भारतीय सांस्कृतिक परम्परा और मीराबाई

डॉ. मंजु रानी

मंजु रानी

सह-आचार्य, दिल्ली विश्वविद्यालय
ईमेल: manjurani@kmc.du.ac.in
चलभाष: 8860787419

मीरा के काव्य में लोक गीतों की भाषा का अध्ययन

मीरा की काव्य भाषा का महत्वपूर्ण पक्ष है लोकतत्व। मीरा को विद्रोह के लिए जो भाषा मिली है, वह लोक से मिली है, जबकि वह खुद राजघराने की हैं,इसलिए मीरा की कविता में लोकगीतों की पंक्तियाँ मिलती हैं। ये पंक्तियाँ किसी लोकगीत की ही लगती हैं:-

    सास बुरी अर नणद हठीली, लरि लरि दे मोहिं तारी, हे माय। 
    मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरण कमल की बारी, हे माय।1

मध्यकालीन हिन्दी काव्य में अगर लोकतत्व देखा जाए तो सबसे ज्यादा मलिक मोहम्मद जायसी के यहाँ मिलता है। कबीर के यहाँ भी है और उसका होना स्वाभाविक भी है। मीरा के यहाँ जो लोकतत्व है, वह लोकगीतों वाला है।
मीरा तो मध्यकाल में ही कहती हैं कि मैं देह से विदेह हो गई हूँ सारा झंझट तो स्त्री की देह को लेकर ही है, तो अब देह है कहाँ? जब मैं कृष्ण की भक्ति में डूब गई हूँ तो मैं अब विदेह हो गई हूँ। यह मध्यकालीन कवयित्री मीरा की भाषा है, जो मीरा की काव्य भाषा में लोकतत्व की बहुत ही प्रभावशाली अभिव्यक्ति है। उनकी कुछ पंक्तियाँ-

    झर झर बूँदाँ बरसाँ आली कोयल सबद सुनाज्यो। 
    गाज्याँ बाज्याँ पवन मधुरयो, अम्बर बदराँ छाज्यो।2

मीरा की भाषा में एक तेजी है, तीखापन है। फारसी में इसे तुर्शी कहते हैं। मीरा की काव्य भाषा में मिर्च का-सा तीखापन है। वह कहती है कि मैं जानती हूँ कि तूने मुझे जहर दिया है लेकिन तुम्हारा दिया जहर मेरे लिए अमृत हो गया। वे कहती हैं कि एक ओर प्रेम का नशा है उसका नशा है। वह कभी नहीं उतरेगा। यह एक स्त्री कहती है। यह एक मध्यकालीन समाज के राजघराने की औरत की भाषा है। मीरा की एक पंक्ति और है, जो लोकगीत से आयी है:-और दूसरी ओर तुमने जो जहर दिया है -

    सास लड़े मेरी नन्द खिजावै, राणा रह्या रिसाय। 
    मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, अवरू न आवै म्हाँरी दाय।3

मीरा ने अनुभूतियों के अमूल्य क्षणों को सरस शब्द ही नहीं, सराग स्वर भी दिए। सामान्य छन्द का सहारा उन्होंने नहीं लिया क्योंकि छंद कविता को लय तो दे सकता है, राग नहीं, जो एकमात्र संगीत की सिद्धि है और इसमें संदेह नहीं कि मुयुक्त राग अभिव्यक्ति को सबल ही नहीं, उसके प्रभाव को व्यापक भी बनाता है। कदाचित् इसीलिए अपने युग के अन्य महान भक्तों की तरह उन्होंने भी भाभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में 'गेय पद' को चुना, जो साहित्य और संगीत श्री मिलन-भूमि पर जन्मा काव्य-रूप है और जिसमें भावधर्मी शब्द-साधना संगीत के स्वर विधान में आकार ग्रहण करती है। मीरा ने भी शताब्दियों की विकसित अपरा को अपने लोकगीतों के द्वारा विश्व में प्रसिद्धि दिलाई। आज भी घर-घर में कगीतों को बडी ही मधुर भाव से सुना और गाया जाता है।

 मीरा के पदों का जनमानस पर व्यापक प्रभाव पड़ा है। भजनों के रूप में. के क्षेत्र में कृष्ण-भक्ति के रूप में प्रेमाभक्ति के क्षेत्र में सरल कथन के भाषा के क्षेत्र में, साहित्यिक सौन्दर्य के रूप में तथा साहित्य के क्षेत्र में प्रभाव को देखा जा सकता हैं।

भक्तिमयी मीरा के पद अनुभूतियों से परिपूर्ण होने के कारण ही लोकमानस को एवं भावुक हृदय को हठात् विमुग्ध कर देते हैं। वस्तुतः मीरा के जनमानस पर पड़े प्रभाव को कोई नकार नहीं सकता। भारत राष्ट्र के ही नहीं बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय क्षितिज पर भी मीरा ने अपना प्रभाव स्पष्ट रूप से अंकित किया है। आसाम से लेकर केरल तक और बंगाल से लेकर कच्छ की खाड़ी तक घर-घर में मीरा के जो स्वर विभिन्न राग-रागिनियों में गुंजरित है, वे मीरा के जनमानस पर प्रभाव का स्वयंसिद्ध प्रमाण है।

वेद, उपनिषद्, वाल्मीकीय रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों को छोड़ देवें और एक व्यक्तित्व, कृतित्व, साधना या सिद्धान्त को प्रतिमान मानकर चलें तो भक्त-शिरोमणि मीराबाई मारवाड़ और मेवाड़ की धरती की सौंधी गन्ध लिए परम भक्ति-भावना व एकनिष्ठ प्रेम-साधना को जनमानस में फैलाने वाली एकमात्र अप्रतिम महिला-संत हैं। गौतमबुद्ध और और भगवान महावीर के बाद अतीत के ऐतिहासिक वातायन में आदिशंकराचार्य ही ऐसे तीसरे व्यक्ति दृष्टिगत होते हैं, जिन्होंने जनमानस के हृदय और मस्तिष्क को आलोडित-विलोडित किया है। मध्ययुग में मीराबाई के पूर्ववर्ती संतों में अकेले कबीर को यह गौरव दिया जा सकता हैं तथा मीरा के समकालीन संतों में गोस्वामी तुलसीदास उनके अमर ग्रंथ 'रामचरित मानस' को ही ऐसा सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इस सम्पूर्ण परम्परा में मीरा अकेली ऐसी महिला हैं, जो जनमानस की दीपशिखा  को ऊर्ध्वमुखी चेतना में आवर्तित करती है। मीरा-काव्य में लोकधारा का वेग बड़ा प्रबल है।

लोक विश्वास
    काग उड़ावत दिन गया, बूझू पंड़ित, जोसी हो। 
    मीराँ विरहिणि व्याकुली, दरसण कब होसी हो।4

लोक शकुन
     सावन अवन हरि अवन री, सुण्या म्हाने बात। 
    मीराँ दासि स्याम रति, ललक जीवन जात।5

लोक रूढ़ि
    दीपा जोयाँ चोक पुरावाँ हेली, पिया परदेस सजावाँ। 
    सूनी सेजाँ व्याल बुझावाँ, जाणा रेण बितावाँ।6

लोक-रीति
    मीराँ रे प्रभु गिरधर नागर, बाँह गह्याँ री लाज।7

लोक पर्व
    सावण माँ झड़ लागियो, सखि तीजाँ खेलै हो। 
    भादवै नदिया बहै, दूरी जिन मेलै हो।8

लोक प्रकृति
    थें तो राणाजी म्हाँने इसड़ा लागो, ज्यों ब्रच्छन में कैर। 
    मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, इमरित कर दियो जहर।9

लोकाभूषण
    बैर्यां साजन सांवरो री, म्हारो चूड़ली अमर हो जाए। 
    मेरे स्वामी, निराकार हरि, आप मुझसे कब मिलेंगे?10

लोक भोजन
    हाथ में माखन रोटी, गौओं के रखवाले। 
    मीरां के प्रभु गिरधर नागर, सारण अयन कूँ तारे।11

लोकोक्ति
    दाध्या ऊपर लूण लगायाँ, हिवड़े करवत सार्यां। 
    मीराँ रे प्रभु गिरधर नागर, हरि चरणाँ चित धार्यां।12

लोक मुहावरे
    तुम देख्याँ बिन कल न पड़त है, जोऊँ बाट तुम्हारी। 
    मीराँ दासी तुम चरणन की, बार बार बलिहारी।13

मीरा का यह सौन्दर्यबोध उनके प्रत्येक पद में छलकता अनुभव किया जा सकता है। अपनी साधना मीरा को इस संसार में ही रहकर करनी पड़ी थी, अतः उसके पदों में लोकजीवन के सौन्दर्य का प्रभाव अपनी अमिट छाप छोड़ता सहज दिखाई देता है। फलस्वरूप संसार के सौन्दर्य को क्षणिक और इस कारण नश्वर बताकर भी वह उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रही। यही कारण रहा कि उसक दिव्य जीवन-चरित के अनेक प्रसंग उसके पदों में लौकिक सौन्दर्य की अनुभूतिया से जुड़ गये हैं। लोकजीवन में शकुन मनाने की भावनात्मक सुन्दर परम्परा रही है। प्रेम-प्रीति के सम्बन्ध में इसका सौन्दर्य अपना अलग ही महत्त्व रखता है। खासकर जब पति परदेस में रहता हो तो उसकी विरहिणी अपने प्रिय के आगमन की उत्कण्ठा में शकुन मनाती है। मीरा भी अपने भावनामय जीवन में इस लोक-परम्परा का अनुसरण करती है और अपने साजन के आगमन की बात सोनचिरैया और कौवे का शकुन लेकर जानना चाहती है। विरह की तीव्रता में वह अपने परदेसी को पाती भी इसलिए नहीं लिख पाती कि वियोग-व्यथा से अशक्त और इस कारण उसका काँपता हाथ कलम थामने में भी असमर्थ हैं और फिर उसकी आँखों से जो निरन्तर आँसू वह रहे हैं, हृदय की धड़कन अलग बढ़ रही हैं, वह कैसे लिखे और क्या लिखे? इसी तरह विरह कातर मीरा अपना दुखड़ा भरा संदेसा चंदा और कौवे से अपने परदेसी को भिजवाने का अनुरोध करती दिखाई देती हैं। इन सभी लोकानुसारी अनुभूतियों का जो एक सौन्दर्य हैं, उससे मीरा के पद दूर नहीं रह पायी हैं।

लोकजीवन वृत्तों और त्यौहारों से भरा हुआ है। इनका लौकिक महत्त्व है तो इनका अपना सौन्दर्य भी है। इन बहुरंगी त्यौहारों तथा शिव-संकल्पों से युक्त व्रतों का सामाजिक, पारिवारिक एवं वैयक्तिक जीवन में समान महत्त्व पाया जाता है। मीरा भी अपनी आराधना उपासना में अपने प्रियतम के योगक्षेम की उत्कट अभिलाषा से इन व्रतों, त्यौहारों को मनाती देखी जाती है। इस दृष्टि से मीरा के पदों में गणगौर और सावणी तीज जैसे त्यौहारों का उल्लेख हुआ हैं, गणगौर एक ऐसा सांस्कृतिक अवसर हैं, जिसमें व्रत और त्यौहार दोनों के मिले-जुले रूप मिलते हैं। योग्यवर की प्राप्ति के लिए इसे जहाँ कुँवारी कन्याएँ मनाती हैं, वहाँ सौभाग्यवती स्त्रियाँ इसी संदर्भ में मीरा कार्तिक स्नान और दान पुण्य करने का उल्लेख भी करती हैं। रंग भरा होली का त्यौहार तो अपना अनूठा ही रंग-ढंग रखता हैं। लोकजीवन में यह हर्षोल्लास की अभिव्यक्ति का खुला अवसर उपलब्ध कराता हैं। इस प्रसंग में मीरा के अधिकांश पद ब्रज के होली सौन्दर्य की पृष्ठभूमि पर मिलते हैं। जिनमें मीरा गोपी बनकर कृष्ण के साथ होली खेलती दिखाई देती है। इन पदों में जहाँ मीरा का हर्षोल्लास अपनी चरम सीमा पर हैं। वहाँ वह मात्र मीरा रहकर प्रोषित पतिका के रूप में अपने विरह में डूबी उदास भी देखी जाती है। जिसका प्रियतम परदेश में हो तो वह होली कैसे और किसके साथ खेले।
    होली पिया बिना लगन री खरी।
    सूने गाँव और देश, सूनी क्यारियाँ और अटारिया।14

संदर्भ:
1.मीराबाई की पदावली: परशुराम चतुर्वेदी, पद 168, पृष्ठ 145
2. मीराबाई की पदावली: परशुराम चतुर्वेदी, पद 148, पृष्ठ 139
3.मीराबाई की पदावली परशुराम चतुर्वेदी, पद 42, पृष्ठ 109
4.मीराँबाई की पदावली: परशुराम चतुर्वेदी, पद 114, पृष्ठ 130
5. मीराबाई की पदावली: परशुराम चतुर्वेदी, पद 66, पृष्ठ 115
6. मीराबाई की पदावली: परशुराम चतुर्वेदी, पद 78, पृष्ठ 119
7. मीराबाई की पदावली: परशुराम चतुर्वेदी, पद 108, पृष्ठ 128
8. मीराबाई की पदावली: परशुराम चतुर्वेदी, पद 114, पृष्ठ 129
9.मीराबाई की पदावली: परशुराम चतुर्वेदी, पद 34. पृष्ठ 106
10. मीराबाई की पदावली: परशुराम चतुर्वेदी, पद 200, पृष्ठ 154
11. मीराबाई की पदावली: परशुराम चतुर्वेदी पद 164, पृष्ठ 144
12. मीराबाई की पदावली: परशुराम चतुर्वेदी, पद 82, पृष्ठ 121
13. मीराबाई की पदावली: परशुराम चतुर्वेदी, पद 112, पृष्ठ 129
14.मीरा का सौन्दर्यबोध: डॉ. रणजीत सिंह गढाला, पृष्ठ 60-61
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