काव्य: प्रतिभा चौहान

प्रतिभा चौहान
1. फ़िलहाल तो इतना ही है हिसाब

पहले खलबली थी उनमें
कि वक़्त को ख़रीदा जा सकता है रुपये से
फिर उगा विश्वास कि सब कुछ ख़रीदा जा सकता है
मसलन आदमी को भी

उद्योग-व्यापार व आधुनिकता के दौर में
यों तो बहुत से चेहरे थे क़ीमत लगाने वालों के
पहले नर्क पर सवाल था
अब स्वर्ग के होने में संदेह है

वे दंभ को झूठ की चादर में लपेटकर ओढ़ लेते हैं
एक ख़ूबसूरत लिबास की तरह
करते हैं हासिल अभिनय की तालीम
और संततियों को देते हैं इसके गुर संस्कारों के नाम पर

अब समय के हिसाब से
वे न नर्क को मानते हैं
न स्वर्ग की ही करते हैं कल्पना
करते हैं भरोसा ताकतवर होने के तर्क पर

कल्पनाओं में जीते हुए नहीं उठाते लुत्फ़ किसी अनजाने ख़ौफ़ से
सौदा कर जाते हैं वे लोग
जो नर्क से भी नहीं डरते
बस डरते हैं तो सिर्फ़ ताक़त कम होने के भय से

कुछ तो इन्हें ही बना लेते हैं अपनी पहचान का हिस्सा
बनना चाहते हैं धूल में गिरे हुए सिक्के सा चमकना
कभी कभी कर देते हैं आत्मरक्षा में हिंसा
क़ानून का इसे हिस्सा बताते हुए

फ़िलहाल तो इतना ही है हिसाब

कोई कर सकता है किसी का नुक़सान
स्वर्ग-नर्क की कल्पना को धता बताते हुए।


2. भयक्रान्त

तुम वही देखते हो
जो देखना चाहते हो

वही सुनते हो जो
सुनना चाहते हो

शेष की कल्पना तक डराती है
और तो और

तुम्हें उतना हँसना भी नहीं चाहिए
जितना हँसता हुआ कोई बेजरूरी लगे

हृदय में उठी हर बात
जुबाँ तक आने में कतराती है

तुमने किस तरह से देखा एक स्त्री को
कि तुम खुल कर तारीफ करने में भी भयक्रान्त हो उठते हो

उसके अस्तित्व और ऊँचाई से डरते हुए
तुमने खुद को हमेशा किया श्रेष्ठ साबित

वो ऐसे
कि जब सब तुम्हारे जैसे लोग एकत्रित हुए

तुमने बजाई झूठी विजय की दुदुंभी
और खुद को कर दिया विजेता घोषित

बिना किसी चुनाव के।


3. हमेशा बची रहती है एक और संभावना

पतझड़ के दिनों में
सिर्फ बचा बजूद

और उसमें सिमटी हुई कई उम्मीदें
उम्मीदों के तार रात में तारों से

जुगनुओं की झिलमिलाहट में
सूरज की पहली किरण से

जुड़े रहे बरस दर बरस
दरख्त को मालूम था

झड़ने, गिरने, जमीदोंज़ होने से पूर्व
हमेशा बची रहती है एक और संभावना।


4. जितना पुराना प्रेम है उतनी पुरानी हिंसा 

जितना पुराना प्रेम है
उतनी पुरानी हिंसा

बनते बिगड़ते हालात में
दोनों रहे हमेशा

जब हिंसा ने तोड़े आशियाने और जीने की आस
जमीं को कर दिया बंजर आख़िरी हद तक उदास

पुराने दरख्तों की जमीं हो गई खंडहर
आने जाने वाले लोग और उनके परित्यक्त सामान

जिस तरह नहीं छोड़ती रोशनी
अपने होने का सबूत

ठीक उसी तरह
मनुष्य में बनी रहती है नैतिकता की जीवित संभवाना।


5. वह सब्र में पकी हुई औरत उफ नहीं करती

हम सब पढ़ना चाहते हैं, प्रेम
लिखना चाहते हैं, प्रेम
प्रेम की बात करते नहीं थकते

और नकारने लगते हैं एक दिन
उस के अस्तित्व को ही

अपने जीवन में प्रेम में पड़े हुए उसी शख्स से
समय गुजरता है कुछ यूँ

जैसे छोटे स्टेशन से गुजरती हैं धड़धड़ाते हुए कोई राजधानी
बेखौफ़, बेअंदाज,बेतकल्लुफ़

जिस लड़की की आँखों में सजाए थे सपने
हथेली पर रखा था प्रेम का बीज

वह अभी भी खड़ी है उसी चौराहे पर
उसी बीज से पनपे वृक्ष की छाया में

अपनी ख्वाहिश को अपने दुपट्टे के कोने से बांधे
कई कई मौसमों के लिए हुए
कभी किसी अंधेरी कोठरी के सन्नाटे में सोचना
उसके इंतज़ार की धड़कती हुई सिमफनी

वह सब्र में पकी हुई औरत
उफ नहीं करती

बस गुजर जाती है किसी दिशा में फैले हुई क्षितिज सी
जिसका अस्तित्व होता भी है और नहीं भी।

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