रमेश पोखरियाल निशंक के शिक्षा दर्शन की प्रासंगिकता

किरण ग्रोवर

किरण ग्रोवर

सह-आचार्य, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, डी.ए.वी. कालेज, अबोहर, पंजाब
चलभाष: 94783-20028; ईमेल: groverkirank@gmail.com

सारांश:- समाज जातिवाद, साम्प्रदायिकता वाद, क्षेत्रीयवाद, प्रांतीय धारणाओं में बंधा हुआ है जो चारों ओर से असमानता को जन्म देती है। औद्योगिकीकरण से मानव भौतिकवादी बन गया है। भौतिकतावाद व पूंजीवाद की अन्धी दौड़ में पड़ कर मानव असुरक्षा महसूस करने लगा है, कभी कभी नकारात्मक दिशा भी ग्रहण कर लेता है।भारत के संतों, महात्माओं, विचारकों, वैज्ञानिकों व समाज सुधारकों ने सत्यं शिवम् सुंदरम् के लिए अपने जीवन को होम कर आदर्शों के पथ का निर्माण किया। राष्ट्र के सामाजिक, आर्थिक, नैतिक तथा सांस्कृतिक उन्नयन के लिए भारतीयों को आत्मानुशासित होकर आचार विचार में समन्वय स्थापित करते हुए अपने चरित्र व व्यक्तित्व को उदभासित करना है। रमेश पोखरियाल निशंक ने शिक्षा और दर्शन को संयुक्त रुप से अभिव्यक्त करने का साहसिक कार्य किया है। उनका मानना है कि दर्शन के माध्यम से शिक्षा का विकास किया जाये और शिक्षा के सहारे समाज का दार्शनिक भावबोध तैयार किया जाये। रमेश पोखरियाल निशंक जी का मानना है कि शिक्षा मात्र सूत्रों, समीकरणों, किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं, यह व्यावहारिक जीवन जीने की कला होने के साथ साथ हमारे आत्मिक विकास से सम्बंध रखती है। शिक्षा व्यक्ति के अन्तःकरण को न केवल परिष्कृत करती है वरन् वह एक अछे नागरिक का भी निर्माण करती है। छात्रों में सामाजिक दर्शन विकसित करना ताकि सामाजिक संवेदनशीलता, सामाजिक न्याय, मानव अधिकारों के लिए चिन्ता व चिन्तन पैदा हो। मूल्य आधारित शिक्षा लोकतंत्र की भावना उत्पन्न कर इस परिकल्पना को वास्तविकता में बदलने की ओर युवा पीढ़ी को अग्रसर करती है। राष्ट्रीय मूल्य नागरिकों के नैतिक आचरण को आकार देकर संस्थागत व्यवहार को परिभाषित करते हैं। संस्कृति का व्यापक प्रचार प्रसार, न्याय, स्वतंत्रता व शान्ति के लिए मानवता की शिक्षा मनुष्य की गरिमा के लिए अपरिहार्य है।

बीज शब्द:- महत्वाकांक्षी, जनोत्थानक, देदीप्यमान, समीकरणों, संस्थागतीकरण, दार्शनिक भावबोध।

डॉ रमेश पोखरियाल निशंक

मूल प्रतिपादन:- आजकल का परिवेश ऐसा है कि लोग धर्म व धर्म में निहित सत्य को भूलते जा रहे हैं। आज देश सभ्यता व संस्कृति को भूलता जा रहा है। शिक्षा के प्रति उदासीनता, उद्देश्य हीनता, दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली दिखाई पड़ रही है। सम्पूर्ण मानव जाति प्रतिस्पर्धा करते हुए एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में लगी हुई है। आज की पीढ़ी दिशाविहीन, स्वाभिमान विहीन, दीनहीन भावना से ग्रसित अराजक तत्वों एवम् अव्यवस्था के बह्मजाल में फंसती जा रही है। आधुनिक शिक्षा आत्मा की ओर से मुंह फेर लेना चाहती है। आत्मबोध के अभाव में युवा पीढ़ी अहंकार ग्रस्त बन चुकी है। छात्र तुष्टिकरण वाली आत्माभिव्यक्ति में संलिप्त हो रहे हैं। आज समाज में शिक्षा को ज्ञान की संचित राशि के संकलन की प्रवृत्ति से न जोड़कर प्रमाण पत्रों की भौतिक उपलब्धि तक सीमित कर दिया गया है। वर्तमान शिक्षा से छात्र आक्रामक और महत्वाकांक्षी बनते जा रहे हैं।1 नैतिकता का पतन होने के कारण मानवता को अपार क्षति सहनी पड़ रही है।1 आज समाज में शिक्षा को ज्ञान की संचित राशि के संकलन की प्रवृत्ति से न जोड़कर प्रमाण पत्रों की भौतिक उपलब्धि तक सीमित कर दिया गया है। छात्र वर्ग धोखा देकर नेता बनना चाहते हैं। राष्ट्र के प्रति छात्रों और अध्यापकों की धारणाएँ मात्र सैद्धांतिक प्रदर्शन के अतिरिक्त और कुछ नहीं। मनुष्य का विकास अगर सहजता से नहीं होता तो समाज और राष्ट्र के सन्तुलित विकास की अवधारणा अधूरी रह जाती है।

 भारत देश का सांस्कृतिक कलेवर भौतिकता से मुक्त होकर आत्मा के सामीप्य को सहेजने का कारण बना। भारत विश्व के लिए दिशा प्रेरक, संजीवनी शक्ति प्रदाता के रुप में मुखरित रहा। इतिहास के पृष्ठों पर जिस गौरवमयी गाथा को अंकित कर हमारा देश जीवन के लिए संघर्ष करता रहा, उसका सिंहावलोकन करना शैक्षिक जगत के लिए उपयोगी व अनिवार्य है।2 प्रत्येक राष्ट्र को समाज सुधार की भावनाओं से परिपूर्ण व्यक्ति ही अपने विचारों से नूतन चिन्तन प्रदान करता है। इतिहास के अमर व्यक्तित्व अपने स्वर्णिम विचार जनता को प्रदत करते हैं जिनसे मानव पीढ़ी कृतकृत्य हो जाती है। ऐसे व्यक्तियों में नाम स्मरण होता है योग्यतम प्रतिभा के पुंज स्वामी विवेकानंद, महान योगी महर्षि अरविन्द, युग दृष्टा रविन्द्र नाथ टैगोर, सत्य के पुजारी महात्मा गांधी।3 एकात्मक विश्व में मानव जाति के समक्ष एक सी समस्याएँ हैं जोकि परस्पर सम्बिन्धत हैं, उनसे पीड़ित मानव जाति के उद्धार के लिए आवश्यक है कि रमेश पोखरियाल निशंक के शैक्षिक विचारों का अध्ययन किया जाये।रमेश पोखरियाल निशंक के शिक्षा दर्शन को जानने से पहले शिक्षा व दर्शन को जानना अनिवार्य है:-

Education शब्द लैटिन भाषा के educare से निकला है जिसका अर्थ है -पालन पोषण। एक दूसरा लैटिन शब्द है educatum जिसका अर्थ होता है प्रशिक्षण की प्रक्रिया जो स्वयं शिक्षा का एक भाग है। भारतीय और पाश्चात्य विचारक स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, जाॅन डी .जी.फरोवेल, पेस्टालजी ये मानते हैं कि ज्ञान बालक में पहले से मौजूद है, आवश्यकता है उसे बाहर की ओर निकालना या विकसित करना। शिक्षा के तीन मुख्य प्रकार हैं औपचारिक शिक्षा, अनौपचारिक शिक्षा, अंशोपचारिक शिक्षा।

औपचारिक शिक्षा पूर्व नियोजित व्यवस्था है इसमें शिक्षा विशेष संस्था में दी जाती है जैसे विद्यालय, पुस्तकालय, पुस्तकें, अजायबघर।

अनौपचारिक शिक्षा बालक के जन्म से मृत्यु पर्यन्त चलती है। न इसके पूर्व निर्धारित उद्देश्य होते हैं, न पाठ्यक्रम और न समय अवधि निश्चित होती है।

अंशोपचारिक शिक्षा शिक्षा में जो लोग शिक्षा से वंचित रह जाते हैं उनको अनौपचारिक शिक्षा देकर शिक्षित किया जाता है।4

दर्शन वह ज्ञान है जो तत्व का दर्शन करवाता है। ज्ञान के लिए प्रेम, सत्य की खोज, चिन्तन की कला, जीवन की व्याख्या, समस्याओं पर विचार करने का तार्किक ढंग प्रस्तुत करता है। वास्तव में दर्शन वस्तु, प्रकृति, मानव आदि को देखने का एक दृष्टिकोण है।5 भारतीय दृष्टिकोण से दर्शन व जीवन एक है अतः जीवन ही दर्शन का अध्ययन क्षेत्र है। आदर्शवाद जीवन की सबसे प्राचीन दार्शनिक विचारधारा है।

 शिक्षा और दर्शन का बड़ा पुराना सम्बन्ध है।शिक्षा के बिना दर्शन अधूरा है और दर्शन के बिना शिक्षा की पूर्णता सम्भव नहीं। यदि दुनिया से जुड़कर रहना है, विकास की धारा को सबल करना है तो उसके लिए आवश्यक है कि ज्ञानात्मक शिक्षा को ग्रहण किया जाये जो समाज के लिए उपयोगी हो और हितकारिता वृहद् स्तर पर जनोत्थानक सन्दर्भों से आच्छादित हो।6

भारत के संतों, महात्माओं, विचारकों, वैज्ञानिकों व समाज सुधारकों ने सत्यं शिवम् सुंदरम् के लिए अपने जीवन को होम कर आदर्शों के पथ का निर्माण किया। राष्ट्र के सामाजिक, आर्थिक, नैतिक तथा सांस्कृतिक उन्नयन के लिए भारतीयों को आत्मानुशासित होकर आचार विचार में समन्वय स्थापित करते हुए अपने चरित्र व व्यक्तित्व को उदभासित करना है। इस उद्देश्य की पूर्ति तभी हो सकती है जब देश की नयी पीढ़ी का चतुर्मुखी विकास होगा, इस विकास के लिए श्रेष्ठ कोटि की शिक्षा की व्यवस्था करनी होगी। भारतीय शिक्षा मनीषियों में रमेश पोखरियाल निशंक ने देदीप्यमान नक्षत्र की तरह अपनी उपस्थिति दर्ज की है। निशंक जी अपने परिवेश से जुड़े हुए हैं और अपने आप को अभिव्यक्त करने के लिए छटपटाते हैं, उनके भीतर जो घटित घटनाएँ हैं, वह कहीं न कहीं शब्दबद्ध होने के लिए उन्हें प्रेरित करती हैं:-

      मैं अनमना सा सोच रहा, अपने ही भीतर स्वयं को खोज रहा ।

श्रेष्ठ कोटि की शिक्षा ही भारतीय जन जीवन की उन्नति का स्रोत है। शिक्षा राष्ट्रीय जीवन की आधारशिला है। रमेश पोखरियाल निशंक जी के साहित्य की प्रासंगिकता को अनुभव किया जा सकता है कि उनके साहित्य को विश्व की कई भाषाओं जर्मन, अंग्रेजी, फ्रेंच, भारत की तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम, मराठी, गुजराती, पंजाबी संस्कृत आदि भाषाओं में अनूदित किया जा चुका है। उनके साहित्य को मद्रास, चेन्नई और हैंबर्ग, विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है।7 उनके साहित्य पर गढ़वाल विश्वविद्यालय, कुमाऊं विश्वविद्यालय, सागर विश्वविद्यालय, मद्रास विश्वविद्यालय, हैमबर्ग विश्वविद्यालय, जर्मनी विश्वविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय, मेरठ विश्वविद्यालय में शोध कार्य हो चुका है और जारी भी है। रमेश पोखरियाल निशंक जी के शैक्षिक दर्शन को जानना होगा व उसका अनुसरण करना होगा। रमेश पोखरियाल निशंक ने शिक्षा और दर्शन को संयुक्त रुप से अभिव्यक्त करने का साहसिक कार्य किया है। उनका मानना है कि दर्शन के माध्यम से शिक्षा का विकास किया जाये और शिक्षा के सहारे समाज का दार्शनिक भावबोध तैयार किया जाये।

1शिक्षा: आत्मिक विकास में सहायक:- शिक्षा व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास के साथ साथ कौशल, विनम्रता, और शिष्टाचार को समाहित करती है। रमेश पोखरियाल निशंक जी मानना है कि व्यक्ति असाधारण प्रतिभा सम्पन्न होता है। मनुष्य के अन्दर कुछ प्रतिभाएँ जन्मजात होती हैं जबकि शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति की आन्तरिक प्रतिभा को निखारा जा सकता है।8 किसी भी विषय की गम्भीरता का आकलन करना जरूरी होता है। प्रत्येक विषय का अपना एक विशिष्ट महत्व होता है। शिक्षा सम्पूर्ण जीवन का सार है। शिक्षा की आधारशिला संस्कार और मूल्य होते हैं। संस्कारों व मूल्यों से व्यक्तित्व का निर्माण व परिमार्जन होता है।9 निशंक जी मानना है कि शिक्षा मात्र सूत्रों, समीकरणों, किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं, यह व्यावहारिक जीवन जीने की कला होने के साथ साथ हमारे आत्मिक विकास से सम्बंध रखती है।

2 शिक्षा: व्यक्तित्व निर्माण में सहायक:-रमेश पोखरियाल निशंक जी का मानना है कि व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास उसके अच्छे आचरण से होता है। अच्छे आचरण से व्यक्ति चरित्रवान बनता है और चरित्रवान व्यक्ति समाज के लिए पूंजी के समान होता है। शिक्षा का असली मकसद व्यक्तित्व का निर्माण करना है। अच्छी शिक्षा एक सामान्य मनुष्य को ऊंचाइयों तक ले जाती है। शिक्षा केवल मनुष्य के ज्ञान तक सीमित नहीं है वरन् शिक्षा व्यक्ति के संयम व विकास पर केंद्रित होनी चाहिए।10 शिक्षा व्यक्ति के अन्तःकरण को न केवल परिष्कृत करती है वरन् वह एक अचछे नागरिक का भी निर्माण करती है। मजबूत चरित्र व व्यक्तित्व को लार्ड मैकाले ने विवरण पत्र 1835 में नवीन शिक्षा पद्धति/सिद्धांत का प्रतिपादन किया। राष्ट्रीय पाठ्यक्रम के ढांचे ( NCF) 2005 भी सभी स्कूल चरणों में पाठ्यक्रम और पाठ्य पुस्तकों का विकास नैतिकता पर जोर देता है। राष्ट्रीय शिक्षा के आदर्शों को स्पष्ट करते हुए एनी बेसेंट ने कहा था कि भारतीय शिक्षा को भक्ति, ज्ञान व नैतिकता के भारतीय आदर्श प्रस्तुत करने चाहिए और उसमें भारतीय धार्मिक भावना का समावेश होना चाहिए।11 हंटर कमीशन 1882 भी छात्रों के नैतिक स्तर का उत्थान करने के लिए उनकी प्रकृति धर्म और मानव धर्म के सिद्धांतों से परिचित करने की संस्तुति करता है।12

4 शिक्षा: चरित्र निर्माण में सहायक रमेश पोखरियाल निशंक जी का मानना है कि भारतीय शिक्षा प्राचीन काल से ही सत्यं शिवम् सुंदरम व वसुधैव कुटुंबकम् जैसे शाश्वत व सार्वभौमिक मूल्यों पर आधारित रही है।13 प्रत्येक पीढ़ी को लोकतांत्रिक सिद्धांतों, मूल्यों, विचारों, अधिकारों और जिम्मेदारियों की अन्तर्निहित अवधारणाओं को सीखने और सिखाने की नितांत आवश्यकता है। धार्मिक कट्टरवाद, पर्यावरण में गिरावट, विज्ञान व प्रोद्योगिकी का दुरुपयोग, असमानताएं, जनसंचार माध्यमों का दुष्प्रभाव, वैश्वीकरण, व्यवसायीकरण जैसी कुरीतियों के विरुद्ध मूल्यपरक शिक्षा एक सार्थक अस्त्र है।14 मूल्यपरक शिक्षा संस्कारों के पीढ़ी दर पीढ़ी के स्थानांतरण को कहते हैं। मूल्यों पर आधारित शिक्षा का प्राथमिक उद्देश्य छात्र को बाहरी दुनिया का सामना करने के लिए सही दृष्टिकोण और मानकों का ज्ञान देना है। मूल्यपरक शिक्षा छात्र के समग्र चरित्र विकास की सतत प्रक्रिया है।15 रुसो के प्रकृतिवादी विचार प्रकृति की ओर लौटो तथा प्रकृति का अनुसरण करो छात्रों की शिक्षा में प्रकृति की महत्ता को उजागर करते हैं। मनुष्य स्वयं को जीव जन्तुओं से समर्थ मानकर उनका हनन व शोषण करता है। वैश्विक व आध्यात्मिक मूल्यों के आधार पर प्राकृतिक प्राणियों के प्रति दया, सहानुभूति व समानता की भावना उत्पन्न की जा सकती है।16

5 शिक्षा: सामाजिक दर्शन के विकास में सहायक:-रमेश पोखरियाल निशंक जी का मानना है कि शिक्षा तो केवल साधन है साधक की आत्म जिज्ञासा ही उसका फल निर्धारित करती है। शिक्षक को ऐसे वातावरण की संरचना करनी होती है जिसमें छात्र अपनी भावनाओं, विचारों व अनुभवों को व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र महसूस करें। चर्चा, संवाद, वाद विवाद, व्यावहारिक गतिविधियों में प्रतिभागिता हेतु छात्रों को सूचित, उत्तेजित व सचेत करना शिक्षक का कर्तव्य होना चाहिए। शिक्षक छात्रों को जाति, पंथ, लिंग और धन की विभिन्नता के बावजूद सभी को समान महत्व दें।17 खाद्य, जल, ऊर्जा, प्रदूषण, स्वास्थ्य, जनसंख्या से सम्बंधित भविष्य की समस्यायों के बारे में जागरूकता पैदा करना। छात्रों में सामाजिक दर्शन विकसित करना ताकि सामाजिक संवेदनशीलता, सामाजिक न्याय, मानव अधिकारों के लिए चिन्ता व चिन्तन पैदा हो।

6 शिक्षा: धर्म निरपेक्ष सोच के विकास में सहायक रमेश पोखरियाल निशंक जी का मानना है कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में धर्म निरपेक्ष समाज की स्थापना भी शिक्षा का उद्देश्य है। धर्म निरपेक्ष सोच एक स्वस्थ समाज के निर्माण में व्यक्तिगत उत्तरदायित्व का निर्वाह करने के लिए प्रेरित करती है। लोकतांत्रिक समाज में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक समानता व भातृत्व के मूल्यों के पालन का अवसर दिया जाता है। मूल्य आधारित शिक्षा लोकतंत्र की भावना उत्पन्न कर इस परिकल्पना को वास्तविकता में बदलने की ओर युवा पीढ़ी को अग्रसर करती है।18

 7 शिक्षा: राष्ट्रीय अखंडता सुनिश्चित करने में सहायक:- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 ए में शिक्षा के मूल्यों को मौलिक कर्तव्यों के रूप में प्रदर्शित किया गया है- सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म व उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा व अवसर की समानता, व्यक्ति की गरिमा, राष्ट्र की एकता व अखंडता सुनिश्चित करवाने वाली बंधुता। रमेश पोखरियाल निशंक जी स्वपहचान और विश्वास प्रणाली के साथ एक राष्ट्र के निर्माण के लिए राष्ट्रीय मूल्यों का संस्थागतीकरण आवश्यक है। राष्ट्रीय मूल्यों की अनुपस्थिति राष्ट्र निर्माण के प्रति नागरिकों के कार्यों को दिशाहीन बना देती है। राष्ट्रीय मूल्य नागरिकों के नैतिक आचरण को आकार देकर संस्थागत व्यवहार को परिभाषित करते हैं। 19 सच्चे नायकों को पहचान देकर व उनकी उपलब्धियों का जश्न मनाकर छात्रों में आदर्शों को स्थापित करना, राष्ट्रीय अखंडता सुनिश्चित करने के लिए संस्थाओं में सभी धर्मों के त्योहार मनाकर, राष्ट्रीय प्रतीक का ज्ञान व सम्मान बढ़ाना भी राष्ट्रीय अखंडता के प्रति शिक्षा की जिम्मेदारी है, मूल्य से समझौता न करने की शिक्षा देकर। प्रत्येक राष्ट्र उतना ही महान बनता है जिस परिमाण में राष्ट्र के नागरिकों में देश प्रेम की भावना होती है।

8 शिक्षा: सार्वभौमिक मूल्यों के विकास में सहायक खेलकूद, नाटक, सांस्कृतिक क्रियाकलाप, समाज सेवा मतदान जागरूकता अभियान, सफाई अभियान, सामुदायिक कार्य, पर्यावरण बचाव कार्य, वन महोत्सव, जल संरक्षण, नुक्कड़ नाटक के माध्यम से सांस्कृतिक संरक्षण, जनतांत्रिक भावना व सहयोग की भावना को विकसित किया जा सकता है। राष्ट्र वाद केवल एक राष्ट्र तक सीमित नहीं है अपितु सम्पूर्ण विश्व कल्याण की भावना से निहित है। राष्ट्रीय मूल्य निवासियों के परस्पर सम्बन्धों और सामुदायिक व्यवहारों पर भी प्रभाव डालते हैं। भारत के संविधान की प्रस्तावना को उद्देशिका समझ कर प्रत्येक नागरिक को मनसा वाचा कर्मणा से सार्वभौमिक मूल्यों को अपनाना चाहिए। रमेश पोखरियाल निशंक जी का मानना है कि युद्ध मानव के मस्तिष्क में शुरू होता है, शांति का बचाव भी मस्तिष्क से किया जाना आवश्यक है जो शिक्षा के माध्यम से सम्भव है। संस्कृति का व्यापक प्रचार प्रसार, न्याय, स्वतंत्रता व शान्ति के लिए मानवता की शिक्षा मनुष्य की गरिमा के लिए अपरिहार्य है।20 शिक्षण संस्थाएँ राष्ट् निर्माण का आधार होती हैं। शिक्षा व शिक्षण संस्थानों की सबसे बड़ी भूमिका यह होता है कि वह अपनी संस्कृति, धर्म व इतिहास को अभिन्न अंग बनाये रखें जिससे। राष्ट्र का गौरवशाली अतीत भावी पीढ़ी के समक्ष प्रस्तुत कर सकें और युवा पीढ़ी पीढ़ी अपने अतीत से दूर न हो जाये। शिक्षण संस्थाओं द्वारा परोपकार की भावना, राष्ट्रीय महत्व के कार्यक्रमों में सहयोग देने की भावना का विकास व साथ ही वसुधैव कुटुंबकम् की भावना विकसित होती है।

शिक्षा दर्शन मनुष्य का शारीरिक, मानसिक, धार्मिक, नैतिक, सामाजिक, बौद्धिक, सौंदर्यात्मक, आर्थिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक, चारित्रिक, भावात्मक विकास, आध्यात्मिक आनंद, स्वतंत्र विचार शक्ति, निर्णय लेने की शक्ति, समतामूलक और समावेशी समाज, वैश्विक नागरिक के सम्बन्ध में मान्यताएं. समभाव का प्रचार व प्रसार करता है। रमेश पोखरियाल निशंक जी का मानना है कि शिक्षा मात्र सूत्रों, समीकरणों, किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं, यह व्यावहारिक जीवन जीने की कला होने के साथ साथ हमारे आत्मिक विकास से सम्बंध रखती है। शिक्षा व्यक्ति के अन्तःकरण को न केवल परिष्कृत करती है वरन् वह एक अछे नागरिक का भी निर्माण करती है। छात्रों में सामाजिक दर्शन विकसित करना ताकि सामाजिक संवेदनशीलता, सामाजिक न्याय, मानव अधिकारों के लिए चिन्ता व चिन्तन पैदा हो। मूल्य आधारित शिक्षा लोकतंत्र की भावना उत्पन्न कर इस परिकल्पना को वास्तविकता में बदलने की ओर युवा पीढ़ी को अग्रसर करती है। राष्ट्रीय मूल्य नागरिकों के नैतिक आचरण को आकार देकर संस्थागत व्यवहार को परिभाषित करते हैं। संस्कृति का व्यापक प्रचार प्रसार, न्याय, स्वतंत्रता व शान्ति के लिए मानवता की शिक्षा मनुष्य की गरिमा के लिए अपरिहार्य है। रमेश पोखरियाल निशंक ने शिक्षा और दर्शन को संयुक्त रुप से अभिव्यक्त करने का साहसिक कार्य किया है। उनका मानना है कि दर्शन के माध्यम से शिक्षा का विकास किया जाये और शिक्षा के सहारे समाज का दार्शनिक भावबोध तैयार किया जाये। किसी भी राष्ट्र की उन्नति तभी सम्भव है जब नागरिक कर्तव्य परायण होंगे, कार्यों को क्रियान्वित करने में योग देंगे, तभी आत्मोन्नति के साथ साथ प्रजा की उन्नति का सन्दर्भ प्रमाणित कर सकेंगे।

सन्दर्भ ग्रन्थः-

1. सरयू प्रसाद चौबे, भारतीय शिक्षा का इतिहास, माधव प्रकाशन, इलाहाबाद, 1986, पृ. 137 ।

2.रमेश पोखरियाल निशंक, मूल्य आधारित शिक्षा, प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली, 2021, पृ.56 ।

3. https://hi.public-welfare.com/4312740-what-is-philosophy-the-concept-role-methods-and-functions

4. राम शक्ल पाण्डेय, शिक्षा दर्शन, विनोद पुस्तक भंडार, आगरा, 1992, पृ.145 ।

5. एन.आर. सक्सेना, शिक्षा दर्शन का स्वरूप, नैशनल पब्लिशिंग हाउस, मेरठ, 1979, पृ. 78-79 ।

6. https://hi.public-welfare.com/4312740-what-is-philosophy-the-concept-role-methods-and-functions

7. https://sm.education.gov.in/hi/ministers-profile

8. रमेश पोखरियाल निशंक, मूल्य आधारित शिक्षा, प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली, 2021, पृ.8

9. वही, पृ.6

10. डा. रमेश पोखरियाल निशंक, संसार कायरों के लिए नहीं, राजकमल प्रकाशन, पृ.160-161

11. रमेश पोखरियाल निशंक, मूल्य आधारित शिक्षा, प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली, 2021, पृ.49

12. वही, पृ.52.

13.रमेश पोखरियाल निशंक, मूल्य आधारित शिक्षा, प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली, 2021, पृ.9-10.

14. डा. रमेश पोखरियाल निशंक, चुनौतियों को अवसरों में बदलता भारत, प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली, 2021, पृ.51

15. रमेश पोखरियाल निशंक, मूल्य आधारित शिक्षा, प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली, 2021, पृ.29.

16. वही, पृ.55.

17. वही, पृ.103

18. वही, पृ.53-54.

19. वही, पृ.117-118

20. वही, पृ.116            

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