रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून...

पानी गये न ऊबरे मोती, मानुस, चून

पेयजल विश्व की प्रमुख समस्याओं में से एक है फिर भी इसे जिस गम्भीरता से लिया जाना चाहिये वह हमारे प्रशासकों में नहीं दिखती है। संसार की लगभग चौथाई आबादी के लिये शुद्ध पेयजल आज भी दुर्लभ है। इस मामले में भारत की दशा बहुत बुरी है जहाँ शायद ही किसी भी महानगर का जल आरओ या फ़िल्टर के बिना पिया जा सके। बड़े राज्यों की बात तो छोड़ ही दें, दिल्ली जैसे नगर-राज्य तक में जो हिमनद-पोषित यमुना नदी के तट पर स्थित है, पेयजल व्यवस्था की कमर टूटी हुई है। कभी झीलों का नगर कहे जाने वाले बेंगळूरु ने गर्मी का मौसम आने से पहले ही जल का हाल बुरा होने की भविष्यवाणी कर दी है। दिन-ब-दिन हम से मैं की ओर बढ़ते समाज के सूखते नदी-तालों के बीच इस प्रकार के समाचार अत्यंत पीड़ादायक हैं, विशेषकर बेघर जनता, विवश वन्य-प्राणियों तथा यायावर नागर पशुओं के लिये, जो प्यास लगने पर किसी दुकान में जाकर पानी की बोतल नहीं खरीद सकते। 

तपती लू की तरह हर ओर से आती अक्षमता, स्वार्थ, भ्रष्टाचार और निठुराई की हवा के बीच एक समाचार शीतल बयार सा लगा। ओडिशा राज्य ने सन् 2017 में शुरू किये "नलके से पियो" अभियान (Drink from Tap Mission) पर काम करते हुए सोपानबद्ध प्रयासों द्वारा घर-घर पाइप द्वारा शुद्ध पेयजल की आपूर्ति का लक्ष्य नागर क्षेत्रों में पूरा कर लिया है। यह पानी भारतीय जल शुद्धता मानक (IS 10500) पर खरा है।

ओडिशा जल निगम (Water Corporation of Odisha, WATCO) ने इस महत् कार्य को भुवनेश्वर और पुरी में अग्रणी-परियोजना के रूप में आरंभ किया और फिर धीरे-धीरे अनुभव लेते हुए अन्य नगरों को सम्मिलित किया गया। पाइपों के पुराने जाल को सुधारने के साथ-साथ संरचना और वितरण का विस्तार किया गया और केंद्रीय जल संशोधन संयंत्रों से आपूर्ति निश्चित की गयी।

इसके साथ-साथ जल-साथी नामक स्वयंसेवकों को प्रशिक्षण देकर मीटर-रीडिंग, बिल-उगाही के अलावा नलकों की छोटी-मोटी मरम्मत तथा ग्राहक शिकायत व सुविधा जैसे कामों को सहज-सुलभ किया गया। इन जल-साथियों के सहयोग से मोबाइल वैन और प्रयोगशालाएँ संशोधन संयंत्र से लेकर घरों की टोंटी तक विभिन्न स्तरों पर जल की गुणवत्ता की जाँच करते हैं ताकि आपूर्ति शुद्ध रहे।

जलापूर्ति की दृष्टि से ओडिशा राज्य का यह क्रियान्वयन न केवल प्रशंसनीय है बल्कि अन्य छोटे-बड़े प्रदेशों व नगर-राज्यों द्वारा अपनी काहिली छोड़ने का एक आह्वान भी है। देखें कितने राज्य और प्रशासक इस अनुकरणीय उदाहरण से कुछ सीखते हैं। विश्वगुरु तो हम हैं ही, कभी-कभी छात्र भी बन सकें तो देश के जीवन-स्तर में सुधार होगा।


विनीत,
सेतु, पिट्सबर्ग
31 मार्च 2024 ✍️

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