व्यंग्य: वे तो बस हिसाब लगाते हैं

अखतर अली

अखतर अली

निकट मेडी हेल्थ हास्पिटल, आमानाका, रायपुर (छत्तीसगढ़) 492010
चलभाष 9826126781

आदमी को तरह-तरह के शौक होते हैं और आदमी अपने शौक को पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ता। मेरे एक परिचित है जिनका नाम लोगो ने हिसाबी लाल रख दिया है। अगर आदमी अपने शौक पूरा करने में हिसाब नहीं लगाता तो वही हिसाबी लाल का शौक ही हिसाब लगाना है। इनको हिसाब लगाने का शौक है। कहीं कोई कार्यक्रम हो रहा है जिसका इनसे दूर दूर तक का भी संबंध नहीं फिर भी ये उस कार्यक्रम में हुए खर्चे का हिसाब लगाने बैठ जाते है। न तो किसी ने उनको हिसाब लगाने के लिये कहा और न ही उनके हिसाब को कोई चैक करता है। दुनिया को उनके बनाये हिसाब से कोई लेना देना नहीं लेकिन यह उनका शौक है। ये उस आयोजन का बारीकी से अध्ययन करते है और ध्यान से खर्चे की पाई-पाई जोड़ते हैं और इतना पक्का हिसाब बनाते है जितना उस व्यक्ति ने खुद भी नहीं बनाया होगा जिसने आयोजन किया था।

हिसाब का उन्हें बेहिसाब शौक है। उन्हें बस पता चलना चाहिये कि कहीं कुछ हो रहा है भले वह शासकीय हो या अशासकीय, किसी संस्था का हो या किसी का व्यक्तिगत कार्यक्रम हिसाबी लाल हिसाब लगाने के लिये सक्रिय हो जाते है। इस हिसाब के चक्कर में उनके व्यवसाय और गृहस्थी का हिसाब बिगड़ रहा है।

किसी परिवार में शादी हुई नहीं कि ये पूरी शादी के खर्चे का हिसाब लगाने बैठ जाते हैं। एक-एक मद का खर्चा नोट करते है। कार्ड छपाई से लेकर मेहमानों की विदाई तक का खर्चा इनके हिसाब के रडार पर होता है। ट्रांसपोर्ट में कितना खर्च हुआ, होटल में मेहमानों को ठहराने का कितना बिल बना होगा, कितने मेहमान आये, कितने दिन रुके, ऐसा कुछ नहीं होता जो उनकी नज़र से चूक जाये। पैसे के खर्चे के साथ साथ ये संबंधों का भी हिसाब रखते हैं। किसने किसको क्या बोला, किसको बोलना था पर नहीं बोला, किसको नहीं बोलना था पर बोलता रहा। कौन खुश होकर गया कौन नाराज़ होकर। फूफा का हिसाब अलग से निकालते है।

समय, स्थान और परिस्थिति के अनुसार उनके हिसाब लगाने के समीकरण भी बदलते रहते है। इनके हिसाब का इंजन बहुत तेज़ी से चलता है। इनके शानदार, जानदार, दमदार बंपर हिसाब का कुछ लोगों को इंतज़ार भी रहता है। कोई-कोई तो अपने घर में हुई शादी के खर्चे का हिसाब रखते ही नहीं कहते हैं बाद में हिसाबी लाल से पूछ लेंगे। ऐसा भी होता है जब किसी परिवार में शादी का अवसर आता है तो वह हिसाबी लाल से पिछली दो तीन शादियों का हिसाब पूछ लेता है ताकि अपने घर की शादी का बजट बना सके।

कोई आदमी नया मकान बनायेगा तो ये महाशय ज़मीन से लेकर छत तक का हिसाब करने बैठ जाते हैं। रेत के एक एक कर्ण का हिसाब लगाते हैं। हर दीवार पर कितनी ईंट लगी, कितना सीमेंट बर्बाद हुआ, कितनी रेत चोरी हुई इसका भी पूरा लेखा जोखा रखते हैं। जब हिसाब लगाने बैठे ही हैं तो लगे हाथ ठेकेदार की आमदनी का भी हिसाब लगा लेते है कि इस मकान को बनाने में ठेकेदार ने कितना कमाया।

चुनाव के दिनों में तो इनका सीज़न रहता है। इस समय तो इनको सांस लेने की भी फुर्सत नहीं मिलती। कितनी पार्टियाँ, कितने प्रत्याशी, कितनी सभाएँ, कितने पोस्टर बाप रे बाप प्रत्याशी से ज़्यादा व्यस्त तो हिसाबी लाल रहते हैं। नेताजी की आम सभा में जाते हैं तो भीड़ का हिसाब लगाने बैठ जाते हैं।  इतने लोगों को लाने ले जाने और खाने पीने में कितना खर्चा हुआ होंगा उसकी सूची बनाते है। भाषण सुनते हैं तो उसका हिसाब लगाते हैं कि इसमें कुल कितने शब्द खर्च हुए, कितने शब्द फ़ालतू ही में सुने बिना नष्ट हो गये, कितने शब्द अतिरिक्त बोल दिये गये, अगर इतने शब्द कम भी कर दिये जाते तो बात पूरी कही जा सकती थी। इनके पास पिछले कई वर्षों में दिये गये भाषणों की बैलेंसशीट है।

किसी की मृत्यु का समाचार मिलता है तो हिसाबी लाल उसके जीवन का हिसाब लगाना शुरू कर देते हैं। मृतक के अंतिम दिनों में हुए खर्च का हिसाब लगाते है फिर मृत्यु के बाद हुए धार्मिक रीति रिवाज में हुए खर्च का हिसाब लगाते है। अब जीवन और मृत्यु को जोड़ कर निष्कर्ष निकालते हैं कि बेटे को बाप कितने में पड़ा।

मोहल्ले में जब दो लोगों के बीच लड़ाई झगड़ा, गाली गलौच और मार-पीट होती है तब ये उस झगड़े का हिसाब लगाते हैं कि किसने कितनी गाली बकी, कितने लात-घूँसे चलाये, क्या-क्या आरोप लगाये गये। अपने हिसाब के अनुसार वो घोषणा करते हैं कौन जीता कौन हारा। किसने कितनी गाली दी और बदले में उसे कितनी गाली प्राप्त हुई। अपने आँकड़ों के आधार पर वो गालियों का लाभ-हानि खाता बनाकर लेनदारी देनदारी का विवरण तैयार करते है।

हिसाब लगाने में इन्हें जो आत्म संतुष्टि मिलती है उसका तो कोई हिसाब ही नहीं है। ये घर में बैठे बैठे हिसाब तैयार कर देने वाले व्यक्ति नहीं हैं। आप तो मौका ए वारदात का सूक्ष्म अध्ययन करने के बाद अपनी रिपोर्ट तैयार करते है, उसे ध्यान से पढ़ते हैं। हिसाबी लाल लड़ाकू किस्म के पढ़ाकू हैं।

इनके हिसाब में निष्पक्षता और पारदर्शिता होती है। ये अपने हिसाब में ज़रा भी तीन-पाँच नहीं करते और न ही उन्नीस-बीस होने देते हैं। यही कारण है कि आज तक ऐसा कोई माई का लाल पैदा नहीं हुआ जो इनके आँकड़ों को चुनौती देता, इनकी रिपोर्ट की हत्या नहीं की जा सकती। आँकड़ों की अविश्वसनीयता के इस दौर में हिसाबी लाल के आंकड़ों पर किसी को संदेह नहीं होता।

थोड़े थोड़े दिन में कोई न कोई इनसे यह सवाल ज़रूर करता है कि इस तरह हिसाब लगाने से तुम्हे क्या मिलता हैं ? अब उन रूखे सूखे लोगों को कैसे समझाया जाये कि दीवानों के बहुत से काम बेवजह भी होते हैं। इनका दामन हिसाबों से भरा पड़ा है। हिसाब लगाने में ये शरीर के हर अंग की उर्जा खर्च कर देते हैं। ये अपने काम का प्रचार भी करते हैं लेकिन नगाड़े की आवाज़ की तरह नहीं वायलिन की धुन की तरह करते हैं।

हिसाबी लाल हर हिसाब ख़ुशी ख़ुशी झूम-झूम कर नहीं बनाते। एक हिसाब उन्होंने रोते-रोते बनाया था। हिसाब बनाने के दौरान ज़ार-ज़ार रोते रहे। उनकी सिसकी और आँसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। ऐसा तब हुआ जब वे अपने शहर में हुए दंगे का हिसाब लगा रहे थे। दंगे कितने दिन चले, कितनी दुकानें लूटी गई, कितनी गाड़ियाँ जली, कितने इंसान मारे गये, कितने दिन बाज़ार बंद रहा, कौन लूटा कौन लुटा? इसके लिये आयोजको का कितना पैसा खर्च हुआ होगा, कितने आदमी बाहर से भाड़े पर बुलाये गये होगे। फिर खर्चे के अनुपात में बर्बादी का मूल्यांकन करते है फ़िर रिपोर्ट में लिखते है कि दंगो का आयोजन सफ़ल रहा या फ़्लॉप रहा।

अब उनके हिसाब का क्षेत्र इतना विस्तृत हो गया है कि लोग उनके सामने आने से डरने लगे हैं क्योकि ये अपने अनुभव के कमाल से आदमी का पेट देख कर पाप का, आँख देख कर नज़र का और चाल देख कर चलन का पूरा हिसाब बना देते हैं।
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