कवि भाई के साथ कुरुक्षेत्र के वे दिन

ब्रजेश कृष्ण

संस्मरण: ब्रजेश कृष्ण


वर्षों पहले का वह दिन मेरी स्मृति में चित्र की तरह अंकित है। बात नवंबर-दिसंबर 1975 की है। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के टैगोर छात्रावास की मैस के चहल-पहल और शोरगुल भरे हॉल में एक छात्र बहुत ही सधे कदमों से धीरे-धीरे प्रविष्ट हुआ। वह शोधछात्रों का हॉस्टल था और यह समय लंच का था। उस छात्र ने बंद गले का कत्थई कोट और सिलेटी रंग की पेंट पहन रखी थी। चेहरे पर मोटे लैंस का भारी चश्मा और हल्की मूँछें थीं, जो उसे काफ़ी गंभीर किस्म का बनाती थीं। मेरी पहली नजर तो वेशभूषा के कारण ही उस पर टिकी थी। जिन दिनों कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के शोधछात्र सूट या कोट-टाई में लैस रहते थे, वह किसी बुज़ुर्ग की तरह बंद गले के लंबे कोट में नमूदार हुआ था। वह हॉल में घुसा और डाइनिंग टेबिल के एक किनारे चुपचाप बैठकर खाने की थाली का इंतजार करने लगा था। 
उसे देखकर मुझे अचानक विनोदकुमार शुक्ल की कविता का शीर्षक याद आया: ‘वह आदमी नया गरम कोट पहनकर चला गया विचार की तरह’। मैंने शीर्षक में ‘चला गया’ की जगह ‘आ गया’ किया और मन ही मन मुसकराया! कुछ कौतुक और नए विद्यार्थियों के छेड़ने की मस्ती के साथ मैं उसकी ओर खिसका और उसका परिचय जानना चाहा। उसने बताया कि उसने हिंदी विभाग में शोधछात्र के रूप में प्रवेश लिया है। शिकोहाबाद से आया है। और नाम है, चंद्रप्रकाश विग। उसकी आवाज धीमी, मगर स्पष्ट थी। आत्मविश्वास से भरी हुई। वजनदार। 
कुछ ही महीने हुए थे कि मैं सागर विश्वविद्यालय से यहाँ आया था। यहाँ मैं किसी साहित्यिक रुचि वाले साथी के संग-साथ के लिए तरस रहा था। जब चंद्रप्रकाश ने बताया कि वह समकालीन कविता पर शोध करेगा तो जाहिर है, मुझे उससे मिलना अच्छा लगा। यह प्रकाश मनु से मेरी पहली भेंट थी, हालाँकि उन दिनों तक उनका नाम चंद्रप्रकाश विग था। जल्दी ही हम रोज मिलने लगे और हमारे बीच ऐसी मैत्री स्थापित हुई कि आज पैंतालीस बरस होने को आए, न वह मैत्री मुरझाई और न ही उसका रंग मटमैला हुआ! हम अब बरसों तक नहीं मिल पाते, किंतु बगैर खाद-पानी के मैत्री का यह बिरवा अब तक लहलहा रहा है! 
पहली भेंट के दो-एक दिन के भीतर ही मैं प्रकाश को अपने कमरे में ले गया। उन्हें मैंने सागर के विलक्षण साहित्यिक माहौल के किस्से सुनाए। वहाँ होने वाली गोष्ठियों, प्रतिष्ठित लेखकों के आगमन और वहाँ के कवि-लेखक मित्रों की चर्चा की तो वे जैसे रोमांच से भर गए। वे भी शिकोहाबाद के अपने कवि दोस्तों के बारे में बताते रहे, मेरे आग्रह पर उन्होंने अपनी दो-एक कविताएँ सुनाईं। वे उन दिनों वे ‘रुद्र’ उपनाम से कविताएँ लिखते थे। उनकी कविताओं में उस समय, अपने साहित्यिक नाम के अनुरूप, खौलता हुआ गुस्सा रहता था। फिर भी वे कविताएँ मुझे अच्छी लगीं और ये हमारे और नजदीक आने का कारण भी बनीं। यद्यपि मैंने महसूस किया कि समकालीन कविता से उनका परिचय उतना सघन नहीं है, जितनी मैं उम्मीद कर रहा था। 
उसी दिन या फिर कुछ अंतराल से मैंने उन्हें सागर से साथ लाई हुई कुछ किताबें पढ़ने को दीं। इनमें मुक्तिबोध का ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’, धूमिल का ‘संसद से सड़क तक’, रघुवीर सहाय का ‘आत्महत्या के विरुद्ध’, कैलाश वाजपेयी का ‘तीसरा अँधेरा’ के अलावा अशोक वाजपेयी द्वारा संपादित विष्णु खरे, ज्ञानेंद्रपति, जितेंद्र कुमार आदि की ‘पहचान’ सीरीज की कलात्मक पुस्तिकाओं के साथ कुछ पत्रिकाओं के अंक थे। मुझे याद है कि मैंने अपने प्रिय कवि विष्णु खरे की कुछ पसंदीदा कविताओं का बहुत डूबकर वाचन भी किया था। प्रकाश के अनुसार, इस सबसे उनके आगे एक नई दुनिया खुल गई और उन्हें अपनी अभिव्यक्ति को पहचानने में मदद मिली।
मेरे लिए तो प्रकाश का कुरुक्षेत्र आना जैसे वरदान सिद्ध हुआ। मैं सागर में प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व में शोधछात्र था, और मैं वहाँ की साहित्यिक गतिविधियों में खूब सक्रिय था। परिस्थितिशवश मुझे सागर विश्वविद्यालय का साहित्य-संपन्न वातावरण छोड़कर यहाँ रिसर्च असिस्टेंट की नौकरी के लिए आना पड़ा था। हालाँकि मुझे यह सुविधा दी गई थी कि मैं अपनी अधूरी पी-एच.डी. का काम भी पूरा कर सकूँ। मन में यह बात हमेशा बनी रहती थी कि जैसे ही मौका मिलेगा, मुझे कुरुक्षेत्र छोड़ना है। मैं अकसर सोचता था कि कुरुक्षेत्र की वैदिक नदी सरस्वती तो कब की सूख चुकी है, और शायद उसी के साथ यहाँ से साहित्य-कला की देवी भी पलायन कर गईं हैं! प्रकाश से दोस्ती के बाद मेरा मन यहाँ थमने लगा। और फिर स्थितियाँ ऐसी बनती गईं कि मैं कुरुक्षेत्र का होकर ही रह गया! 
प्रकाश के लिए कुरुक्षेत्र के वे दिन गहन आकांक्षा से भरे जीवन के सबसे उत्तेजक दिन थे। उन्होंने फिजिक्स में एम.एस-सी. करने के बाद हिंदी में एम.ए. किया था और उन्हें यहाँ पी-एच.डी. करने के लिए यूजीसी की फेलोशिप मिली थी। उन्होंने बताया था कि जब वे यहाँ इंटरव्यू देने आए थे तो यूनिवर्सिटी का कैंपस देखकर जैसे मोहाविष्ट से रह गए थे, और यहाँ रहकर रिसर्च करना उनके लिए एक बड़े सपने जैसा था। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय का विशाल कैंपस सचमुच है ही इतना खूबसूरत कि किसी का भी मन मोह ले।
अपने-अपने विभागों में रहने के अलावा हमारे पास जितना भी समय होता, हम साथ बिताते। उन्हीं दिनों यह भी सुखद संयोग रहा कि मेरे बड़े भाई और सत्तर के दशक के प्रसिद्ध कथाकार बल्लभ सिद्धार्थ दिल्ली आते हुए अकसर कुरुक्षेत्र के चक्कर लगाने लगे। फिर तो हम लोगों की जैसे मजलिस जम जाती। देर रात तक चर्चा करते और सुनते-सुनाते, बहसें करते और लड़ते! 
*

कुरुक्षेत्र ने प्रकाश को बहुत कुछ दिया, लेकिन तकलीफ भी कम नहीं दी! वे प्रखर मेधावी तो हैं ही, शुरू से ही घनघोर और अनथक परिश्रमी भी हैं। जिस काम को करते हैं तो जुनून के साथ जुटते हैं। उन्हें उस समय न अपना होश रहता और और न ही उन्हें बाहरी किसी चीज की जरूरत रहती है। मेधा और परिश्रम का संयोग अपने रंग खिलाता ही है! वे दिन-रात अपनी रिसर्च में जुटे रहते। दिन-दिन भर लाइब्रेरी और विभाग में बैठकर किताबों में डूबे रहते। इससे जहाँ एक ओर विभाग में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ रही थी, वहीं दूसरी ओर वे चालाकी और चापलूसी से आगे बढ़ने वाले शोध-छात्रों की ईर्ष्या और जलन के पात्र बनने लगे थे! ‘तेरी कमीज, मेरी कमीज से उजली क्यों’ वाला मामला था! ये लोग कोई भी मौका नहीं छोड़ना चाहते थे, और मौका उन्हें मिल भी गया।
प्रकाश के शोध निदेशक थे हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ रामेश्वरलाल खंडेलवाल ‘तरुण’। उन्हीं दिनों उनका नया कविता संग्रह ‘आँधी और चाँदनी’ प्रकाशित होकर आया, जिसे उनके सभी शोधछात्रों ने पढ़ा और जाहिर है, खूब जमकर सराहा। मगर प्रकाश ने सभी शोधछात्रों के सामने (शायद मेरे लिए प्रेमातिरेक की किसी झोंक में आकर!) कह दिया कि “जेनुइन कवि खंडेलवाल जी नहीं, ब्रजेश भाई हैं। इसलिए अमर कवि के नाते ही देखना हो तो अगर खंडेलवाल जी मेरे आगे आकर खड़े हों तो शायद मैं उनके लिए खड़ा न होऊँ...पर ब्रजेश भाई आएँ तो मैं जरूर खड़े होकर उनका स्वागत करूँगा…ब्रजेश मुझे कहीं ज़्यादा बड़े कवि लगते हैं।” वहाँ बैठे एक शोधछात्र ने, जो खंडेलवाल जी के घरेलू काम सलटाने की वजह से यहाँ तक पहुँचा था, जाकर चुगली कर दी। ऐसी बात कोई भी सत्ताधीश कैसे सहन कर सकता है!
उसी समय हिंदी विभाग में वार्षिक शोध संगोष्ठी हुई जिसके लिए कवि भाई ने बहुत परिश्रम से एक शोधपत्र लिखा। यद्यपि खंडेलवाल जी अस्वस्थता की वजह से संगोष्ठी के सत्र में उपस्थित नहीं रह सके, किंतु जब प्रकाश ने अपना शोधपत्र संगोष्ठी में पढ़ा तो सबने उसकी बेहद तारीफ की, और मुख्य वक्ता विजयेंद्र स्नातक ने तो यहाँ तक कहा कि “मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि मैं अब क्या बोलूँ? क्योंकि जो कुछ मैं बोलने के लिए आया था, वह सब तो मुझसे पहले इस युवक ने कह दिया है!” 
इतनी तारीफ न तो सब्जी-भाजी लाने वाले उस शोधछात्र को पची और न ही विभाग के एक रीडर को, जो प्रकाश से एक अन्य कारण से चिढ़ते थे। दोनों ने जाकर विभागाध्यक्ष के कान भरे कि यह कल का लड़का (या शायद लौंडा ही कहा हो!) चंद्रप्रकाश तो बड़ा घमंडी हो गया है! इसने अपने शोधपत्र में डॉ नगेंद्र जी के कथन का उल्लेख करते हुए उनके नाम के साथ आदरसूचक ‘डॉक्टर’ और ‘जी’ न लगाकर सिर्फ नगेंद्र लिखा है! मज़े की बात यह है कि प्रकाश का यह शोधपत्र विभागाध्यक्ष पहले देख चुके थे और तब उन्हें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगा था। किंतु इन दोनों की बात से उनका दिमाग फिर गया। भरे तो वे तबसे ही बैठे थे जबसे उन्होंने एक अदना कवि के साथ अपनी तुलना की बात सुनी थी! 
जब प्रकाश विभागाध्यक्ष के स्वास्थ्य का हालचाल लेने उनके घर गए तो उस समय उनके साथ विभाग की दो-तीन शोध छात्राएँ भी थीं। प्रकाश ने हालचाल लेने के लिए कुछ बोला ही था कि विभागाध्यक्ष (जी!) फट पड़े, “मुझे तुमसे ऐसी उम्मीद न थी! अपने से बड़ों का सम्मान न करना बहुत ही घटिया और बेहूदी बात है! मैं इसे बिल्कुल भी बरदाश्त नहीं कर सकता!”
नगेंद्र जी वाली बात की ओट तो उनके पास थी ही! प्रकाश ने उन्हें लाख समझाना चाहा कि “जब किसी का सम्मान सर्वसिद्ध हो तो उसके नाम के आगे ‘डॉक्टर’ या ‘श्री’ और बाद में ‘जी’ लगाना अनावश्यक हो जाते हैं”, और शोध के क्षेत्र में तो यह आम चलन है। लेकिन उन्होंने एक न सुनी। बल्कि अंत में लगभग धमकी देते हुए गुस्से से कहा, “अब मुझे भी सोचना पड़ेगा कि तुम्हारे साथ क्या व्यवहार किया जाए?!” अपने साथियों के सामने इस घोर अपमान को प्रकाश ने खून के घूँट की तरह पिया और बहुत ही व्यथित और खिन्नमन हॉस्टल लौटे!
प्रकाश की संवेदनशीलता की कोई सीमा नहीं है! अपनों के लिए मैंने उन्हें शिशु की तरह फफक-फफककर रोते हुए देखा है। कायर और ढोंगियों के लिए उनके मन में इतनी वितृष्णा, गुस्सा और नफरत है कि उसका छोर ढूँढ़ना नामुमकिन है! उनके भीतर बेबाकी इतनी है कि बग़ैर परिणाम की चिंता किए वे बड़े-से-बड़े तुर्रमखाँ से भी भिड़ सकते हैं! विभागाध्यक्ष की तानाशाही के खिलाफ कुछ न कुछ तो होना ही था। उनका गुस्सा एक कविता के रूप में फूटा। लावा उगलती हुई एक शानदार कविता: ‘भीतर का आदमी’! कविता में आज की क्रूरताओं के कई गहन बिंब थे। कविता में पहला दृश्य अफसर की क्रूरता का था। कविता के ‘अफसर’ से खंडेलवाल का चित्र साफ उभरता था। 
प्रकाश ने मुझे जब यह कविता सुनाई तो मैं झूम उठा। उठकर मैंने उन्हें गले लगाया और मेरे मुँह से निकला, “मान गया तुम्हें, कवि भाई! तुमने कविता को पा लिया है!” उस दिन के बाद से ही मैंने उन्हें ‘कवि भाई’ कहना शुरू कर दिया! अब हमेशा के लिए वे मेरे और पत्नी के ‘प्रकाश मनु’ नहीं, ‘कवि भाई’ हैं, और बच्चों के ‘कवि चाचा’!
पर अभी तो कविता को अपनी सही जगह तक पहुँचना था! उन्हीं दिनों अखिल भारतीय भाषा परिषद का अधिवेशन कुरुक्षेत्र में हुआ, जिसके अंतिम दिन शाम को कवि सम्मेलन आयोजित था। इसमें प्रकाश को भी कविता पढ़ने का न्योता मिला था। रामेश्वरलाल खंडेलवाल ‘तरुण’, बहैसियत प्रख्यात कवि, बढ़िया सिल्क के कुरता और धोती में मंच पर मंद-मंद मुसकराते हुए विराजमान थे! यूनिवर्सिटी कॉलेज का वह हॉल लगभग पूरा भरा था। हजार श्रोता से कम नहीं रहे होंगे। जब मंच से कविता पढ़ने के लिए प्रकाश का नाम पुकारा गया, तब वे श्रोताओं के बीच मेरे बगल में बैठे थे, और एकदम नॉर्मल थे। किंतु मैंने देखा कि मंच पर चढ़ते-चढ़ते उनका चेहरा बदल चुका था! उन्होंने भरपूर गुस्से और वितृष्णा के साथ खड़े होकर अपनी लंबी कविता ‘भीतर का आदमी’ पूरे जुनून के साथ सुनाई। 
वैसे भी प्रकाश कविता के अद्भुत वाचक हैं, फिर आज तो मंद मुसकराहट के साथ वह ‘अफसर’ सामने ही बैठा था, जिसके लिए यह कविता लिखी गई थी। कविता पाठ के दौरान पूरा हॉल सन्नाटे के साथ एक ऐसी उत्तेजना से भर गया, जैसे सभी श्रोता साँस रोककर कविता सुन रहे हों! और कविता के ख़त्म होते ही तालियों की गड़गड़ाहट से हॉल बहुत देर तक गूँजता रहा। मैंने पचासों कवियों के कविता पाठ सुने हैं, लेकिन बग़ैर किसी अतिशयोक्ति के और बिना झिझके मैं कह सकता हूँ कि वह अद्वितीय और विलक्षण कविता पाठ था! 
तालियों के रुकते ही प्रख्यात कवि जगदीश गुप्त, जो प्रथम पंक्ति में श्रोताओं के बीच बैठे थे, एकाएक मंच पर पहुँचे और माइक से बोले कि “अब मंच ने अपनी गरिमा पा ली है। अभी-अभी जिस युवक ने कविता पढ़ी, उसे सुनकर मुझे मुक्तिबोध की याद आ गई!” मेरे लिए देखने वाली बात यह थी कि इस बीच खंडेलवाल साहब की मुसकराहट लुप्त हो चुकी थी! वे कविता पाठ के दौरान और बाद में भी गुमसुम बैठे रहे, चुपचाप! उन्होंने उस समय या बाद में प्रकाश से इस कविता के बारे में कभी कोई बात नहीं की।
प्रकाश हारने वाले इनसान कभी नहीं थे! बगैर किसी की परवाह के वे अपने शोधकार्य में जुट गए और जो भी समय मिलता, उसमें हम मस्ती करते। अकसर कैंटीन के बाहर लॉन में बैठक जमती, जिसमें हिंदी विभाग के अन्य शोधछात्र हरपाल और सुनीता भी होती। कई बार प्रकाश के हाथ में जो भी किताब होती, उसमें से मनपसंद कविताएँ सुनाते, जिसे सुनने के लिए आसपास विद्यार्थियों का जमघट लग जाता और मुग्धभाव से सुनता।
शाम को कभी-कभी हम ब्रह्मसरोवर तक घूमने निकल जाते। जब तक आप इस सरोवर को स्वयं न देख लें, तब तक आप इसके अद्भुत सौंदर्य की कल्पना नहीं कर सकते! इतना सुंदर और बड़ा सरोवर मैंने दूसरा नहीं देखा। यह दो भागों में विभक्त था, जिसके आधे हिस्से में तब कमल खिले रहते थे और आधे में असंख्य प्रवासी पक्षी किल्लोल करते रहते थे। कई बार शुक्ला जी, विनोदशंकर और पी.डी. शर्मा जैसे अन्य मित्र भी इस पदयात्रा में शामिल होते। खूब हँसी-ठट्ठा होता! यहाँ मैं प्रकाश की हँसी को जरूर दर्ज़ करना चाहता हूँ। तनिक भी अतिरंजना के बिना मैं यह कहूँगा कि प्रकाश जैसी जोरदार, खुली हुई निर्मल हँसी मैंने दूसरी नहीं देखी। हँसी जो सिर्फ और सिर्फ अंदर की सघन निष्कलुषता से उपजती है! हँसी, जो आपको भीतर तक सराबोर कर दे! हँसी, जो कोई भी कभी नहीं भूल पाए!
*

एक बात और जिसे मैं नहीं भूल पाता, वह है उनके जीवन की सादगी और उदारता। इस आत्मपरक स्वार्थी समय में ऐसे गुण दिनोंदिन दुर्लभ होते जा रहे हैं। प्रकाश को अपने लिए बहुत ही कम चीज़ों की आवश्यकता पड़ती है। कपड़े भी वे बहुत कम रखते हैं। कुरुक्षेत्र में उन्होंने घर से दिए गए ढेर सारे कपड़े हॉस्टल के सफाईकर्मी और विभाग के पियन में बाँट दिए थे। इसके बाद से उन्होंने अपने लिए कभी कपड़ों का अंबार नहीं लगने दिया। किसी की शादी-ब्याह या अन्य समारोह में शामिल होने के लिए भी उन्हें अलग से कोई विशेष कपड़ों की जरूरत नहीं लगती। उनकी माँ अकसर पिन्नियाँ और एक बड़े डिब्बे में घी भेजती थीं, वह भी वे इन्हीं लोगों को समर्पित होता था। उनके साथ रहते हुए कैंटीन में या अन्य जगह जब तक कोई जेब से पैसे निकालता, वे दे चुके होते। जब भी मैं फरीदाबाद गया, तो उन्होंने कभी जेब में हाथ नहीं डालने दिया। अगर मैं ज़िद करता तो वे आहत होते। दरअसल, जेब में पड़ा हुआ पैसा उन्हें काटता है! 
जिन दिनों प्रकाश कुरुक्षेत्र में थे, उन्हीं दिनों हम दोनों को अपनी शादियाँ करनी पड़ीं, हालाँकि हम दोनों ही आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे। मुझे शादी के लिए अपने घर मऊरानीपुर जाना था और शादी के लिए कपड़े भी सिलवाने थे। जाड़ों के दिन थे तो कुछ अन्य दोस्तों से उधार लेकर एक कोट-पेंट के कपड़े का जुगाड़ हो गया। शर्ट का कपड़ा प्रकाश ने अपनी तमाम दिक्कतों के बावज़ूद भेंट किया! उन दिनों कुरुक्षेत्र में कोई ढंग के दर्जी नहीं थे, इसलिए हम दोनों कपड़े दर्जी को देने अंबाला गए और देर तक मटरगश्ती कर आधी रात को लौटे। नए जूतों के पैसों का हिसाब नहीं जम पाया तो नए कपड़ों और पुराने घिसे हुए जूतों में शादी कराकर छह दिन बाद मैं अकेला वापस कुरुक्षेत्र आ गया। 
वे मेरे लिए बेहद तनाव भरे दिन थे। पत्नी को कुरुक्षेत्र न ला पाने के अलावा मैं एक और झंझट में फँस गया। हॉस्टल वार्डन से किसी बात को लेकर कहा-सुनी हो गई तो उसने मुझे हॉस्टल खाली करने का फरमान सुना दिया। अब मैं जाऊँ तो कहाँ जाऊँ? ऐसे संकट में भी प्रकाश के अलावा और कौन साथ दे सकता था! उन्होंने बग़ैर हॉस्टल वार्डन की परवाह किए मुझे अपने कमरे में कई महीने तक अतिथि बनाकर रखा!
गरमी की छुट्टियाँ के बाद मैंने पत्नी को कुरुक्षेत्र लाने का निश्चय किया। प्रकाश के साथ शहर में कई दिनों की तलाश के बाद बैंक कॉलोनी में एक कमरा तय कर लिया। किराया तो हैसियत से ज़्यादा था, लेकिन कमरा साफ-सुथरा था। पत्नी के आगमन की पूर्व तैयारी में प्रकाश का पूरा साथ रहा। हमने एक बत्ती वाला नूतन स्टोव, बालटी, मग्गा, घड़ा, चार प्लेटें, छह गिलास तथा दो चारपाइयाँ खरीदीं। चारपाई में निवाड़ लगाने का काम भी दोनों की मदद से संपन्न हुआ! बाद में जश्न के रूप में बैठकर कहीं चाय पी गई और तय किया कि गृहस्थी की बाक़ी चीज़ों की खरीदने का गौरव पत्नी को ही प्रदान किया जाए! छुट्टियों के बाद मैं पत्नी रमा को लेकर लौटा और हमारी गाड़ी चल पड़ी।
लौटकर आया तो प्रकाश ने सुनीता के साथ अपने प्रेम होने की सूचना दी। सुनीता भी हिंदी विभाग में शोधछात्रा थीं और दोनों एक-दूसरे को खूब चाहने लगे थे। दोनों दिन भर अपने शोध के काम लगे रहते, फिर शाम को ब्रह्मसरोवर पर घूमते। वे दोनों चाहते थे कि जल्दी से शोध पूरी हो, नौकरी लगे फिर शादी करें। लेकिन सुनीता के घर परिस्थितियाँ बिगड़ रहीं थीं। दोनों को लगा कि अगर शादी करनी है, तो अभी करना पड़ेगी। सुनीता ने अपने परिवार के नाम एक चिट्ठी लिखी कि “अब मेरे ‘राम’ चंदर हैं, और मैं इनके साथ शादी करने जा रही हूँ।” चिट्ठी उसने सिगड़ी के पास यह सोचकर रखी थी कि जब माँ खाना पकाने के यहाँ आएँगी तो चिट्ठी देख लेगीं। लेकिन खाना बनने के समय से पूर्व ही इतनी देर तक सुनीता के न पहुँचने से परिवारी जन चिंता में पड़ गए और विभाग में पता करने आए। जब विभाग से यह जानकारी मिली कि चंद्रप्रकाश और सुनीता दोंनो गायब हैं तो तहलका मच गया! इस बीच सुनीता को लेकर प्रकाश अपने घर शिकोहाबाद पहुँच गए।
माँ ने दोंनो को आशीष दिया। शिकोहाबाद के बाद वे दोनों पास के एक कस्बे भोगांव चले गए, जहाँ प्रकाश के बड़े भाई स्टेशन मास्टर थे। दो-एक दिनों में ही सुनीता के परिवारी जन ढूँढ़ते-ढूँढ़ते भोगाँव पहुँच गए और तय हुआ कि लौटकर दोनों का विधिवत विवाह कर दिया जाएगा। इस सारे घटनाक्रम की मुझे कोई जानकारी नहीं थी, क्योंकि मैं कुरुक्षेत्र में नहीं था। उन दिनों मैं अपने विभाग के अन्य सहकर्मियों के साथ पुरातात्त्विक उत्खनन के लिए पास के गाँव दौलतपुर में तंबू लगाकर रह रहा था। प्रकाश अचानक दौलतपुर कैंप में पहुँचे और सारा किस्सा सुनाने के बाद बोले कि “कल शादी है, चलो।”
शादी में मेरे अलावा दो अन्य मित्र और भोगाँव से आए उनके बड़े भाई तथा सुनीता के परिवार के लोग शामिल हुए। मेरी पत्नी रमा भी नहीं थी, उसे मैं अपने कैंप की व्यस्तता की वजह से पहले ही झाँसी भेज चुका था। शादी के बाद नवबधू को रिक्शे पर बैठाकर प्रकाश मेरे घर आए, और इस तरह एक सुनसान घर में नवबधू का ‘अनोखा’ स्वागत हुआ!
*

शादी के बाद तो प्रकाश और सुनीता पर विपत्तियों का जैसे पहाड़ टूट पड़ा! इस विवाह से विभागाध्यक्ष बुरी तरह नाराज हो गए। बावज़ूद इसके कि विभागाध्यक्ष ‘प्रेम और सौंदर्य’ के ख्यात कवि थे और उन्होंने स्वयं प्रेमविवाह किया था, वे इन दोनों के विवाह को सहन नहीं कर सके। उन्होंने प्रकाश और सुनीता को ‘विभागीय अनुशासन तोड़ने के जुर्म में’ स्कॉलरशिप बंद करने का नोटिस दे दिया। इस नोटिस का प्रकाश ने भरपूर उत्तर दिया। अंतत: स्कॉलरशिप तो बंद नहीं हुई, मगर दोनों के रिसर्च गाइड बदलकर एक प्राध्यापकों के निर्देशन में शोध पूरी करने की अनुमति दी गई, जिनके बारे कुछ भी कहना शब्दों की फिज़ूलखर्ची होगी! इन तमाम काली सुरंगों से गुजरते हुए प्रकाश ने किसी तरह अपनी थीसिस पूरी करके जमा कर दी। थीसिस जमा होते ही उनकी फेलोशिप बंद हो गई। और अब सिर्फ सुनीता की स्कॉलरशिप बची थी!
इन दिनों ये लोग शहर में एक कमरा किराए पर लेकर रह रहे थे। सुनीता अपनी थीसिस पूरी करने में जुटी थी और प्रकाश नौकरी की तलाश में! ऐसी मानसिक त्रासदियों और जीवन-संघर्ष से जूझते हुए जब कोई भी टूटकर ढह सकता है, तब भी इन दोनों ने बगैर किसी समझौते के खुद को बचाए रखा! प्रेम करना आग के दरिया से गुजरना है। मैंने इस युगल को सचमुच आग का दरिया पार करते देखा है! 
एक मामले में प्रकाश बहुत भाग्यशाली हैं कि उन्हें सुनीता जैसी जीवनसंगिनी मिली। सुनीता जैसी पारदर्शी, जलबिंब-सी पावन महिला मैंने दूसरी नहीं देखी! प्रकाश के लिए उनका ऐसा अनुपम समर्पण है कि आपको किसी पौराणिक पवित्र कथा की याद दिला दे। दोनों एक सुर और एक ताल! जीवन में न कोई बनावट और न सजावट!
जैसे-तैसे दोंनो की थीसिस पूरी हुई, मगर डिग्री अवार्ड होने में साल लग गया। फिर सहारनपुर, पानीपत और मलोट में टेंपरेरी लेक्चररशिप का सिलसिला चला। प्रकाश अद्भुत टीचर हैं। जहाँ कहीं भी वे रहे, विद्यार्थियों के बीच जल्दी ही सर्वाधिक लोकप्रिय अध्यापक बन गए। पढ़ाने का अंदाज ऐसा कि क्लास के बाहर भी सुनने के लिए अन्य विभागों के विद्यार्थियों की भीड़ जमा हो जाती थी। वे किसी भी विश्वविद्यालय में प्राध्यापक होते तो यह उस विश्वविद्यालय का गौरव होता, मगर बाद में उन्होंने पत्रकारिता का जीवन चुना और दिल्ली पहुँच गए। जीवनयापन के लिए वे भले ही पत्रकारिता में रहे हों, मगर जिया उन्होंने साहित्य ही! 
एक बात का उल्लेख किए बग़ैर मेरी बात पूरी नहीं होगी। प्रकाश को अपने कविता संग्रह ‘छूटता हुआ घर’ पर प्रथम गिरिजाकुमार माथुर स्मृति पुरस्कार मिला। उन्होंने तय किया कि इससे मिलने वाली धनराशि का उपयोग वे स्वयं के लिए नहीं करेंगे, बल्कि इस राशि से वे उन कवियों का संग्रह प्रकाशित करेंगे जो उनके अनुसार अच्छा लिख रहे हैं, मगर कहीं प्रकाशित न हो पाने के कारण गुमनामी के अँधेरे में खो जाते हैं! उन्होंने बारह कवियों की कविताओं का चुनाव किया। इन बारह में एक मैं भी था। यह संग्रह ‘सदी के आखिरी दौर में’ के नाम से प्रकाशित हुआ। 
इसे प्रकाश ने संपादित किया और भूमिका रामदरश मिश्र जी ने लिखी। संग्रह की उत्साहवर्द्धक और प्रशंसात्मक समीक्षाएँ छपीं। लगातार कम होती संवेदनाओं के इस समय में, जब स्थापित लेखक नवागत लेखकों की रचनाओं को पढ़ना तो दूर, उनसे बात करना भी पसंद नहीं करते, प्रकाश का नए लेखकों के लिए ऐसा भाव अपने आप में एक उदाहरण है।
असली कलाकार की अपनी कलात्मकता तभी तक बची रहती है, जब तक वह खुद को ईर्ष्या-द्वेष, लालच, प्रतियोगिता की तड़प और दूसरों के लिए किसी भी तरह की दुर्भावना से बचाए रख सकता है। कवि भाई ने इस आपाधापी से भरी और लगातार संवेदनहीन होती जाती दुनिया में बहुत ही निष्कलुष जीवन जिया है। फरीदाबाद में जब-जब मैं उनके घर गया हूँ, मुझे हर बार किसी आश्रम में पहुँच जाने का अहसास हुआ है, जहाँ अपने नितांत एकाकीपन में धूनी रमाए कोई ॠषि बगैर एक पल भी खोए निरंतर अपने काम में लगा है! वैसे भी कवि भाई के लिए लिखना साँस लेने जैसा है!
आज मैं कवि भाई के साथ कुरुक्षेत्र में बिताए दिनों की जुगाली कर रहा हूँ। पहली मुलाक़ात के समय विनोदकुमार शुक्ल की एक कविता के शीर्षक के बहाने जो बात मैंने सिर्फ मजाक में सोची थी, वह एक गंभीर सच्चाई बनने वाली है, यह मैंने कभी नहीं सोचा था! कवि भाई मेरे जीवन में सचमुच विचार की तरह आए, एक गहन-गंभीर और सार्थक विचार की तरह! मैंने एक बार उनसे कहा था, “कवि भाई! मैं तुम्हारे जैसा जीवन जीवन जीना चाहता हूँ।” लेकिन मुझमें न तो इतना जुनून था, न साहस! 
उन दिनों की हजार दिक्कतों और त्रासद स्थितियों के बावज़ूद उनके साथ बिताए दिनों को मैं यहाँ के सबसे अच्छे दिनों के रूप में याद करता हूँ। कुरुक्षेत्र उन दिनों बहुत कम आबादी वाला एक छोटा-सा शहर था, जिसने अपने पंख अभी फैलाने शुरू ही किए थे और जहाँ एक खास तरह की ग्रामीण रम्यता बची हुई थी! विश्वविद्यालय के कैंपस की धूप-छाँह हर प्रहर में मोहित करती थी और चमत्कृत भी। हम दोनों ने जैसा भी जीवन जिया, उसकी नींव तो कुरुक्षेत्र में ही पड़ी थी! कवि भाई के साथ रहते हुए मुझे हर समय एक ऐसी ऊष्मा की उपस्थिति का एहसास होता था, जो सिर्फ एक परम ईमानदार व्यक्ति के भीतर सतत सुलगती आग से आती है। एकदम बच्चों की-सी हँसी की खिलखिलाहट और उनके निष्कपट व्यवहार की अनुगूँजें अब मेरी स्मृति का स्थायी हिस्सा हैं।
***

परिचय: ब्रजेश कृष्ण
29, अगस्त 1945 को मऊरानीपुर (झाँसी) उत्तर प्रदेश में जन्म। 
प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व में एम ए, पी-एच डी। कुरुक्षेत्र विश्व्विद्यालय में प्राध्यापक, विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त।  
एक कविता संग्रह ‘जो राख होने से बचे हैं अभी तक’ प्रकाशित।
विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित। अंग्रेज़ी से हिन्दी में कहानियों और लेखों के अनुवाद।
सम्पर्क: 1348, सेक्टर-5, कुरुक्षेत्र-136118 (हरियाणा),
चलभाष: 94161-06707

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