व्यंग्य: व्यंग्यकारी के दाँव-पेंच

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

ईमेल: dharmtoronto@gmail.com फ़ोन: +1 416 225 2415
सम्पर्क: 22 फेरल ऐवेन्यू, टोरंटो, एम2आर 1सी8, कैनेडा


एक जमाना था जीतू जी पहलवानी के उस्ताद थे। जिसको उठाते थे, उसे पटक देते थे और चित्त कर देते थे। उस पर घुड़सवार जैसे चढ़ बैठते थे और रेफरी उनका हाथ पकड़कर ऊँचा उठाने को तैयार होता था तभी उठते थे। अब पहलवानी में कोई स्कोप नहीं था। उनसे ज्यादा सम्मान नुक्कड़ के व्यंग्यकार को मिल रहा था। सो वे व्यंग्य लिखने लग गए। एकदम धाँसू, खानदानी और भोपाली टाइप। आज उनका पुराना शागिर्द बच्चू पहलवान उनसे मिलने आ गया। पैर छुए और बोला- बड़े उस्ताद जी, छोटे उस्ताद जी कह रहे थे कि आजकल आप नई तरीके की वर्जिश करते हो। हाथ-पाँव की बजाय शब्द चलाते हो और मुहावरे मारते हो। लंगोट वाले फोटू में तो आपको बहुत बार देखा, पर आज सुबह अखबार में आपका बाबूजी जैसा फोटो देखा। घरवाले कहने लगे, जा जीतू उस्ताद से नए दाँव सीख कर आ। उस्ताद जी आपके व्यंग्य के अखाड़े में मुझे भी भर्ती कर लो।
जीतू जी बड़े पहलवान थे। दूर-दराज तक उनके पठ्ठे थे, अमेरिका से कैनेडा तक। इसलिए उनके हर जगह चर्चे भी थे। बच्चू को पास बिठाकर बोले- सुन, ताने मारने में दम कम, दिमाग ज्यादा लगता है। पहलवानी सीख गया तो व्यंग्य क्या चीज है। तेरी भुजाओं में बल है। लगा रहा तो सीख जाएगा। भाग गया तो चूक जाएगा।
- जी उस्ताद। पाय लागू।
- व्यंग्य में सबसे बड़ी बात है पंच मारना। ऐसे पंच जो संपादक को समझ में आएँ।
- उस्ताद, मैं कमाल के पेंच मारता हूँ, छक्के छुड़ा देता हूँ।
- बेटे पेंच नहीं, पंच। पेंच को व्यंग्य में पंच कहते हैं। 
- उस्ताद मारना है न, पंच ऐसे मारूँगा कि तड़का दूँगा। सांडीतोड़ लगाऊँगा तो संपादक का हाथ तोड़ दूँगा। बगलडूब लगा कर उसको उठाकर पटक दूँगा और फिर धोबीपाट जमा कर धो दूँगा।
- नालायक, तू भी प्रसिद्ध व्यंग्यकारों जैसा निकला जो समझते हैं कि संपादक का बाजा बजा देंगे तो वे डर कर छाप देंगे। सुन, जब तक व्यंग्य के अखाड़े का रुस्तमे हिंद नहीं बन जाए तब तक पंच व्यंग्य में ही लगाना, दूसरी जगह नहीं। संपादक को दोस्त नहीं बनाएगा तो फेमस कैसे होगा? बाद की बात बाद में।
- बराबर उस्ताद। बाद के दाँव लगाना आपने अच्छे-से सिखाए हैं। उन्हें दोस्त बना कर मैं निकालदाँव आजमाऊँगा। चरण स्पर्श करने के बहाने टाँगों में घुसकर उन्हें कंधों पर बिठा लूँगा। जब तक छापेंगे, कंधों पर सारे अखाड़े में घुमाऊँगा, जिस दिन ना-नुकुर करेंगे, धूल में दचक दूँगा।
- बेवकूफ, सारा दमखम शब्दों पर लगाना। दाँव संपादक पर नहीं, व्यंग्य में ही लगाने पड़ते हैं।
- मगर उस्ताद जी, छोटू पहलवान बता रहे थे कि आप संपादकों पर बड़े-बड़े दाँव खेलते हो!
- अरे छोटिया मस्करी करता है। व्यंग्य लिखने में तगड़े शरीर से सब कुछ नहीं होता। शब्दों को पकड़ने की फुर्ती चाहिए। उनसे चालबाजियाँ बनानी और उनकी रंगबाजी बतानी आनी चाहिए। फिर धीरज से सुरसुरी छोड़नी आनी चाहिए।
- उस्ताद जी यह कही पते की बात। मैं जाँघियापकड़ दाँव में पक्का हूँ। पकड़ लेता हूँ तो छोड़ता नहीं। 
- हरामी, व्यंग्यकार बनना हो तो अपनी भाषा सुधार। यह सभ्य समाज है। यहाँ शब्द पकड़ते हैं, जाँघिया नहीं। जैसे मिट्टी को नरम बनाने के लिए तेल, छाछ आदि मिलाते हैं, वैसे ही व्यंग्य में करुणा मिलानी पड़ती है। व्यायामशाला में कसरत की बजाय व्हाट्सऐप के व्यंग्य ग्रुपों में दिमागी कसरत कर सकते हो। यहीं ठेके की कुश्तियों जैसी मिलीभगत देख सकते हो। इधर लाठी और तलवारबाजी की जगह साहित्यिक आलोचना करने का हुनर आना चाहिए।
- सर जी, कान पकड़ता हूँ। अपनी पहलवानी में कलाजंग दाँव है, एकदम साहित्यिक। शब्द को पेट के बल उठाओ और पीठ के बल पटक दो।
- हाँ चेले जी। अब तूने सही शब्दावली पकड़ी, खोटा सिक्का ऐसे ही चल निकलता है। सुन, तुझे दूसरे अखाड़े के विरोधी व्यंग्यकार मिलेंगे। गोष्ठियों में जाना पड़ेगा, ये दंगल जैसी होंगी। सम्मेलनों में सुनना-सुनाना पड़ेगा। दूसरे व्यंग्यकार शरीर से पतले-दुबले दिखते हैं पर दिमाग से भारी होते हैं। ये पहलवान से नहीं व्याकरण से पहलवानी करते हैं। उनसे ध्यान से बात करना।
- बेफिक्र रहो उस्ताद जी। टंगीदाँव लगाऊँगा तो विरोधियों की गर्दन अपनी टाँगों में दबोच लूँगा। गोष्ठियों में टक्करपछाड़ खेलूँगा और झटके की टक्कर दूँगा। सम्मेलनों में शेरपछाड़ लगाऊँगा तो सब वाह-वाह करने लगेंगे।
- बेटे, मैं बहुत खुश हुआ। चल तेरा नाम इक्कीसवीं सदी के श्रेष्ठ व्यंग्यकारों में दो सौ बावनवें नंबर पर लिखवा देता हूँ।

(‘भीड़ और भेड़िए’ से साभार)

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।