समीक्षा: गुरुभक्त सिंह 'भक्त' के जीवन और साहित्य पर 'कुन्द' जी का श्रद्धापूर्वक चिन्तन

विजय कुमार तिवारी


समीक्षित कृति: गुरुभक्त सिंह 'भक्त' जीवन और साहित्य
लेखक: जगदीश प्रसाद बरनवाल 'कुन्द'
मूल्य: ₹ 400/-
प्रकाशक: संकल्प प्रकाशन, दिल्ली


जगदीश प्रसाद बरनवाल 'कुन्द' जी हिन्दी साहित्य में चर्चित, प्रतिष्ठित, खूब सम्मानित व पुरस्कृत रचनाकार हैं। उत्तर प्रदेश का आजमगढ़ उनका जन्म स्थान और कर्मभूमि दोनों है। लगभग 75 वर्ष की उम्र के बावजूद उनकी साहित्यिक गतिविधियाँ यथावत हैं और उन्होंने स्वयं को सक्रिय बनाए रखा है। 1949 में जन्मे कुन्द जी की प्रथम कविता 'आज' में 1963 में सर्वप्रथम प्रकाशित हुई। फिर तो देश भर की पत्र-पत्रिकाओं ने उन्हें खूब छापा, उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुईं और उन्हें अनेकानेक पुरस्कार प्राप्त हुए। हालांकि मुझे उनके विपुल साहित्य से परिचित होने और पढ़ने का सुयोग बहुत कम बना है। सुखद है, उनकी नवीनतम प्रकाशित पुस्तक "गुरुभक्त सिंह 'भक्त' जीवन और साहित्य" मेरे सामने है और इसी के बहाने उनके लेखन से परिचित होने का सुअवसर मिला है।

गुरुभक्त सिंह 'भक्त' और जगदीश प्रसाद बरनवाल 'कुन्द' दोनों आजमगढ़ के हैं और दोनों ने हिन्दी साहित्य सेवा अपने-अपने तरीके से की है। कुन्द जी उनके प्रति श्रद्धा भाव रखते हैं, उनसे सीखते हैं और उनकी इच्छा रही है कि उनके व्यक्तित्व व कृतित्व पर पाठकों के लिए विचार किया जाए। यह पुस्तक उसी भाव से भक्त जी के प्रति कुन्द जी का श्रद्धापूर्वक समर्पण है। दोनों की उम्र में लगभग छः दशक का अन्तराल है फिर भी कुन्द जी को उन्होंने पारिवारिक सदस्य बना लिया।

विजय कुमार तिवारी
कुन्द जी "अपनी बात" में लिखते हैं, "हिन्दी के प्रमुख प्रबंधकाव्यकारों में गुरुभक्त सिंह 'भक्त' का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। 1920 में उनकी कविताओं में परिपक्वता के दर्शन होने लगे थे। यह काल द्विवेदी युग की स्थूलता और इतिवृत्तात्मकता की प्रतिक्रिया में उद्भूत छायावाद के विकास का माना जाता है। कुछ कवियों ने इन दोनों प्रवृत्तियों के मध्य का मार्ग अपनाया और स्वतन्त्र गति दी। जहाँ उनमें इतिवृत्तात्मकता, वर्णनात्मकता है वहीं प्रकृति एवं मानव मन की सूक्ष्म से सूक्ष्म अभिव्यक्तियों को भी प्रश्रय दिया गया है।" कुन्द जी लिखते हैं-"आचार्य पं रामचन्द्र शुक्ल ने उन कवियों को विस्तृत अर्थ भूमि पर स्वाभाविक स्वच्छन्दता का मर्म पथ ग्रहण करके चलने वाला बताया है। इन स्वच्छन्दतावादी कवियों में भक्त जी का नाम सर्वोपरि है।" गुरुभक्त सिंह 'भक्त' के लेखन पर उनकी यह टिप्पणी समझने योग्य है-"चाहे स्फुट कविताएं हों या प्रबंध काव्य की पंक्तियाँ, सबमें प्रकृति एवं मुहावरों को, मानवीय प्रवृत्तियों तथा संवेदनाओं के धागे के साथ इस प्रकार गूँथा गया है कि वे एक रत्नजटित मनका की भांति देदीप्यमान हो गयी हैं।" कुन्द जी स्पष्टतः लिखते हैं-"जब उनके लेखन की सर्वांगीणता पर मंथन और आलोचकीय दृष्टि से विचार होना चाहिए था, उस वृद्धावस्था के काल में वह हिन्दी साहित्य में भुला दिए गए। मृत्योपरान्त तो कभी उनकी चर्चा ही नहीं हुई।"

यह स्थिति हिन्दी साहित्य में केवल गुरुभक्त सिंह 'भक्त' जी की ही नहीं है, ऐसे बहुत से रचनाकार काल-कवलित हो सदा के लिए गुमनामी के अंधेरे में खो गए हैं। उनका कोई उल्लेख तक नहीं होता। हमारे देश में हर भाषा और बोली के साहित्य के लिए कोई ऐसी व्यवस्था अवश्य होनी चाहिए जो रचनाकारों को गुमनामी से बचा सके। इससे साहित्य की क्षति तो होती ही है, कई बार लेखक भी बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। लेखन ईश्वर प्रदत्त प्रतिभा है, उसे फलने-फूलने और पूर्ण होने देना चाहिए। इस दिशा में सरकारों के साथ-साथ संस्थाओं की भी सहभागिता होनी चाहिए। सबसे अधिक अपेक्षा लेखक-रचनाकारों से ही है, उन्हें स्वयं इस दिशा में सार्थक पहल और कारगर प्रयास करना चाहिए। इस दिशा में कुन्द जी द्वारा गुरुभक्त सिंह 'भक्त' को लेकर किया गया यह प्रयास सराहनीय और स्तुत्य है।

आज का लेखक पढ़ नहीं रहा। न तो वह समकालीन साहित्य पढ़ता है और न प्राचीन, बस स्वयं लिखता है, स्वयं पढ़ता है और आत्म-मुग्धता में जीता है। इस दिशा में बहुत कुछ लिखा गया है और लोग समझते भी हैं फिर भी दौड़ में सभी लगे हुए हैं।

जगदीश कुमार बरनवाल 'कुन्द' जी ने अपनी पुस्तक को 15 खण्डों में विस्तार दिया है, साथ में सन्दर्भ पुस्तकें और पत्र-पत्रिकाओं की भी चर्चा की है। उनका यह कथन महत्वपूर्ण है-"व्यक्ति को शिखर पर चढ़ाने में प्रेरणा का बहुत बड़ा योगदान होता है।" इसकी पुष्टि में वे 'भक्त' जी को ही उद्धृत करते हैं-"कुछ पूर्व जन्म का संस्कार लेकर इस जीवन में आया था। सम्भवतः इसी से सरस्वती जी स्वाभाविक काव्यधारा हृदय-उद्गम से प्रवाहित करती रहती हैं। मैं निश्चित रूप से कैसे कहूँ कि काव्य के प्रति रुझान कब और कैसे हुई। प्रेरणा का स्रोत तो मेरी दृष्टि में अनादि और अनन्त है।" प्रकृति उनके लिए सहचरी की तरह है। उन्होंने 'दरवेश' उपनाम से गजलें लिखनी शुरू की और खूब चर्चित भी हुए। स्वामी सत्यदेव परिव्राजक की बातें सुनकर कि वे जो कुछ भी लिखें, अपनी मातृभाषा हिन्दी में लिखें, भक्त जी ने हिन्दी में लिखना शुरू कर दिया। कुन्द जी ने उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि और जन्मस्थान आदि का सुन्दर, मनोहारी चित्रण किया है। साथ ही उनकी साहित्यिक यात्रा, उनका लेखन और अन्य साहित्यिक पक्षों का भी उल्लेख किया है। उनके जीवन में अनेक विपत्तियाँ आयीं। कुन्द जी लिखते हैं-"वह टूटे जरूर लेकिन बिखरे नहीं।" भक्त जी निराला और पन्त जी के ही समकालीन हैं परन्तु उनकी चर्चा उतनी नहीं हुई। इस तरह उन्होंने "पारिवारिक परिवेश और जीवनवृत" नामक अपने पहले लेख में तत्कालीन साहित्यिक परिस्थितियों का सार्थक चिन्तन किया है।

कुन्द जी ने गुरुभक्त सिंह 'भक्त' के प्रकृति चित्रण व अध्ययन को लेकर "प्रकृति से तादात्म्य" लेख में विस्तार से वर्णन किया है-"भक्त जी और उनके प्रकृति प्रेम का संबंध बचपन से है।" उन्होंने स्वयं लिखा है- "सबसे ज्यादा स्नेह पात्र थे मेरे द्विज समुदाय। खगकुल ही, मानव जाति के साथी, सहयोगी के रूप में प्रकृति की सुन्दरतम और अत्यन्त उपयोगी रचना है।" उनका कवि मन स्वीकार करता है-"हम उनकी उपेक्षा करके उनके सौन्दर्य और संगीत का रस नहीं लेते।" भक्त जी के विचार से उत्कृष्ट काव्य लिखने के लिए सूक्ष्म से सूक्ष्म विषयों का ज्ञान रखना आवश्यक होता है। उसमें नवीनता, आकर्षण और प्रवाह होना चाहिए। कुन्द जी लिखते हैं-"विविध ऋतुओं, नक्षत्रों, पक्षियों, वृक्षों, घासों आदि का ज्ञान रखने में वह अद्वितीय थे।" प्रकृति, फूलों और पक्षियों को लेकर उन्होंने खूब पढ़ा व शोध किया है और उनके काव्य 'नूरजहाँ' में उनका प्रकृति प्रेम देखा जा सकता है।

कुन्द जी लिखते हैं-भक्त जी को इतिहास, पुरातत्व और ललित कलाओं से काफी प्रेम रहा है। उनका मत है, ऐतिहासिक पात्रों को लेकर काव्य सृजन के लिए संबंधित स्थलों, पुस्तकीय साक्ष्यों एवं तत्कालीन परिवेश व परिस्थितियों का अवलोकन, अध्ययन अवश्य किया जाना चाहिए। बरसों वह रियासतों के दीवान रहे हैं जहाँ दिन-रात नाच-गाने का समां बँधा रहता था, उन्होंने उन बारीकियों को समझा और अपने सृजन में उतारा। उनके अनुसार सृष्टि का उद्भव और लय ब्रह्मनाद द्वारा होता चला आया है। शिव के डमरू की अनादि ध्वनि को अनंत सूर्य मंडल समूहों के जन्म और सूर्य की परिक्रमा का आधार माना है। भारतीय वास्तुकला व मूर्तिकला उन्हें आकर्षित और प्रभावित करती है। कुन्द जी ने उनके जीवन के साथ-साथ उनके शोधपूर्ण कार्यों को रेखांकित किया है।

उन्होंने "स्फुट काव्यों में सौन्दर्य" शीर्षक से गुरुभक्त सिंह 'भक्त' जी के काव्य सृजन पर विशद विवेचना की है। इस क्रम में उन्होंने उनकी काव्य कृतियों सरस सुमन, कुसुम कुंज, वंशीध्वनि, वनश्री, दो फूल, आधुनिक कवि, कुसुमाकर और गुरुभक्त सिंह 'भक्त' समग्र के आधार पर नाना उदाहरणों के साथ विस्तार से चिन्तन किया है। यथानुसार इन काव्य संग्रहों के लेखन और प्रकाशन की तिथियाँ भी उद्धृत हुई हैं। हरिऔध जी ने 'सरस सुमन' के लिए लिखा है-"एक दिन एक सरस सुमन मेरे सामने आया, उसकी भीनी-भीनी महक मनमोहक थी। उसमें सुमनता और सरलता भी मिली, मैं उत्फुल्ल हो गया। इस सरस सुमन के प्रस्तुत करने वाले हिन्दी संसार के एक होनहार कवि हैं। आप कितने सरस हृदय हैं, आपका प्रकृति निरीक्षण कितना भावमय है, आपकी कोई-कोई उक्ति कितनी मार्मिक है, उसमें कितना प्रवाह और कितनी स्वाभाविकता है, कितना प्रसाद गुण है, ग्रंथ की कुछ लाइनें कितनी सजीव हैं, इस विषय में कुछ नहीं कहूँगा, मुझको कहने का अधिकार नहीं, अपनी वस्तु किसे प्यारी नहीं होती। कविता कुसुमोद्यान दोष, कण्टकरहित नहीं होता, सरस सुमन की रक्षा के लिए कण्टकनिर्माण में भी प्रकृति का कुछ कौशल है, अतएव मैं दोषों की भी चर्चा नहीं करूँगा। मैं तो केवल हिन्दी साहित्य क्षेत्र में प्रिय ग्रंथकार का अभिनन्दन मात्र करूंगा और आदिम उद्योग में ही उन्होंने जितनी सफलता लाभ की है, उसके लिए धन्यवाद दूँगा। साथ ही यह कामना भी करूँगा कि उनकी प्रतिभा पूर्ण विकसित हो, उक्ति और अधिक सुन्दर और सरस हो, वह प्रकृति निरीक्षण में और अधिक पटुता प्राप्त करें, और यदि संभव हो तो हिन्दी संसार में उस कीर्ति के अर्जन करने की चेष्टा करें जिसको अंग्रेजी साहित्य में वर्डसवर्थ ने लाभ किया है।"

कुन्द जी लिखते हैं, "सरस सुमन की कविताओं को प्रकाश में लाने और उनके माध्यम से भक्त जी को हिन्दी साहित्य-संसार में प्रवेश कराने का श्रेय विन्ध्येश्वरी प्रसाद सिंह को है।" उन्होंने इस प्रसंग को विस्तार से लिखा है जो आज किसी दस्तावेज की तरह है। 'सरस सुमन' का प्रकाशन 1925 में हुआ और 'कुसुम कुंज' 1927 में छपा। 'वंशीध्वनि' 1932 में, वनश्री 1940 में, 'दो फूल' 1963 में, 'आधुनिक कवि 12' 1967 में और 'कुसुमाकर' 1974 में क्रमशः प्रकाशित होते रहे। उनके मरणोपरान्त 2017 में 'गुरुभक्त सिंह 'भक्त' समग्र का प्रकाशन हुआ है। उन्होंने भक्त जी के काव्य साहित्य को विश्लेषण की दृष्टि से फुटकल अथवा मुक्तक और प्रबंध काव्य दो वर्गों में रखा है।

कुन्द जी ने "प्रबंध योजना की ओर" शीर्षक से गुरुभक्त सिह 'भक्त' के प्रबंध काव्यों- 'नूरजहाँ' और 'विक्रमादित्य' को लेकर विस्तार से लिखा है। उनकी सोच, इच्छा, परिस्थिति और विरोधों-अवरोधों की सम्यक चर्चा हुई है। कुन्द जी स्वयं ही पारखी और गम्भीर अध्येता है, उन्होंने नूरजहाँ और विक्रमादित्य, दोनों प्रबंध काव्यों पर जबरदस्त विवेचना की है और हर दृष्टि से सब कुछ निचोड़ कर रख दिया है। काव्य संग्रहों की ऐसी विवेचना विरल है। कथानक, प्रकृति-चित्रण, भाव-संवेदनाओं का प्रकटीकरण, पात्रों का चित्रण और ऐतिहासिक संदर्भ सब कुछ बेहतरीन है। जितना श्रेष्ठ भक्त जी का प्रबंध काव्य है वैसी ही अच्छी विवेचना कुन्द जी ने की है। कुंद जी ने नूरजहाँ काव्य को लेकर पं पद्म सिंह शर्मा के बनारसी दास चतुर्वेदी को लिखे पत्र को उद्धृत किया है-"इस पुस्तक को सज-धज से छपवाने का प्रबंध कीजिए और अपनी पत्रिका में इसका कुछ अंश छाप हिन्दी संसार को इसकी अनोखी छवि से अवगत करा दीजिए। इसमें दरिया की रवानी है, जीवन की जवानी है, मोतियों का पानी है, विछोह और मिलन की कहानी है। इसकी फड़कती भाषा सरल सुबोध मुहावरेदार है। कनक की मादकता लिए इसके शब्द-शब्द बोलते हैं। इसके वाक्य फेनिल छलकते प्याले हैं हाला व अंगूरी के।" इस लेख में कुन्द जी ने विस्तार से नूरजहाँ काव्य की पूरी कथा रोचक तरीके से लिखी है। साथ ही उन्होंने उनके दूसरे प्रबंध काव्य 'विक्रमादित्य' की बड़ी सार्थक व प्रभावशाली विवेचना की है। उन्होंने गीतों को बहुतायत मात्रा में उद्धृत किया है जिससे भक्त जी के सृजन की छाप दिखाई दे रही है। विक्रमादित्य प्रबंध काव्य की भूमिका भगवत शरण उपाध्याय जी ने लिखी और इसे उनकी श्रेष्ठ कृति माना। कुन्द जी की समीक्षात्मक विवेचना को पढ़ते हुए बहुत कुछ सीखने के साथ-साथ मुझे अतीव आनंद मिल रहा है। उन्होंने उनकी भाषा-शैली, मुहावरे आदि पर गम्भीरता से दृष्टि डाली है, उनकी पंक्तियाँ देखिए-"दोनों काव्य प्रकृति चित्रण, रोमांस और मुहावरों के प्रयोग से भरे पड़े हैं। दोनों ही काव्यों में षड्यंत्रों की झलक तथा कुछ उपघटनाओं का समावेश किया गया है, किन्तु अनेक समानताओं के बाद भी दोनों काव्य अपनी अलग-अलग लोकप्रियता की स्थापना करते हैं तथा पठनीयता, निरन्तरता, रोचकता एवं उत्सुकता बनाये रखने में समर्थ सिद्ध होते हैं।"

जगदीश प्रसाद बरनवाल 'कुन्द' जी ने 'भक्त जी का अप्रकाशित साहित्य' शीर्षक से एक संक्षिप्त लेख लिखा है जिसमें उन्होंने गहन छानबीन के आधार पर भक्त जी के अप्रकाशित रचनाओं का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है। उनके दो नाटक-'प्रेमपाश' व 'तशनीम', दो उपन्यास- 'वे दोनों' एवं 'रधिया', लम्बी प्रेमकथा-'मृदुला मनोहर' और गीत मुक्तक, हिन्दी गजल संग्रह-'प्रमदवन' आदि का प्रकाशन नहीं हो पाया। साहित्य की दुनिया की विडम्बना ही है कि बहुत सा लिखा हुआ धरा का धरा रह जाता है, कभी छप नहीं पाता। आज भी ऐसी स्थितियाँ बनी हुई हैं और बहुत सा साहित्य लेखकों की आलमारी में पड़ा रह जाता है। हमारे जीवन के बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं जिसको लेकर कभी कोई योजना बनी ही नहीं, यदि कहीं कुछ हुआ भी तो आधा-अधूरा। कुन्द जी लिखते हैं-उनकी आत्मकथा की पाण्डुलिपि 1981 में स्वयं भक्त जी द्वारा हिन्दी साहित्य सम्मेलन को उपलब्ध करायी गयी थी, परन्तु वह कृति भी प्रकाशित नहीं हुई। 'नूरजहाँ' का अंग्रेजी पद्यानुवाद स्वयं भक्त जी ने किया था जिसे किसी अमेरिकन प्रकाशक ने लिया परन्तु उसके प्रकाशन की भी कोई जानकारी नहीं है। सुखद है, कुन्द जी ने अपने इस लेख द्वारा हिन्दी साहित्य जगत का ध्यान आकृष्ट किया है और उम्मीद की जानी चाहिए कि कोई इस दिशा में सक्रिय हो।

"भक्त जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर रचित साहित्य" शीर्षक से उन्होंने अपने इस ग्रंथ में जानकारी से भरा लेख लिखा है। गुरुभक्त सिंह 'भक्त'के 75 वर्ष पूरे होने पर डा० किशोरी लाल गुप्त के संपादन में "गुरुभक्त सिंह भक्तः व्यक्ति" नामक पुस्तक प्रकाशित हुई जिसमें तत्कालीन कवियों, साहित्यकारों द्वारा लिखे गए संस्मरण, संक्षिप्त जीवन झांकी और जीवन परिचय सम्मिलित हैं। उनके पुत्र ने "गुरुभक्त सिंह भक्तः भाषा संगम" का संपादन किया। डा० भगवत शरण उपाध्याय जी ने "नूरजहाँ' की व्याख्यात्मक आलोचना लिखी। प्रो वृजलाल वर्मा जी ने भी "नूरजहाँ समीक्षा" लिखी। डा० किशोरी लाल गुप्त ने "नूरजहाँ मीमांसा" नामक लेखों के संग्रह का संपादन किया। कुन्द जी ने अनेक लेखकों द्वारा भक्त जी और उनकी रचनाओं पर लिखी पुस्तकों का उल्लेख किया है जो अभी प्रकाशित नहीं हुई हैं। उनपर अनेक शोध-छात्रों ने शोध करके अनेक ग्रंथों की रचना की है। इस तरह उन्होंने विस्तार से भक्त जी पर सृजित साहित्य का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है।

अपने इस संग्रह में कुन्द जी ने "भक्त जी एवं उनके कृतित्व पर विद्वानों की सम्मतियाँ" शीर्षक से तत्कालीन लेखकों के विचारों, उद्गारों और सम्मतियों को संग्रहित किया है जिनमें पं रामनरेश त्रिपाठी, पं देवीदत्त शुक्ल, अमरनाथ झा, पं पद्मसिंह शर्मा, पं विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, डा. त्रिभुवन सिंह, डा. जितेन्द्रनाथ पाठक, डा. लखनलाल सिंह 'आरोही', डा. उदयनारायण तिवारी, डा. सुरेशचन्द्र गुप्त, प्रो. शान्ति सुमन, श्री शिवदान सिंह चौहान, रामरतन भटनागर और डा. धीरेन्द्र वर्मा जैसे मूर्धन्य विद्वानों की सम्मतियाँ सम्मिलित हुई हैं।

जगदीश प्रसाद बरनवाल 'कुन्द' जी ने भक्त जी के दोनों प्रबंध काव्यों "नूरजहाँ" और "विक्रमादित्य" पर अलग से विचार करते हुए विद्वान लेखकों की टिप्पणियों को सम्मिलित किया है जिसमें आचार्य पं रामचन्द्र शुक्ल, विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी, राहुल सांकृत्यायन, डा. अमरनाथ झा, विश्वम्भर मानव, डा. त्रिभुवन सिंह, डा. गणपति चन्द्र गुप्त, डा. शिवप्रसाद सिंह, डा. भगवतशरण उपाध्याय, डा. सुरेशचन्द्र गुप्त, अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध', डा. श्रीपाल सिंह 'क्षेम' और डा. उमाकान्त गोयल सरीखे विद्वान लेखक, समीक्षक, आलोचक हैं। इसी कड़ी में कुन्द जी ने "भक्त जीः व्यक्ति और कवि" शीर्षक से उनके काव्य को लेकर पं सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला', डा. भगवतशरण उपाध्याय और डा. किशोरी लाल गुप्त जी के वक्तव्यों का भावपूर्ण तरीके से उल्लेख किया है। इससे स्पष्ट होता है, कुन्द जी के मन में भक्त जी के व्यक्तित्व, कृतित्व और लेखन को लेकर गहरे भाव और कोई गहरी श्रद्धा है। उन्होंने बड़ा ही उपकार किया है, भक्त जी को भेजे गए पंडित रूपनारायण चतुर्वेदी एवं डा. हरिवंश राय बच्चन जी के पत्रों को इस ग्रंथ में शामिल करके। आज लेखकों के बीच पत्र लेखन होता ही नहीं। साथ ही उन्होंने बायोग्राफिकल इनसाइक्लोपीडिया आफ द वर्ल्ड में प्रकाशित भक्त जी का अंग्रेजी भाषा में जीवन-परिचय भी यहाँ उद्धृत किया है। इस ग्रंथ की शोभा बढ़ाते हुए कुन्द जी ने भक्त जी को दिए गए "साहित्य रत्न का प्रमाण पत्र" और अभिनन्दन पत्रों को सम्मिलित किया है।

उन्होंने भक्त जी द्वारा 'दरवेश' उपनाम से लिखी रचनाओं का उल्लेख करते हुए कुछ रचनाओं को उद्धृत भी किया है। वे लिखते हैं-"भक्त जी द्वारा सन् 1919 में 'प्रेमपाश', 1920 में 'तशनीन' एवं 1924 में 'रधिया' नामक तीन नाटकों की रचना की गयी थी किन्तु ये प्रकाशन से वंचित रहीं।" उनकी कुछ कविताओं को उन्होंने यहाँ पाठकों के लिए सम्मिलित किया है जिसको पढ़कर लोग उस महत्वपूर्ण रचनाकार के काव्य सृजन को समझ सकते हैं। 'नूरजहाँ' का विदागीत और 'विक्रमादित्य' का 36वाँ सर्ग यहाँ गौरव पूर्ण तरीके से कुन्द जी ने शामिल किया है। गुरुभक्त सिंह 'भक्त' जी की कहानी 'प्रदर्शनी' पढ़कर कोई भी सुधी पाठक उनकी लेखन शैली, भाषा और भाव-प्रवणता से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। भक्त जी अंग्रेजी भाषा में भी लिखते थे और उन्होंने स्वयं 'नूरजहाँ' का अंग्रेजी पद्यानुवाद किया था जो प्रकाशित नहीं हो सका। उन्होंने इन सभी अंग्रेजी रचनाओं को यहाँ सम्मिलित किया है और अपनी गहन श्रद्धा की अभिव्यक्ति की है। साथ ही कुन्द जी ने संक्षेप में उनकी जीवन झांकी, उनकी रचनाओं का तिथि क्रम, और सन्दर्भ पुस्तकों, पत्रिकाओं का उल्लेख किया है। इस तरह सारगर्भित सन्दर्भों से भरा यह भक्त जी के व्यक्तित्व व कृतित्व पर निश्चित ही महत्वपूर्ण ग्रंथ है। गहन शोध करते हुए कुन्द जी ने विपुल सामग्री का संचयन किया है और पुस्तकाकार प्रकाशित करके अपनी श्रेष्ठ श्रद्धा-सेवा की है। मेरा भी कोई सौभाग्य ही है, मुझे कुन्द जी की पुस्तक को पढ़ने का अवसर मिला और मैं गुरुभक्त सिंह भक्त सरीखे कवि-साहित्यकार के बारे में जान सका। सुखद संयोग ही है और मेरा मन आह्लादित है कि गुरुभक्त सिंह भक्त का समय मेरे बलिया जिले में गुजरा है और उन्होंने उस मिट्टी में बैठकर सृजन किया है। उन्हें हृदय से नमन करता हूँ और कुन्द जी का बहुत-बहुत आभार कि उन्होंने मुझे यह गौरव पूर्ण सुअवसर प्रदान किया है।

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