गिजुभाई बधेका: बच्चों को प्यार करने वाले दोस्त अध्यापक

डॉ. सुनीता

सुनीता

545, सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008
चलभाष: 09910862380

बाल शिक्षा में एक नया स्वप्न देखने वाले गिजुभाई बधेका बड़े अनोखे बाल साहित्यकार हैं। उन्होंने पहलेपहल यह आवाज बुलंद की कि बच्चों को पढ़ाना है तो आपके हृदय में माँ की तरह ममता और दुलार होना चाहिए। बच्चों को पढ़ाते समय डाँट-डपट और डंडे का प्रयोग करना बर्बरता है। बच्चों के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित करते वाले गिजुभाई बधेका ने ऐसी अनोखी शिक्षा का स्वप्न ही नहीं देखा, उसे व्यवहार में भी ढाला। गुजरात मे उन्होंने शिक्षा की ऐसी प्रयोगशाला शुरू की, जिसकी गूँज सारे देश ने सुनी।

गिजुभाई बच्चे की शिक्षा और बाल साहित्य को एक साथ लेकर चलते थे। उन्होंने जोर देकर कहा कि बच्चों को रोचक कहानियाँ सुनाकर आप जो प्रभाव पैदा कर सकते हैं, वह किसी और तरह से संभव ही नहीं है। बच्चों को डंडे के डर से अनशासित नहीं किया जा सकता, और न डाँट-डपटकर उन्हें पढ़ाया जा सकता है। पर हाँ, अगर आप सुंदर और रोचक कहानियों के जरिए बच्चों में संस्कार डालेंगे और उन्हें अच्छी चीजें समझाएँगे, तो न सिर्फ उनका सारा व्यक्तित्व बदल जाएगा, बल्कि उनकी पढ़ाई-लिखाई में इतनी रुचि पैदा हो जाएगी कि उन्हें कभी पढ़ने के लिए कहने की जरूर ही न पड़ेगी।

गिजुभाई बधेका
 (15 नवम्बर 1885 – 23 जून 1939)
पर इसके साथ ही गिजुभाई बधेका बच्चों के बहुत अच्छे लेखक भी थे, जिन्होंने एक से एक दिलचस्प कहानियाँ लिखी हैं। उनकी कहानियों में बड़ी नाटकीयता और रस है, जिन्हें सुनते हुए बच्चे किसी जादू की डोर से बँधे साथ बहते हैं। पर गिजुभाई इससे भी अधिक आदर्श बाल क्षिक्षा का स्वप्न देखने वाले ऐसे विलक्षण स्वप्नदर्शी थे, जिन्होंने देश में पहली बार बाल साहित्य के जरिए शिक्षा देने का महामंत्र अध्यापकों को दिया। वे ऐसे ममतालु शिक्षाशास्त्री थे, जिनकी लोकप्रियता ने हर किसी को अचरज में डाल दिया। हजारों बच्चे उनके मुरीद थे, जिन्होंने उनकी कहानियों से जीवन के अनमोल पाठ पढ़े। इसलिए आज भी उन्हें लोग ‘बच्चों की मूँछों वाली माँ’ कहकर प्यार और आदर से याद करते हैं।

गिजुभाई बधेका ने सिर्फ बालशिक्षा में प्रयोग ही नहीं किए, बल्कि अपने प्रयोगों पर आधारित एक सुंदर पुस्तक ‘दिवास्वप्न’ पुस्तक लिखी, जिसे आज भी बड़े-बड़े शिक्षाशास्त्री ‘बाल शिक्षा की गीता’ कहकर याद करते हैं। गुजरात के इस विलक्षण शिक्षाशास्त्री की यह पुस्तक सन् 1932 में लिखी गई थी और तभी से अपने नएपन और शिक्षा के बारे में अपने क्रांतिकारी विचारों के कारण इसने सभी का ध्यान आकर्षित किया। मध्य प्रदेश के गांधीवादी विद्वान काशीनाथ त्रिवेदी ने बड़े धैर्य से इस पुस्तक का गुजराती से हिंदी में ऐसा अनुवाद किया, जो मूल जैसा ही आस्वाद देता है। यह पुस्तक समय बीतने के साथ-साथ इतनी लोकप्रिय हुई कि राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने 1991 में इसका पहला संस्करण प्रकाशित किया। तब से सन् 2011 तक इसके अठारह संस्करण हो चुके हैं।

गिजुभाई की यह पुस्तक ऐसे सभी शिक्षाकर्मियों के लिए जो बच्चों के लिए कुछ नया करना चाहते हैं, उन्हें बस्ते के बोझ से, ज्ञान के अतिरेक से मुक्ति दिलाने की बेचैनी महसूस करते हैं, एक दिग्दर्शक का काम करती है। गिजुभाई अच्छी तरह जानते हैं कि सच्चा ज्ञान वह है, जिसे बच्चे खेल-खेल में हृदयंगम कर लेते हैं। जबरदस्ती ठूँसा गया ज्ञान तो ऊब और अपच पैदा करता है और बच्चों के कोमल मस्तिष्क पर दुष्प्रभाव डालता है।

इस पुस्तक को पढ़ने के बाद शिक्षा को लेकर नए ढंग से सोचने-विचारने वाले सभी लोगों को एक हार्दिक खुशी और संतोष तो प्राप्त होता ही है कि हाँ, एक ऐसा भी रास्ता हो सकता है, जो मासूम बच्चों की मासूमियत बचाए रख सके, उनकी हर पल की जिज्ञासु वृत्ति को संतुष्ट कर सके और बगैर उन पर क्रोधित हुए, या बगैर किसी शारीरिक दंड के, उनकी अति सक्रियता को सही दिशा में मोड़ सके।

गिजुभाई बधेका का मानना था कि शिक्षा तो आनंद की वस्तु है। उसका भला शारीरिक दंड से क्या वास्ता? पर दुर्भाग्य से शिक्षा के नाम पर बच्चों को शारीरिक दंड देने का तरीका कमोबेश आज भी चल रहा है, जो न सिर्फ बच्चों को कुंठित कर रहा है, बल्कि उनमें बदले की भावना और मारपीट की प्रवृत्ति भी पैदा कर रहा है। बड़े-बड़े नामी स्कूलों की महँगी शिक्षा और पढ़ाई के तामझाम के बावजूद, यह सही शिक्षा का अभाव ही है, जो बच्चों में क्रोध और असुरक्षा की भावना पैदा कर रहा है। प्यार और कोमलता से पढ़ाने की बजाय, एक अनुचित प्रतिस्पर्धा पैदा करके, हम उन्हें एक तरह की हिंसा ही सिखा रहे हैं। ऐसी पढ़ाई से वे लगातार उद्धत बन रहे हैं, ताकि वे अपने अपमान का तुरंत बदला ले सकें।

अगर बच्चों को सही शिक्षा मिले, कोई प्यार से उन्हें पढ़ाने वाला हो, तो ऐसी बुराइयाँ पनप ही नहीं सकतीं।
‘दिवास्वप्न’ जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, शिक्षा को लेकर एक ममतालु अध्यापक का सपना ही है। बहुत प्यारा, बहुत आह्लादकारी सपना, जिसकी हम सब कामना करते हैं कि काश, ऐसा हो पाता! गिजुभाई ने इस पुस्तक में बच्चों के साथ खेलते हुए, कहानी सुनाते हुए, मिट्टी के खिलौने बनाते हुए एक ऐसे अध्यापक की कल्पना की है और अपने जीवन के ऐसे अनुभवों को उसमें ऐसे पिरोया है कि वह कोरा दिवास्वप्न न होकर, हमारी कामनापूर्ति का साकार रूप ले लेती है।

गिजुभाई की ‘दिवास्वप्न’ बहुत ही दिलचस्प पुस्तक है। एक साँस में पढ़ जाने वाली। बरसों से यह घर में थी, पर पहले कभी पढ़ने की फुरसत ही न मिली। शायद इसलिए भी, कि यह छोटी सी पुस्तक बड़े-बड़े पोथों में दबी हुई थी। तो नजरअंदाज होती रही। अभी कुछ समय पहले ही अपने पढ़ने के व्यसन के कारण कोई नई पुस्तक देख रही थी कि नई-पुरानी किताबों और पत्रिकाओं के बीच दबी गिजुभाई बधेका की ‘दिवास्वप्न’ दिखाई पड़ी। नाम तो गिजुभाई का बहुत बार सुना है, और उनका नाम आते ही मन में बच्चों के मामा गिजुभाई की प्यारी सी तसवीर खिंच आती है, जो बच्चों को मजेदार कहानियाँ सुनाया करते हैं। पर ‘दिवास्वप्न’ पुस्तक पढ़ी तो मन में नए विचार और चिंतन की खिड़कियाँ ही खुलती चली गईं। लगा, बाल शिक्षा के क्षेत्र में ताजा विचारों के इस झोंके ने मुझे भीतर-बाहर से बदल दिया है।

एक छोटी सी पुस्तक भी क्या जादू कर सकती है, इसे जानना हो, तो मैं कहूँगी, कि फुर्सत मिले तो आप भी गिजुभाई बधेका की पुस्तक ‘दिवास्वप्न’ पढ़ें। बाल शिक्षा को लेकर लिखी गई ऐसी रोचक पुस्तक शायद ही कोई और हो। 
*

चलिए, अब गिजुभाई बधेका जी के ‘दिवास्वप्न’ और इस पुस्तक के जादुई प्रभाव की चर्चा की जाए।
असल में, ‘दिवास्वप्न’ कहानी है एक ऐसे प्रयोगशील शिक्षक की, जो एक प्राथमिक पाठशाला में चौथी कक्षा में पढ़ाने आता है। पहले ही दिन में उसके मन में शिक्षा की पारंपरिक शैली को लेकर उदासीनता है। वह कुछ नया करना चाहता है। उसे बिल्कुल पसंद नहीं कि पहले दिन से ही कक्षा में घुसे, हाजिरी ली और फिर पाठ्यपुस्तक का पहला पाठ शुरू। उसकी धारणा है कि पहले बच्चों से अच्छे से परचना चाहिए, अपरिचय की दीवार टूटनी चाहिए। पढ़ाना-लिखाना तो इसके बाद ही हो सकता है।

खैर, पहले दिन इस नए प्रयोगवादी अध्यापक की शुरुआत शांतिपाठ से होती है। अब चौथी कक्षा के बच्चे पहले दिन नए अध्यापक की कक्षा में चुप क्यों बैठने लगे? ऊपर से ऐसे अध्यापक से, जिसमें जरा भी रौब नहीं है। उसके लिए सचमुच बड़ी मुसीबत हो गई। गिजुभाई ने इस दृश्य का बहुत ही सुंदर चित्र खींचा है—

“लड़कों में से कोई ऊँ-ऊँ करने लगा, कोई हाऊ-हाऊ करने लगा तो कोई धमाधम पैर पटकने लगा। इतने में एक ने ताली बजाई और सब ताली बजाने लगे। फिर कोई हँसा और हँसी उड़ने लगी। मैं खिसिया गया।”

पहले दिन नए अध्यापक का यह प्रयोग तो सफल नहीं हुआ। पर अगले दिन कक्षा में जाने पर अध्यापक ने कहा, “कहानी सुनोगे?” और यह सुनते ही सब बच्चे खुश हो गए, उसके आसपास घेरा बनाकर बैठ गए। थोड़ी ही देर में एकदम पूरी कक्षा एकाग्रचित्त होकर कहानी सुन रही थी। कहानी भी राजा-रानी, उनके परिवार और राजकुमारों के विचित्र कारनामों की। यानी इतनी लंबी कि जिसका कोई ओर-छोर नहीं। पर बच्चे हैं कि एकटक सुन रहे हैं, न भूख न प्यास, न छुट्टी का होश। छुट्टी की घंटी बजने पर भी सबका एक ही आग्रह, “मास्टर जी, कहानी पूरी कीजिए न!” किसी बच्चे का घर जाने का मन ही न हो।

वाह, कमाल है भाई, मन करता है, ऐसा स्कूल बचपन में हमें भी मिला होता तो कितने मजे आते। मेरी बहुत सी बचपन की सहेलियाँ स्कूल की मार के डर से स्कूल का मुँह ही नहीं देख पाईं। वे अगर ऐसा स्कूल, ऐसे अध्यापक पातीं तो आज क्या वे अनपढ़ होतीं?

गिजुभाई स्वयं भी बच्चों पर कहानी के जादुई असर की चर्चा बड़े सुंदर ढंग से करते हैं। वे कहते हैं, “पहले दिन जो मेरी सुनते तक नहीं थे और जो हा-हा, ही-ही करके मेरी खिल्ली उड़ा रहे थे, वे ही जब से कहानी सुनने को मिली है, तब से शांत बन गए हैं। मेरी ओर प्रेम से देखते हैं। मेरा कहा सुनते हैं। मैं जैसा कहता हूँ, उसी प्रकार बैठते हैं। ‘चुप रहो, गड़बड़ मत करो’ तो मुझे कभी कहना ही नहीं पड़ता और कक्षा में से निकालने पर भी नहीं निकलते।”

यों गिजुभाई अपने अनोखे प्रयोगशील मास्टर के जरिए कहानी के सूत्र से अपने विद्यार्थियों से एक अटूट बंधन में बँध जाते हैं। कहानी द्वारा ही फिर इतिहास की बातें होती हैं, साहित्य की बातें होती हैं, यानी कहानी, कविता, नाटक, एकांकी की। पर व्याकरण...? वह बच्चों को कैसे पढ़ाया जाए? बहुत से बच्चों को तो वह हौआ ही लगता है। 
पर अध्यापक और बच्चों का यह विलक्षण संवाद बना, तो फिर सीधे-सीधे व्याकरण सिखाने की एक बहुत ही मजेदार पद्धति भी निकल आती है। और सवाल-जवाब भी बड़े मजेदार। भई, सिंह की स्त्री कौन हुई? सिंहनी। फिर ऐसे ही बकरा, बकरी आदि बहुत सारे उदाहरण सामने आ जाते हैं। बच्चों से ही सारा कुछ निकलवाया जाता है। व्याकरण भी इतने आनंददायक ढंग से पढ़ाया जा सकता है, यह गिजुभाई से सीखा जा सकता है।

इसी तरह गिजुभाई बताते हैं कि स्कूल का मतलब सिर्फ पाठ्यपुस्तक पढ़ा देना ही नहीं है। इसके साथ शिक्षा का अर्थ बच्चों के संपूर्ण विकास पर ध्यान देना है। उनकी शारीरिक सफाई, नाखून, बाल, कपड़े, मुँह-हाथ सब साफ-सुथरे रखना। सिर्फ अपनी ही सफाई नहीं, बल्कि पूरे स्कूल की भी सफाई की ओर ध्यान देना आदि भी शिक्षा का ही एक महत्त्वपूर्ण अंग है।

पुस्तक पढ़ते हुए बराबर खयाल आ रहा था कि आज की शिक्षा कैसी हो गई है? यह सिर्फ पाठ्य पुस्तकों की रटाई तक सीमित हो गई है। न सिर्फ अध्यापक ऐसा करते हैं, बल्कि अभिभावक भी इसी बात का निरंतर दबाव बनाते हैं, जिससे बच्चों का एकांगी विकास होता है। इम्तिहान में ज्यादा नंबर हासिल करने के पीछे जो खींचतान चलती है, उसका भी गिजुभाई विरोध करते हैं। हाँ, बच्चों से जो गलतियाँ होती हैं, उनके सुधार की ओर उनका पूरा ध्यान रहता है।

शिक्षा में उनके प्रयोगों के कुछ और दिलचस्प तरीके भी हैं। उदाहरण के लिए, बच्चों में कला के पति रुचि विकसित करना, चित्र बनाना, लोकगीत सिखाना, सुनना, बच्चों को ही पात्र बनाकर कहानी का नाट्य रूपांतरण करवाना, वगैरह-वगैरह।

इस नए अध्यापक के प्रयोगों के दौरान दूसरे अध्यापकों की क्या प्रतिक्रिया होती है, इसका भी पुस्तक में बहुत बढ़िया वर्णन है। असल में नए अध्यापक की प्रयोगशीलता से सबसे ज्यादा मुश्किल दूसरे अध्यापकों को ही है। कैसे दूसरे अध्यापक इस नए प्रयोगशील अध्यापक से ईर्ष्या करते हैं, क्या-क्या कटूक्तियाँ उसके खिलाफ हवा में तैरती हैं, इसका बड़ा ही जीवंत वर्णन है। दूसरे शिक्षक अकसर यह कहकर नए अध्यापक का मजाक उड़ाते थे—

“ये महाशय तो रोज एक नया प्रयोग करते हैं। ये हमें अपने छात्रों को सुख से पढ़ाने भी देंगे या नहीं? इन्हें परवाह ही क्या है? ये इस प्रयोग में सफल हो गए तो साहब, हमसे भी कहेंगे कि लो, करो इस तरह और उस तरह, और यदि सफल न हुए तो अपना बोरिया-बिस्तर लेकर चल देंगे।”

लेकिन परीक्षा परिणाम आया, तो सब कुछ उलट गया। डायरेक्टर साहब नए अध्यापक के प्रयोगों से बहुत प्रभावित हुए। उनकी भरपूर सराहना करते हुए वे कहते हैं—

“...ये सज्जन एक साल पहले चौथी कक्षा में शिक्षा के प्रयोग करने हेतु मेरे पास आए थे। मैंने उस समय इन्हें एक पढ़ा-लिखा मूर्ख ही समझा था। मैंने यह सोचकर इन्हें अनुमति दी थी कि इनके जैसे बहुतेरे पड़े हैं जो कसौटी पर कसे जाने पर भाग खड़े होते हैं। मुझे कहना चाहिए कि मैं इनमें विश्वास नहीं करता था। लेकिन अब मैं सहर्ष स्वीकार करता हूँ कि इनके प्रयोग बहुत सफल हुए हैं। मेरे विचारों में भी इन्होंने भारी परिवर्तन कर दिया है और आज अपने अंतःकरण में मुझे यह ध्वनि सुनाई पड़ रही है कि प्राथमिक पाठशाला के इस पुराने ढर्रे का अब शीघ ही अंत होगा। हमारे जैसे शिक्षकों और अधिकारियों को अब राजी-खुशी रुखसत लेकर नई पीढ़ी के शिक्षाशास्त्रियों और कल्पनाशील विचारकों को अपना स्थान सौंप देना चाहिए।”
*

कुल मिलाकर ‘दिवास्वप्न’ बच्चों की शिक्षा से जुड़े हर व्यक्ति के लिए एक अत्यंत पठनीय पुस्तक है। आँखें खोल देने वाली। मैंने तो इसे एक ही बैठक में पढ़ा है और सुबह शुरू करने के बाद, शाम तक खत्म करके ही छोड़ा। इसे पढ़ने के बाद हृदय में एक अलग तरह का आह्लाद, एक अनोखी खुशी की लहर तैरती रही। यह एक बढ़िया पुस्तक पढ़ लेने की गहरी तृप्ति ही तो थी।

इसके साथ ही बरसों पहले स्वयं हम लोगों ने एक साल तक श्रमिक बस्ती में ‘पहला कदम’ नाम से स्कूल चलाया था, उसकी याद फिर से ताजा हो गई। बच्चों को कहानियाँ-कविताएँ सुनाते हुए, खेल-खेल में पढ़ाई-लिखाई का आनंद क्या होता है, यह हम लोगों ने खुद महसूस किया था।

गिजुभाई की ‘दिवास्वप्न’ पुस्तक पढ़ते हुए, उस स्कूल के सभी बच्चों के चेहरे आँखों के आगे बरबस तैरने लगे। वे झुग्गी-झोंपड़ी के बच्चे थे, पर इतने अच्छे और प्रतिभावान कि हम लोग दंग थे। उन्हें रंग और ड्राइंग बुक्स दी गईं, तो उन्होंने ऐसे सुंदर और मनमोहक चित्र बनाए कि देखकर हम अचरज में थे। कल्पना की उड़ान उनमें कम न थी। इसी तरह उन्हें घर और आसपास के परिवेश पर कुछ लिखने के लिए कहा गया, तो उन्होंने बड़े अलग ढंग से अनुभव लिखे। छोटी-छोटी बातें, लेकिन मर्म को छू लेने वाली। इसलिए कि उन्होंने किताबों से ज्यादा जीवन के खुले विद्यालय में शिक्षा हासिल की थी। गरीबी ने उन्हें प्यार और हमदर्दी की सीख दी थी। उनमें बहुत कुछ जानने की इच्छा थी, साथ ही अपनी बात कहने की भी।

ये ऐसे बच्चे थे जो स्कूलों में अध्यापकों के कठोर व्यवहार से डरकर भाग खड़े हुए थे। पर हमारे खुले स्कूल में तो वे बड़ा रस लेते थे और बड़े उत्साह से आया करते थे। कपड़े बहुत साधारण, मैले भी, पर उनके दिल बड़े उजले थे और आँखों में चमक थी। यह मैंने महसूस किया, मनुजी ने भी। उन्हें एक पुरस्कार मिला, जिसकी राशि वे लेना नहीं चाहते थे, और उसी से यह स्कूल चला। हमारे जीवन का यह यादगार अनुभव था, जिसे ‘दिवास्वप्न’ पढ़कर मैंने एक बार फिर बड़ी शिद्दत से याद किया।

और भी बहुत कुछ है, जो याद आ रहा है। असल में शिक्षक, बालक और बाल साहित्य इन तीनों की त्रिवेणी बहुत महत्त्वपूर्ण है। बच्चे को अच्छी शिक्षा देने का रास्ता ही यह है कि उसे अच्छा बाल साहित्य पढ़ने को दिया जाए, या अच्छी कहानियाँ सुनाई जाएँ। तब शिक्षा भार नहीं बनती, एक रुचिकर खेल हो जाती है। बच्चा हर घड़ी उससे सीखता है, हर बात से सीखता है। इससे न सिर्फ बालक का संपूर्ण विकास होता है, बल्कि समाज में एक सुंदर और रचनात्मक बदलाव नजर आता है।

यह कितने आनंद की बात है कि गिजुभाई बधेका ने बरसों पहले यह स्वप्न देखा था और इसका महत्त्व दिनोंदिन बढ़ता जाता है। बहुत दिनों बाद मैंने कोई ऐसी पुस्तक पढ़ी, जिसने मुझे बहुत गहरी तृप्ति दी और मन में नए विचारों की खिड़कियाँ खुलने लगीं। लगा, शिक्षा बच्चे के व्यक्तित्व निर्माण के साथ-साथ एक अच्छे समाज की भी आधारशिला है। पर वह शिक्षा सुंदर और रचनात्मक ढंग से क्यों नहीं दी जा सकती? शिक्षा के भारी तामझाम की बजाय, सीधे-सादे और सरस ढंग से पढ़ाई क्यों नहीं हो सकती?

गिजुभाई का लिखा बहुत कुछ है, जिनमें उनकी रोचक कहानियों का गुलदस्ता भी शामिल है, पर अगर आपने वह सब नहीं पढ़ा, तो यह एक ही पुस्तक ही उन्हें अनंत काल तक आपके दिल में बसाए रखेगी।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।