मीडिया की आचार संहिता के महत्व को प्रतिपादित करती पुस्तक: भूमण्डलीकरण: मीडिया की आचार संहिता

समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

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समीक्ष्य पुस्तक: भूमण्डलीकरण: मीडिया की आचार संहिता (शोध प्रबंध) 
लेखक: डॉ. अमित कुमार विश्वास
आईएसबीएन: 978.93.5518.476.4
प्रकाशक: वाणी प्रकाशन, दिल्ली
प्रकाशन वर्ष: 2023 
मूल्य: ₹ 950 रुपये 
पृष्ठ: 400 

साहित्य मनीषी, जागरूक पत्रकार, सम्पादक डॉ. अमित कुमार विश्वास की एक महत्वपूर्ण पुस्तक ‘भूमण्डलीकरण’ का प्रकाशन दिल्ली के वाणी प्रकाशन ने किया है। 400 पृष्ठीय इस पुस्तक में भूमण्डलीकरण को केन्द्र में रखकर 10 शोध परक आलेखों का समावेश किया है।

आलेखों के शीर्षक हैं- भूमण्डलीकरण, भूमण्डलीकरण और बहु राष्ट्रीय कम्पनियाँ, भूमण्डलीकरण और मीडिया का अन्तःसम्बन्ध,मीडिया और सांस्कृतिक साम्राज्यवाद, ग्लोबल विलेज और मार्शल मैकलुहान, पत्रकारिता, मीडिया कानून, मीडिया की आचार संहिता तथा आचार संहिता: व्यावहारिक पक्ष एवं वर्तमान बहस, प्रेस की स्वतंत्रता एक बहस आदि।

दिनेश पाठक ‘शशि’
प्रबुद्ध लेखक ने इन शोध आलेखों को तैयार करने में अत्यन्त श्रमपूर्वक अनेक सन्दर्भ ग्रन्थों का गहन अध्ययन किया है, पुस्तक को पढ़ते हुए पग-पग पर यह अहसास होता है।

पुस्तक के पहले आलेख "भूमण्डलीकरण" में डॉ. अमित कुमार विश्वास  लिखते हैं "भूमण्डलीकरण विश्व भर के इतिहास में सर्वथा नयी परिघटना है।

वस्तुतः भूमण्डलीकरण किसी एक देश के अर्थतन्त्र को शेष विश्व की अर्थव्यवस्था से जोड़ने का प्रकल्प है, जिसमें आर्थिक गतिविधियाँ बिना किसी अवरोध के विश्व भर में संचालित होती हैं।" (पृष्ठ 33)

भूमण्डलीकरण के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को समझाते हुए अमित जी ने विभिन्न रूपों का यथा आर्थिक भूमण्डलीकरण, सांस्कृतिक भूमण्डलीकरण राजनैतिक भूमण्डलीकरण, का मनुष्य के जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों को व्याख्यायित किया है।

भूमण्डलीकरण की अवधारणा को भारत की "वसुधैव कुटुम्बकम्" से समानता स्थापित करते हुए अमित जी कहते हैं कि-

"भूमण्डलीकरण कोई नयी अवधारणा नहीं है। यह हमारे यहाँ की पारम्परिक "वसुधैव कुटुम्बकम्" अर्थात् सारा विश्व एक परिवार है, की अवधारणा के करीब है।" (पृष्ठ 71)

पुस्तक के दूसरे अध्याय का शीर्षक है " भूमण्डलीकरण और बहु राष्ट्रीय कम्पनियाँ" है। इसके " भूमण्डलीकरण के सन्दर्भ में बहु राष्ट्रीय   कम्पनियों का इतिहास" उप शीर्षक के अन्तर्गत बहु राष्ट्रीय  कम्पनियों का इतिहास प्रस्तुत किया गया है जैसे- "आधुनिक बहु राष्ट्रीय कम्पनियों में दुनिया की सबसे पहली कम्पनी "द मस्कोवी कम्पनी" मानी जाती है। जिसकी स्थापना सन् 1553 में हुई।"

"सन् 1600 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी व्यापार करने के उद्देश्य से भारत आई।"(पृष्ठ 87)

दूसरे ही अध्याय का एक और उप शीर्षक है "भारत में बहु राष्ट्रीय कम्पनियाँ" जिसके अन्तर्गत लेखक ने आँकड़े जुटाते हुए बताया है कि-

"भारत में विदेशी कम्पनियाँ तीन तरीके से अपने व्यापार करती हैं- एक-सीधे तौर पर अपनी शाखाएँ खोलकर, दूसरा- अपनी सहायक कम्पनियों के द्वारा और तीसरा- देश की अन्य कम्पनियों के साथ साझीदार कम्पनी के रूप में।

भारत में 1990 ई. के बाद लागू नई आर्थिक नीति के तहत विकास के नाम पर बहु राष्ट्रीय कम्पनियों को न्योता देकर बुलाया जाने लगा। जून 1995 तक 3500 से अधिक बहु राष्ट्रीय कम्पनियाँ, अपनी शाखाओं या सहायक कम्पनियों के रूप में व्यापार करने लगीं थीं।"(पृष्ठ 93)

इसी अध्याय में लेखक ने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के झूठ और सच का भी कच्चा चिट्ठा खोला है।

पुस्तक के तीसरे अध्याय का शीर्षक है "भूमण्डलीकरण और मीडिया का अन्तःसम्बन्ध"। वर्तमान में मीडिया के बदलते हुए स्वरूप पर लेखक ने चिंता व्यक्त की है। वह लिखते हैं-

"पहले की मिशनरी पत्रकारिता ने वृत्ति से नहीं अपितु व्रत से देश के भविष्य की दिशा तय करने में अपना अमूल्य योगदान किया पर आज यह बाजारवाद का अंग बन चुका है। बाजारवाद में शुद्ध लाभ के गणित को तरजीह दी जाती हैं यहाँ हमें यह कहने में गुरेज नहीं है कि पूँजीपति ही देश के भाग्य निर्माता हो गये हैं। संचार माध्यमों से पूँजीपतियों ने उपभोक्तावादी संस्कृति को बढ़ावा दिया है।" (पृष्ठ 109)

इसी अध्याय में विद्वान लेखक ने कुछ उपशीर्षकों "भारत में मीडिया एवं भूमण्डलीकरण का दबाव","भारतीय मीडिया का चरित्र एवं भूमण्डलीकरण", वैश्विक बिरादरी एवं भारतीय लोकतंत्र", मीडिया की राजनीतिक अर्थव्यवस्था" आदि के द्वारा भूमण्डलीकरण के परिप्रेक्ष्य में भारतीय मीडिया को व्याख्यायित किया है। वह लिखते हैं-

"आज जब हम भूमण्डलीकरण के परिवेश में साँस ले रहे हैं, तब वर्तमान मीडिया का राजनीतिक आर्थिक तन्त्र कृषि युगीन लोक संचार माध्यमों से नितान्त भिन्न है। यहाँ तक कि स्वतन्त्रता कालीन मीडिया से भी भिन्न। ... हिन्दी पत्रकारिता की मिशनरी भूमिका का विलोपीकरण हुआ है।" (पृष्ठ 123)

वह आगे लिखते हैं कि "आज मीडिया की एकमात्र नैतिकता का दर्शन होता है-बाजारवाद में। वर्तमान दौर में मीडिया का यह राजनीतिक-आर्थिक तन्त्र है जो परम्परागत आचार संहिता के लिए तर्कसंगत नहीं है।" (पृष्ठ 125)

चौथे अध्याय "मीडिया और सांस्कृतिक साम्राज्यवाद" में डॉ. अमित विश्वास लिखते हैं "अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के नाम पर जनमाध्यम बाजार के लक्ष्य की पूर्ति करता है। बेशुमार पूँजी लगने के कारण मीडिया पर पूँजीपतियों का आधिपत्य स्थापित हो जाता है।" (पृष्ठ 126)

वे आगे लिखते हैं "हू ऑन दि मीडिया? कंसन्ट्रेशन ऑफ ऑनरशिप इन दि मास कम्यूनीकेशन इंडस्ट्री" नामक कृति में बेंजामिन एम.कम्पनी ने 35 हजार से 40 हजार अमेरिकी मीडिया कम्पनियों का सर्वेक्षण कर बताया कि ज्यादातर उपभोक्ता उत्पादों के मालिक मीडिया समूह के मालिकान हैं।" (पृष्ठ 127)

सम्पादकों की स्वतंत्रता के बारे में बताते हुए वह सम्पादकों की विवशता को भी इंगित कर देते हैं-

"अपने हितों के विस्तार के लिए ये कम्पनियाँ, सम्पादकीय नीतियों में हस्तक्षेप करती हैं।" (पृष्ठ 127)

इसी अध्याय में लेखक ने न्यूज कॉरपोरेशन और टाइम वार्नर, डिज्नी  आदि विभिन्न कम्पनियों की महत्वपूर्ण जनमाध्यम परिसम्पत्तियों का व्योरा भी पेश किया है।

सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का उल्लेख करते हुए लेखक का कथन है कि-

"अंग्रेजी शासन के आक्रमण का राष्ट्रीय स्तर पर जितना विरोध होना चाहिए था वह नहीं हो पाया इसलिए सीमित साधनों व मामूली संख्या में सैनिकों के रहते हुए भी अंग्रेज भारत को जीतने में सफल हुए। ऐसे ही आज अगर  पश्चिम का सांस्कृतिक साम्राज्यवाद एशिया, अफ्रीका में तेजी से हावी हो रहा है तो इसका एक बड़ा कारण यहाँ के लोगों का सांस्कृतिक समर्पण है। (पृष्ठ 139)

लेखक का ऐसा आँकलन है कि भूमण्डलीकरण आर्थिक रूप से, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से एवं राजनीतिक रूप से, अलग-अलग देशों को  अलग-अलग प्रकार से प्रभावित करता है

भूमण्डलीकरण के सकारात्मक पक्ष को प्रस्तुत करते हुए डॉ. अमित का कहना है कि-

"यह सही है कि भूमण्डलीकरण तमाम विसंगतियों के बावजूद जाति प्रथा को दूर करने में अपनी महती भूमिका निभा रही है।.... जाति प्रथा, जो अस्पृश्यता की अमानवीयता से ग्रसित थी, का बन्धन काफी हद तक शिथिल हो गया। ऊँची जाति के लोगों का, निम्न जातियों के साथ दुर्व्यवहार करना आम बात नहीं रही है। मीडिया के माध्यम से दलित व कमजोर तबके भी अपनी व्यथा को समाज के समक्ष बयाँ करते हैं।" (पृष्ठ 151-152)

जहाँ लेखक ने भूमण्डलीकरण के सकारात्मक पक्ष को रखा है वहीं इसके नकारात्मक पक्ष को लेकर वह चिंतित भी है। वह बताते हैं कि- 

"परिवार नाम की संस्था चरमरा रही है। भारत की पहचान सांस्कृतिक विविधताओं के कारण से विशिष्ट है, बाजारीय शक्तियों ने हमारी परम्पराओं को बहुत गहरे तक प्रभावित किया है। बर्थडे, फादर्सडे, वेलेन्टाइन डे, वीमेन्स डे, लेबर डे समारोह में फास्ट फूड रेस्तराओं की बढ़ती संख्या और गिफ़्ट पैक संस्कृति को बढ़ावा दिया है। बाजार के एजेन्डे के तहत ही हम शॉपिंग मॉल, प्लास्टिक मनी, मनोरंजन के लुभावने तरीके से जुड़ते जा रहे हैं।" (पृष्ठ 152)

"भूमण्डलीकरण के दौर में खास करके नयी आर्थिक नीति के दुष्परिणाम दृष्टि  गोचर होने लगे हैं और ज्यों-ज्यों लोग इसके दंष को महसूस करेंगे, उनकी पीड़ा मुखर होने लगेगी।" (पृष्ठ 153)

पुस्तक के पांचवे अध्याय का नाम है "ग्लोवल विलेज और मार्शल मैकलुहान"।

कनाडा के मीडिया सिद्धान्तकार और टोरंटो स्कूल के प्रो.मार्शल मैकलुहान ने टी.वी.के आधार पर ग्लोवल विपेज की धारणा दी। मैकलुहान के अनुसार इलैक्ट्रोनिक माध्यम दृश्य    संस्कृति का परिचायक है। दृश्य    संस्कृति आत्म का विकास सामूहिकता की कीमत पर करती है।  ...यही वह प्रस्थान बिन्दु है जहाँ से राष्ट्र , राज्य का क्षय आरम्भ होता है।" (पृष्ठ 168)

"पत्रकारिता" शीर्षक है अगले अध्याय का। पत्रकारिता से जुड़े लोगों के लिए तथा शोधार्थियों के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण अध्याय है। इसमें संचार के कार्य, संचार के तत्व,संचार के प्रकार,तथा जनसंचार के माध्यम, हिन्दी पत्रकारिता की विकास यात्रा सभी का महत्वपूर्ण तरीके से विस्तृत वर्णन किया गया है। इतना ही नहीं आकाशवाणी की विकास यात्रा और टेलीविजन के विकास तथा सोशल मीडिया के बारे में भी पूर्ण जानकारी दी गई है।

मीडिया कानून की जानकारी दे रहा है पुस्तक का अगला अध्याय जिसका शीर्षक ही है "मीडिया कानून"। इसके अन्तर्गत विद्वान लेखक ने भारतीय संविधान में मीडिया के बारे में विस्तृत जानकारी दी है।

"अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर हम कोई अनुचित कार्य न करने लगें, इसके लिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(2) में युक्तियुक्तता का उल्लेख है अर्थात् नागरिकों की वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाई जा सकती है।" (पृष्ठ 209)

मुक्त प्रेस की अवधारणा के बारे में बताते हुए लेखक ने लिखा है कि-

"इस अवधारणा के तहत ही भारत में संविधान के अनुच्छेद 19 (1)क में निहित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत मुक्त प्रेस के यथार्थ रूप् में हम पाते हैं कि पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है।" (पृष्ठ 212)

इसी अध्याय में श्रमजीवी पत्रकार कानून 1955 का उल्लेख किया गया है तो फिल्म प्रमाणीकरण बोर्ड के बारे में भी बताया गया है। केबल टेलीविजन नेटवर्क अधिनियम 2002, प्रेस से सम्बन्धित कानून,प्रेस के अधिनियम आदि की विस्तृत जानकारी भी इस अध्याय मे दी गई है।

पुस्तक का आठवाँ अध्याय "मीडिया की आचार संहिता" है। लेखक ने अपने प्राक्कथन में स्पष्ट   किया है कि-

परम्परागत रूप से प्रेस या मीडिया को हम लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ या पहरुआ के रूप में देखते-समझते आये हैं। यह सोचना देश के प्रत्येक संवेदनशील व जागरूक नागरिक का कर्तव्य है कि क्या यह प्रहरी वर्तमान वैश्वीकृत   परिवेश में भी अपनी अपेक्षित या वांछित भूमिका निभा रहा है? क्या भूमण्डलीकरण ने इसके मूलभूत चरित्र को परिवर्तित किया है? सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक स्तरों पर आ रहे परिवर्तन से यह कितना प्रभावित हुआ है? प्रश्न या मूल मुद्दा यह भी है कि प्रेस या मीडिया ने देश के लिए दिशा बोधक की भूमिका निष्ठा  पूर्वक निभाई है या नहीं। (पृष्ठ 24)

मीडिया की नैतिकता पर उठ रहे सवालों के मद्देनजर ही आचार संहिता की बात लाजमी है कि क्या मानवीय मूल्यों के सरोकारों से सम्बद्ध है। "भूमण्डलीकरण मीडिया की आचार संहिता" विषय पर यह पुस्तक इन उद्देश्य की पड़ताल करती है कि... ( पृष्ठ 27)

पुस्तक के अगले अध्याय  "आचार संहिता : व्यावहारिक पक्ष एवं वर्तमान बहस" में आचार संहिता के व्यावहारिक पक्षों पर सप्रमाण चर्चा की गई है। भारतीय प्रेस परिषद् में आचार संहिता उल्लंघन के सन्दर्भ में वर्ष 2001 से 2020 के मध्य घटित मामलों का विवरण इस अध्याय में क्रमवार दिया गया है तो प्रेस की स्वतंत्रता के खतरे से सम्बन्धित मामलों को भी। इस प्रकार प्रेस सम्बन्धी अनेकानेक तथ्यों को सप्रमाण इस अध्याय में प्रस्तुत किया गया है।

पुस्तक का 10वाँ अध्याय  "प्रेस की स्वतंत्रता एक बहस" है जिसमें विद्वान लेखक डॉ. अमित कुमार विश्वास ने प्रेस की स्वतंत्रता के दायरों के विभिन्न पक्षों के तर्क-वितर्क प्रस्तुत किए हैं। मास मीडिया की परिभाषा पर पुनर्विचार करने की जरूरत भी बताई है। उनके अनुसार समाज की कुछ ताकतवर शक्तियाँ मीडिया की भूमिका ही बदल देना चाहती हैं। वह यह भी कहते हैं कि "हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ से जो जनअपेक्षाएँ हैं वैसी किसी अन्य पेशे से नहीं। अगर मीडिया थोड़ा भी विचलित हो जाये तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था ही चरमरा जायेगी। (पृष्ठ 343)

पुस्तक के बारे में पुनः दोहराना पड़ेगा कि प्रबुद्ध लेखक डॉ. अमित कुमार विश्वास ने 400 पृष्ठीय इस पुस्तक को तैयार करने में अत्यन्त श्रमपूर्वक अनेक सन्दर्भ ग्रन्थों का गहन अध्ययन करके भूमण्डलीकरण के इस युग में मीडिया की आचार संहिता के महत्व को प्रतिपादित किया है। पुस्तक, पत्रकारिता के विभिन्न रूपों से जुड़े सभी मीडियाकर्मियों व  आमजन के ज्ञान में वृद्धि करने वाली महत्वपूर्ण पुस्तक तो है ही, शोधकर्ताओं के लिए भी अति उपयोगी सिद्ध होगी, ऐसी आशा है।

पुस्तक मन्त्रिमण्डल सचिवालय (राजभाषा) विभाग बिहार सरकार, पटना के प्रकाशन अनुदान से प्रकाशित हुई है। पुस्तक का मुद्रण त्रुटिहीन एवं आवरण अत्यन्त आकर्षक व विषय के अनुरूप है। निश्चित ही पुस्तक डॉ. अमित कुमार विश्वास के यशवर्द्धन में सहायक सिद्ध होगी, ऐसा विश्वास है।

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