स्वामी विवेकानंद जो भारतीय अस्मिता और गौरव के प्रतीक बन गए!

प्रकाश मनु

प्रकाश मनु


उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के संधि-काल में भारत के जिन तेजस्वी व्यक्तित्वों ने देश के गौरव को कीर्ति-शिखरों तक पहुँचाया और भारतीय जनता की सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक उन्नति के लिए प्राण-पण से प्रयत्न किया, उनमें वीर संन्यासी विवेकानंद (12 जनवरी, 1863-4 जुलाई, 1902) सबसे अलग और विलक्षण हैं। ऐसा ओज, ऐसी भव्यता और धज कि उनके निकट जाने पर वे पहली बार में ही मोह लेते हैं। 
आप विवेकानंद को पढ़ते हैं और विवेकानंद आपके भीतर उतरने लगते हैं, आपको अंशतः विवेकानंद बनाते हुए। लगता है, भारत को ऐसा ही सतेज व्यक्तित्व और ऐसी ही ओजस्वी वाणी चाहिए, पिछली भूलों और नैराश्यपूर्ण इतिहास की लंबी नींद से जगाने के लिए। सच तो यह है कि पिछले हजार वर्षों में भारत में ऐसा तेजस्वी चिंतक कोई और नहीं हुआ। उनका व्यक्तित्व ऐसा था, जैसे विवेकानंद कोई व्यक्ति न हों, बल्कि ऐसा एक राष्ट्र-प्रतीक, सैकड़ों धधकती बिजलियाँ जिनमें समा गई हों। और इसीलिए उनके शब्द भीतर से हमें जगाते और कई बार नींद से झिंझोड़ते हुए-से लगते हैं।

विवेकानंद का मतलब ही है, जागृति। उनके हर शब्द से मानो एक ही गूँज उठती है—‘उत्तिष्ठित जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत’। और इसीलिए निराशा और गुलामी के अँधेरे में सोए देश को जगाने में जितना काम अकेले विवेकानंद ने किया, उतना सैकड़ों लोग मिलकर भी नहीं कर सके। पूरी बीसवीं शताब्दी में उन जैसा सतेज कोई दूसरा व्यक्ति नहीं दिखाई देता, जिसका भारतीय जन-मानस पर इतना गहरा और व्यापक असर पड़ा हो।
यह कम आश्चर्य की बात नहीं कि विवेकानंद संन्यासी होते हुए भी किसी वीर योद्धा की तरह भारत को पतन और निराशा के गर्त से बचाने के लिए रात-दिन संघर्ष कर रहे थे। उनकी तुलना किसी संन्यासी से नहीं, घोर तिमिर की बेड़ियों को काटने के लिए शर-संधान करते धनुर्धर अर्जुन से की जानी चाहिए। उन्होंने पराधीन जनता के सामने एक ऐसा आदर्श रखा कि पूरे भारत में जागृति और स्वाभिमान की एक नई लहर दिखाई पड़ने लगी। धर्म और अध्यात्म को उन्होंने निष्क्रिय साधना की अंतःगुहाओं से निकालकर मानव-सेवा के आदर्श में बदला और देखते ही देखते विवेकानंद जातीय पुनर्जागरण के अग्रदूत बन गए। उनका नाम लेते ही जैसे छाती चौड़ी होती है और हम अपने पूर्णत्व का अहसास करने लगते हैं।

विवेकानंद, यानी नरेंद्रनाथ दत्त। शिकागो जाने के लिए वे जहाज पर बैठे, उससे कुछ समय पहले ही वे विवेकानंद हुए थे और फिर देखते ही देखते विवेकानंद ऐसा नाम हो गया जो घंट-नाद की तरह सारी दुनिया में बजने लगा। धर्म का चिंतन-मनन और प्रवचन करने वाले हैरान थे। उनके देखते ही देखते रंगमंच पर एक ऐसे जादुई व्यक्ति का प्रादुर्भाव हुआ जिसने पढ़े-लिखे समाज के साथ ही साधारण से साधारण लोगों पर भी अपना असर डाला और दुनिया उसके पीछे चलती हुई नजर आने लगी।

12 जनवरी, 1863 को कोलकाता (उस समय कलकत्ता) के एक संपन्न परिवार में जनमा ऐसा यह हठीला नरेंद्र बचपन में भी कम चंचल न था। बल्कि कहा जाए कुछ-कुछ उद्धत भी, जिससे माँ कभी-कभी झुँझला भी पड़तीं, “मैंने शिव से बालक माँगा था, पर उन्होंने भेज दिया यह उत्पाती!" लेकिन बच्चा बहुत प्रतिभाशाली था। पढ़ने-लिखने में उसकी गहरी रुचि थी और जो कुछ एक बार पढ़ता, उसे झट याद हो जाता था। पिता कलकत्ता के प्रसिद्ध वकील थे और माँ भी अत्यंत बुद्धिमती थी, जो नरेंद्र से बेहद प्रेम करतीं थीं। माँ-बाप दोनों चाहते थे कि नरेंद्र पढ़-लिखकर कोई ऊँची सरकारी नौकरी करे, पर नरेंद्र का लक्ष्य तो कुछ और ही था। उसके भीतर जीवन को लेकर बड़े सवाल उठ रहे थे और गहरा अंतर्मंथन शुरू हो गया था। बार-बार यह सवाल उसके भीतर चक्कर काटता—‘मैं कौन हूँ, मैं क्यों आया हूँ, मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है?’

पिता की आकस्मिक मृत्यु नरेंद्र के जीवन में एक बज्रपात की तरह थी, जिसके बाद घर का सारा भार उनके कंधों पर आ गया और वे एक मर्मांतक द्वंद्व में फँसे नजर आते हैं। फिर भी दुनियादारी से ज्यादा उनका ध्यान समूचे भारत और भारतीय जनता के पुनरुत्थान पर था और वे लगातार इस पर चितंन-मनन करते थे। भारतीय जनता की मौजूदा हालत देखकर उनका हृदय रो पड़ता था। पर उन्हें कोई सही राह नहीं मिल पा रही थी। उनके भीतर रह-रहकर उठने वाले प्रश्न अनुत्तरित थे और उन्हें लगातार बेचैन करते थे। वे मधुर स्वर में भक्तिगीत गाते तो अनहद नाद में एकदम डूब जाते और सुनने वालों को भी विभोर कर देते। पर उनके भीतर एक बुद्धिवादी चिंतक भी था, जो अपने हर सवाल का तर्कपूर्ण जवाब पाना चाहता था। और यहाँ वह प्रखर सत्यान्वेषी और बहुत हठीला था।

उन्हीं दिनों विवेकानंद रामकृष्ण परमहंस के प्रभाव में आए। रामकृष्ण परमहंस बड़े विलक्षण संन्यासी थे, जो बस अपने आप और अपनी साधना में ही खोए रहते थे। इसलिए कुछ लोग तो उन्हें अधपागल भी कहते। पर रामकृष्ण ऐसे अद्भुत संन्यासी थे, जिनके लिए इस तरह के मतामत कोई मानी नहीं रखते थे। वे अपने जीवन में सारे मोह और बंधनों से ऊपर उठकर, जीवनमुक्त हो गए थे। सब कुछ त्यागकर वे साधना के उच्चतम सोपानों पर पहुँचे थे, इसीलिए परमहंस कहलाए। यहाँ तक कि धार्मिक कर्मकांड भी उनके लिए फिजूल थे। चारों तरफ तेजी से उनका प्रभाव फैलता जा रहा था। विद्रोही विवेकानंद रामकृष्ण परमहंस के निकट आए, तो लगा एक चुंबकीय आकर्षण से वे इस अध्यामपुरुष की ओर खिंचते जा रहे हैं। वे चाहकर भी खुद को रोक नहीं पा रहे।

पर विवेकानंद इतनी जल्दी प्रभावित होने वाले न थे। उनके मन में ईश्वर और संसार के स्वरूप को लेकर तरह-तरह के प्रश्न और शंकाएँ थीं। ईश्वर है भी या नहीं और अगर है तो क्या सचमुच उसके दर्शन किए जा सकते हैं? वे बार-बार विकल होकर सोचा करते थे। और कई बार तो उन्हें अपने सवालों के जवाब न मिलते, तो वे ईश्वर के अस्तित्व पर ही शंका करने लगते थे और धर्म की बहुत-सी आस्थाओं और धामिक प्रतीकों की खिल्ली उड़ाया करते थे। कई बार तो रामकृष्ण परमहंस के सामने ही ऐसी बातें कहते। रामकृष्ण यह देखते, तो हँसकर रह जाते थे। या कभी-कभी कहा करते थे—
“अभी समय नहीं आया। समय आएगा, तो तुम इन सबको मानोगे और यह भी जान जाओगे कि तुम कौन हो और किस काम के लिए इस जगत में आए हो?...पर यह जान जाने के बाद तुम्हारे पास अधिक समय नहीं बचेगा और तुम उसी दिव्य शक्ति में मिल जाओगे, जिसका तुम अंश हो।"

विवेकानंद को रामकृष्ण परमहंस की बातें बहुत बहकी-बहकी लगतीं। तो भी उनके प्रभाव से वे चाहकर भी मुक्त नहीं हो पाते थे। अब वे रात-दिन यही सोचा करते कि अगर ईश्वर है तो क्या मैं उसके दर्शन कर सकता हूँ? क्या कोई है जो मुझे ईश्वर के दर्शन करा सकता हो? उन्होंने रामकृष्ण परमहंस से यह प्रश्न किया, तो उन्होंने हँसते हुए कहा, ''मैं तुम्हें ईश्वर से मिलवा सकता हूँ। तुम उसी प्रकार ईश्वर को देखोगे, जैसे मैं तुम्हें और तुम मुझे देख रहे हो।’’
कहते-कहते परमहंस ने विवेकानंद को छू दिया। देखते ही देखते एक अलौकिक आनंद की लहर विवेकानंद के सारे शरीर में दौड़ गई और वे रोमांचित हो उठे। उस क्षण उन्हें लगा, मानो सामने खड़े ईश्वर का साक्षात् कर रहे हैं। इसके बाद ऐसे कई अवसर आए जब विवेकानंद ने रामकृष्ण परमहंस की दिव्यता और आध्यात्मिक सिद्धि का अनुभव किया। वे रामकृष्ण परमहंस के शिष्य हो गए।

रामकृष्ण परमहंस अपने शिष्यों में विवेकानंद से सबसे अधिक प्रेम करते थे। कहा करते थे कि इसमें दिव्य तेज है और आगे चलकर यह संसार में बहुत बड़ा काम करेगा। 


[2]
युवावस्था में विवेकानंद कैसे थे, इस बारे में उनके गुरुभाई स्वामी सारदानंद ने बहुत अचरज भरी बातें लिखी हैं। रामकृष्ण परमहंस से नरेंद्र की बहुत प्रशंसा सुनी तो उन्होंने सोचा, जाकर देखना चाहिए कि आखिर वह नरेंद्र है कैसा? ढूँढ़ने पर उसका पता तो चल गया, पर उसके बारे में ऐसी बातें सुनने को मिलीं कि उनका माथा चकरा गया। उन्होंने जिस-जिस से भी पूछा, उसी ने कंधे उचकाते हुए जवाब दिया, “अरे, वह घमंडी और उद्धत युवक...? उसके बारे में तो कोई बात न की जाए यही अच्छा है।"

स्वामी सारदानंद को बड़ा आश्चर्य हुआ कि जिस युवक के बारे में गुरुदेव इतनी प्रशंसा भरी बातें कहते हैं, उसके बारे में तो लोग ऐसी उलटी-सीधी बातें कहते हैं। कहीं गुरुदेव को भ्रांति तो नहीं हो गई? उन्होंने जाकर रामकृष्ण परमहंस से जाकर कहा तो वे बोले कि लोग उसे नहीं जानते, इसलिए ऐसी बातें कहते हैं। फिर नरेंद्र की प्रशंसा करते हुए कहा—
“वह पढ़ाई-लिखाई में, बातचीत में और धर्म-विषय में—सभी बातों में एक समान होशियार है। ध्यान करने बैठता है, तो रात बीत जाती है और सवेरा हो जाता है, फिर भी उसे सुध नहीं आती और उसका ध्यान समाप्त नहीं होता। हमारा नरेंद्र तो खरा सिक्का है, बजाकर देखो, कैसा खन-खन बोलता है।" (श्री नरहर रामचंद्र परांजपे, श्रीरामकृष्ण लीलामृत, पृष्ठ 415)

नरेंद्र के भीतर जो असीम शक्ति और दिव्यत्व था, उसे मानो वे अपनी आँखों से साफ-साफ देख रहे थे। इसीलिए नरेंद से मिलने के लिए वे इतने विकल रहा करते थे कि बहुत दिनों तक दिखाई न पड़े, तो वे खुद उसे ढूँढ़ने निकल पड़ते थे। एक बार तो जब नरेंद्र बहुत दिनों तक नहीं आया, तो वे ब्रह्मसमाज की बैठक में जा पहुँचे जहाँ नरेंद्र कोई भक्तिगीत गा रहे थे। भजन सुनकर रामकृष्ण परमहंस इस कदर आविष्ट हुए कि वे धीरे-धीरे उसी ओर बढ़ने लगे, जहाँ नरेंद्र भजनमंडली के बीच बैठकर गा रहा था। और फिर हालत यह हुई कि खड़े-खड़े ही परमहंस जी की समाधि लग गई। ब्रह्मसमाज की उस सभा में आए सभी लोग उत्सुक होकर उनके आसपास इकट्ठे हो गए और अचरज से उन्हें देख रहे थे। और फिर जैसा होना ही था, उस दिन की ब्रह्मसमाज की बैठक स्थगित कर दी गई। बाद में नरेंद्र गुरु के निकट पहुँचा तो स्वयं को अपराध-बोध से ग्रस्त पा रहा था। उसके मन में इस बात के लिए तीव्र ग्लानि थी कि उसके कारण रामकृष्ण परमहंस को उसे ढूँढ़ने के लिए यहाँ आना पड़ा!

पर रामकृष्ण परमहंस को भला इस सबकी क्या परवाह? वे तो नरेंद्र से मिलकर मगन थे। नरेंद्र में छिपे हुए तेजपुंज को उन्होंने पहचान लिया था। हालाँकि नरेन्द्र अभी तक नहीं समझ पाता था। उसे हैरानी होती। कई बार लगता, मेरे प्रति अतिरिक्त मोह के कारण ही गुरु जी ऐसा कह रहे हैं। एक बार की बात, ब्रह्म समाज के केशवचंद्र सेन, विजयकृष्ण गोस्वामी आदि प्रमुख लोग रामकृष्ण परमहंस से मिलने आए। वे रामकृष्ण का उपदेश सुन रहे थे। सामने ही नरेंद्र भी बैठा था। अचानक परमहंस का ध्यान नरेन्द्र की ओर चला गया और वे मुग्ध होकर उसे देखते रहे। बाद में भावपूर्ण स्वर में बोले—
“देखा कि जिस एक  शक्ति के उत्कर्ष के कारण केशव जगद्विख्यात हुआ है, वैसी अठारह शक्तियों का नरेंद्र में पूर्ण उत्कर्ष हुआ है। और यह भी दिखा कि विजय और केशव के हृदय में दीपक की ज्योति के समान ज्ञान है, परंतु नरेंद्र के हृदय में प्रत्यक्ष ज्ञानसूर्य ही उदित हो गया है।" 
नरेन्द्र को सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने अविश्वास से कहा, “महाराज यह क्या कह रहे हैं? ये इतने ख्यात लोग हैं, मैं भला इनके सामने क्या हूँ!"
सुनकर हँसने लगे। बोले, “मैं स्वयं थोड़े ही कहता हूँ। माँ जगदंबा मुझे जैसा दिखाती हैं, वैसा बोलता हूँ।" (वही, पृष्ठ 417) 
शुरू में विवेकानंद रामकृष्ण के सामने उनके विश्वासों की खिल्ली उड़ाते, तो भी वे कुछ कहते नहीं थे हँसकर टाल जाते थे। और कहते थे, “समय आएगा, जब तू स्वयं कहेगा और मानेगा भी।"

और वह समय आया, जब वे अपने जीवन के सबसे दुखद मोड़ पर थे। पिता के निधन पर अचानक जिम्मेदारियों का बड़ा बोझ उनके कंधों पर आ गया, पर मन उनका दूसरी ओर दौड़ रहा था। तो भला वे क्या करें?...उनके जीवन की धारा तो जैसे दूसरी ओर मुड़ गई थी, पर घर की जिम्मेदारियों का क्या करें? माँ और छोटे भाई-बहन सब उन पर अवलंबित थे।

उन्होंने नौकरी तलाशने की कोशिश की, पर उन्हें सफलता नहीं मिल रही थी। सारे दिन पैदल यहाँ से वहाँ चक्कर काटते, पर हर जगह निराशा हाथ लगती। सारे प्रयत्न निष्फल हो चुके थे। सारा दिन नौकरी की तलाश में यहाँ से वहाँ भटकते हुए पैरों में छाले पड़ गए थे और मन में घोर निराशा थी। घर की आर्थिक हालत इतनी जर्जर थी कि कई बार बिलकुल खाने को न होता, सभी को भूखा रहना पड़ता। अकसर विवेकानंद चुपके से रसोई में जाकर झाँक लेते। अगर सबके खाने के लिए पर्याप्त भोजन न होता, तो कह देते कि आज उन्हें कहीं बाहर भोजन के लिए जाना है, और चुपचाप घर से निकल जाते, ताकि घर के दूसरे लोगों को पेट भर खाना मिल सके।

ऐसे ही एक दिन जब वे नौकरी की तलाश में यहाँ-वहाँ भटकते हुए उनके पैरों में फफोले पड़ गए। बुरी तरह थककर आराम करने के लिए वे एक मीनार की छाया में लेट गए, तो उनके एक मित्र ने ‘दीनानाथ दयालु दयानिधि हरें सभी दुख तेरे’ भजन गाकर उनका मन हलका करना चाहा। पर नरेंद्र ने जैसे क्रोधावेश में कहा, “बस, बस, बंद कर।" यह गीत नरेंद्र का प्रिय गीत था, पर इस प्रत्यक्ष विपत्ति के आ पड़ने पर कठोर सत्य के सामने गीत के शब्द उन्हें अपना उपहास करते प्रतीत हुए। लगा कि अगर ईश्वर इतना ही दयालु है, तो भला संसार में इतने दुख, दारिद्य और कष्ट क्यों हैं?

मित्र स्तब्ध! वह भला नरेंद्र के मन की हालत कैसे समझ सकता था जो आस्था-अनास्था के गहरे द्वंद्व में फँसा था और सोच रहा था कि अगर ईश्वर दुख में लोगों की मदद नहीं करता तो उस ईश्वर के होने न होने से फर्क ही क्या पड़ता है?

इस दारुण दुख की घड़ी में अचानक एक दिन उन्हें जगदंबा का ध्यान आया। सब ओर से ठोकरें खाया मन उन्हें मानो जगदंबा के दरबार में खींचकर ले जा रहा था, पर अभी हिचक बाकी थी। पता नहीं जगदंबा उनकी बात सुनें या न सुनें, पर परमहंस की बात तो वे जरूर मानेंगी। उसी समय उनके मन में आया कि अगर परमहंस जी कहें तो माँ जगदंबा जरूर कुछ सहायता करेंगी। उन्होंने जाकर रामकृष्ण परमहंस से यह कहा। सुनकर वे बोले, “मैं कहूँगा, पर ऐसी बातें मुझसे कही नहीं जातीं। तू खुद क्यों नहीं कहता?"

उन्होंने नरेंद्र को जगदंबा के दरबार में भेजा। पर माँ के मंदिर में जाते ही वे इस कदर ध्यानमग्न हो गए कि उन्हें कुछ कहना याद ही नहीं रहा। रामकृष्ण परमहंस ने दोबारा भेजा, तब भी नरेंद्र की यही हालत हुई। यहाँ तक कि तीसरी बार गए, तब भी वे माँ जगदंबा से कुछ माँग नहीं पाए।

लौटकर नरेंद्र ने गुरु से कहा कि उन्हें तो परिवार के लिए कुछ माँगने की बात याद ही नहीं रहा। इस पर परमहंस हँसकर बोले, “देख ले, इतने बड़े दरबार में इतनी छोटी बात क्या कही जा सकती है?" फिर विवेकानंद को व्यग्र देखकर उन्होंने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा, “ठीक है, आज से तेरे घर मोटे अनाज और वस्त्र की कमी न रहेगी।" 
और सचमुच हुआ भी यही। नरेंद्र को नौकरी मिली और फिर घर की हालत भी धीरे-धीरे सुधरने लगी।

पर विवेकानंद इसके लिए तो बने नहीं थे। उनका मन तो तेजी से अध्यात्म की ओर खिंच रहा था। उन्होंने जिस तीव्र चुंबकीय शक्ति की अनुभूति कर ली थी, उसके घेरे से निकल पाना क्या आसान था। लग रहा था, जिन सवालों के जवाब वे खोज रहे थे, वे अब मिल रहे थे। उनका इस जीवन में आने का प्रयोजन क्या है, कुछ-कुछ वे समझने लगे थे। बहुत मुश्किल से उनके विद्रोही मन ने जगदंबा को माना था। पर जब माना तो कुछ और उनके ध्यान में टिकता ही न था। रामकृष्ण परमहंस इस बात से इतने अधिक आनंदित थे कि जो भी उनसे मिलने जाते, उससे बस एक ही बात कहते, “नरेंद्र ने जगदंबा को मान लिया...!" मानो अब उन्हें वह सब बिलकुल साफ नजर आने लगा था, जिसको पहले उन्होंने ध्यान में देखा था।

विवेकानंद अपने गुरुभाइयों के साथ ध्यान में बैठते थे। एक दिन उन्होंने परमहंस जी से कहा, “महाराज, मुझे निर्विकल्प समाधि का सुख अभी तक नहीं मिला।" 
इस पर रामकृष्ण बोले, “मैं क्या कर सकता हूँ?...माँ की जैसी इच्छा होगी, वैसा होगा।" 
और फिर एक दिन नरेंद्र जब अपने गुरुभाइयों के साथ ध्यान करने बैठा, तो उसकी ऐसी गहन समाधि लग गई कि देह का कोई बोध ही नहीं रहा। उसके गुरुभाई अचरज से यह देख रहे थे। उन्होंने जाकर परमहंस से कहा। वे बोले, “ठीक है, वह बहुत समय से मुझे तंग कर रहा था।" 
बहुत देर बाद जब विवेकानंद को देहभान हुआ, तो उनकी आँखों से अश्रु बह रहे थे। तन-मन आनंदविभोर था। वे दौड़े-दौड़े रामकृष्ण के पास पहुँचे। रामकृष्ण परमहंस उनकी अवस्था देखकर ही सब जान गए। बोले, “अब माँ ने तुझे सब कुछ दिखा दिया है और तेरे दरवाजे की चाबी मुझे दे दी है!..."

सन् 1886 में रामकृष्ण परमहंस की अनंत समाधि के बाद विवेकानंद ने अपने गुरुभाइयों के साथ मिलकर उनके अधूरे कामों को पूरा करने और उनके उपदेशों को दूर-दूर तक फैलाने का जिम्मा सँभाला। उन्होंने सारे भारत में भ्रमण किया। उससे घोर गरीबी में भी गहरी ईश्वरीय आस्था के साथ जीने वाली भारत की सीधी-सादी जनता को उन्हें निकट से देखने और समझने का अवसर मिला। देश के असंख्य लोगों के दुख, गरीबी और उत्पीड़न को निकट से महसूस करके वे विचलित हो उठे। वे सोचते थे कि सच्चा अध्यात्म तो यह है कि कोटि-कोटि जनता के दुखों को दूर किया जाए।

स्वयं विवेकानंद संन्यास ग्रहण करके लोकसेवा के जिस पथ पर वे चले, वह कम कष्टों भरा न था। वे जगह-जगह जाकर लोगों से मिलते। उन्हें सच्चे अध्यात्म की राह बताते। लोग जो कुछ रूखा-सूखा देते, वह खा लेते। कभी-कभी तो हालत यह होती कि सूखी रोटी तक नहीं मिल पाती थी। और कभी ऐसी रोटियाँ भी मिलतीं कि पानी में डालने पर थोड़ी नरम हों, तभी खाई जा सकती थीं। पर संन्यासी विवेकानंद इसे भी अपने लोगों का प्रेम-उपहार मानकर प्रसन्नता से ग्रहण करते। दूसरी ओर बहुत स्थानों पर राजा-महाराजा और संपन्न वर्ग के ऐसे उदार और चेतनासंपन्न लोग भी मिलते, जो उन्हें सम्मान से आमंत्रित करते और उनकी बातों से बहुत प्रभावित होते। समय आने पर ऐसे इस तरह के उदार और संवेदनशील लोगों ने उनकी बहुत मदद भी की।


[3]
सन् 1893 में शिकागो में आयोजित सर्वधर्म महासभा मानो ऐसा रंगमंच था, जिसमें विवेकानंद को अपनी संपूर्ण कलाओं और भास्वर तेजस्विता के साथ पूरी दुनिया के आगे आना था। इस विश्व धर्म महासभा का पता चला, तो विवेकानंद उसमें भाग लेने पहुँचे। खेतड़ी के महाराजा ने उन्हें जहाज का टिकट खरीदकर दिया। साथ ही विवेकानंद की अनिच्छा के बावजूद उन्होंने एक रेशमी गैरिक चोगा भी सिलवाकर दिया, जो शिकागो में सभी के आकर्षण का केंद्र बना। हालाँकि विवेकानंद शिकागो पहुँचे, तो हड्डियों तक को कँपकँपाने वाली जिस सर्दी से उनका सामना हुआ, उसका उऩ्हें कतई अंदाजा नहीं था और न उससे बचने का कोई साधन उनके पास था। बड़ी मुश्किल से सड़क के किनारे पड़े एक बड़े से पाइप में छिपकर उन्होंने जान बचाई।

यहाँ तक कि विश्व धर्म महासभा कब होनी है, इसकी सही तारीख का भी उन्हें ध्यान नहीं था। शिकागो पहुँचकर उन्हें पता चला कि अभी तो उसमें समय है और वे काफी पहले आ गए हैं। एक मुश्किल यह थी कि प्रतिनिधियों के लिए पंजीकरण की तारीख निकल चुकी थी। और दूसरी बड़ी परेशानी यह थी कि सिर्फ वही वक्ता इस विश्व धर्म महासभा में हिस्सा ले सकते थे, जिन्हें किसी धार्मिक संस्था ने अपना प्रतिनिधि बनाकर भेजा हो। विवेकानंद ने इस बारे में तो सोचा ही नहीं था और न उन्हें यह जानकारी थी। उन्होंने मद्रास पत्र लिखा, ताकि वहाँ की एक धामिक संस्था से यह पत्र हासिल कर सकें कि विवेकानंद वहाँ उसका प्रतिनिधित्व करेंगे। हालाँकि मुसीबत ने यहाँ भी उनका साथ नहीं छोड़ा। इसलिए कि जिस संस्था से पत्र भेजने के लिए अनुरोध गया था, उसके अधिकारी बेहद दंभी निकले और सारी बात पता चलने पर उसके प्रधान के मुँह से निकला, “उस शैतान को ठंड खाकर मर जाने दो।" (रोमां रोलाँ, विवेकानंद की जीवनी, पृष्ठ 30)

इस अनिश्चय की अवस्था में विवेकानंद बोस्टन घूमने चले गए। रेलगाड़ी में मिली एक भली महिला से उनका परिचय हुआ, जिनके पति जे.एच. राइट हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर थे। उन्होंने विवेकानंद को अपने घर आमंत्रित किया। प्रोफेसर राइट विवेकानंद के विचारों से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने सर्व धर्म सम्मेलन की समिति को पत्र लिखा कि उनकी इच्छा है कि भारत से आया यह तेजस्वी संन्यासी इस सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व करे। साथ ही उन्होंने शिकागो के लिए टिकट भी कटा दिया।

पर विवेकानंद शिकागो पहुँचे, तो पता चला कि समिति का पता कहीं खो गया है। गाड़ी भी कुछ देर से पहुँची थी। अब भला वे क्या करें? कोई उन्हें सही-सही राह बताने वाला कोई नहीं था। पूछने पर जगह-जगह अपमानजनक स्थितियाँ झेलनी पड़ीं। बुरी तरह थककर और परेशान होकर वे एक छोटी-सी गली में बैठ गए और सोच रहे थे कि अब क्या करें? पास ही एक दयालु परिवार रहता था। उन लोगों ने विवेकानंद की वेशभूषा देखकर कुछ अनुमान लगाया और पूछा कि कहीं वे विश्व धर्म महासभा में भाग लेने तो नहीं आए? सारी बात पता चलने पर उन्होंने मदद की और स्वामी जी सम्मेलन में पहुँचे।

पर इस तरह की हताश कर देने वाली घटनाओं के बावजूद विवेकानंद निराश नहीं हुए। आखिर वे भारत जैसे महान और गौरवशाली परंपराओं वाले देश के प्रतिनिधि थे और यह गौरव ऐसा था जिसके आगे बाकी सारी उलझनें और मुश्किलें छोटी थीं।

विश्व धर्म महासभा में पहले ही दिन अपने स्वागत का उत्तर देते हुए उन्होंने जो शब्द कहे, अब वे एक ऐतिहासिक दस्तावेज बन गए हैं। सभी प्रतिनिधि जहाँ औपचारिक संबोधन से बात शुरू कर रहे थे, वहाँ स्वामी विवेकानंद की वाणी में छिपी ममता और स्नेह ने पल में सभी को अपना बना लिया। देर तक लोग खड़े होकर तालियाँ बजाते रहे। उस दिन स्वामी विवेकानंद को अपने स्वागत के जवाब में धन्यवाद देना था, और उनके शब्द ऐसे थे, जो वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति के दिल में उतर गए। चंद शब्दों में ही उन्होंने भारत की उस महान परंपरा से सबको परचा दिया, जिसके प्रतिनिधि के रूप में वे वहाँ उपस्थित थे। उस दिन विवेकानंद के वक्तव्य के आरंभिक शब्द थे—
“अमेरिकावासी बहनो और भाइयो, आपने जिस सौहार्द और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया है, उसके प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खड़े होते हुए मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूरित हो रहा है। संसार में संन्यासियों की सबसे प्राचीन परंपरा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूँ, धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूँ, और सभी संप्रदायों एवं मतों के कोटि-कोटि हिंदुओं की ओर से धन्यवाद देता हूँ।"

फिर उन्होंने ‘शिवमहिम्नः स्तोत्रम्’ के साथ-साथ गीता का भी एक श्लोक पढ़ा, जिसका भावार्थ है, “जो कोई मेरी ओर आता है—चाहे किसी प्रकार से हो—मैं उसको प्राप्त होता हूँ। लोग जो भिन्न-भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हैं, अंत में मेरी ओर आते हैं।"

जाहिर है, ये ही वे शब्द थे, जिन्होंने विश्व धर्म महासभा की दशा-दिशा तय कर दी थी। उन्होंने वक्ताओं को विचार और चिंतन की एक ऐसी समन्वयात्मक राह दे दी थी, जिसमें धार्मिक मतभेद और दीवारों को अंततः ढहना ही था, ताकि इस विश्व महासभा से विश्व कल्याण की राह निकले। छूछे शब्दों का कर्मकांड नहीं। विवेकानंद की वाणी में ऐसा तेज था कि उनके शब्द, जो बहुत ही निर्मल मन और सच्चाई से कहे गए थे, लोगों के दिलों में उतरते चले गए। चारों तरफ उनका प्रभाव छा गया। सुनने वाले मंत्रमुग्ध हो उठे।

फिर उन्होंने हिंदू धर्म के विचारों को लेकर जो गंभीर और गवेषणापूर्ण लेख पढ़ा, उसमें हिंदू धर्म की सभी बुनियादी बातें इतने साफ और प्रभावी रूप में सामने आईं कि यह लेख आज भी ‘हिंदू धर्म की एक संपूर्ण व्याख्या’ सरीखा लगता है। शायद ही हिंदू धर्म से जुड़ा विचार और चिंतन का कोई महत्वपूर्ण पक्ष उनसे छूटा हो।

इस लेख में विवेकानंद जहाँ हिंदू धर्म की उदारता और विश्व दृष्टि की चर्चा करते हैं, वहाँ वे उन पक्षों का भी मजबूती से जवाब देते हैं, जिन्हें लेकर मिशनरी और दूसरे लोग लगातार हमले कर रहे थे और बुरी तरह खिल्ली उड़ाते थे। विवेकानंद ने हिंदू धर्म की उस आश्चर्यजनक ग्रहणशीलता और समन्वयात्मक दृष्टि की बहुत सुंदर ढंग से चर्चा की, जिसके कारण हजारों वर्षों से असंख्य चुनौतियों का सामना करने के बावजूद वह चुका नहीं, बल्कि हर बार पहले से बहुत अधिक प्रबल और सतेज होकर सामने आया। यहाँ तक कि जो आक्रांता बनकर आए, वे भी आगे चलकर इसी में समा गए और हिंदू धर्म ने सभी की अच्छी बातों को उदारता से ग्रहण किया।

इसी तरह वेदों के अनादि होने की बात को उन्होंने बहुत अच्छे ढंग से समझाया। मूर्तिपूजा को लेकर पादरी हिंदू धर्म का बहुत मखौल उड़ाते थे। इस बात की चर्चा करते हुए विवेकानंद भारत के सीधे-सादे लोगों की आस्था के साथ खड़े हो जाते हैं। वे कहते हैं—
“बचपन की एक बात मुझे याद आती है। एक ईसाई पादरी कुछ मनुष्यों की भीड़ जमा करके धर्मोपदेश कर रहा था। बहुतेरी मजेदार बातों के साथ वह पादरी यह भी कह गया—अगर मैं तुम्हारी देवमूर्ति को डंडा लगाऊँ तो यह मेरा क्या कर सकती है? एक श्रोता ने झट चुभता-सा जवाब दे डाला—अगर मैं तुम्हारे ईश्वर को गाली दूँ तो वह मेरा क्या कर सकता है? पादरी बोला—मरने के बाद वह तुम्हें सजा देगा। हिंदू भी तनकर बोल उठा—तुम मरोगे तो उसी तरह देवमूर्ति भी तुम्हें दंड देगी!"

आगे वे कहते हैं, “जब मूर्तिपूजक कहे जाने वाले लोगों में मैं ऐसे मनुष्यों को पाता हूँ जिनकी नैतिकता, आध्यात्मिकता और प्रेम अपना सानी नहीं रखते, तब मैं रुक जाता हूँ और अपने से यही पूछता हूँ—क्या पाप से भी पवित्रता की सृष्टि हो सकती है?" (विवेकानंद साहित्य संचयन, पृष्ठ 10)

इसी व्याख्यान में आगे मूर्तिपूजा को लेकर मिशनरियों के दुष्प्रचार पर वे कुछ आक्रामक लहजे में कहते हैं—
“एक बात आपको अवश्य बतला दूँ। भारतवर्ष में मूर्तिपूजा कोई जघन्य बात नहीं है। न वह व्यभिचार की जननी है। वरन वह अविकसित मन के लिए उच्च आध्यात्मिक भाव को ग्रहण करने का उपाय है। अवश्य हिंदुओं के बहुतेरे दोष हैं, उसके कुछ अपवाद हैं, पर यह ध्यान रखना रखिए कि उसके वे दोष अपने शरीर को ही उत्पीड़ित करने तक सीमित हैं। वे कभी अपने पड़ोसियों का गला नहीं काटने जाते। एक हिंदू धर्मांध भले ही चिता पर अपने को जला डाले, पर वह विधर्मियों को जलाने के लिए ‘इक्विजिशन’ की अग्नि कभी प्रज्वलित नहीं करेगा। और इस बात के लिए उसके धर्म को उससे अधिक दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जितना डाइनों को जलाने का दोष ईसाई धर्म पर मढ़ा जा सकता है।" (वही, पृष्ठ 12)

इसी व्याख्यान में विवेकानंद बौद्ध और जैन धर्मों की भी चर्चा करते हैं, जो इसी देश में जनमे और थोड़े मतांतर के बावजूद मूलतः हिंदू धर्म की ही आस्था और विश्वासों को आगे बढ़ाते हैं। विवेकानंद कहते हैं—
“यद्यपि बौद्ध तथा जैन ईश्वर पर निभर नहीं करते, तथापि उनके धर्म की पूरी शक्ति प्रत्येक धर्म के महान केंद्रीय सत्य—मनुष्य में ईश्वरत्व के विकास की ओर उन्मुख है। उन्होंने पिता को भले न देखा हो, पर पुत्र को अवश्य देखा है। और जिसने पुत्र को देख लिया, उसने पिता को भी देख लिया।" (वही, पृष्ठ 13)

अपने व्याख्यान के अंत में वे अमेरिका और अमेरिकावासियों को संबोधित करते हुए बड़े विश्वासपूर्ण शब्दों में कहते हैं—
“आप ऐसा ही धर्म सामने रखिए और सारे राष्ट्र आपके अनुयायी हो जाएँगे। अशोक की परिषद बौद्ध परिषद थी। अकबर की परिषद अधिक उपयुक्त होती हुई भी केवल बैठक की ही गोष्ठी थी। किंतु पृथ्वी के कोने-कोने में यह घोषणा करने का गौरव अमेरिका के लिए ही सुरक्षित था कि प्रत्येक धर्म में ईश्वर है।" (वही, पृष्ठ 13)

और इस विश्व धर्म महासभा के समापन के समय विवेकानंद ने जो शब्द कहे, वे भी मानो घंटा-नाद की तरह लंबे समय तक दुनिया भर के धर्म चिंतकों को मथते रहे। उन्होंने बड़े ही ओजस्वी शब्दों में कहा—
“इस धर्म महासभा ने जगत के समक्ष यदि कुछ प्रदर्शित किया है तो वह यह है, उसने यह सिद्ध कर दिया है कि कि शुद्धता, पवित्रता और दयाशीलता किसी संप्रदाय विशष की एककंतिक संपति नहीं है एवं प्रत्येक धर्म ने श्रेष्ठ एवं अतिशय उन्नत चरित्र स्त्री-पुरुषों को जन्म दिया है। अब इन प्रत्यक्ष प्रमाणों के बाद भी यदि कोई ऐसा स्वप्न देखे कि अन्यान्य सारे धर्म नष्ट हो जाएँगे और केवल उसका धर्म ही जीवित रहेगा, तो उस पर मैं अपने हृदय के अंतस्तल से दया करता हूँ और उसे स्पष्ट बतलाए देता हूँ कि शीघ्र ही सारे प्रतिरोधों के बावजूद, प्रत्येक धर्म की पताका पर यह लिखा रहेगा—सहायता करो, लड़ो मत, परभाव-ग्रहण न कि परभाव-विनाश, समन्वय और शांति, न कि मतभेद और कलह!" (वही, पृष्ठ 17)

स्वामी विवेकानंद की प्रेरणा से भारत के लोगों की सेवा और अध्यात्म के लिए सब कुछ समर्पित करने वाली भगिनी निवेदिता ने विश्व धर्म महासभा में उनके चमत्कारी भाषण के प्रभाव को बड़े काव्यात्मक ढंग से अपने शब्दों में बाँधा है। वे कहती हैं—
“...विश्व धर्म महासभा के सम्मुख स्वामी जी के अभिभाषण के संबंध में यह कहा जा सकता है कि जब उन्होंने अपना भाषण आरंभ किया तो विषय था हिंदों के धार्मिक विचार, किंतु जब उऩ्होंने अंत किया, तब तक हिंदू धर्म की सृष्टि हो चुकी थी। इस संभावना के लिए समय भी परिपक्व हो चुका था।" (वही, भूमिका, हमारे गुरु और उनका संदेश)
शिकागो की विश्व धर्म सभा में स्वामी विवेकानंद के शब्दों का इतना गहरा असर पड़ा कि अमेरिकी अखबारों ने लिखा, “उन्हें सुनने के बाद हम अनुभव करते हैं कि भारत जैसे ज्ञानी राष्ट्र को मिशनरी भेजना कितनी बड़ी मूर्खता है।"


[4]
निश्चय ही यह भारत और भारत के प्रतिनिधि के रूप में स्वामी विवेकानंद की बहुत बड़ी जीत थी।

इसके बाद वे जहाँ-जहाँ गए, वहाँ उनका उत्साह से स्वागत हुआ। देखते ही देखते विवेकानंद भारत के सांस्कृतिक, आध्यात्मिक अग्रदूत बन गए। जब वे भारत के विलक्षण धर्म और अध्यात्म की बातें बताया करते थे, तो लोग चकित और चमत्कृत होकर उन्हें सुना करते थे। इस तरह पूरे विश्व में उन्होंने यह संदेश दिया कि आज भारत भले ही पराधीनता के कष्ट झेल रहा हो, पर वह एक महान देश है जिसका महान अतीत और एक गौरवशाली इतिहास है। भारत के पास आज भी बहुत कुछ ऐसा बचा हुआ कि सारा संसार शिष्य की तरह उससे बहुत कुछ ले सकता है। दुनिया का उद्धार भारत द्वारा दिखाए गए धर्म और अध्यात्म के पथ पर चलकर ही हो सकता है।

अमेरिका में अब हर ओर विवेकानंद के नाम की धूम थी। उनसे प्रभावित होने वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही थी। जगह-जगह उनके व्याख्यान आयोजित किए जा रहे थे। पर इस विश्वव्यापी कीर्ति के कारण उन्हें जो अंतहीन आफतें सहनी पड़ीं, उनकी कथा भी अनंत है और बड़ी तकलीफदेह भी। इसलिए कि विवेकानंद की यह प्रशंसा ईसाई मिशनरियों को जरा नहीं सुहाई और उन्होंने ईर्ष्यावश शत्रुता ठान ली। दुख और दर्भाग्य की बात यह कि भारत के बहुत से लोग और धार्मिक संस्थाएँ भी ऐसी थीं, जिन्हें विवेकानंद का यह प्रादुर्भाव जरा भी नहीं सुहाया। विवेकानंद ने पूरे भारत का गौरव बढ़ाया था, पर ऐसे लोग उन्हें केवल प्रबल प्रतिस्पर्धी समझ रहे थे और ईर्ष्यालु होकर उनके विरुद्ध झूठा प्रचार और प्रवाद फैलाने में जुट गए थे। इस पर दुखी होकर विवेकानंद ने कहा—
“शायद वर्षों की गुलामी का ही यह असर है कि भारत में चार लोग मिलकर कोई काम नहीं कर सकते। अगर एक कुछ आगे बढ़ेगा तो बाकी तीन उसकी टाँग पीछे खींचने में लग जाएँगे।"

अलबत्ता, स्वयं देशवासियों द्वारा स्वामी जी के इस अविवेकपूर्ण विरोध से एक अजब-सी भ्रांति का वातावरण बना। विदेशियों को लगने लगा, शायद मिशनरी लोग ही ठीक कह रहे हैं। तभी तो स्वयं भारतीय भी उनके विरोध में हैं। मिशनरी लोग ऐसे लोगों की बातों को दूर-दूर तक प्रचारित करते और कहीं ज्यादा तेजी से अपने निंदा-अभियान में जुट जाते। एक ओर विवेकानंद अंतर्राष्ट्रीय शख्सियत बन चुके थे, दूसरी ओर उनके मार्ग में कंटक और रुकावटें पैदा करने लोग सक्रिय थे। यह एक आश्चर्य की बात थी कि इतने बड़े देश से किसी ने विवेकानंद के विरुद्ध मिशनरियों के झूठे अभियोगों का जवाब देने के लिए एक पत्र तक नहीं लिखा कि विवेकानंद हमारे देश के सम्माननीय प्रतिनिधि है। इन पर इस तरह के झूठे लांछन निंदनीय हैं।

विवेकानंद इससे आहत थे, पर उन्होंने हार नहीं मानी। अविचल भाव से वे अपने कर्म में जुटे थे। उनका कर्मयोगी व्यक्तित्व खुद ही सारे विरोधों का जवाब था। सब तरह के दुष्प्रचारों के बावजूद उनके व्यक्तित्व की ‘समुज्ज्वला प्रभा’ कुछ ऐसी थी कि उनकी सच्ची और सीधी ललकार के आगे कुछ ठहरता नहीं था।

विवेकानंद पश्चिम के लोगों से साफ-साफ कहा करते थे कि भारत अध्यात्म में बहुत बढ़ा-चढ़ा है और इस क्षेत्र में उसके पास सारी दुनिया को देने के लिए बहुत कुछ है। दूसरी ओर पश्चिम ने भौतिक तरक्की बहुत की है, जिसकी भारत में कमी है। इसलिए मैं भारत से अध्यात्म यहाँ लाता हूँ और बदले में यहाँ से धन लेकर वहाँ जाता हूँ, ताकि मेरे देश के लोगों की कुछ सहायता हो सके।

इसी तरह भारत में मिशनरियों को भेजने के प्रति अपनी नाराजगी प्रकट करते हुए उन्होंने कहा, “भूखे को धर्म का उपदेश देने से बढ़कर उसका कोई अपमान नहीं हो सकता। उसको पहले रोटी दो और बाकी बातें बाद के लिए रखो। इसलिए अगर आप लोग भारत की मदद करना ही चाहते हैं, तो वहाँ मिशनरी भेजने के बजाय धन से उनकी मदद कीजिए।"

मद्रास के लोगों द्वारा भेजे गए अभिनंदन का जवाब देते हुए विवेकानंद ने हिंदू धर्म के आगे मौजूद चुनौतियों की ओर उनका ध्यान आकर्षित करते हुए, एक बार फिर ईसाई मिशनरियों के कलुषपूर्ण दुष्प्रचार की ओर उनका ध्यान खींचा। वे लिखते हैं—
“यह बात सच नहीं है कि मैं किसी धर्म का विरोधी हूँ। और मैं भारत के ईसाई पादरियों से शत्रुता रखता हूँ, यह भी उतना ही असत्य है। परंतु अमेरिका में वे जिस तरीके से चंदे से दान एकत्र करते हैं, उसका मैं अवश्य ही प्रतिवाद करता हूँ। बच्चों की पाठ्यपुस्तकों में ऐसे चित्रों के छापने का क्या मतलब है, जिसमें हिंदू माता अपने बच्चे को गंगा नदी में मगर के मुँह में झोंक रही है। चित्र में माता तो काले रंग की है परंतु बच्चे का रंग गौर रखा गया है, जिससे कि बच्चे के प्रति सहानुभूति अधिक बढ़े और अधिक धन प्राप्त हो। उन चित्रों का भी क्या अर्थ है जिनमें एक मनुष्य अपनी पत्नी को अपने हाथों से एक स्तंभ से बाँधकर इसलिए जीवित जला रहा है कि वह मरकर भूत हो जाए और उसके (अपने पति के) शत्रुओं को सताए।" (वि.सा.सं., पृष्ठ 290)

अमेरिका की दूसरी यात्रा में ही उनके मन से अमेरिका की पहली छाप मिटने लगी। उसका बाजारवादी चेहरा जगह-जगह उन्हें नजर आता, जहाँ हर चीज बिकाऊ थी और धर्म भी एक बाजार-सरीखा था, जहाँ विज्ञापन के नाम पर ऐसी भौंडी बातें कही जाती थीं कि उन्हें ऊब होने लगती। उन्हें व्याख्यान देने के लिए एक संस्था से निमंत्रण मिला। इसके बदले में अच्छी-खासी राशि भी मिलती, जिससे वे भारत के लोगों की सेवा कर सकते थे। कुछ जगह उन्होंने व्याख्यान दिए। पर उन्होंने देखा कि जो लोग उनका व्याख्यान सुनने आते हैं, उनमें से अधिकांश ऐसे भाव प्रकट करते, जैसे यह भी कोई मजेदार तमाशा हो। ऐसे लोगों के सामने अध्यात्म के गूढ़ रहस्यों की चर्चा क्या अपमानजनक नहीं है?

विवेकानंद इतने क्रुद्ध हुए कि आवेश में आकर उन्होंने सामने बैठे ऐसे लोगों को खूब खरी-खोटी सुना दी। उन्होंने समृद्धि के नशे में चूर ऐसे लोगों को इस बुरी तरह लताड़ना शुरू कर दिया कि लोग हक्के-बक्के रह गए। वे अभी तक भारत से आए संन्यासी के उस खुद्दार, स्वाभिमानी चेहरे से परिचित नहीं थे, जो अपनी पर आए तो राजा-महाराजाओं को भी फटकार सकता था।

स्वयं विवेकानंद इतने क्षुब्ध थे कि उस व्याख्यान-माला को उन्होंने बीच में ही छोड़ दिया।
हालाँकि सौभाग्य से अमेरिका ही नहीं, इंगलैंड, जर्मनी, फ्रांस और दूसरे कई देशों में उनके ऐसे अनुयायी पैदा हो चुके थे, जो उन्हें जी-जान से प्यार करते थे और उन्हें किसी मुक्तिदाता विश्व-दूत से कम नहीं समझते थे। इनमें से बहुत से वहीं रहकर काम करते रहे तो कुछ भारत भी आए और इसी देश को उन्होंने अपनी कर्मभूमि भी बना लिया।


[5]
भारत लौटने के बाद स्वामी विवेकानंद सन् 1897 में अपने गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस के विचारों को फैलाने तथा भारत के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक विकास के लिए रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। हालाँकि यहाँ भी उन्हें एक अजीब स्थिति का सामना करना पड़ा।

विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना के लिए एक स्थान पर आत्मीय जनों और परमहंस के शिष्यों को आमंत्रित किया। उनके सामने उन्होंने एक ऐसी संस्था का विचार रखा जो हर तरह के भेदभावों से ऊपर उठकर सारी दुनिया में अध्यात्म-साधना और मानव-सेवा के लिए काम करे। उनके कुछ गुरुभाइयों को यह बड़ा अजीब लगा। उनका कहना था कि रामकृष्ण परमहंस की साधना तो ऐसी नहीं थी। कहीं ऐसा करके हम उनकी राह से भटक तो नहीं रहे? इस पर विवेकानंद ने उन्हें समझाया कि उनके गुरु रामकृष्म परमहंस की साधना ऊपर से देखने पर एकांतिक भले ही लगे, पर उनके मन में पूरी मानवता का दर्द बसा था, इसलिए यह संस्था केवल धर्म और अध्याम की गतिविधियों तक सीमित न रह कर मानवता की सेवा को अपना लक्ष्य मानेगी। अगर हम दुखी और पीड़ित लोगों की मदद नहीं करते तो हमारे अध्याम की यह एकांत साधना निरी अधूरी और निष्ठुर कही जाएगी।
आखिर विवेकानंद के सब गुरुभाइयों ने इसे माना और रामकृष्ण मिशन की स्थापना हुई। उसमें धर्म और अध्यात्म की साधना के साथ-साथ मानव-सेवा के बड़े उद्देश्य को भी रखा गया। देखते ही देखते उत्साही नवयुवक साथ आए और देश-विदेश में सब ओर रामकृष्ण मिशन की शाखाएँ नजर आने लगीं।

स्वामी विवेकानंद ने जगह-जगह घूमकर इस संस्था और इसके पीछे मानवता की सेवा और कल्याण के विचार को फैलाया। वे जनता को बताते कि जब तक हम पूरा बल लगाकर अपनी वर्तमान जड़ता और अंधकार को खत्म नहीं कर लेते, तब तक हमारे अध्यात्म का कोई मोल नहीं है, भले ही वह कितना ही महान क्यों न हो! कई बार वे आविष्ट होकर कहते—
''भारत के नौजवानों को गीता पढ़ने के बजाय फुटबॉल खेलना चाहिए। हमें पश्चिम से सीखना चाहिए कि कैसे उनके जीवन में बिजली की-सी कौंध और तेजी है। हमें भी वह आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता के गुण को अपनाना चाहिए।’’

स्वामी जी अध्यात्म और ऐहिक जीवन के बीच वैसी चौड़ी खाई स्वीकार न करते थे, जैसी रूढ़ि बन चुकी थी। उनके भीतर का क्रांतिकारी युग-चिंतक एक नया ही सपना देख रहा था। अपने एक पत्र में स्वामी जी ने रामकृष्ण मिशन से जुड़े बड़े अद्भुत सपने को इन शब्दों में प्रकट किया है—
“हमारे देश में हजारों एकनिष्ठ और त्यागी साधु हैं, जो गाँव-गाँव धर्म की शिक्षा देते फिरते हैं। यदि उनमें से कुछ लोगों को ऐहिक विषयों में भी प्रशिक्षित किया जाए, तो गाँव-गाँव, दरवाजे-दरवाजे जाकर वे केवल धर्म शिक्षा ही नहीं देंगे, बल्कि ऐहिक शिक्षा भी दिया करेंगे। कल्पना कीजिए कि इनमें से एक-दो शाम को साथ में एक मैजिक लैंटर्न, एक ग्लोब और कुछ नक्शे आदि लेकर किसी गाँव में गए। इसकी सहायता से वे अनपढ़ लोगों को बहुत कुछ गणित, ज्योतिष और भूगोल सिखा सकते हैं। जितनी जानकारी वे गरीब जीवन भर पुस्तकें पढ़ने से न पा सकेंगे, उससे कहीं सौगुनी अधिक वे इस तरह बातचीत द्वारा पा जाएँगे।"

विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन के साथ सेवा का जो आदर्श जोड़ा था, उसकी परीक्षा का समय भी जल्दी ही सामने आ गया। बंगाल में भीषण अकाल पड़ा तो आम जनता के दुख और कराहों ने विवेकानंद को व्यथित किया। उन्होंने रामकृष्ण मिशन को पूरी तरह दीन-दुखियों और पीड़ित लोगों की सेवा में लगाया और स्वयं भी हर तरह से लोगों की सहायता में जुट गए। मंदिर के बाहर रहकर वे सब कार्यों की निगरानी कर रहे थे। भूख से मरते लोगों की तकलीफें इतनी दारुण थीं कि विवेकानंद ने अपने शिष्यों और गुरुभाइयों से यहाँ तक कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो इस मंदिर को भी बेच दिया जाए। उससे जो धन मिले उससे अकालग्रस्त लोगों और दीन-दुखियों की मदद की जानी चाहिए, क्योंकि जीवित मनुष्य से बढ़कर ईश्वर का कोई और मंदिर नहीं हो सकता।

जल्दी ही भारत में ही नहीं, विदेशों में भी रामकृष्ण मिशन की शाखाएँ खुलीं और अनेक विचारवान लोग बहुत उत्साह से इसमें शामिल हुए। इंग्लैंड की मिस मार्गेट नोबेल विवेकानंद के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर संन्यासिनी बन गईं। संन्यासिनी होने के बाद विवेकानंद ने उनका नाम निवेदिता रखा। निवेदिता भारत आकर जीवन भर विवेकानंद के विचारों के प्रचार में लगी रहीं। वे अखबारों और पत्रिकाओं में जो लेख लिखती थीं, उनसे पूरे भारत में एक नई हिलोर पैदा होती थी। उन्होंने सच में रामकृष्ण मिशन में सक्रिय होकर स्वामी विवेकानंद के काम को आगे बढ़ाया।

अपनी अनवरत यात्राओं और अहर्निश तप से स्वामी जी का शरीर जर्जर हो चुका था। उन्हें यह आभास हो गया कि अब उनके पास अधिक समय नहीं है। शरीर क्लांत और शिथिल हो चुका था। कहाँ तो वर्षों पूर्व अमरनाथ की यात्रा के समय वे दुर्गम पहाड़ियों पर चढ़कर गए थे और कहाँ अब हालत यह थी कि अपने जीवन के सांध्यकाल में वे यात्रा पर गए तो उन्हें सहारा देकर ले जाना पड़ा। शरीर दुर्बल था और मन मुक्त। वे बहुत जल्दी भावावेश और समाधि की अवस्था में पहुँच जाते थे और शरीर की सुध-बुध एकदम खो बैठते। मानो वे जान गए थे कि इस संसार में उनका काम पूरा हो चुका है और अब वे प्रस्थान के लिए तैयार थे। बहुत पहले अपनी एक कविता में उन्होंने यही भावाकुलता प्रकट की थी— 
माँ, मुझे उस तट तक पहुँचाओ...
इन पीड़ाओं, इन आँसुओं और भौतिक सुखों से परे,
जिस तट की महिमा को
ये रवि, शशि, उडुगण और विद्युत भी अभिव्यक्ति न देते,
महज उसके प्रतिबिंब का प्रकाश लिए फिरते हैं।
ओ माँ, ये मृगपिपास भरे स्वप्नों के आवरण
तुम्हें देखने से मुझे न रोक सकें,
मेरा खेल खत्म हो रहा है माँ!
ये शृँखला की कड़ियाँ तोड़ो
मुक्त करो मुझे! (वही, पृष्ठ 347)

सात बरस पहले न्यूयार्क में लिखी गई इस कविता में जो भाव था, वही अब रोम-रोम से प्रकट होकर उनकी चेतना को झकझोर रहा था। आखिर 4 जुलाई, 1902 को केवल 39 वर्ष की अवस्था में भारत के इस महान योद्धा संन्यासी ने अपना चोला छोड़ दिया। लेकिन आने वाली सदियाँ बड़ी कृतज्ञता के साथ उन्हें एक ऐसे वीर संन्यासी के रूप में याद करेंगी, जिसने अध्यात्म का एक नया और युगांतकारी भाष्य करके उसे जन-जन की पीड़ा से जोड़ दिया और कहा कि ''यह इतना बड़ा आदर्श है, जिसके आगे मुझे अपनी मुक्ति भी छोटी लगती है।’’ 

विवेकानंद सचमुच क्रांतिकारी विचारक थे। यही कारण है कि उनके विचारों को पढ़ते हुए आज भी हमारे भीतर बिजलियाँ-सी दौड़ जाती हैं।


[6]
स्वामी विवेकानंद को बहुत छोटी उम्र मिली। शायद इसीलिए उन्हें ऐसा उद्दाम आवेग भी मिला, जो सामने उपस्थित बड़े से बड़े जन-समुदाय को किसी प्रचंड वेगवती नदी के तीव्र प्रवाह की तरह बहाए लिए जाता था। लोग उनकी बात सुनकर अपने आप से कहते, “हाँ, यह ठीक है—यही ठीक है।...इसमें कोई संदेह नहीं!" और फिर न जाने कब वे स्वयं को उनके पीछे-पीछे चलते महसूस करते। हजारों लोगों के भीतर उन्होंने ऐसा जादुई व्यक्तित्वांतर पैदा कर दिया कि उन्हें लगने लगगा विवेकानंद से मिलने से पहले वे कुछ और थे और उनसे मिलने के बाद कुछ और हो गए हैं। यह जादू पूरी दुनिया ने देखा, जिसके गवाह हर जगह मौजूद थे।

शायद इसी का यह परिणाम था कि अकेले स्वामी विवेकानंद ने जितना भारत को प्रभावित किया, उतना सैकड़ों समाज-सुधारकों ने भी नहीं। भारत की हजारों वर्ष पुरानी परंपरा उनमें मूर्तिमान लगती थी और वे बोलते थे तो उनके शब्द सीधे दिल से संवाद करते थे, और सुनने वालों का थोड़ी देर के लिए जैसे अपने आप से नियंत्रण समाप्त हो जाता था। वे सुनते थे और अपने आपको उनके साथ बहता महसूस करते थे। सच तो यह है कि विवेकानंद जैसी प्रखर प्रतिभा सदियों में कभी-कभी जन्म लेती है। वे मानो पराधीन भारत के निराशा के बंध काटकर उसमें प्रचंड आत्मविश्वास का लावा भरने के लिए ही जनमे थे।

स्वामी जी कहा करते थे, “हमें ऐसे युवक चाहिए, जिनका शरीर बज्र-सरीखा और धमनियाँ फौलाद की हों!" और आश्चर्य नहीं कि इसकी सर्वोपरि मिसाल वे स्वयं ही थे। इस दुनिया के लगते हुए भी, इससे बहुत दूर, बहुत ऊपर। 
स्वामी जी की शिष्या भगिनी क्रिस्तीन किंचित विस्मय से उन्हें याद करती हुई कहती हैं—
“कभी-कभी समय की दीर्घ अवधि के बाद एक ऐसा मनुष्य हमारे ग्रह में आ पहुँचता है, जो असंदिग्ध रूप से किसी दूसरे मंडल से आया हुआ एक पर्यटक होता है, जो उस अति दूरवर्ती क्षेत्र की, जहाँ से वह आया हुआ है, महिमा, शक्ति और दीप्ति का कुछ अंश इस दुखपूर्ण संसार में साथ लाता है। वह मनुष्यों के बीच विचरता है लेकिन वह इस मर्त्यभूमि का नहीं है। वह है एक तीर्थयात्री, एक अजनबी—वह केवल एक रात के लिए यहाँ ठहरता है।....वह जानता है कि वह उस वर्णनातीत स्वर्गीय क्षेत्र से आया है जहाँ सूर्य अथवा चंद्र की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह क्षेत्र आलोकों के आलोक से आलोकित है। वह जानता है कि ‘जब ईश्वर की सभी संतानें एक साथ आनंद के लिए गान कर रही थीं’, उस समय से बहुत पूर्व ही उसका अस्तित्व था।" (वही, भूमिका, स्वामी विवेकानंद)

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ‘दिव्य अस्तित्व’ का सर्वश्रेष्ठ अंश लेकर जनमे विवेकानंद के बारे में रोमां रोलाँ का कहना था कि वे हर क्षेत्र में प्रथम और सिर्फ प्रथम ही हो सकते थे। उनके दूसरे स्थान पर होने की कल्पना ही असंभव लगती है। बेशक वे भारत के ऐसे स्वाभिमानी पुत्र थे, जो दुनिया को जीतने आए थे। बल और अस्त्र-शस्त्र से नहीं, प्रेम की मधुर वाणी और सच्चाई के ओज से। और वे जीते, इसका प्रमाण यह कि जब वे गए तो हर आँख में आँसू थे, जैसे हमें अपनी पहचान कराने और विपत्ति में सहारा देने वाली एक बड़ी शक्ति और ज्योति हमसे छिन गई।

स्वामी विवेकानंद ने गुलामी से आक्रांत भारतीय जनता के मन में ऐसी तेजस्विता और आत्मविश्वास भरा, कि उसके हाथों में पराधीनता को काटने का अमोघ अस्त्र आ गया। सच ही विवेकानंद का प्रादुर्भाव भारत की ‘मुक्तिगाथा’ का प्रारंभ था, जिसके आगे इतिहास देवता को ‘आजादी’ का अध्याय तो लिखना ही था!
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