ब्रजभाषा का विशिष्ट शोध ग्रंथ: राधावल्लभ सम्प्रदाय के ब्रजभाषा गद्य साहित्य का सर्वेक्षण

समीक्षक: आचार्य नीरज शास्त्री

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ग्रंथ: राधावल्लभ सम्प्रदाय के ब्रजभाषा गद्य साहित्य का सर्वेक्षण
ग्रंथकार: डॉ. अमरसिंह सैनी
प्रकाशक: अर्जेन्ट प्रिंटर्स, बनखण्डी, मथुरा
प्रथम संस्करण: सन् 2023, पेपर बैक
पृष्ठ: 328
मूल्य: ₹ 450/- रुपये

 ब्रजभाषा के मूर्धन्य विद्वान डॉ अमरसिंह सैनी 'श्रीमाली' जी द्वारा प्रणीत शोधग्रंथ 'राधावल्लभ सम्प्रदाय के ब्रजभाषा गद्य साहित्य का सर्वेक्षण' एक विशिष्ट शोध ग्रंथ है।यह सद्य प्रकाशित अद्भुत ग्रंथ मुझे श्रद्धेय श्रीमाली जी द्वारा समीक्षार्थ प्राप्त हुआ तो इसके आवरण पृष्ठ को देखते ही इसे पढ़ने की अभिलाषा बलवती हो गई। अत्यधिक कार्य -व्यस्तता एवं सामयिक न्यूनता की स्थिति में भी जब मैंने इसे पढ़ना आरम्भ किया तो पढ़ता ही चला गया। प्रस्तुत शोध ग्रंथ में विद्वान लेखक ने हित हरिवंश गोस्वामी द्वारा स्थापित राधावल्लभ सम्प्रदाय के ब्रजभाषा गद्य साहित्य का समुचित सर्वेक्षण किया है। उन्होंने राधावल्लभ संप्रदाय के ब्रजभाषा गद्य से जुड़े सभी पक्षों को इस ग्रंथ द्वारा प्रस्तुत किया है।

आचार्य नीरज शास्त्री
 हरिवंश गोस्वामी का नाम ब्रजभाषा और भक्ति काल दोनों के लिए अति महत्वपूर्ण है। भक्ति संप्रदाय के संस्थापक होने के कारण वह और अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं।  स्वामी हित हरिवंश पहले माध्व सम्प्रदाय के आचार्य गोपाल भट्ट के शिष्य थे किंतु बाद में राधावल्लभ संप्रदाय के संस्थापक हुए, ऐसा माना जाता है। ब्रजेश्वरी माँ श्री राधा रानी ने स्वामी हित हरिवंश को स्वप्र में मंत्र दीक्षा देकर राधावल्लभ संप्रदाय की स्थापना की प्रेरणा दी और तब हित हरिवंश गोस्वामी ने 'राधावल्लभ सम्प्रदाय' की स्थापना की। इस सम्प्रदाय में श्री राधा जी ही इष्ट हैं,श्री कृष्ण, उनके प्रियतम होने के कारण परम प्रिय और पूज्य तो हैं किन्तु उन्हें इष्ट स्वीकार नहीं किया गया है।

 विद्वान ग्रंथकार डॉ अमर सिंह सैनी श्रीमाली जी ने पूरे ग्रंथ को सात अध्यायों और उपसंहार के अतिरिक्त दो परिशिष्ट के अंतर्गत विभाजित किया है। इस ग्रंथ रत्न को समझने के लिए इन सभी अध्यायों का अध्ययन परम आवश्यक है।

 प्रथम अध्याय:'विषयावतार' के अन्तर्गत विषय की उपयोगिता और महत्ता के साथ ही हिंदी साहित्य के इतिहास में प्रस्तुत विषय का उल्लेख तथा अब तक हुए शोधकार्य के साथ ही सामग्री संकलन को स्थान दिया है। विषय से सम्बन्धित सामग्री का पता लगाना और फिर उसे प्राप्त करने का उपक्रम निश्चित ही लेखक के लिए कठिन साधना की तरह रहा होगा, जिसे उनके द्वारा सफलतापूर्वक सम्पन्न किया गया है।

 द्वितीय अध्याय में 'ब्रजभाषा गद्य की पृष्ठभूमि शीर्षक के अंतर्गत डॉ श्रीमाली जी ने ब्रजभाषा गद्य के स्वरूप निर्धारण,काल निर्धारण, आविर्भाव, ब्रजभाषा गद्य के विकास तथा ह्रास सभी पहलुओं पर प्रकाश डाला है। इसमें ब्रजभाषा और उसके जातिगत स्वरूप का भी बोध कराया गया है। विद्वान ग्रंथकार ने ब्रजभाषा के आरम्भिक रूप को ग्यारहवीं शताब्दी के ब्रजभाषा ग्रंथों में तलाशा है। उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि शौरसेनी अपभ्रंश से ही ब्रजभाषा की उत्पत्ति हुई है। यह अध्याय भाषा विज्ञान का पाठ अनुभव होता है तथा प्रस्तुत ग्रन्थ को अधिक महत्वपूर्ण बना देता है।

 तृतीय अध्याय: 'भक्तिकाल में राधावल्लभ सम्प्रदाय के ब्रजभाषा-गद्य-निर्माता' शीर्षक के अन्तर्गत पूर्व पीठिका में,  राधावल्लभ सम्प्रदाय के संस्थापक स्वामी हित हरिवंश एवं गोस्वामी वनमालीदास जी के जीवन एवं उनके साहित्यिक योगदान पर प्रकाश डाला गया है। इन्हीं के साथ स्वामी चतुर्भुजदास , हित ध्रुवदास , दामोदर स्वामी और प्राणनाथ के ब्रजभाषा गद्य में किए गए योगदान को भी स्पष्ट किया है।

 चतुर्थ अध्याय: 'रीतिकाल में राधावल्लभ सम्प्रदाय के ब्रजभाषा-गद्य-निर्माता' में ब्रजभाषा के तेरह अति विशिष्ट गद्यकारों को प्रस्तुत किया है जिनमें अनन्य अली, चाचा वृन्दावनदास, अतिवल्लभ, लोकनाथ, प्रेमदास, हित रूपलाल गोस्वामी, वृन्दावन दास (द्वितीय),रतनदास, हरिलाल व्यास, प्रियादास,चतुर शिरोमणि लाल गोस्वामी, प्रियादास (पटना वाले) तथा आनंदीबाई प्रमुख हैं। इन तेरह ब्रजभाषा गद्यकारों के साहित्यिक अवदान की भी विवेचना की गई है। 

 पंचम अध्याय: 'आधुनिक काल में राधावल्लभ सम्प्रदाय के ब्रजभाषा गद्य निर्माता' के अंतर्गत विद्वान लेखक ने स्वामिनी शरण, प्रीतमदास, गोस्वामी जुगतवल्लभ, राधिकाचरणदास (ढौंगी बाबा) के साहित्यिक अवदान को आलोकित किया है।

 षष्ठ अध्याय: राधावल्लभ सम्प्रदाय के ब्रजभाषा-गद्य की विविध विधायें' के अंतर्गत मौलिक एवं अनुदित ब्रजभाषा गद्य का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया है।

 सप्तम अध्याय: 'राधावल्लभ सम्प्रदाय के ब्रजभाषा गद्य साहित्य का मूल्यांकन' शीर्षक के अन्तर्गत ब्रजभाषा गद्य के आन्तर पक्ष और बाह्य पक्ष पर चर्चा की गई है। विद्वान ग्रंथकार ने यहां विभिन्न अति महत्वपूर्ण रचनाकारों के उद्धरण भी प्रस्तुत किए हैं।

 ग्रंथ के उपसंहार में डॉ श्रीमाली जी ने वर्तमान युग में ब्रजभाषा साहित्य, प्रमुखत: गद्य की उपेक्षा के प्रति चिंता व्यक्त की है। वे ब्रजभाषा साहित्य के पठन-पाठन व संरक्षण को अनिवार्य मानते हैं।

 'परिशिष्ट एक' के अंतर्गत हस्तलिखित एवं मुद्रित सहायक एवं संदर्भ ग्रंथों की सूची प्रस्तुत की गई है।
 'परिशिष्ट दो' के अंतर्गत हस्तलिखित ग्रंथों के महत्वपूर्ण पृष्ठों के स्कैन्ड छायाचित्र प्रस्तुत किए गए हैं।
 उपरोक्त सभी के आधार पर प्रस्तुत ग्रन्थ अति महत्वपूर्ण है। इस ग्रंथ के प्रणयन के लिए डॉ श्रीमाली जी ने सरल साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग किया है। शैली विवेचनात्मक है जो ग्रंथ के विषय के सर्वथा अनुकूल है।

 अंत में आवरण पृष्ठ पर ग्रंथकार का परिचय प्रस्तुत किया गया है। 328 पृष्ठीय इस ग्रंथ का मूल्य 450/- भी उपयुक्त ही है।  इस प्रकार यह ग्रंथ हिंदी साहित्य के श्री भंडार में एक और रत्न सिद्ध होता है। मुझे आशा ही नहीं,पूर्ण विश्वास है कि यह ग्रंथ विद्वान लेखक डॉ अमर सिंह सैनी श्रीमाली जी के यश में श्रीवृद्धि करेगा। अनंत शुभकामनाएँ!
 

1 comment :

  1. आदरणीय डॉ अमरसिंह सैनी श्रीमाली जी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। संपादक महोदय को बहुत बहुत धन्यवाद।

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