जीवन के विविध रंगों से झिलमिलाती कहानियाँ

समीक्षक: अशोक बैरागी

पुस्तक: मेरी प्रिय बाल कहानियाँ
लेखक: डा. सुनीता
प्रकाशक: इंद्रप्रस्थ प्रकाशन, नई दिल्ली
संस्करण: 2023
पृष्ठ: 215
मूल्य: 650 रुपए

बाल साहित्यकारों में डॉ. सुनीता का नाम बड़े आदर व सम्मान के साथ लिया जाता है। बहुत ही सरल, सौम्य एवं ममतालु व्यक्तित्व की धनी सुनीता जी उन उत्कृष्ट साहित्यकारों में है, जो बाल साहित्य को ऊँचाइयों तक ले जाने में नींव के पत्थर की तरह काम कर रहे हैं। इनकी बाल कहानियाँ कहानी के पूर्व बने ढर्रे को तोड़कर चलती हैं। और बच्चों को अच्छा इनसान बनने के लिए उनमें मानवीय संवेदनाओं को जगाती हैं।

सुनीता जी की कहानियों में झलकता ग्रामीण परिदृश्य ही उनका सबसे अलग और सबल पक्ष है। वे गँवई अस्मिता के चित्र और चरित्र को इतने अनूठे ढंग से उभारती हैं कि कहानी पढ़ने-सुनने वाला स्वयं उसी परिवेश का अभिन्न अंग बन जाता है। उनकी कहानियों में गाँव-देहात की ताजी आबोहवा, सादगी भरा रहन-सहन, शुद्ध खान-पान, धार्मिक तीज-त्योहार, सात्विक आचार-विचार, व्यस्त दिनचर्या, सरल स्वभाव, बढ़िया आदतें, सुंदर संस्कार और वहाँ की सहज जीवन शैली लहकती-महकती नजर आती है।

सुनीता जी की एक बड़ी विशेषता यह है कि शहरी तथा महानगरीय चमक-दमक, अति भौतिकवादी परिवेश, बेचैनी और तनाव भरा जीवन, दूषित पर्यावरण और संस्कारहीनता को वे कथा में सरलता से पिरो देती हैं। दूसरी ओर, ग्रामीणों का सीधा-सरल और कम से कम सुख-सुविधाओं का आदी, फक्कड़ मस्ती भरा खुशहाल जीवन उनके कथानकों का अहम हिस्सा है। यहाँ परिवेश और संस्कारों की एक अप्रत्यक्ष तुलना है और बेहतर के स्वीकार की प्रेरणा है। लेखिका शायद यह बताना चाहती हैं कि जीवन का वास्तविक सुख अपनों के बीच परस्पर प्रेम और शांति से रहने में है।

अशोक बैरागी
सुनीता जी की कहानियों में साठ के दशक के गाँवों की आदर्श छवि नजर आती है। और इसका कारण भी स्पष्ट है। सुनीता जी ने बचपन में गाँव और उसके रीति-रिवाजों को बड़े नजदीक से जिया है। बाद में वे घरेलू कारणों से नगरों-महानगरों में रहीं और शहरी जीवन को भी उन्होंने निकट से देखा। इसके बाद भी उनके मन के किसी कोने में धूल-धुएँ से भरे अनौपचारिक से अनगढ़ गाँवों की स्मृतियाँ रची-बसी हैं। अतः ये जिए हुए अनुभव और स्मृतियाँ ही इनकी कहानियों में बार-बार नए और अछूते कथानक के रूप में सामने आती हैं।

पिछले दिनों उदारमना सुनीता जी का सद्य प्रकाशित कहानी संग्रह ‘मेरी प्रिय बाल कहानियाँ’ पढ़ने को मिला। पुस्तक का आवरण बेहद आकर्षक है, जिसमें फूलों से भरी रंग-बिरंगी, खुशबूदार क्यारी में खेलते, चहकते, महकते बच्चे अपनी कल्पनाओं में परियों की तरह उड़ रहे हैं। साथ ही वे भँवरों और तितलियों की-सी मस्ती भरी गुंजार कर रहे हैं। वास्तव में जितने रंग, खुशबू, सुंदरता और निर्मलता पुस्तक के आवरण चित्र में है, उससे कहीं अधिक संवेदनाओं की खुशबू, जीवन के विविध रंग, जीने की कला, व्यवहार की निर्मलता, बाल मन का सौंदर्य और भाषा-शिल्प की सहजता अंदर की कहानियाँ में समाई है। सच पूछिए तो ये कहानियाँ नहीं, बल्कि जीवन की गढ़ी हुई वे कलात्मक मूर्तियाँ हैं, जो सरस भावों की मिट्टी को लेकर अनूठे शिल्प से तराशी गई हैं। आत्मकथात्मक संस्मरणों जैसी ये कहानियाँ बच्चों का भावात्मक, नैतिक और चारित्रिक विकास करती हैं।

डॉ. सुनीता
स्वयं सुनीता जी अपनी कहानियों के विषय में लिखती हैं, “ये बच्चों को भीतर से आर्द्र, संवेदनशील और आगे चलकर एक बढ़िया इनसान बनाती हैं, जो हर किसी के दुख-दर्द को महसूस कर सकता है। इस तरह बाल कहानियाँ जाने-अनजाने उनके भीतर एक तरल-सा, भला-भला सा संस्कार भी पैदा करती हैं, जिससे जीवन में पग-पग पर उन्हें खयाल रहता है कि हमें क्या करना चाहिए, क्या नहीं? और जीवन के कठिनतम क्षणों में भी वे सच्चाई का साथ नहीं छोड़ते। पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों को भी बच्चा सबसे पहले कहानियों के माध्यम से ही सीखता है और फिर ये गहरे संस्कार आगे चलकर उसकी दृढ़ जीवन-आस्था में बदल जाते हैं।”

इस संग्रह की कहानियाँ इस आदर्श कसौटी पर कितनी खरी उतरती हैं, यह तो कहानियों का अध्ययन करने से पता चलेगा। लेकिन यह सच है कि अच्छी कहानी किसी बच्चे को पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरण संबंधी मूल्यों को सहज आस्था एवं विश्वास के साथ जीने के लिए प्रेरित करती है। अपनेपन की भावनाओं, संवेदना और कल्पनाओं को विस्तार देती हैं।

चलिए पहले ‘नीला का नया स्कूल' (कहानी) में चलते हैं। आठ वर्षीय नीला धुन की पक्की, परिश्रमी और आत्मविश्वास से भरी बालिका है। उसकी पढ़ने-लिखने की लगन को देखकर माँ उसके सपनों को पंख लगाना चाहती है, यानी उसे खूब पढ़ना-लिखना चाहती है। पर नीला के साथ बड़ी समस्या यह है कि उसके पिता का हर दूसरे-तीसरे साल तबादला हो जाता है। इस बार भी पिता जी की बदली कैथल से पानीपत हुई। लेकिन यह क्या! फूलाँ बहन जी इतनी अक्कड़ और निर्दयी। बाहरी रूप से देखने में उनका व्यक्तित्व बड़ा ही धीर-गंभीर, कुछ-कुछ डरावना सा। पहले ही दिन टेस्ट! ऊपर से लहजा भी सख्त! उसकी माँ सहज विनम्रता से कहती है, “बहन जी, यह दूसरी में सेकिंड आई है। होशियार है। आपको तंग नहीं करेगी। आप इसे दाखिल कर लें।”

इस पर फूलाँ बहन जी का रवैया देखिए, “ऐसे कैसे कर लूँ? पहले टेस्ट देणा पड़ेगा।” उनकी लंबी-चौड़ी काया और बड़ी-बड़ी आँखें जिनमें थोड़ा गुस्सा भरा हुआ था, देखकर नीला कुछ डर-सी गई। उसके हाथ काँपने शुरू हो गए, साथ ही रुलाई भी छूट गई। और जब टेस्ट में घबराहट के मारे नीला ठीक उत्तर नहीं दे पाई, तो फूलाँ बहन जी बड़े गुस्से और व्यंग्य से उसकी माँ से कहती हैं, “आप तो कह रही थी कि यह लड़की सेकिंड आई है। इसे तो यह भी नहीं पता कि रुपए, आने, पाई का घटा-जोड़ कैसे करते हैं। ले जाओ इसे। इतनी नालायक लड़की को मैं नहीं दाखिल करूँगी। यह तो मेरी क्लास में पास भी नहीं हो सकती।”

सुनीता जी कहना चाहती हैं कि अध्यापक का रवैया, उनका व्यवहार किसी ममतालु माँ जैसा मधुर होना चाहिए। बच्चे प्रेम के भूखे होते हैं। वे जरा-से लाड-प्यार से अपनी क्षमता से भी बढ़कर काम कर दिखाते हैं। वहीं डर-भय वाले माहौल में तो वे अपना नाम तक भूल जाते हैं, और फिर सवाल तो बहुत बड़ी चीज है। यहाँ नीला के परिश्रम की, उसकी लगन की और उसके स्वभाव की प्रशंसा करनी चाहिए। वह केवल माँ का भरोसा ही कायम नहीं रखती, बल्कि सबसे सख्त दिखने वाली फूलाँ बहन जी का प्रेम भरा दिल भी जीत लेती है।

नीला नालायक नहीं, बल्कि चुनौतियों का सामना करना जानती है। उसने विपरीत परिस्थितियों में स्वयं को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध कर दिखाया। और इससे भी बड़ी बात यह कि पढ़ना-लिखना उसके लिए कोई बाहरी दबाव नहीं, बल्कि अंत:स्फूर्त आनंद है। यहाँ नीला दुखों और कष्टों में रोती-बिलखती नहीं और न ही फूलाँ बहन जी के व्यवहार पर खीजती या गुस्सा करती है। वह हर प्रकार के छल-बल से दूर, धैर्यवान है, संस्कारवान है और इसीलिए वह सम्मान करना भी जानती है और सम्मान पाना भी जानती है।

कहानी का अंतिम दृश्य देखिए, “परिणाम निकलते ही बच्चों ने जोर-जोर की तालियाँ बजा-बजाकर प्रथम आने पर उसका उत्साहवर्धन किया। इस समय नीला ने वह गेंदे की माला फूलाँ बहन जी के गले में डाल दी। उन्होंने नीला का सर पुचकारकर उसे आशीर्वाद दिया। पहले दिन वाली उनकी आँखों के हिकारत का अब कहीं नामोनिशान न था। उनमें स्नेह ही स्नेह झलक रहा था।”

यह नीला के ही नहीं, बल्कि हर परिश्रमी बच्चे के संकल्प की जीत की कहानी है।
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मानवीय संवेदनाओं को झकझोर देने वाली ऐसी ही एक और प्रेरक कहानी ‘करुणा का बस्ता' है। यह एकदम सच्ची और जीवन से जुड़ी हुई, परस्पर प्रेम और सहयोग का संदेश देती है। “बचपन की लाख बातें भूल जाऊँ, पर करुणा का बस्ता भी क्या कभी भूल सकती हूँ।...करुणा की वे सूनी-सूनी आँखें, भल-भल-भल बहते आँसू!” कहानी की शुरुआत में ही ऐसी आत्मीय पँक्तियों से महसूस होता है, जैसे सुनीता जी अपने बचपन की अत्यंत विरल स्मृतियों को कहानी में सँजो रही हैं। निर्धन बाप की मेहनती बेटी करुणा की यह लाजवाब कहानी है। जब काम करने की सच्ची नीयत हो तो सहारा देने वाले भी मिल जाते हैं। जैसे करुणा की मदद उसकी अध्यापिकाएँ करती हैं। माया दीदी ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “करुणा, तू चिंता मत कर। आज से तेरी फीस भरने का जिम्मा मेरा रहा।”

और फिर करुणा का बस्ता भी अजब-अनोखा और उसे जान से प्यारा है। इसके माध्यम से लेखिका बच्चों में साफ-सफाई और प्रत्येक वस्तु को उसके यथास्थान पर, व्यवस्थित ढंग से रखने की व्यावहारिक सीख देती है। करुणा जैसी सभी बच्चियों में कोई न कोई प्रतिभा छिपी होती है, आवश्यकता उसे पहचानने, बाहर निकलने और निखारने की होती है। इसके साथ ही बेहद गरीबी की हालत में जी रही करुणा की उस जादुई संदूकची का खो जाना बहुत ही मार्मिक है।

वास्तव में पढ़ने वाले बच्चों को अपनी हर चीज जान से प्यारी होती है। इसलिए अपनी प्यारी संदूकची के गुम हो जाने पर करुणा भल-भल रोती है। लेकिन यहाँ अध्यापिकाओं की सहृदयता की तारीफ करनी पड़ेगी। उनका प्रेम, स्नेह-सहयोग और दुख की घड़ी में हौसला देना बहुत ही जीवंत और अनुकरणीय है। पाठक कहानी पढ़ते हुए करुणा के दुख-दर्द के साथ बहने लगते हैं। गरीबी के बाद भी करुणा अपनी कक्षा में प्रथम आती है। उसके अंदर प्रतिभा भरी पड़ी है और बाद में वह एक बड़ी अधिकारी बनती है। कहानी से स्पष्ट होता है कि निर्धनता या अन्य रूकावटें प्रतिभा के राह में बाधा नहीं बन सकतीं। कहानी के छोटे-छोटे चुस्त संवाद बेहद मार्मिक और भावपूर्ण हैं।
सुनीता जी की प्रत्येक कहानी में आदर्श जीवन की महक और सामासिक ग्रामीण संस्कृति की झलक है। इनमें एक तरफ दुख-पीड़ा और आँसू हैं, तो दूसरी तरफ हँसी-खुशी और मुसकान हैं। वे कहानी को इस ढंग से बुनती है कि वह बच्चों की अपनी कहानी हो जाती है।

‘रजत की क्यारी में पिल्ले' कहानी जीवों के प्रति दया, करुणा, प्रेम और संरक्षण का भाव पैदा करती है। बच्चे चाहे कुत्ते के हों, बिल्ली के या गाय-भैंस के हों, ये बच्चों के लिए विशेष आकर्षण और मनोरंजन का केंद्र रहे हैं। साथ ही, ये बच्चों के सबसे प्रिय दोस्त और खिलौनों की तरह होते हैं।

कहानी में भूरी कुतिया के बच्चों को रजत और उसके साथी खूब प्यार करते हैं। उनके साथ खेलते-कूदते और उनके खाने-पीने का प्रबंध करते हैं। कहानी का एक पहलू यह भी है कि माँ ही माँ की पीड़ा समझ सकती है। माँ चाहे इनसानी बच्चों की हो या फिर पशु-पक्षियों की, वह अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंता करती है और कभी-कभी आक्रामक भी हो जाती है। जैसे भूरी हो जाती है, क्योंकि रजत अपने मनोरंजन के लिए भूरी के बच्चों को तंग करने लगता है। आखिर जब भूरी से सहन नहीं हुआ तो उसने रजत को काट लिया।

यहाँ रजत की माँ अंजली जी की बात ध्यान देने की है। वे उसे मीठी डाँट से समझाती है कि, “बेटे, अगर कोई तुम्हारी एक टाँग पकड़कर उठा दे, तो तुम्हें कितना दर्द होगा? बस, वैसे ही समझ लो, इन पिल्लों को भी दर्द होता है। तभी तो ये दर्द से चिल्लाते हैं। ये बोल नहीं सकते, पर इसका मतलब यह तो नहीं कि हम इन्हें अपने मजे के लिए बेवजह परेशान करते रहें।”

कहानी वैज्ञानिक जानकारी भी देती है कि कुत्ते, बिल्ली, बंदर आदि के काटने पर एंटी रेबीज के इंजेक्शन लगाए जाते हैं।
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सुनीता जी की कहानी बच्चों में तुलना करके जाँचने, परखने और बेहतर को स्वीकार करने का गुण-सामर्थ्य भी देती हैं। वे पर्यावरण की स्वच्छता की प्रबल समर्थक हैं। अब ‘नानी के तारे' कहानी देख लें। बच्चे छुट्टियों में नानी के घर, यानी गाँव में जाने का कार्यक्रम बना लेते हैं। गाँव का स्नेहभरा स्वच्छ वातावरण, सीधे-सरल ग्रामीण, सादा रहना-सहना, साफ-सुथरा देसी खाना, पक्षियों की चहचाहट, भँवरे व तितलियों की गुंजार, फल-फूलों की सुगंध, खुले और निर्मल प्राकृतिक परिवेश में रहना बच्चों के मन को खूब भाता है, क्योंकि ऐसा शहरों में कहीं भी नहीं है। 
गाँव के स्वच्छ आकाश में बहुत सारे चमकीले तारों को देखकर विभोर और दूसरे बच्चे हैरान हो जाते हैं। उनकी जिज्ञासा भी स्वाभाविक है। तब उनकी माँ उन्हें समझाती है कि, “हाँ बेटा, यहाँ ज्यादातर घर एकमंजिले ही हैं, इसलिए आसमान इतना खुला और इतना बड़ा दिखाई पड़ता है। वातावरण भी साफ-सुथरा है। इसलिए काले आसमान में चमकते सितारे इतने सुंदर लगते हैं कि बड़ा अद्भुत नजारा दिखाई देता है।”

यहाँ उनकी माँ महानगर की भागमभाग भरी जीवन शैली और प्रदूषण की सच्चाई भी बताती है। वास्तव में आजकल बच्चों के पास प्रकृति से संवाद करने का फुर्सत ही कहाँ है? वे तो स्कूल, ट्यूशन और होमवर्क के त्रिकोण में फँसे यंत्र जैसे हो गए हैं।

यह कहानी स्पष्ट करती है कि गाँव में बिजली, यातायात, शिक्षा आदि सुविधाएँ केवल नाम की हैं, लेकिन इसके बावजूद ग्रामीण लोग सुख-सुविधाओं का रोना नहीं रोते, बल्कि थोड़े में भी हँसी-खुशी से गुजर-बसर कर लेते हैं। गाँव वालों का परस्पर सेवाभाव शहरी बच्चों के लिए किसी अजूबे से कम नहीं है। जरा कहानी की ये पंक्तियाँ देखें, “घर पहुँचते ही रामकली बड़े प्यार से शिकंजवी बनाकर ले आई और फिर खड़े-खड़े ही हाथ में पंखा करने लगी। गाँव में बिजली तो है, पर कभी-कभी ही दर्शन देती है।”

यहाँ गाँव का बहुत ही उदात्त और भावपूर्ण चित्रण किया गया है। कहानी में कदम-कदम पर जिज्ञासा और गँवईपन बेजोड़ है। यह कहानी पढ़कर मुझे निर्मला पुतुल की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं कि, “आओ मिलकर बचाएँ / कि इस दौर में भी बचाने को/ बहुत कुछ बचा है, अब भी हमारे पास!” शायद कुछ ऐसे ही प्रश्नों के साथ पूरी होती है, कहानी। लेकिन यह भी सच है कि आज के गाँव का स्वरूप, चित्र और चरित्र बदल चुके हैं। जिन चीजों के लिए गाँव दर्शनीय होता था, वे चीजें और वे मूल्य धीरे-धीरे छीजते जा रहे हैं।
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लेखिका का बचपन करनाल (हरियाणा) के सालवन गाँव में बीता है। इसलिए सालवान के माध्यम से ग्रामीणों के परस्पर संबंधों की उजास कदम-कदम पर महसूस होती है। मानवीय संवेदना से भरपूर और बच्चों को रिझाने वाली एक और कहानी है ‘सींक वाली ताई'। इसकी शुरुआत में लेखिका ने दबंग और बहादुर ग्रामीण औरतों का जो अद्भुत चित्र उकेरा है, उसे देखते हैं, “यों भी देखने में खूब लंबी-चौड़ी, खूब ऊँचे कद-काठी वाली थीं, सींक वाली ताई। खूब साँवला, पक्का रंग। चेहरे पर ऐसा मर्दानापन कि कोई दूर से देखकर ही डर जाए। और बोली ऐसी सख्त, कड़वी कि जिसे दो-चार खरी-खरी सुना दें, उसे रात भर नींद न आए।” यहाँ ताई के मन में जो जरा सी कड़वाहट है, अविश्वास है, वह सब परिस्थितियों के कारण है। पर वह दिल की बुरी नहीं है। नीना बहुत मृदुल स्वभाव की है, वह जानती है कि कठोरता को विनम्रता से जीता जा सकता है। फिर नीना और ताई बिल्कुल सखी हो जाती हैं। सींक वाली ताई नीना को दूध-लस्सी, मक्खन खिलाती हैं। उसे चाहने लगती हैं। कहानी में नीला की सूझबूझ, सेवा, सहयोग और समर्पण भी सराहनीय है।

सींक वाली ताई किस्से-कहानियों की भंडार है और साथ ही नया सुनने-जानने की जिज्ञासु भी है। उसे प्रशंसा करना और सुनना दोनों ही अच्छे लगते हैं। वह नीना की किताब के बारे पूछती है, “अच्छा, ऐसा लिखा है तेरी किताब में!...बता बेटी, और क्या-क्या लिखा है तेरी किताब में?” बाद में कुछ शरारती बच्चों के कारण ताई को चोट लग जाती है, लेकिन वही बच्चे जो कभी उसे खिजाते थे, तंग करते थे, वही अब उसकी सेवा करते हैं। यहाँ बच्चों के मन में स्वत: सेवा और आदर का भाव जागना बड़ी बात है। दूसरी ओर नीना और बच्चों की सेवा से खुश होकर ताई के मन की कटुता दूर हो जाती है। वह स्वयं बच्चों को आशीर्वाद देते हुए कहती है कि, “मैं आज समझ पाई हूँ कि प्यार लुटाने से ही प्यार मिलता है।”

अगर बच्चों की कहानी हो, उसमें दादी-नानी हों, मस्ती की रवानी हो और वर्षा खूब आनी हो, तो कहानी का रंग जम जाता है। ‘बारिश का पहला दिन’ वाह, फुल मस्ती! यह एकदम धौल-धप्पा, हास्य-रोमांच तथा आसमान से भी परे उड़ती बाल कल्पना की कहानी है। फिरोज और अशरफ की अजब-गजब बातें, काम और उनकी अदाएँ खूब रिझाती हैं।

होता यों है कि भीषण गरमी में बाल-बच्चे, बड़े-बुजुर्ग, पशु-पक्षी सभी बेहाल थे। पर बच्चे तो बच्चे हैं, शरारतों और मस्ती पर उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। वे अपनी-अपनी कहानी सुनाना शुरू कर देते हैं। शाम को मौसम करवट बदलता है और जोर की बारिश शुरू हो जाती है। सभी को गरमी से राहत मिलती है। यों वर्षा का होना, मतलब सभी को खेलकूद-मस्ती का अवसर मिल जाता है। बच्चे तो क्या, पड़ोसी, बड़े-बुजुर्ग, स्त्री-पुरुष सभी के लिए जैसे कोई उत्सव शुरू हो गया। यह कहानी ग्लोबल वार्मिंग की ओर भी इशारा करती है।

कहानी की भाषा बाल सुलभ, कोमल कल्पना व भावनाओं से युक्त काव्यात्मक है। कहानी के अल्हड़ संवादों में लय, गति और उत्सुकता भरी पड़ी है। ऊपर से शब्द-चयन बड़ा ही अनूठा है। ‘बरसो राम धड़ाके से बुढ़िया मर गई फाके से,' ‘गरमा-गरम पुए बनाकर हमें खिलाओ।' जैसी पंक्तियाँ बच्चों की मौज और आनंद की ओर संकेत करती है। बच्चों का कहानी सुनाने का अंदाज भी बड़ा ही रसीला, अनूठा और रोचक है।

कहानी में ध्वन्यात्मक एवं पुनरुक्त शब्दों के साथ पदमैत्री कमाल की है। पूरी कहानी में टप-टपा-टप, धमाधम उछलने-कूदने, ताली बजा-बजाकर, रोका-टोकी, धूम-धड़ाका, हिप-हिप हुर्रे, हँस-हँसकर ठुमके तथा झमाझम बारिश, तक-धिना-धिन, धिन-धिन जैसे अल्हड़ मस्ती भरे शब्द बिखरे पड़े हैं। कहानी बच्चों में साहस और हिम्मत भी पैदा करती है। बारिश में नहाना, गरम पकौड़े, पुए और हलवा खाने के प्रसंग बड़े रोचक और स्वाभाविक है। एक अच्छी बाल कहानी कैसी हो, इसे सुनीता जी की ‘बारिश का पहला दिन’ कहानी पढ़कर जाना जा सकता है। ऐसी शानदार कहानी को बार-बार पढ़ने का मन करता है।
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इस संग्रह की ‘भगती’ कहानी भी बाल मनोविज्ञान की कसौटी पर खरी उतरती है। गुड्डे-गुड़िया हों या फिर खिलौने, बच्चों के चहेते दोस्त होते हैं। बच्चों की नजरों में वे ही सर्वश्रेष्ठ होते हैं। क्या मजाल कोई उनकी बुराई कर दे। और इसी बात को लेकर नीना और उसकी प्रिय सखी भगती के बीच झगड़ा हो जाता है। नीना की गुड़िया की नाक में भगती मीन-मेख निकलती है। यह देख नीना रो पड़ती है और बुदबुदाते हुए कहती है, “यह समझती क्या है अपने को? उँह, गुड़िया की नाक बड़ी तीखी है!...अरे, तीखी है तो तुमसे कुछ ले रही है क्या? उलटे तीखी नाक वाली लड़कियाँ तो सुंदर होती हैं।” 
यह बाल मनोविज्ञान का जीवंत उदाहरण है। लेकिन सखियों के बीच रूठना-मनाना तो चलता ही रहता है। वे अधिक देर तक अलग नहीं रह सकतीं। कहानी में सबसे बड़ा मोड़ तब आता है, जब नीना की माँ उसे शहर में पढ़ाने का फैसला करती है। अब नीना और भगती तो दो जिस्म एक जान थीं। दोनों एक-दूसरे के बिना आधी-अधूरी। कहानी के अंतिम संवादों में आई बिछुड़ने की निर्मल भावनाएँ, करुणा, पीड़ा, अपनापन, मन को झकजोर देता है। एक बानगी देखिए:
“नीना, तू चली जाएगी तो मैं बिल्कुल अकेली हो जाऊँगी” भगती ने कहा तो उसकी आँखें आँसुओं से भरी हुई थीं।
”अच्छा, हर साल जब गरमी की छुट्टियाँ पड़ेंगी तो मैं जरूर नानी के घर आया करूँगी।” मैंने कहा। 
“सच्ची...?” 
“हाँ, एकदम पक्का!” मैंने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा।
नीना जब जाने लगी तो भगती एक पुड़िया-सी उसकी और करके बोली, “ले, गुलगुले हैं। मेरी माँ ने रात को बनाए थे, मैंने तेरे लिए छिपाकर रख लिए थे।”

‘भगती’ कहानी के इन संवादों में आत्मीय प्रेम की अथाह पीड़ा, प्रेम की पराकाष्ठा और नायाब अपनापन है। ऐसी अनूठी कहानी हमेशा याद की जाएगी।

इसी तरह ‘साकरा गाँव की रामलीला’ भी बड़ी अद्भुत कहानी है। इसे हृदय परिवर्तन की कहें, या फिर बुराई पर अच्छाई की या प्रेम की जीत की सीख देने वाली कहें बड़ी मर्मस्पर्शी कहानी कहा जा सकता है। कहानी में गाँव की सहज-सरल दिनचर्या, ऋतु गीतों, भागवत कथा एवं धार्मिक सत्संग की प्राचीन और सात्विक परंपरा की उजास है।
दीपा की नानी अनूठी किस्सागो हैं। वे कथा को रोचक और प्रभावी बनाने के लिए उसे पूरे हाव-भाव, उतार-चढाव और तन्मयता से सुनाती हैं। नानी ने रामकथा का दिल को छू लेने वाला और बहुत ही महत्वपूर्ण प्रसंग सुनाया है। प्रसंग सुनते-सुनते दीपा प्रेम-मगन होकर सोचने लगी, “आहा, नानी के स्वर में कितनी मिठास और कैसा जादू है उनकी बात सीधे दिल में उतर जाती है।”

रामकथा के इस करुणा भरे प्रेम-प्रसंग का असर भी तुरंत और प्रत्यक्ष दिखाई देता है। ‘पत्थर दिल' और ‘राक्षस' कहलाने वाला सिंघू इस कथा को सुनकर फूट-फूटकर रोने लगता है। ये उसके पछतावे के आँसू थे। भाई के प्रति उसकी सारी कटुता घुल जाती है। सिंघू कहता है, “मुझे माफ कर दे ताई। मुझे बड़ा पाप हुआ।...आज मेरी आँखें खुल गई हैं।” वह अपने भाई से भी क्षमा याचना करते हुए उसे उसका पूरा हक देता है। “आज से तुम यहीं रहोगे। यह घर पहले तुम्हारा है, बाद में मेरा। अब कभी निकलना पड़ा तो मैं निकलूँगा, तुम नहीं।”

यह कहानी हमें मानवता के प्रति आस्थावान होना और धैर्य रखना भी सिखाती है। कहानी पर गाँधीवादी प्रभाव भी दिखाई देता है। कहानी बच्चों और युवाओं में राम, भरत जैसे गुणी, शील, सज्जन, संतोषी और त्यागी होने का भाव भरती है
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होली, दीवाली, दशहरा आदि सांस्कृतिक पर्वों की रंगत उनकी छठा बच्चों से ही बढ़ती है। होली जैसा त्योहार तो मानो बच्चों के रंग-बिरंगे होने और हुड़दंग मचाने का ही त्योहार है। ‘गोपीरामपुरा की होली’ नीना और उसकी सखियों के रंगों से सराबोर होने की कहानी है। पहले तो नीना साथियों से बचना चाहती है और घर के स्टोर रूम में छिपकर बैठ जाती है। परंतु अचानक एक मोटी छिपकली वहाँ आ धमकती है और डर के मारे नीना की चीख निकल जाती है। अब बच्चे तो मस्ती के मूड में थे, वे भला कहाँ रुकने वाले थे। उन्होंने नीना को भी अपने रंग में रँग लिया और पूरी टोली मस्ती में झूमने लगी। यह अल्हड़ मस्ती की बड़ी स्वाभाविक कहानी है।

‘आप बहुत अच्छी हैं लच्छो चाची’ हृदय को संवेदित करने वाली शानदार कहानी है। यह कहानी हमें समझाती है कि व्यक्ति कठोर या बुरा नहीं होता, कभी-कभी परिस्थितियाँ उसे वैसा करने-दिखाने के लिए मजबूर कर देती हैं। अब आप लच्छो चाची को ही देख लीजिए। सब उसे ‘कंजूस करमे की बहू' कहते हैं। लेकिन असली वजह उसके साथ किया जाने व्यवहार था। एक तो उसकी जमीन-जायदाद परिवार वालों ने हड़प ली, दूसरे अकेली और विधवा स्त्री, तीसरा कोई संतान न होना। ये सब चीजें हैं जो उसे बहुत सख्त और कठोर बना देती हैं। लेकिन नीना की विनम्रता, उसकी सूझबूझ काबिलेतारीफ है, जो लच्छो चाची के हृदय में छिपी कोमलता, उसकी करुणा, प्रेम और ममता को जगा देती है। कह सकते हैं कि कठोरता को विनम्रता से और क्रोध को शांति से जीता जा सकता है। 
अब उसी लच्छो चाची का बदला हुआ व्यवहार देखिए, “गाँव के बच्चों से ऐसे हँस-हँसकर बोलती, जैसे सभी उसके बेटे-बेटियाँ हों। वह पहले वाली ‘कंजूस करमे की बहू' तो न जाने कहाँ चली गई!” नीना को इस जादुई व्यवहार का पारितोषिक भी मिलता है। वह करमे की बहू, जो किसी को पानी तक नहीं पिलाती थी, नीना को चमचमाते चाँदी के कड़े उपहार में देती है। यह हृदय को छू जाने वाली बहुत मार्मिक कहानी है।

बच्चों को दैनिक जीवन और व्यवहार में अनुशासन सिखाने वाली, संग्रह की बड़ी प्यारी-सी कहानी है, ‘टुलटुल की परेशानी'। बच्चे अपनी कॉपी, किताबें, जूते, थैला, कपड़े आदि कई बार यहीं-कहीं रखकर भूल जाते हैं। और जरूरत पड़ने पर सभी परेशान होते उठते हैं, क्योंकि कोई चीज सही स्थान पर नहीं मिलती। अतः बच्चों को अपने सभी सामान उनके निश्चित स्थान पर रखना चाहिए, जिससे बाद में किसी को दिक्कत न हो। इससे घर में साफ-सफाई भी रहती है। कहानी की टुलटुल को अपनी इसी लापरवाही की आदत के कारण क्लास में शर्मिंदा होना पड़ता है, तब उसे अपनी भूल का अहसास होता है।

‘मैं यहाँ हूँ पुन्नालाल’ एकदम अलग तरह की कहानी है। वैद्य पुन्नालाल की मुश्किलों भरी यात्रा और सफलता हरिओध सिंह उपाध्याय की कविता ‘एक बूँद' की याद दिलाती है। बूँद की तरह पुन्नालाल के मन में भी भय और संदेह है, लेकिन उन दोनों का यों घर निकलना न केवल खुद के लिए, बल्कि पूरे मानव समाज के लिए कल्याणकारी सिद्ध होता है।

‘दादी की मुसकान' में लेखिका ने कोयना के माध्यम से बच्चों में पनप रही हिंसात्मक प्रवृत्ति, अकेलेपन और कुंठा का एक बड़ा कारण टीवी संस्कृति और गलत खान-पान को बताया है। बच्चे दादी-दादी या परिवार के सदस्यों के साथ न बैठकर टी.वी. या मोबाइल से चिपके रहते हैं। इससे उनके अंदर प्रेम, स्नेह और सहयोग के सामाजिक एवं पारिवारिक संस्कार नहीं पनपते। कोयना नमकीन, बिस्किट, चिप्स, कुरकुरे आदि बाजारू सामान खाने के साथ-साथ टी.वी. पर अधिक समय बिताती है। फलत: वह ज्यादा कुंठित, गुस्सैल और जिद्दी सी हो जाती है। 
लेकिन यहाँ दादी के हृदय की विशालता देखिए, वह कोयना को डाँटती नहीं है। उसकी किसी से शिकायत भी नहीं करती, बल्कि उसे अतिरिक्त स्नेह और प्रोत्साहन देती है, जिससे कोयना को अपनी गलती का अहसास हो जाता है। दादी के अच्छे व्यवहार से प्रभावित होकर वह दादी से पूछती है, “दादी जी, मैं तो आपके कोई काम नहीं करती, क्योंकि टी.वी. देखते हुए बीच में उठना मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। कोई बीच में बुलाए तो मुझे बहुत गुस्सा आता है। फिर रीना की दादी से आप मेरे बारे में इतनी अच्छी बातें क्यों कह रही थीं?” 
यहाँ दादी का व्यवहार अनुकरणीय है, जो बिना कुछ कहे ही कोयना जैसी लड़की के मन में पछतावे का भाव भरकर, उसे अच्छी राह पर ले आता है। कहानी का अंत देखिए कितना खूबसूरत है, “दादी, अब मैं आपके किसी काम से मना नहीं करूँगी।” और उसकी आँखों से आँसू की दो बूँदें चू पड़ीं। यहाँ स्नेह भी है, अपनी गलती का अहसास भी और अंत:प्रेरणा भी है।
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सुनीता जी की एकदम अलग सी और खासी रुचिकर कहानियों में ‘मुबारक-मुबारक नया साल हो’ बच्चों की सकारात्मक ऊर्जा और प्रोत्साहन से लबरेज कहानी है। बच्चों की सर्जना, गुण, कौशल और संभावनाओं की पहचान करने वाली अनूठी कहानी। सम्यक सहयोग, उचित मार्गदर्शन और शाबाशी से बच्चों को नए-नए कार्य करने की ऊर्जा मिलती है। उनके व्यवहार में बहुत ही सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देता है। सुनीता जी ने बाल मनोभावों को कलात्मक अभिव्यक्ति प्रदान की है। ये कहानियाँ कोई भी सीख या अनुशासन ऊपर से नहीं थोपतीं, बल्कि कहानी के पात्रों में स्वयं वैसा ही अच्छा बनने या करने की मन में स्वतःप्रेरणा पैदा होती है। इस लिहाज से ये कहानियाँ एक आदर्श बाल कहानी की कसौटी पर खरी उतरती हैं।

संग्रह की ‘सुनी कथा बैल ने’, ‘गरीब घर की रानी', ‘सोनू की वापसी’, ‘नाना जी,’ ‘दही-बड़े', ‘खेल-खेल में', ‘इनसानियत की उजास’, ‘राखी की नानी' और ‘मम्मी, तुम कितनी अच्छी हो’ जैसी अनेक कहानियाँ बचपन को पूरी मौज और आनंद से जीने के लिए प्रेरित करती हैं। बचपन की मधुर स्मृतियों पर आधारित ये बच्चों के तन-मन की कहानियाँ बन गई हैं, जिनमें दादी-नानी की कथा जैसी सरस किस्सागोई है। इन कहानियों में एक स्त्री का हृदय धड़कता है, उनकी चिंताएँ और सरोकार हैं। राखी, नीना, नीला, दीपा जैसी मासूम, अल्हड़ एवं प्रतिभावान लड़कियाँ इनकी मुख्य पात्र हैं।

साथ ही, इन कहानियों में पारिवारिक संबंधों की मिठास है। कहीं-कहीं भटकाव है, फिर भी ये प्यार करना और प्यार बाँटना सिखाती हैं। ये कहानी प्रेम, दया, करुणा, त्याग और सदव्यवहार से डर, भय और बुराई को जीतने का मंत्र देती हैं। ये जीवन का अनुशासन सिखाती हैं।

वरिष्ठ साहित्यकार प्रकाश मनु इन कहानियों के विषय में लिखते हैं, “सुनीता जी की बाल कहानियों में लोक जीवन की सुगंध है तो साथ ही दादी-नानी की कहानियों सरीखा अद्भुत रस और आकर्षण भी। उनका बचपन गाँव में बीता है और गाँव के ऐसे अद्भुत चरित्रों को उन्होंने करीब से देखा है, जो ऊपर से देखने पर अनगढ़ भले ही लगें, पर उनके दिल सचमुच सोने के हैं, जिनके भीतर प्यार और इनसानियत का सोता फूटता नजर आता है।”
इन सभी कहानियों की भाषा गाँव-देहात में प्रचलित आम बोलचाल की भाषा है। भाषा में दुरूहता, बनावटीपन या बेसिरपैर की उलझाऊ कल्पनाएँ कहीं नहीं है। लपसी, जीरी, तांगा, लस्सी, मक्खन, घी-बूरा, मर्तबान, भभके, छज्जा और धौल-धप्पा जैसे शब्दों में गँवईपन की सोंधी महक है, तो वहीं दूसरी ओर सीरियस, एंटी रैबीज, इंजेक्शन, ग्लोबल वार्मिंग, बाउंड्री, आइडिया, म्यूजिकल डांस जैसी अंग्रेजी शब्दों का प्रसंगानुकूल और स्वाभाविक प्रयोग है।
इसके साथ नाक में दम करना, अटखेलियाँ करना, आग लगना, फूट-फूटकर रोना, चेहरा सफेद पड़ना, और आँखें भर आना जैसे सार्थक मुहावरों के प्रयोग से भावों की गति और लय मनभावन हो गई है।

सुनीता जी की कहानियों में बहुत गहरी मानवीय आस्था है, जीवों के प्रति दया, करुणा और संरक्षण है, पारिवारिक रिश्तों की सुवास है और ग्रामीण परिवेश की बड़ी अद्भुत प्राकृतिक छटाएँ हैं। इसके साथ ही ये कहानियाँ बालमन की भावनाओं, रुचियों और संवेदनाओं का परिष्कार करके, उन्हें विस्तार देती हैं। इनमें जीवन के विविध रंग एक साथ झिलमिलाते नजर आते हैं। और यही इनकी सुंदरता और आकर्षण का रहस्य भी है। निस्संदेह बच्चे इन कहानियों को बड़ी रुचि से पढ़ेंगे और हमेशा याद रखेंगे।
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अशोक बैरागी
हिंदी प्राध्यापक, राजकीय कन्या उच्च विद्यालय, हाबड़ी,
तहसील - पुंडरी, जिला - कैथल (हरियाणा), पिन-136026,
चलभाष: +91 946 654 9394

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