उजास भरी जिंदगी के सपने दिखाती प्रकाश मनु की कविताएँ

सविता मिश्र

सविता मिश्र

एसोशिएट प्रोफेसर 
हिंदी विभाग, रानी भाग्यवती देवी स्नातकोत्तर महिला विद्यालय, बिजनौर (उत्तर प्रदेश)
चलभाष: 09719659317


प्रकाश मनु की कविताएँ समय की विसंगतियों को उद्घाटित करने वाली कविताएँ हैं। इन कविताओं में एक ओर निराशा का अंधकार है तो दूसरी ओर उजास भरी जिंदगी के सपने हैं। इनमें जीवनगत ऊर्जा है और ईमानदार सर्जक की मूल्यवान रचनाधर्मिता है। ये कविताएँ जीवन के साथ रहने वाली कविताएँ हैं।

उनके कविता संग्रह ‘एक और प्रार्थना’ की पहली ही कविता ‘घर’ घर के भीतर की व्याप्ति को सघन अंतर्दृष्टि से देखती है। यह कविता कवि के जितनी निकट है, उतनी ही पाठकों के निकट भी है। इसमें घर की संपूर्ण प्रतिध्वनियाँ, छवियाँ मौजूद हैं। पूजा की जगह, धूपबत्ती की सुगंध, साबुन, मंजन, आँगन में सूखती मिर्चें, धनिया, आम के अचार की घरेलू गंध के साथ, कच्ची जगह में बोई मूली और गोभी, माँ और पिता के सुख-दुख के गुनगुने फाहों के साथ पकती हुई जिंदगी के अनगिनत बिंब हैं। पारिवारिक संबंधों के बीच पनपते नेह-छोह के साथ आपसी तनावों को भी कवि ने बड़ी खूबसूरती से रचा है। घर के भीतर व्याप्त शांति-अशांति को प्रतीकात्मक शैली में व्यक्त करते हुए वे कहते हैं—

एक छोटा सा राज्य...कभी शांत कभी भीतर तक अशांत;
सुबकता, हिचकियाँ भरता हुआ!
जहाँ के अपने राजा-रानी और राजकुमारियाँ हैं
और तीर-कमान, तलवारें भी
अज्ञात शत्रुओं से लड़ने के लिए।...
कभी-कभी वे आपस में चल जाती हैं
फिर एक तेज अश्रुपात...जख्मों को बहा ले जाने के लिए!...
एक कोना है जहाँ पिता सिर झुकाकर
रोज तीर-कमान टाँगकर कंधे पर
जाते हैं रणभूमि में
लौटकर पोंछेंगे रक्त...
रखकर तीर-कमान : रोज की हारें और अपमान
फिर इसी कोने में...! (पृष्ठ 1-2)

प्रकाश मनु
निम्नवर्गीय जीवन की असंख्य विसंगतियाँ, समाज की त्रासद विडंबनाएँ कवि की कविताओं में पूरी छटपटाहट के साथ व्यक्त हैं। समाज के सामाजिक, आर्थिक यथार्थ की द्वंद्वात्मक स्थितियाँ प्रकाश मनु की कविताओं में देखने को मिलती हैं। निराला की ‘तोड़ती पत्थर’ से साम्य रखती कविता ‘सीता की रसोई’ कवि की संवेदनशीलता को उजागर करती है। आजादी के बाद के व्यवस्थाजन्य अंतर्विरोधों से जूझती, प्लेटफार्म पर छितराई भीड़ की हजार आँखों से बेफिक्र एक औरत खड़िया से गोल घेरा खींचकर, उसके भीतर अपनी रसोई सजाकर अपने परिवार का भरण-पोषण करती है। स्त्री-विमर्श का सशक्त उदाहरण है यह कविता, जो आत्मविश्वास से दीप्त, कर्मनिष्ठ स्त्री का सशक्त एवम् जीवंत चित्र उकेरती है—

चारों ओर की भीड़ और सँकरी निगाहों
से बेपरवाह
एक काली-सी गठीली औरत
जिसका चमकता था माथा तेज आँच की लपटों में!
जुटी थी अपने काम में इस कदर विश्वास से
कि...चारों ओर का गोल लक्ष्मण घेरा
फटकने न देगा किसी दुष्ट राक्षस को उसके पास। (पृष्ठ 90-91)

संवेदनाओं की कोमलता से परे प्रकाश मनु की कविता उन तमाम तकलीफों को बयान करती है जो वे महसूस करते हैं। जिंदगी में कई बार ऐसा समय आता है जब ये तकलीफें कविताओं के माध्यम से बाहर आती हैं। यथार्थ के तीखे और कड़वे रूप उनकी रचनात्मकता को समृद्ध करते रहे हैं। इन कविताओं में अजीब किस्म का खुरदरापन है जो उनके अनुभवों और विचारों का है। अपने नौजवान भतीजे संदीप की हत्या पर लिखी कविता ‘क्षमा करो पुत्र’ में वे अपनी विवशता को कुछ इस तरह अभिव्यक्त करते हैं—

क्षमा करो पुत्रा!
कि हम जिंदगी की रोजमर्रा की
लड़ाइयों और कड़ाहियों में
भुनते-भुनते
सीधी-सी सादा-सी
भाषा तक भूल गए...
जैसे प्यार, जैसे गुस्सा, जैसे उदासी जैसे
प्रतिकार और जैसे दुस्साहस...
पत्थर फोड़कर पानी निकालने का!
हमारी आस्थाएँ पोली हैं वत्स!
हमारे इरादे खोखले। (पृष्ठ 92-93)

‘जिंदगी के जलते अलावों के करीब’ फेंका गया कवि का अस्तित्व क्रुद्ध लहू की कहानी को लिखने के लिए खुद को सक्षम नहीं पाता है, पर फिर भी कोशिश करता है। ऐसी कविताओं से गुजरते हुए पाठक घनीभूत वेदना को महसूस करता है। 
‘एक और प्रार्थना’ संग्रह के फ्लैप पर लिखा है, “ये कविताएँ हरगिज ‘हारे की हरिनाम’ की कविताएँ नहीं हैं। बल्कि एक बुरे वक्त में खुद को टूटने से बचाते हुए, शक्तिशाली से ज्यादा शांत और धीरजवान लड़ाई लड़ने की तैयारी की कविताएँ हैं।”

अंतर्मन की संवेदनाओं का उजास बिखेरती प्रकाश मनु की कविता ‘अभी मैं नहीं मरूँगा’ अद्भुत जिजीविषा संपन्न कविता है। मौसम की पाती में हरापन लाने की उत्कट अभिलाषा, हाथ तापते हुए दोस्तों से बतियाने की तीव्र आकांक्षा, बिजलियों का घेरा तोड़कर आसमान चूमने की लालसा, कविताओं में हरे-हरे खुशमिजाज पेड़ उगाने की कामना करता यह कवि अपनी कविताओं में चुप नहीं रहता, वरन् अपने कथ्य में निरंतर संवादरत रहता है—

अभी पाटनी हैं खाइयाँ
अभी तो हलचलों जैसी हलचल भरनी है
वक्त की छाती में
अभी हरापन लाना है मौसम की पाती में
अभी मिट्टी से पैदा करने हैं तूफान...
और समतल करने हैं रेत के बड़े-बड़े ढूह। (पृष्ठ 38)

संग्रह की कविताओं में कवि के अंतर्जगत की अनगिनत छवियाँ दीप्त हैं। जिंदगी और जिंदगी के संघर्षों और आम आदमी के सुख-दुखों से रूबरू होती ये कविताएँ आसपास की नृशंस घटनाओं और संवेदनहीनता की पराकाष्ठा से साक्षात्कार कराती हैं। कवि मानबहादुर सिंह की नृशंस हत्या पर लिखी कविता ‘कवि को मारना’ में ‘मजमाई कौतुक’ को भी महसूस करता है, जो कवि मानबहादुर सिंह की नृशंस हत्या के बाद पुलिस के आने तक गायब हो जाता है। कवि कटाक्ष करते हुए कहता है—

हे राम जी,
कैसा अद्भुत है यह प्रकृति का न्याय
कि वे सबके सब एक साथ अंधे
हो गए थे।
एक साथ-दो हजार धृतराष्ट्र...
जब महाभारत का यह महा अश्लील कांड हो रहा था/
ऐन उनकी आँख के आगे...
सबसे पहले उन्हीं की आँखें चुग लीं गँड़ासे ने
कवि तो बाद में मरा...
टुकड़ा-टुकड़ा होकर!
पहले मरे वे दो हजार। (पृष्ठ 83)

प्रकाश मनु की कविता का आक्रोश सच्चा आक्रोश है जो हैवानियत को बेनकाब कर देना चाहता है। इस कविता में समय और समाज के प्रति तीव्र घृणा का भाव है। उनकी यही संवेदनशीलता उन्हें सही अर्थों में कवि बनाती है।
*

यह संग्रह प्रकाश मनु ने गर्दिश के साथी अपने दोस्तों को समर्पित किया है। उनकी जिंदगी में दोस्तों की अहम् भूमिका है। भागम-भाग की जिंदगी से गुजरते हुए, ऊब और थकान के बीच फूलों के रंगों से फाग खेलते हुए, हाथ तापते हुए दोस्तों से दुनिया-जहान की बातें करके दुखों को सुनहरा करने की कामना मन में सहेजे कवि अपनी कविताओं के बहाने बार-बार मैत्री का नाद करता है। यह मैत्री भाव ही तो है जो जीवन को समृद्ध करता है। मैत्री की अनंत अर्थ-छवियों को खोलती उनकी कविताएँ दोस्त चित्रकार हरिपाल के लिए कृतज्ञता ज्ञापित करती है। वे कहते हैं—

जब मैं था उद्विग्न
तुम साथ थे
जब-जब मैं हुआ उद्विग्न
तुम साथ चले आए ऐन घर तलक
देर-देर तक थपथपाते कंधा...
कंधे पर हरी पुलकित डाल मुलायम! (पृष्ठ 86)

न केवल मैत्री वरन् चित्रकार हरिपाल के चित्रों के वैशिष्ट्य को काव्यात्मक लहजे में व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा है कि इन चित्रों की लकीरें पूरी जिंदगी के सीखे हुए दाँव, लड़ाइयों और मोर्चे को बड़ी बेबाकी से व्यक्त करती हैं। विषम परिस्थितियों के चक्रव्यूह में फँसे, छटपटाते प्रकाश मनु के जेहन में जब अपने इस दोस्त की स्मृतियाँ पुकारती हैं तो उन्हें महसूस होता है कि हरे-हरे पत्तों की थरथराहट उनके दिल में उत्तर आई है और वे खुश हो उठते हैं—

और मैं खुश हूँ
कम से कम एक है महानगर में
जिसके आगे किसी भी कमजोर क्षण में
कपड़े उतारकर
दिखा सकता हूँ घाव
और मुझे शर्म नहीं आएगी। (पृष्ठ 151)

इन कविताओं से गुजरते हुए कभी ‘सादा आसमानों की लाजवाब हँसी हँसते हुए जनपद के कवि त्रिलोचन से मुलाकात हाती है तो कभी ‘शहर के सबसे बूढ़े देवेंद्र सत्यार्थी से रूबरू होने का मौका मिलता है। ये यात्राएँ जिंदगी में रोशनी की नदियाँ बहाती हैं। देवेंद्र सत्यार्थी के लिए लिखी एक कविता ‘शहर का सबसे बूढ़ा’ में कवि उनके व्यक्तित्व को इस तरह उकेरता है—

दाढ़ी में हँसी
कि हँसी में तैरती है दाढ़ी
उस खुली दाढ़ी में
खुलता जाता है एक समंदर...।” (पृष्ठ 78)

प्रकाश मनु शब्द-शिल्पी हैं। पल में उनका संवेदनशील मन शब्दोत्सव रच देता है। इसी प्रक्रिया में वे भी कभी त्रिलोचन की खुली हुई सादा आसमानों की सी लाजवाब हँसी से रूबरू कराते हैं तो कभी अमृता प्रीतम के वार्धक्य से छनते सौंदर्य को कुछ इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि उनका समूचा व्यक्तित्व हमारे समक्ष उभर आता है—

बहत्तर साल की बूढ़ी औरत
थी बैठी मेरे सामने
मेरे सामने था बुढ़ापे का छनता हुआ सौंदर्य
कितना कसा अब भी!
महीन-महीन कलियाँ बेले की
गुलमोहर के फूलों की आँच-में पका हर शब्द!” (पृष्ठ 80)

प्रगतिशीलता की आड़ में कवि फूल, पेड़, दरिया और चाँद-तारों की झिलमिली पर काली कूची फेरने का हिमायती नहीं है। उसकी संवेदना आम आदमी से जुड़ती है। अपने लिए कोई खास दर्द तलाशने की कोई ललक कवि के मन में नहीं है।

संग्रह की कई कविताएँ समकालीन भयावह, संवेदनशून्य परिदृश्य की फोटो कॉपी हैं, जिन्हें पढ़कर साँस लेना दूभर हो उठता है। ‘चीजें अब उतनी आसान नहीं रहीं’, ‘गोरख पांडे के लिए एक कविता’, ‘कहता है’, ‘वे जो संस्कृति सचिव के पाजामे में घुस जाना चाहते हैं’ आदि ऐसी ही कविताएँ हैं। इन कविताओं में पाठकों का साक्षात्कार उत्तर-आधुनिक समाज से होता है।
अपसंस्कृतिकरण की भिन्न-भिन्न छवियाँ इन कविताओं में खुलती हैं और हम हताशा, क्षोभ और अश्लीलता के अँधेरे कुँए में उतरते चले जाते हैं।
*

प्रकाश मनु की कविताओं में समय की अनुगूँजें व्याप्त हैं। ऐसा परिदृश्य भी है जो नितांत सच है और हमारी संवेदना को भीतर तक झकझोर कर रख देता है। सघन बिंबों और प्रतीकों के सहारे कवि अपनी इन कविताओं में पूरी शिद्दत के साथ समकालीन विसंगतियों से टकराता है, जूझता है, ‘चित्रकार ने कहा तिरस्कार से’ ऐसी ही कविता है जिसमें एक चित्रकार है, जिसके चित्रों में बहुत सारी झोंपड़ियाँ हैं। इस कविता के बहाने कवि जिंदगी के दुखों के बीच से झाँकते सुखों की तलाश करता है—

इनमें हर झोंपड़ी में कम से कम
एक तो जरूर है जवान औरत
पकाती हुई खाना
सिंगार करती देखती हुई दरपन में सपना
सुख-दुख महँगाई के जाल में उलझी रूप की डाल
इसमें जोड़ती पैसा-पैसा गृहस्थी का सुख...
हर झोंपड़ी में है बहुत कुछ।
...मुझे दिखाई दिया सचमुच झोंपड़ियों के भीतर जो कुछ था
कुछ नहीं, बहुत कुछ—
हँसता हुआ दुख के काले-काले होंठों पर
लाल बाँसुरी की तरह! (पृष्ठ 151)

संग्रह में ऐसी कई कविताएँ हैं, जिन्हें पढ़कर एक अजीब सी बेचैनी शिराओं में दौड़ने लगती है, माथे की सारी नसें तड़कने सी लगती हैं, दुनिया बेहद कुरूप और नृशंस लगती है। तभी अचानक प्रकाश मनु ‘चलो ऐसा करते हैं’ कविता के बहाने ‘कुछ नये अचंभों भरे क्षितिज पर चलने का’ आह्वान करने लगते हैं, जहाँ अपनी-अपनी पीठ से उम्र की गठरियाँ उतारकर, हवा में पूरी साँस खींचते हुए, तरोताजा होकर दौड़ने की पुकार लगाते हैं। वे जानते हैं कि विद्रूप, सड़ी-गली हवाओं में साँसें लेना मुश्किल ही नहीं, बहुत मुश्किल है। पर हर मोर्चे पर तनी तलवारों, उदग्र अपमानों और बेबस स्थितियों से उबारने की हर संभव कोशिश करती प्रकाश मनु की कविता को अपनी ताकत पर पूरा भरोसा है। उनकी कविता पूरी तरह से सजग है, तभी वह उद्बोधन करती है—

चलो, ऐसा करते हैं कि
धीमे-धीमे ताप में धीमी करते बातें
टहलते हैं
और टहलते-टहलते कहीं दूर निकल जाते हैं
समय की सारी सरहदें पीछे छोड़ जाते हैं
पीछे छोड़ जाते हैं दुनिया के सारे नियम और कायदे
और बौने लोगों की बौनी दुनिया के नुकसान और फायदे
किसी और दुनिया में चलते हैं जहाँ भाषा इतनी थकाने वाली न हो
लोग इतना अधिक बोलते और घूरते और
इधर-उधर सूँघते और किकियाते न हों
न हो इतने चिड़चिड़ेपन का बोझ आत्मा पर—
चलो कहीं चलते हैं। (पृष्ठ 28)

जिजीविषा का उद्दाम वेग ‘अभी मैं नहीं मरूँगा’ कविता में स्पष्ट परिलक्षित होता है। अपनी सामर्थ्य पर अटूट विश्वास है कवि को और उनका संकल्पशील मन उद्घोष करता है—

अभी रचनी है दुनिया
बिल्कुल नई चमचमाती दुनिया! (पृष्ठ 23)

दुखों को सुनहरा करने की अपूर्व कामना, कठिन चढ़ाइयाँ चढ़ने, तमाम टीलों को पीठ पर उठाकर ले जाने का अभूतपूर्व संकल्प, बिजलियों का घेरा तोड़कर आसमान चूमने की ललक कवि मन में जिंदा है। कवि का यह दायित्वबोध परिवर्तनकामी शक्तियों व समाज की एक ऐसी नई तस्वीर दिखाने के लिए व्यग्र है, जहाँ नई-नई क्रांतियों के बल पर आसमान और धरती का नया गठबंधन कर सके और कविताओं में उगा सके हरे-हरे खुशमिजाज पेड़।

आत्मालाप की शैली में लिखी उनकी यह कविता प्रतीकों के माध्यम से कवि की चिंताओं को व्यक्त करती हुई, सदियों से जमे पठार को दरकाने का काम करती है। उनके शब्दों का ओज पाठकों की जड़ता को तोड़कर उम्मीदों का सुनहरा आकाश रच देता है।
*

इन कविताओं में अनंत आत्मीयताओं का खूबसूरत संसार है। अँगीठी सुलगाती, चौका लीपती ममतामयी माँ है, बेपरवाह अपनेपन से भरे हुए दोस्त हैं। यहाँ नीम की निबोलियों-सा महकता बचपन है। बेफिक्र बचपन की मासूम आकांक्षाओं को कवि ने कुछ इस तरह उकेरा है— 

बचपन दरअसल एक हरा समंदर है
एक सुनहरी आग
और एक दुनिया...
जिसमें न दरवाजे हैं
न दीवारें
सिर्फ उड़ान है, उड़ान—सात हाहाकारते समंदरों पर
एक बेफिक्र बेछोर उड़ान...! (पृष्ठ 23)

‘खोए हुए बचपन के लिए एक कविता’ में कवि ने बचपन की मासूम और बचपन बीत जाने के बाद की मायूस मनःस्थितियों के जो चित्र खींचे हैं, वे पाठकों को बिल्कुल अपने से लगते हैं। अंतर्मन की संवेदनाओं का उजास इन कविताओं में रह-रहकर फूटता है। 
संवेदना के साथ रोशनी में नहाई प्रकाश मनु की कुछ कविताएँ अपूर्व हैं। ‘फूलों की घाटी में एक बच्चा’ ऐसी ही कविता है जो कवि ने एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में नाचते हुए बच्चों को देखकर लिखी है। इसमें रंगों में खिलखिलाती दुनिया है। इठलाती हवाएँ और झूमते दरख्त हैं, शोर मचाता हुआ आता बसंत है—

बच्चे के होठों से
किरणीली मुसकानें फूटती हैं
फूटते हैं नई सदी के गाने
उसके गीतों में अजब सी तुतलाहट है
और कभी न जाने वाले वसंत की नरमी, वसंत की दस्तक
अजब सा आनंद है उसके गीतों में
जिसमें सारी की सारी दुनिया
एक नए ढंग से खुलती है। (पृष्ठ 26)

कवि की कविता में एक ओर समकालीन विसंगतियों की तल्खियाँ हैं, वहीं दूसरी ओर अद्भुत जिजीविषा भी है। ‘चिड़िया का घर’ कविता अनंत संभावनाओं का द्वार खोलने वाली कविता है, जिसमें चिड़िया का ढेर सा उछाह और एक बड़ी जिजीविषा के साथ उसकी कला देखने को मिलती है, जिसके बल पर वह महामारी, अकाल और घुटन भरे वक्त में भी अपना घर बना लेती है। यह कविता हमारे लिए एक बड़ा संबल रचती है और जिंदगी की तमाम बेरंग उदासियों से बाहर खींच ले जाती है।

कवि अपने रचनात्मक उन्मेष के बल पर सकारात्मक सोच द्वारा उस वक्त भी इनसानी रिश्तों का पुल बना डालता है, जिस वक्त एक-दूसरे के खिलाफ षड्यंत्र रचते हुए, एक-दूसरे पर विष उगलते हुए क्रोध से लाल भभूका लोग एक-दूसरे के पास से गुजर जाते थे। परिणाम यह होता है कि अचानक सारा भूगोल और इतिहास बदल जाता है और इनसानी रिश्तों की आवाजाही शुरु हो जाती है। 
दुनिया को सुंदर बनाने की भरपूर कोशिश करती ये कविताएँ, हमारे लिए पुल बनाती हैं और हमें हँसना सिखाती हैं। उजास भरी जिंदगी के सपने दिखाती हुई प्रकाश मनु की कविताओं में गूँजता मैत्री का अनहद पाठकों को संबल प्रदान करता है और अलौकिक शांति के आलोक में ले चलता है, जहाँ दुनिया वाकई खूबसूरत हो जाती है।

इन कविताओं में संवेदनाओं को भरपूर बचाने की कोशिश है। नई उम्मीदें और नये संकल्प हैं। विचार और संवेदना की बुनावट है। कुल मिलाकर इनमें अपने समय की लय, मुखर संवेदन है और जिंदगी की थकान, निराशा, तनावों और ऊब के बीच से अपनेपन को तलाशने का उद्वेग है।
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