आदिवासी कविता की आधिकारिक परख

हरिराम मीणा

आदिवासी कविता: चिंतन और सृजन
डॉ. पुनीता जैन
प्रकाशक: सामयिक पेपरबैक्स, नई दिल्ली- 110002
पृष्ठ 544, मूल्य ₹ 795/-

 आदिवासी परिवेश, जीवन और दृष्टि को लेकर काव्य सृजन की जब बात की जाती है तो मौखिक परम्परा की समृद्ध धरोहर हमारे सामने है जो प्रमुख रूप से गेय परम्परा रही है। इसके साथ ही आंचलिक आदिवासी भाषाओं में कविता के माध्यम से जीवन के विभिन्न पक्षों की अभिव्यक्ति प्रचुर मात्रा में होती रही है। पिछले करीब ढाई दशकों से हिंदी साहित्य में आदिवासी कविता को पहचान मिलने लगी है। वैसे इससे पहले भी आदिवासी कविता का सृजन होता रहा है। सबसे पहला नाम सुशीला सामद का आता है, जो हिंदी की पहली भारतीय आदिवासी कवयित्री, पत्रकार, संपादक और स्वतंत्रता आंदोलनकारी हैं। इनका जन्म पश्चिमी सिंहभूम के चक्रधरपुर स्थित लउजोड़ा गांव में हुआ। इनके दो काव्य संग्रह प्रकाशित हैः- 1935 में ‘प्रलाप’ और 1948 में ‘सपने का संसार’।

हरिराम मीणा
 आदिवासी कविता को लेकर कई पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, जिनमें अधिकांश संपादित हैं। जहाँ तक मेरी जानकारी है, शोधपरक दृष्टि से गंभीर विश्लेषण का बड़ा कार्य पहली दफ़ा पुनीता जैन ने किया है। इनका यह आलोचना ग्रंथ ‘आदिवासी कविता : चिंतन और सृजन’ शीर्षक से हाल ही (वर्ष 2023) में प्रकाशित हुआ है। इस शोध कार्य का विस्तार और गहराई अनुक्रम पर गौर करते ही पहचाना जा सकता हैं। चिंतन खंड में आदिवासी दर्शन, विचार, परिदृश्य और मौखिक-वाचिक परंपरा को सम्मिलित किया गया है। सृजन भाग में सुशीला सामद व रामदयाल मुंडा से लेकर दुलाय चन्द्र मुंडा, रोज केरकेट्टा, ग्रेस कुजूर, निर्मला पुतुल, महादेव टोप्पो, वंदना टेटे, सरिता बड़ाइक, फ्रांसिस्का कुजूर, अनुज लुगुन, जसिंता केरकेट्टा, चन्द्रमोहन किस्कू, आदित्य कुमार मांडी, हरिराम मीणा, वाहरू सोनवणे, भगवान गव्हाडे, अन्ना माधुरी तिर्की, विश्वासी एक्का, पूनम वासम, जमुना बीनी तादर, तारो सिंदिक एवं अन्यान्य कवियों के व्यक्तित्व समेत कृतित्व पर विस्तार के साथ चर्चा की गयी है।

 प्रायः देखा जाता है कि काव्यालोचना रचना-कर्म पर केंद्रित होती है। साथ ही रचनाकार के जीवन को समझने का सतही प्रयास भी किया जाता है। रचित-प्रस्तुत कविताओं की पृष्ठभूमि में जो परंपरा, वैचारिकी, परिवेश, भावभूमि, प्रेरणा और सृजन-प्रक्रिया होती है, उसे समझने का प्रयास बहुत कम किया जाता है। इसकी वजह आलोचक का उस गहराई तक नहीं पहुँच सकना हो सकता है। जब यह मुद्दा मानव जगत के उन आदिम समुदायों से संबंधित होता है जिन्हें मानव-समाज वैज्ञानिकों ने ‘बंद समाज’ की श्रेणी में रखा नहीं। एक ऐसा समाज जिसके भीतर बाहरी व्यक्ति का प्रवेश प्रथम दृष्टया ‘वर्जित-सा’ होता है। यह ऐसा समाज होता है जिसके सदस्य किसी भी बाहरी व्यक्ति से पहली दफा मिलने में कतराता-झिझकता-शर्माता है। यह दीगर बात है कि बाहरी व्यक्ति के दोस्ताना बर्ताव को देखकर उसे अपना सकने का बड़ा दिल भी इन आदिवासियों में होता है। इसके लिए धैर्य की जरूरत होती है।

 आदिम समुदायों और उनसे जुड़े कविता जैसे कर्म की गहराई में उतरने का गंभीर प्रयत्न इस पुस्तक में दिखाई देता है। एक और बात यह है कि अक्सर बाहरी लोगों के पास आदिम मानवता को देखते रहने का या तो ‘जंगली-बर्बर’ अथवा ‘रोमांटिक’ चश्मा ही पाया जाता है। आदिवासी यथार्थ इन चश्मों से नहीं देखा जा सकता। इसके लिए आदिवासियत में प्रवेश करना होगा जो मनुष्य, मानवेतर जीवजगत और प्रकृति तत्वों के सामंजस्य के भाव में घुली-मिली है। स्वयं को चौरासी लाख योनियों में ‘सर्वश्रेष्ठ’ मानने के आग्रह और अहंकार की मानसिकता के चलते यह संभव नहीं! ‘आदिवासी रचनाकारों की सृजनात्मकता को उसके सही परिप्रेक्ष्य और सन्दर्भ में समझने की दृष्टि’ की आवश्यकता का स्पष्ट संकेत पुनीता जी ने पुस्तक की भूमिका में दे दिया है। और इस दृष्टि को विकसित करने में वे सफल दिखाई देती हैं। आदिवासी कविता को समझने के लिए यह ग्रंथ बेहद जरूरी है। पुनीता जी को बहुत बहुत बधाई ।
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हरिराम मीणा
चलभाष: 97995-56622
पता: शिव-शक्ति नगर, किंग रोड, अजमेर हाइवे जयपुर- 302019 (राजस्थान)

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