'मास्क के पीछे क्या है? के गहरे व्यंग्य

विजय कुमार तिवारी


समीक्षित कृति: मास्क के पीछे क्या है? (व्यंग्य संग्रह)
व्यंग्यकार: अनिला सिंह 'चाड़क'
मूल्य: ₹ 350/-
प्रकाशक: इंडिया नेटबुक्स, नोएडा

साहित्य में व्यंग्य और हास्य को लेकर खूब लिखा जा रहा है,पत्र-पत्रिकाओं में समुचित स्थान मिल रहा है, पाठकों, समीक्षकों, आलोचकों और स्वयं हास्य-व्यंग्यकारों के बीच चर्चाएं-अचर्चाएँ होती रहती हैं। किसी भी विधा की जीवन्तता का यही प्रमाण है। आज के सामाजिक मीडिया के दौर में यदि कोई विधा सर्वाधिक प्रचलित-चर्चित है, बिना किसी संशय के हास्य-व्यंग्य की बातें हो सकती हैं। वैसे यह कोई नई विधा नहीं है, इसका अपना इतिहास है और हास्य-व्यंग्य को लेकर शोधादि कार्य बहुत हुए हैं। बड़े-बड़े धुरन्धर व्यंग्यकार हमारे साहित्यिक दस्तावेजों में सम्मानपूर्वक स्थान पा चुके हैं। आज तो जैसे बाढ़ आई हुई है। हर कोई हाथ आजमाना चाहता है। हर कोई अन्य विधाओं के साथ व्यंग्य के साहित्यिक परिदृश्य से जुड़ना चाहता है। सभी व्यंग्यकारों को सादर नमन कि उन्होंने पाठकों को गम्भीर रचनाओं के बीच हँसने-मुस्कराने की गुंजाइश पैदा की है। हमारी नारी शक्ति भी इसमें लगी हुई है, बुलंदी के झंडे गाड़ रही है और पाठकों के बीच समादृत है।

विजय कुमार तिवारी
ऐसी ही विदुषी व सशक्त व्यंग्यकार अनिला सिंह चाड़क का व्यंग्य संग्रह "मास्क के पीछे क्या है" मेरे सामने है। उनके हिस्से में अनेक व्यंग्य संग्रह, कविता संग्रह, गजल संग्रह आदि प्रकाशित हैं। उन्होंने अनेक बाल कविता, बाल कहानी संग्रहों का संपादन, प्रकाशन किया है। साहित्यिक आयोजनों में उनकी विदेश यात्राएँ हुई हैं और पुरस्कारों-सम्मानों के लिए तो उनका घर छोटा पड़ रहा होगा।

पुस्तक के फोल्डर पर प्रो सत्यकेतु सांकृत ने हरिशंकर परसाई जी के हवाले से लिखा है, "व्यंग्य जीवन से साक्षात्कार कराता है, जीवन की आलोचना करता है, विसंगतियों, मिथ्याचारों और पाखंडों का पर्दाफाश करता है।" उसी परपरा को आगे बढ़ाने वालों के बीच उन्होंने जम्मू की सुश्री अनिला सिंह चाड़क के व्यंग्य लेखन पर चिन्तन किया है। प्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री रामस्वरूप दीक्षित जी ने अनिला सिंह के व्यंग्य लेखन को लेकर लिखा है, "उनके पास व्यंग्य की एक मुकम्मल भाषा है और कहने का बेढब अंदाज। वे गुदगुदाते हुए धीरे से बहुत तीखा कटाक्ष कर पाठक को तिलमिला कर रख देती हैं। यह कौशल एक सुदीर्घ अभ्यास, सचेत और चौकस निगाह रखने पर ही आ पाता है।" प्रो० राजेश कुमार जी ने "शुगर कोटेड पिल्स" शीर्षक के अन्तर्गत सारगर्भित भूमिका लिखी है। संभवतया इस भूमिका के बाद कुछ भी कहने के लिए शेष नहीं बचता।

सुश्री अनिला सिंह चाड़क अपने 'मन की बात' काव्यात्मक शैली में लिखती हैं-"व्यंग्य स्वतः ही अंतस से फूटता है, जैसे फूटती है प्राकृतिक हँसी एक फब्बारे की तरह और आसपास के माहौल को स्वच्छ और निर्मल कर देती है, बिल्कुल उस पानी के फव्वारे की तरह जो पत्तियों और डालियों पर पड़ते ही गरदो गुबार को साफ कर देता है, हास्य-व्यंग्य भी अंतस से फूट कर उस सारे गरदो गुबार का सफाया कर देता है जो समाज के चेहरे पर अवतरित होते रहते हैं।" अपने इस व्यंग्य संग्रह "मास्क के पीछे क्या है? को लेकर लिखती हैं-"मेरा मानना है कि मास्क के पीछे सुगबुगाहट है, बगावत है, कराहट है और मिलावट है, दर्द है, उदासियाँ हैं, चहचहाहट है, कड़वाहट है, प्रकृति की समस्त क्रियाओं की प्रतिक्रियाएँ हैं।" उनका कहना है, यह मास्क ही है जो इतना कुछ छिपा सकता है। इस संग्रह में कुल 26 व्यंग्य संग्रहित हैं जिनसे व्यापक तौर पर उनके व्यंग्य लेखन की धार को समझा जा सकता है।

उनके व्यंग्य के हिन्दी-उर्दू-अंग्रेजी के शब्दों से युक्त शीर्षक ध्यान खींचते हैं और संकेत करते हैं कि जो भी चपेट में आया, कटना ही है। भाषा-शैली हो, तेज धार हो, आक्रामकता हो, भला कोई गुल न खिले, ऐसा हो ही नहीं सकता। जिसकी जैसी दृष्टि, अनुभव करने की क्षमता हो तो अच्छा लेखन होता ही है, उन्होंने अच्छा व्यंग्य लिखा है और अच्छा लेखन करती हैं। 'लल्लन और उनके दुमकटे चमचे' देश-दुनिया में व्याप्त चमचागीरी पर जबरदस्त व्यंग्य है। चमचे दुमदार होने चाहिए जबकि यहाँ उनकी दुम कटी हुई है। चमचागीरी के लिए आत्मा को मारना होता है। व्यंग्यकार ने चमचों पर गहन छानबीन की है, खूब चिन्तन किया है और उनके निष्कर्ष चौंकाने वाले हैं। लल्लन जी के साथ संवाद में भी व्यंग्य छिपा हुआ है और उन्होंने दुमकटे चमचों से सावधान होने की गुहार की है।

व्यंग्यकार में साहस है लोहा लेने का, जो भी पूछिए उसका उत्तर देने का। कोई पूछे-मास्क के पीछे क्या है? तो उत्तर मिलेगा कि चेहरों की बेशुमार संख्या है, तेवर और रंगों के बारे में भी बताया जायेगा। बाॅस को रिझाने, बहकाने वाला चेहरा, चमचागीरी में डूबा चेहरा, भ्रष्ट होते हुए ईमानदारी ओढ़ा हुआ चेहरा, नफरतों से भरा चेहरा, मुहब्बत की झूठी नुमाइश करता चेहरा, नेता का खूंखार चेहरा और न जाने कितने चेहरों की गाथा छिपी हुई है इस व्यंग्य में। अनेक कहानियाँ हैं, लेखिका ने परत-दर परत खोलकर रख दिया है। भाषा-शैली, कथ्य-कथानक सभी प्रभावशाली हैं। मास्क का हिन्दी करण मुख-लंगोट कम रोचक नहीं है। इसी को उन्होंने पुस्तक का शीर्षक बना दिया है। 'कुलबुलाहट सम्मान प्राप्ति की' साहित्य की दुनिया में पुरस्कारों, सम्मानों की दशा-दुर्दशा पर लेखिका ने भयंकर कटाक्ष किया है, कुछ पंक्तियाँ देखिए-साहित्य और सम्मान आपस में मीलों दूर हैं, सम्मान कला से नहीं कलाबाजियों से मिलते हैं, पुरस्कारवादी और अलगाववादी का चिन्तन आदि-आदि। पुरस्कार को लेकर घटनाक्रम, संवाद, जोगाड़ व तरकीबें रोचक हैं और आँखें खोलने वाली हैं। व्यंग्य "दुष्ट संग नहीं देही विधाता" में दुष्ट और पुष्ट पर शोध चौंकाने वाला है यानी जो दुष्टता की सीमा लाँघ गया, वह पुष्ट हो गया। कौआ और हंस की कथा रोचक परन्तु डराने वाली है। आधा कौआ, आधा हंस बनने से बात बनने वाली नहीं है। दुष्टता के इस माहौल में साफ-सुथरा बने रहना मुश्किल है। लेखिका की चिंता, चिन्तन और परिवेश का ज्ञान चौंकाता और सावधान करता है।

मुस्कराहटों ने शायद व्यंग्यकार को बहुत छला है, वे हाथ धोकर पड़ गई हैं, परत-दर-परत सच्चाई खोलती जा रही हैं और मान बैठी हैं, मुस्कराहटें बहुत घातक होती हैं। उनकी कविता देखिए-प्रेम से भी किया जाता है वार। उनके पास जानलेवा वनस्पतियों के उदाहरण हैं। शायरों की शायरी, रामकालीन नाक काटने का प्रसंग और बहुत कुछ है जो उनके अनुभव को विस्तार देता है। उन्होंने इस कला को आजमाना चाहा, लिखती है-आज जब हमें मुस्कराने की ज़रूरत पड़ी, चेहरे के अन्य अंगों ने अलगाववादी प्रवृत्ति अपना ली। जबरदस्ती कुछ भी नहीं किया जा सकता। हारकर उन्होंने तय कर लिया, अब झूठी तो क्या सच्ची मुस्कराहट भी चेहरे पर नहीं लाएंगे। वैसे इसकी ज़रूरत उन्हें पड़ती है, जिन्हें सौन्दर्य का टोटा पड़ा हो। इस तरह मुस्कराहटों को लेकर उनका बेबाकीपन अद्भुत व्यंग्य सृजित किया है। साहित्य में चोरी की परम्परा पहले से ही है और यह व्यंग्य विधा में जोरदार तरीके से उछाला जाता है। उनके नानाजी कहा करते थे-'चोर इतने निपुण होते हैं कि आँख से काजल चुरा लेते हैं और दूसरी आँख को खबर तक नहीं होती।" 'चौर्य से शौर्य तक' व्यंग्य में उन्होंने साहित्य में चोरी को खूब चित्रित किया है। निश्चित रूप से उनको खूब पाला पड़ा होगा। इसके कुछ लाभ भी हो सकते हैं जैसे बुढ़ऊ की डायरी से निकली कविता सौन्दर्यमयी सुरीले कंठ से निकल रही है। व्यंग्यकार की यह शैली, उनका अनुभव चमत्कृत तो करता ही है, यह भी दिखाता है, वह स्वयं भी कम निपुण नहीं हैं, दूसरों द्वारा साहित्य चोरियों का जीवन्त चित्रण करती है और पाठकों को सम्मोहित और सावधान करती हैं।

उनकी शैली देखिए-अभी-अभी मोबाइल ने खनकना शुरू किया है। हमने भी कुहुकते हुए जवाब दिया, कहिए? यह खनकना और कुहुकना जब अनिला सिंह 'चाड़क' के लेखन में हो, तो व्यंग्य उभरेगा ही और उसी का नतीजा है यह व्यंग्य रचना "मार्शल आर्ट फार लिविंग"। कुछ पंक्तियाँ देखिए-पहले हम आंतरिक प्रेरणा से मिमियाते थे, अब रिमोट कंट्रोल मिमियाने का बटन दबाता है तो हम मिमियाने लगते हैं, भौंकने का बटन दबाता है तो हम भौंकने लगते हैं। आँख, नाक, कान, गुर्दा, फेफड़ा आदि सबको लेकर लिखा गया यह व्यंग्य झकझोरता है। उनके व्यंग्य में थोड़ा हास्य, थोड़ी नजाकत और शेष सारा यथार्थ है। शरीर के अंगों को आधार बना उनका चिन्तन समझने योग्य है और उनकी तैयारी भी। वे लिखती हैं-"हम भविष्य में करीने से मार्शल आर्ट ज़रूर सीखेंगे और संसार की समस्त नारियों को सिखायेंगे--आप सब भी देखना---हम भी देखेंगे"। 'नंगा क्या नहाए क्या निचोड़े?' आज की आधुनिकता को लेकर जबरदस्त व्यंग्य है। पहले गरीबी थी, कपड़े पर्याप्त नहीं थे, इसलिए यह उक्ति प्रचलित थी। अब कपड़ा और रोटी जीवन से छूमंतर होता जा रहा है। जिस्म को उघाड़ने के फैशन ने सब कुछ नंगा कर दिया है और इन विचारों पर उन्होंने सही और सार्थक टिप्पणी की है-"यह सब कमीने हमें आदिमानव बनाने पर तुले हैं।" आज की औरत को लेकर उनका कटाक्ष और आक्रोश समझने योग्य है। वे लिखती हैं-"सुन्दरियों के जनून की लहर कहीं उनकी आत्मा भी न नंगी कर दे।" आज यह दुनिया स्वयं नंगा होने के लिए उतारू है और इसी सोच पर उनका व्यंग्य सावधान कर रहा है।

"लोकेशन मरने के बाद की" रचना का व्यंग्य और हास्य 'चाड़क' जी के मन की उड़ान दिखाती है। ऐसे दृश्य होते ही हैं घरों में और यह घरेलू आपसी खींचतान की अद्भुत कहानी है। पति-पत्नी के बीच की नोक-झोंक, वर्चस्व बनाए रखने की कोशिश, जीवित और मृत लोगों की तस्वीरों का सवाल, सब कुछ रोचकता लिए चित्रित हुआ है। सबसे रोचक तो उनकी भाषा है, लड़ाकू और आक्रमण करती हुई। झंडू और झंडी जैसा नामकरण और बिंब खूब हँसाने वाले हैं। लगता है, अनिला सिंह 'चाड़क' ने ऐसा जीवन्त युद्ध स्वयं अपने आसपास कहीं देखा है तभी ऐसे दृश्य सटीक रूप से दिखाई दे रहे हैं। "दशा हमारी दिशा पंडित की" पुनः रोचक और शिक्षाप्रद व्यंग्य हमारे सामने है। ग्रह-नक्षत्र, ज्योतिष, पंडित, ज्योतिषी आदि को लेकर उनका हास्य-व्यंग्य चित्रण सावधान करता है और ज्ञान देता है। उन्हीं का लिखा देखिए-हमने अब साफ-साफ पंडित जी से कह दिया कि ग्रहों की दशा इतनी बुरी नहीं है जितनी आपकी हमारे घर की ओर आने वाली दिशा, इसलिए हमारे पर रहम खाइए और अपना रास्ता और दिशा किसी दूसरे घर की ओर मोड़िए।

उनके हास्य व व्यंग्य रचनाओं में प्रतीकों, मुहावरों और बिंबों का कमाल उभरता है। विरोधी या दुखद परिस्थितियों को भी हास्य का विषय बना लेना उनके लिए सहज है। वे स्वयं पर व्यंग्य कर लेती हैं और कोई रोमांस का दृश्य दिखा देती हैं। सबसे कठिन होता है अपने-आप पर हँसना। "छूटती हुई हवाई यात्रा" की पंक्ति देखिए-तू भी मेरे साथ चिपकी हुई एक ट्राली है जिसे मैंने भी घसीटा है----उनके ख्वाबों का जहाज भी शादी के बाद वक्त के पहले ही उड़ गया।" लेखिका फिल्म के दृश्य जोड़ती हैं और गाती हैं-तन्हा--तन्हा दुख भोगेंगे---तन्हा--तन्हा गायेंगे। किंगफिशर और सुन्दरियों को लेकर वे जबरदस्त व्यंग्य करती हैं, बल्कि आक्रमण करती हैं। एयरपोर्ट का टुकड़ा-टुकड़ा दृश्य उनकी चिन्तनधारा और उड़ान दर्शाता है। यह उनकी क्षमता ही है एयरपोर्ट पर रात भर जागने की पीड़ा को हास्य-व्यंग्य के रूप में लिखकर स्वयं आनंद ले रही हैं और पाठकों को भी दे रही हैं। वैसे ही उनका छोटा सा व्यंग्य है-"सेक्यूलर मच्छर की हिमाकत", पंक्तियाँ देखिए-"वह(मच्छर) इस बात से अनभिज्ञ था कि सबके खून में कुछ खुराफाती अंश पाए जाते हैं जो आपस में मिलकर खूंखार प्रवृति के हो जाते हैं और आपस में भिड़कर मर जाते हैं।" चाड़क जी ने एकता के लिए अच्छी कल्पना की है और दुश्मनों की पहचान भी।

'गिरे गाज तुम पर प्याज' प्याज को लेकर स्वस्थ और सुंदर व्यंग्य है। सुखद यह है, इस प्याज ने सुंदर सी व्यंग्यकार के आँसू निकाले हैं और यह सूचना उन्होंने स्वयं दी है। ज़रूरत से ज्यादा भाव बढ़ने की वजह से वह दुर्लभ हो जाती है और उसके मुखौटे पर मुखौटे से कोई भी रहस्य समझ नहीं पाता। प्याज के ऐसे-ऐसे कारनामे हैं, कोई भी पंगा नहीं ले सकता। चाड़क जी ने ऐसा वर्णन किया है मानो उनका खूब पाला पड़ा है। 'अंग्रेजियत का लंगोट' किंचित भिन्न तरह का व्यंग्य है। उनके पास हिन्दी, उर्दू, कश्मीरी, अंग्रेजी, भोजपुरी के शब्द हैं और धड़ल्ले से प्रयोग करती हैं। मुहावरे और कहावतों से उनकी भाषा-शैली चमत्कृत करती है। खूब खुलकर, साहस के साथ लिखती हैं, मानो यह कोई उनकी मर्दाना शैली है। लंगोट का उदाहरण ही देख लीजिए, लिखती हैं-इस लंगोट को सिर का हैट बना लिया और बड़ी शान से लंगोट ढोते रहे यानी जितनी अंग्रेजी वह छोड़ गए थे उसे माथे का ताज बना लिया। अंग्रेजी के अधूरे ज्ञान के अनेक रोचक प्रसंग लिख कर उन्होंने खूब हँसाया है। ऐसा होता ही है परन्तु हम इसके खतरे को समझ नहीं पा रहे हैं। चाड़क जी ने अंग्रेजियत के लंगोट को सही पकड़ा है, उम्मीद है हमारे देशवासी उनके व्यंग्य की धार को समझेंगे।

शीर्षक का चुनाव भी व्यंग्य की दशा-दिशा बताने लगता है और ज्ञात होने लगता है कि अमुक व्यक्ति बना ही है व्यंग्य लिखने के लिए। उनके भीतर आवश्यक सारे गूढ़ तत्व भरे हुए हैं, जब चाहें, जहाँ चाहें उन्हें व्यंग्य दिख जाता है। यह उनकी आँखों का कमाल है और मन-मस्तिष्क तो तैयार ही रहता है। कूड़ा आख्यान को समेटे उनका शीर्षक "कूड़ा-कूड़ा एवरीवेयर" उनकी समझदारी, लाचारी और भावनाओं का सटीक चित्रण है। उनकी अपनी दृष्टि साथ देती ही है, वे नत्थू जैसे लोगों से ज्ञान हासिल करती हैं, विदेश से भारत दर्शन के लिए आने वालों को कूड़ा पहाड़ दिखाती हैं। उनकी रचनाओं में स्त्रियाँ होती हैं, इधर से हों या उधर से, खूब कटाक्ष करती हैं। स्त्री होकर भी उन्होंने स्त्रियों को दुनिया की सारी समस्याओं से जोड़ रखा है और हर व्यंग्य में झाडू़ दिखा देती हैं। सामने का और भीतर पसरा सारा कूड़ा मूर्त होकर अद्भुत व्यंग्य बन जाता है। वैसे ही "कोरोना का रोना" शीर्षक वाले व्यंग्य में सीधे परमात्मा से ही स्पर्धा है। वह एक ताज से सुशोभित है, यह अनेक ताज पहने विचर रहा है। मनुष्य भय के चलते बहुत कुछ करता रहता है। कोरोना ने भगवान को ही लाॅक कर दिया और स्वयं विचरण करने लगा। लोग डर-डर कर जीने लगे हैं। लेखिका का मत है, परमाणु बम न बनाकर यदि लोगों के लिए रोटी का जुगाड़ किया गया होता तो लोग इस तरह सड़कों, रेल की पटरियों पर भूखे पेट न मरते। कोरोना ने प्रकृति को, परिन्दों, जानवरों को स्वच्छन्द कर दिया है। लोग घरों में दुबक गए, अपने बुरे कर्मों का हिसाब लगाने लगे हैं और सुधरने लगे हैं।

'हक से मांगो प्रिया गोल्ड' की पंक्ति देखिए-"काले रंग में एक विशेष गुण है कि वह खुद पर पड़े दाग-धब्बों को दिखने नहीं देता, आत्मिक तौर पर सफेद शफ्फाक लोग बिना कोई सवाल किए ग्रहण कर लेते हैं।" कौए का उदाहरण देते हुए वे बताती हैं, लोग एडजस्ट करने की सलाह देते हैं परन्तु कौए कभी एडजस्ट नहीं करते। उन्हें अपना हक लेने आता है। कालेपन में इनर्जी लेवेल अधिक होता है क्योंकि वह वातावरण से इनर्जी चूसता है। रिश्तेदारों के मन में प्रेम का सागर सूख चुका है, वे प्रेम की वजह से नहीं पधारते, बस खाने-पीने, लूटने की वजह से आते हैं। इन सभी प्रसंगों की चर्चा करते हुए लेखिका ने व्यंग्य सृजित किया है। कभी-कभी किंचित अति की बू आती है उनके देखने, समझने और लिखने में। हमेशा भोगकर ही सीखा जाए, ज़रूरी तो नहीं, सबको सावधान, सचेत भी रहना चाहिए। 'शहदीली जुबान' रोचक और यथार्थ से भरा व्यंग्य है। रचनाकार को कटु अनुभव हुए हैं और अब उनपर रूखा बोलने का आरोप लगता है। सामने कुछ और, पीछे कुछ और की चर्चा होती ही है, किसी के साथ फोनवार्ता प्रसंग ने हिलाकर रख दिया है। मोबाइल, जिह्वा आदि सबसे प्रश्न करती हैं, शहदीली होने का रहस्य जानना चाहती हैं और स्त्रियों को लेकर तनिक अधिक ही चिन्तित हैं।

अनिला सिंह 'चाड़क' अपनी व्यंग्य रचनाओं में बिंब का सहारा लेती हैं, कटाक्ष करती हैं और शब्दों की जादूगरी दिखा देती हैं। 'मक्खी बनाम डेमोक्रेसी' के सारे दृश्य ऐसे रचे गए हैं मानो उन्होंने सब कुछ अपनी खुली आँखों देखा है। सुखद संयोग यह भी है, जाँच-पड़ताल का जिम्मा मक्खी पर है। ऐसे बिंब में ढालना किसी के लिए साहस ही माना जायेगा। उन्होंने मक्खी प्रसंग बार-बार देखा और अनुभव किया है। मास्टर जी की राष्ट्र भक्ति को मक्खी ने प्रभावित किया था, यह कुलभ्रष्ट प्रसंग सामने ही है, ऐसे में मक्खी से बेहतर कुछ हो नहीं सकता रहस्योद्घाटन के लिए। कोरोना ने दूसरी मुसीबत खड़ी कर दी है। लोग कोरोना और मक्खी दोनों से परेशान हैं, एक मास्क पहनने को मजबूर करता है और दूसरा मास्क उतरवाने पर आमादा है। सबसे रोचक और सच्चाई स्वयं मक्खी बयान करती है और अपनी व्यथा बताती है। कहानी में विक्रम और बेताल का आगमन होता है। इस कथा का व्यंग्य तो सभी समझ रहे हैं परन्तु संदेश समझने के लिए उन्हीं की शरण में जाना पड़ेगा। जीवन में नित्य नए-नए अनुभव सबको होते हैं और एक से एक धुरंधरों से पाला पड़ता है। "मैं चरित्रवान हूँ" जैसा व्यंग्य होना ही था इस संग्रह में। व्यंग्यकार ने जीवन के नाना संदर्भों, सम्बन्धों को देखा है, परखा और समझा है। चरित्र प्रसंग से तो दुनिया बेहाल है, स्त्रियों ने पुरुषों को देखा है, पुरुषों ने स्त्रियों को आजमाया है और इसी में चरित्रवान व चरित्रहीन की सच्चाई छिपी हुई है। कथा रसिक लाल जी की है और लिखा है एक सधी हुई साहसी व्यंग्यकार ने। यह कथा बड़ी भी है, इसके दृष्टान्त सर्वत्र मिल जाते हैं, विषय-वस्तु, कथ्य-कथानक की कोई कमी नहीं होती। व्यंग्यकार की प्रश्नोत्तरी और संवाद शैली जबरदस्त प्रभाव छोड़ रही है, शायद यह उनका प्रिय प्रसंग हो व्यंग्य लिखने के लिए।

व्यंग्यकार की एक और विशेषता होती है, वह शब्दों के साथ खूब खेलता है और नाम चुनकर ले आता है। 'शरीफ बनाम बदमाश' व्यंग्य में उन्होंने डुप्ले जी का उल्लेख किया है। यह भी कोई नाम हुआ? वे किसी से मिलते हैं तो कोहनियों तक हाथ जोड़ देते है। बदमाश तो कभी ऐसा नहीं करते। उनकी पत्नी रहस्य खोलती है-"वह कूल नहीं, नामाकूल है, हमेशा मेरे प्रतिकूल हैं और मेरे लिए फूल हैं।" वे बताती हैं-डूप्ले जी ने सफेद रंग का चोगा भीतर के कालेपन को छिपाने के लिए पहना है, वे सफेद कपड़े पहनकर लोगों को भ्रमित करते हैं। पीछे बैठे दूसरे सज्जन ने डूप्ले जी को लेकर कहा-इन्होंने न जाने कितने शरीफ लोगों को रिझाकर अपने भीतर गुड़प लिया है। वे खुलकर हँसते नहीं। व्यग्यकार को पता है-डूप्ले जी शराफत की आड़ में पत्नी की आत्मा को निगल चुके हैं और न जाने कितनों की आत्माओं का अपहरण किया है। वे आकर पास बैठें, इससे पहले ही उन्होंने बाहर का रास्ता पकड़ लिया। "ईमानदार कुत्ते और कला निपुण दरवाजे" जैसी रचना में लोगों के परस्पर विरोधी चरित्र की झलक मिलती है। यह हमारे समाज की आज की सच्चाई है। वहाँ शेरू और मुरारी लाल जी हैं, उन्हीं की चर्चा है और व्यंग्यकार लिखती हैं-इस कुत्तामयी वातावरण में हमें लग रहा था कि हम कहीं कुत्ते में ही परिवर्तित न हो जाएँ और भौंकने लग जाएं। ईमानदार कुत्ता और बेइमान मालिक के साथ निभ कैसे रहा है? ये सारे दृश्य झकझोरते हैं, प्रश्न विचलित करते हैं और व्यंग्य चमत्कृत करता है।

'चूहों की भागीरथी" छोटी सी व्यंग्य रचना में चूहों की भीड़, घर में अनधिकार प्रवेश, एक-एक चीज को कुतर-कुतर कर नष्ट करना, उछल-कूद मचाना और डराना, मनमानी करना प्रायः सबने देखा है। चाड़क जी लिखती हैं-जैसे भारतीय अपने देश की आत्मा तक को कुतर जाते हैं, चूहों का निशान भी हमारी आत्मा थी, हम अहिंसावादी थे और वह हिंसावादी। चूहों को लेकर व्यंग्यकार ने देश का सच लिखा है। भले ही यह उनका अपना चिन्तन व विचार है परन्तु व्यंग्य पढ़ने योग्य है। चूहों के बाद बिल्ली पर "खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे" जैसा व्यंग्य अनिला सिंह की सोच दर्शा रही है। यहाँ भी चूहा है, मास्टर जी का पाजामा है और उनके साथ बिल्ली का संवाद है। कहानी को बुनने के लिए व्यंग्यकार को बहुत दूर जाना नहीं पड़ा है, सारा माल-मसाला आसपास ही है और यह शीर्षक तो जमाने से उपलब्ध है। उनके पास कला है, कथ्य-कथानक है और बिल्ली का संकल्प है। वह मास्टर जी से कहती है, "मैं तेरा दुष्चरित्र नोचूंगी, अनैतिक मूल्यों को नोचूंगी, सड़ी-गली शिक्षा-प्रणाली को नालों में डालूँगी।" दिमाग की खिड़की खुलती है-यह बिल्ली रूपी जनता हमेशा खिसियाती हुई खंभों को नोचने की तीव्र इच्छा लिए हुए अपने सिर के बाल नोचती होगी क्योंकि समाज का जहर उसे खिसियाने के लिए उकसाता होगा और लीडर रूपी चूहे फलों का आनंद लेते होंगे।

'समाज में चेहरों का योगदान' व्यंग्य लिखते समय अनिला सिंह जी के जेहन में उनके लम्बे जीवन के कटु अनुभव वाले चेहरे साक्षात आ खड़े होते होंगे। उनकी भाषा में ये भेड़िए हैं कभी शेर की खाल ओढ़ लेते हैं और कभी बगुला भगत की तरह खड़े हो जाते हैं। उनके अनुभव रोचक हैं। कोई उनका अधीनस्थ कर्मचारी सामने रोनी सी सूरत में प्रोन्नति के लिए याचना करता है और बाहर निकल कर वीभत्स हो उठता है, दाँत निपोरता है और उल्लू कहता, समझता है। यह तो हिल जाने वाली घटना है। ऐसे ही कुछ दूसरों के व्यवहार-विचार, हाव-भाव और चेहरे-मोहरे के बारे में उन्होंने यथार्थ चित्रण करते हुए लिखा है और खूब व्यंग्य का प्रसाद बांटा है। वे लिखती हैं-"चेहरे, समाज में एडजस्ट होने के लिए कितना बड़ा योगदान दे सकते हैं।"

उनके व्यंग्य संग्रह "मास्क के पीछे क्या है?" का अंतिम व्यंग्य 'यक्ष का दक्ष' है। व्यंग्यकार को किसी संपादक का पत्र मिला है और स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती पर व्यंग्य लिखने का आग्रह किया गया है। व्यंग्य में विवादास्पद बात नहीं होनी चाहिए। उन्हें लगता है मानो हमें हुक्म दिया जा रहा है कि अपने हाथ-पैर बाँधकर विसंगतियों के गाल पर जोर से तमाचा मारो, आँखें फोड़ लो और समाज में फैली विकृतियों को ढू़ँढ-ढूँढकर आकार दो, टांगें कटवाकर स्वतंत्रता की जय-जयकार करते हुए तेज दौड़ो और मंजिलों को पा लो, सूँघने की सारी शक्तियों को क्षीण कर लो और सूँघकर पता लगाओ कि समाज का कौन सा अंग सड़ रहा है। स्वतंत्रता को संबोधित करते हुए व्यंग्यकार की बातें व्यंग्य के साथ तार्किक भाव-संवेदना व्यक्त करती है। "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा" किसी महापुरुष की बातों को याद करती हैं और लिखती हैं-"हमें यह महसूस हो रहा है कि दुनिया की हर शह स्वतंत्र है, गुलाम है तो सिर्फ हमारी कलम।" आगे यक्ष प्रसंग को उन्होंने रोचक तरीके से प्रश्नोत्तरी में ढाला है ताकि पाठक हँसते रहें।   

इस तरह देखा जाए तो हास्य-व्यंग्य की रचनाएँ खूब लिखी और पढ़ी जा रही हैं। इस विधा ने साहित्य में अपनी जड़े जमा ली हैं और व्यंग्यकार सम्मानित-पुरस्कृत हो रहे हैं। अनिला सिंह चाड़क के व्यंग्य संग्रह को पढ़ते हुए लगा, उनके पास शब्दावली है, कहावतें-मुहावरे हैं, कथ्य आधारित भाषा और बेबाकपन वाली शैली है। सारे दृश्य उनके आसपास के हैं और चरित्र कुत्तों, चूहों, बिल्लियों वाले हैं। निश्चित रूप से उन्होंने मनुष्य के भीतर जड़ जमाए स्वार्थ, ईर्ष्या, लोभ-लालच जैसे दुर्गुणों को खूब चित्रित किया है। पढ़े-लिखे समाज के दोहरे चरित्र वाले पुरुषों और स्त्रियों को खूब लताड़ा है। स्त्रियों पर उन्होंने बार-बार व्यंग्य किया है, उनकी भावना है कि स्त्रियों का उज्वल चरित्र हो, वे छोटे-छोटे स्वार्थों के लिए समझौता न करें। उन्होंने निश्चित ही ऐसे दृश्यों को देखा है और विचलित हुई हैं। कभी-कभी उनका  भाषा-संयम आक्रामकता के साथ उभरता है, इसका अपना सौन्दर्य और अपनी मर्यादाएँ हैं। वे जानती सब कुछ हैं और स्वच्छन्दता पूर्वक जितना मन होता है, पाठकों के सामने परोस देती हैं या जितना चाहती हैं छिपा लेती हैं। कुल मिलाकर उनका व्यंग्य प्रभावशाली दिखाई देता है।

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