प्रकाश मनु: सतत बहता सोता

सूर्यनाथ सिंह
संस्मरण: सूर्यनाथ सिंह

181, नेवल टेक्निकल आफीसर्स सोसाइटी, प्लॉट नं. 3-ए, सेक्टर-22, द्वारका, दिल्ली-77
चलभाष: 09958044433

कई बार किसी के लिखे को पढ़कर हमारे भीतर उसके व्यक्तित्व को लेकर विपरीत धारणा भी बन जाती है। जैसे एक बार नामवर सिंह ने कहा था कि टालस्टाय से मिलने के बाद कोई यह नहीं कह सकता था यह व्यक्ति अपने लेखन में इतना बड़ा क्रांतिकारी हो सकता है। उसी तरह उनके लेखन को पढ़कर कोई अंदाजा नहीं लगा सकता कि उनका व्यक्तित्व इतना संत स्वभाव का हो सकता है।

कुछ ऐसा ही घालमेल मेरे मन में भी था प्रकाश मनु को लेकर। उनकी कई रचनाएँ मैं पढ़ चुका था, खासकर ‘यह जो दिल्ली’ है। चूँकि उन दिनों मैंने दिल्ली प्रेस में नौकरी शुरू की थी, इसलिए ‘यह जो दिल्ली है’ पढ़कर मेरे भीतर एक अजीब तरह का भय और गुस्सा था।

मैंने दफ्तर में साथियों से इस उपन्यास पर चर्चा की, तो पता चला कि मनु जी हिंदुस्तान टाइम्स में काम करते हैं। मैंने मिलने की इच्छा जाहिर की तो हमारे सहकर्मी जयप्रकाश पांडेय उनसे मिलवाने को उत्साहित हो उठे। मेरे भीतर मनु जी की छवि किसी दाढ़ी-बाल बढ़ाए, सिगरेट फूँकते, आँखों में सूनापन और आक्रोश का मिला-जुला भाव भरे क्रांतिकारी व्यक्ति की थी। 

प्रकाश मनु
फिर एक दिन हम गए उनसे मिलने। उन्हें देखते ही मेरे भीतर की छवि खंडित हो गई। सौम्य, स्नेहिल, सहास व्यक्तित्व। नरम आवाज में बोलने वाले। हर बात पर हँसने वाले। तपाक से गले मिलने वाले।...मैंने पहली मुलाकात में ही उन्हें यह बात बता दी थी कि आपको पढ़कर मेरे भीतर आपकी जो छवि बनी थी, वह टूट गई। वे जोर से हँसे और हँसते रहे।

उसके बाद से जब मौका मिलता, मैं उनसे मिलने पहुँच जाता। आज की तरह मोबाइल फोन तो दूर, लैंडलाइन का भी चलन बहुत नहीं था। लोग तब चिट्ठियाँ लिखा करते थे। इसलिए पहले से समय लेकर किसी से मिलने का चलन भी बहुत नहीं था। न आज की तरह अखबारों के दफ्तरों में यह चलन शुरू हुआ था कि किसी कर्मी से मिलने कोई आए तो सुरक्षाकर्मी पहले उससे पूछेगा कि मिलने वाले को भेजूँ या न भेजूँ, फिर भेजेगा। तब खुला दरबार होते थे अखबारों के दफ्तर। जब जो चाहे मिलने चले जाए, जब तक मर्जी बैठे, बतियाए। कोई रोक-टोक नहीं। आजकल तो आगंतुक को मिलने के लिए कर्मी की सीट तक नहीं भेजा जाता। मिलने के लिए एक अलग जगह बना दी गई है, जहाँ बहुत देर तक बैठकर गपशप करना संभव नहीं होता। कई दफ्तरों में तो सुना है कि आगंतुकों के आने और जाने का समय भी दर्ज होता है।

तब हर कर्मी के पास मिलने वालों के लिए दो-चार अतिरिक्त कुर्सियाँ रखी होती थीं। अखबारों के दफ्तरों में विद्वानों-लेखकों की आवाजाही बनी रहती थी। बहस-मुबाहिशों के अड्डे भी हुआ करते थे तब अखबारों के दफ्तर। इसलिए तब मनु जी से मिलने जाते वक्त इस बात की चिंता नहीं होती थी कि हम जाएँ और उनके काम का हर्जा हो, तो ठीक न होगा। बस, जब मन में हुलास बँधती, स्कूटर उनके दफ्तर की तरफ मोड़ देते। उन्हें भी कभी यह कहते नहीं सुना कि आज काम कुछ अधिक है, निपटा लेते हैं, फिर बात करते हैं या किसी और दिन आएँ तो बात हो पाएगी। जाते, जितनी देर संभव होता बैठते, कुछ और लोग आ जुटते, तो उनसे भी संपर्क हो जाता। 
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मनु जी से मिलने जाने का एक सुख यह भी था कि वहाँ लेखक उनसे मिलने आते रहते थे, उनसे मुलाकातें भी हो जाती थीं। जब भी उनसे मिलते कुछ नया और अमिट लेकर ही लौटते। इस तरह मिलते-जुलते हमारा अटूट संबंध बना। वह गाढ़ा ही होता गया। वे मुझमें अपने छोटे भाई जैसा कुछ तत्त्व पाते हैं। उसी तरह स्नेह देते, मेरे बच्चों और पत्नी को प्यार देते हैं। अब हमारे बच्चों के ताऊ जी हैं। वे बार-बार कहते हैं कि सूर्य भाई, मैं आपमें अपने को देखता हूँ।

तब मैं कविताएँ लिखता था और अटूट विश्वास था कि कविता ही साहित्य की दीर्घकालिक विधा है। गद्य की उम्र लंबी नहीं होती। मगर मनु जी से मिला तो उन्होंने समझाया कि आज गद्य का ही जमाना है, उसके बिना काम नहीं चल सकता। हालाँकि पत्रकारिता में नौकरी पाई थी, तो वहाँ गद्य ही बरतता था, पर रचनात्मक लेखन के तौर पर उससे दूरी ही बनाए चल रहा था।

फिर उन्होंने कहा कि बच्चों के लिए भी कुछ लिखना चाहिए। बच्चों के लिए! यह तो मेरे लिए और विचित्र बात थी। कभी सोचा ही नहीं था कि बच्चों के लिए भी कुछ लिखना चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि तमाम बड़े रचनाकारों ने बच्चों के लिए लिखा है। फिर सीधे प्रस्ताव रख दिया कि ‘नंदन’ के लिए कहानी लिखिए।

उनका वह प्रस्ताव जम गया दिमाग में। उनका कहा टाल भी सकता था, पर टाल न सका। उसी पल से दिमाग में घुमड़ना शुरू हो गया था कि बच्चों के लिए कहानी क्या हो सकती है। दिमाग को खूब वर्जिश कराई, पर उसकी पकड़ में कोई बात न आई। तब मुझे लगा कि बच्चों के लिए लिखना आसान बात नहीं। खैर, मनु जी के आदेश का पालन करना था, इसलिए बचपन में सुनी राजा-रानी की एक कहानी को तोड़-मरोड़कर लिख दिया। पक्का यकीन था कि वह कहानी उन्हें पसंद नहीं आएगी और अंततः रद्दी की टोकरी में जाएगी या खेद सहित वापस आएगी। पर हैरानी की वह ‘नंदन’ में छपी भी।

छपने के बाद उसे पढ़ा तो राज खुला। तब समझ में आया कि जाना तो उसे रद्दी की टोकरी में ही चाहिए था, पर चूँकि मनु जी ने मेरा हौसला बढ़ाने के लिए लिखवाया था और वह मेरी पहली कहानी थी, इसलिए उन्होंने उसे सुधारने-सँवारने में अच्छी-खासी मेहनत की थी।

इस तरह न जाने कितने नए लेखक उन्होंने बनाए होंगे, उन्हें प्रोत्साहित किया होगा। उसके बाद से तो वे मेरे पीछे ही पड़े रहते। अब तो बहुत दिन हो गए, कोई कहानी लिखनी चाहिए—यह उनका तकाजा करने का तरीका होता था। हर महीने कोई न कोई कहानी माँग लेते। बड़ी मुश्किल। खैर, जैसे-तैसे जोड़-तोड़ करके कहानी बना देता, वह ‘नंदन’ में छप भी जाती। इस तरह बच्चों के लिए लिखने का सिलसिला बना।

फिर तीनेक साल बाद एक दिन उन्होंने पूछा कि अब तो बीस-बाईस कहानियाँ हो गई होंगी? मैं हैरान। मैंने तो गिनी नहीं थीं कि कितनी कहानियाँ अब तक लिख चुका हूँ। अपनी छपी रचनाओं को सँभालकर रखने की आदत कभी रही नहीं, पर उनकी फोटोकॉपी थी। घर आकर देखा, तो सचमुच बीस के करीब कहानियाँ थीं। हैरान हुआ कि मनु जी को इस बात का अंदाजा था कि इतनी कहानियाँ लिख चुका हूँ। उन्हें बताया कि हाँ, बीस के करीब हैं। उन्होंने कहा कि एक संकलन तैयार कर दीजिए, एक प्रकाशक माँग रहा है।

मैं सारा कुछ उठाकर उन्हें दे आया। उन्होंने उन कहानियों को क्रम दिया, उन्होंने ही संग्रह का नाम दिया और प्रकाशक को दे आए। इस तरह आत्माराम एंड संस से मेरी पहली किताब छपी, ‘शेरसिंह को मिली कहानी’ नाम से। 
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मनु जी पूर्णकालिक रचनाकार हैं। किताबें ही उनका ओढ़ना-बिछौना हैं। बस, साहित्य में रमे रहने वाले। वे हर चीज में कोई न कोई रचना तलाश लेते हैं। उनका अनुभव-संसार बहुत विशाल है। स्मृति तो गजब की है। इतनी अद्भुत कि वे किसी का इंटरव्यू करके आते हैं और बिना किसी रिकार्डर की मदद के, बिना कुछ नोट किए, घर आकर पूरी की पूरी बातचीत जस का तस उतार देते हैं।

उन्हें याद रहता है कि किसने किस किताब में क्या बात लिखी है। आप विषय बता दें, तो वे उससे संबंधित दस बातें, दस किताबों का संदर्भ वे दे देंगे। इसलिए कई बार जब कोई किसी शोध आदि के लिए, खासकर बाल साहित्य पर मुझसे कोई जानकारी लेना चाहता है, तो मैं चुपके से उसे मनु जी का नंबर दे देता हूँ। हो सकता है, कुछ लोग उनसे संपर्क करते होंगे, कुछ नहीं भी करते होंगे। जो करते होंगे, निस्संदेह बहुत कुछ पाते होंगे। यह तो तय है कि वे उन्हें कुछ रचनात्मक लेखन करने को भी उकसाते होंगे।

वे धुन के पक्के हैं। एक बार जो ठान लिया, बस रात-दिन उसी में लग जाते हैं। पहले वे कविताएँ लिखते थे, कहानियाँ और उपन्यास तो लिखे ही। फिर साक्षात्कार की धुन चढ़ी तो ढेर सारे साक्षात्कार ले डाले। उनके साक्षात्कार लेने का तरीका अखबारी नहीं होता। कई-कई बैठकें करके बातचीत का सिलसिला बनाए रखना और जब तक पूरी तरह संतुष्ट न हो जाएँ, बातचीत करते रहना। इसलिए उनके साक्षात्कार बहुत लंबे हैं और कई तो पूरी किताब के आकार के हैं।

देवेंद्र सत्यार्थी और विष्णु खरे से उनकी बातचीत ऐसी ही है। देवेंद्र सत्यार्थी से प्रभावित हुए, तो उन्हें पूरी तरह खँगाल मारा। उनके व्यक्तित्व का हर पहलू सामने ले आए। उन पर लगातार लिखते रहे। विष्णु खरे से कई दिन तक लगातार बात करते रहे और फिर करीब छह सौ पृष्ठों की किताब तैयार कर दी। विष्णु खरे जैसे कुछ सख्त और तुनकमिजाज माने जाने वाले रचनाकार को जब वे इतनी देर साधकर बातचीत के लिए बिठा सके, तो निस्संदेह यह मनु जी के व्यक्तित्व का ही प्रभाव था।

दरअसल, रचनाकारों से उनका संपर्क रस्मी या महज लेखक बिरादरी का होने के नाते नहीं बनता। वे जिनके संपर्क में आते हैं, उन्हें अपना बना लेते और उनके हो जाते हैं। इस तरह मनु जी ने अपना एक विशाल लेखक परिवार बनाया है, जिसके हर सदस्य का सुख-दुख उनका अपना भी सुख-दुख होता है। किसी की उपलब्धि पर प्रसन्न होते हैं तो उनके रोम-रोम में वह प्रसन्नता प्रस्फुटित होने लगती है। किसी के दुख से दुखी होते हैं, तो दुख उनकी आँखों से झरने लगता है। जैसे लगता है, वह उन्हीं के साथ घटित हुआ है। ऐसी करुणा कम लोगों में देखने को मिलती है।
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वे लंबे समय से फरीदाबाद में रहते हैं। नौकरी करते थे दिल्ली के कनॉट प्लेस में कस्तूरबा गांधी रोड पर, हिंदुस्तान टाइम्स कार्यालय में। तब मेट्रो और बसों की इतनी सुविधा नहीं थी। दिल्ली वालों को फरीदाबाद जाने के बारे में सोचना पड़ता था। पर मनु जी वहाँ से रोज आते-जाते थे।

उनके घर से फरीदाबाद का रेलवे स्टेशन खासा दूर है। सुबह-सवेरे स्टेशन जाना और फिर ट्रेन पकड़कर दिल्ली आना। शिवाजी ब्रिज स्टेशन पर उतरकर दफ्तर पहुँचना और समय पर पहुँचना, साधारण काम नहीं था। पर वे पूरी नौकरी आते-जाते रहे। शाम को थककर देर रात तक घर पहुँचना। ऐसे में हैरानी की बात है कि वे कैसे इतना कुछ लिख-पढ़ लेते थे। तो, इसका एक तरीका उन्होंने निकाला था। रास्ते में भी आते-जाते वे पढ़ते रहते थे। बैठने को सीट मिले न मिले, वे भीड़ की रेलम-पेल, धक्का-मुक्की में भी खड़े-खड़े किताबें पढ़ते रहते थे। सुबह चार बजे जाग जाना और फिर लिखना-पढ़ना करना, फिर तैयार होकर दफ्तर पहुँचना। इस तरह उन्होंने अपनी दिनचर्या बना रखी थी।

वे पंजाब के एक कॉलेज की नौकरी छोड़कर दिल्ली आए थे और पत्रकारिता करने लगे थे। मगर दिल्ली ने उन्हें खूब रगड़ा। दिल्ली को नरम चारा मिल जाए, तो वह उसे इसी तरह चबाती है। मगर मनु जी ने भी दिल्ली को खूब छकाया। उन्होंने उसे खुद को चबाने नहीं दिया। वे उसके दाँत खट्टे करने में लगे रहे। आने-जाने, रहने और दफ्तर की तकलीफों को कभी सिर पर चढ़ने ही नहीं दिया। दफ्तरी तनाव कम न थे, पर वे उन्हें झटककर दूर करते और किताब में सिर गोत लेते रहे। बड़ी गाड़ी, बड़ा घर, रुतबा वगैरह की आकांक्षा कभी पाली नहीं। किताबों का शौक पाले रहे, इसलिए दिल कमजोर नहीं हुआ, ईमान डोला नहीं और इस तरह दिल्ली की रगड़-घिस्स से वे ऊबे-थके नहीं। और मजबूत होते गए।

इस संघर्ष में उनका साथ दिया उनकी पत्नी सुनीता जी ने। दिल्ली की रेलम-पेल में उन्हें जब-जब कहीं चोट लगती रही, वे उस पर भावनात्मक मरहम लगाती रहीं और शाबाशी देती रहीं कि ऐसी चोट से क्या घबराना, ऐसी चोटें तो लगती रहती हैं, उठो, चलो। शायद सुनीता जी ऐसी न होतीं, तो मनु जी कहीं कमजोर जरूर पड़ गए होते, शायद दिल्ली के दाँत उन्हें चबाने में कुछ हद तक कामयाब भी हो गए होते। इसी तरह उनकी दोनों बच्चियाँ ऋचा और नन्ही ने उन्हें सँभाले रखा।
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उनके पास इन तमाम संघर्षों के इतने सारे खट्टे-मीठे, कड़वे अनुभव हैं कि उनके भीतर से बार-बार फूट-फूट पड़ना चाहते हैं। मनु जी मूलतः कथाकार हैं, इसलिए उनके अनुभव कथा के रूप में उतरते रहते हैं। पर उन्होंने अपने को सिर्फ कथा विधा तक सीमित नहीं रखा है। वे साहित्य के उन तमाम अनछुए या कमजोर पक्षों को समृद्ध करना चाहते हैं, जिन्हें या तो जान-बूझकर नजरअंदाज किया गया या अपेक्षित महत्त्व नहीं मिला है। वे चाहते तो कथा साहित्य तक अपने को सीमित रख सकते थे। उनके पास कथाओं की कमी नहीं है, पर जब उन्हें लगा कि साहित्यिक साक्षात्कार विधा की धारा सूखने लगी है, पत्रकारीय साक्षात्कारों के ताल-तलैया ही ज्यादा भरे-भरे दिखते हैं, तो उन्होंने लंबे साक्षात्कार लिए।

फिर उन्हें लगा कि बाल साहित्य पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता, उसे दोयम दर्जे का माना जाता है, तो वे उसका महत्त्व स्थापित करने में जुट गए। मुख्यधारा कविता-कहानी को विश्राम दे दिया। न सिर्फ बच्चों के लिए कविता-कहानियाँ लिखने लगे, बल्कि बाल साहित्य का इतिहास लिखने की भी ठानी। पहले बाल कविता का इतिहास लिखा, फिर बाल साहित्य का इतिहास। साहित्य का इतिहास लिखना कितना श्रमसाध्य काम है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। शुद्ध क्लर्की वाला काम है। किताबों का क्रम तैयार करना, उन्हें कालखंड के हिसाब से सहेजते जाना। और जब यह काम कोई रचनात्मक व्यक्ति करने की ठाने, तो उसकी मुश्किलें कई गुना बढ़ जाती हैं।

पर मनु जी ने उस ऊबाऊपन से बचने का रास्ता निकाला और बाल साहित्य के इतिहास को एक रचनात्मक आयाम दिया। जिज्ञासु विद्यार्थी की तरह बाल साहित्य की तमाम किताबें जुटाते, पढ़ते, उन पर नोट्स लेते रहे और फिर इतिहास रच दिया। ऐसे समय में, जब इतिहास लिखने का बीड़ा दो-चार लोग मिलकर भी उठाने से डरते हैं, मनु जी ने अकेले वह काम किया। हैरानी होती है, उनकी लगन और मेहनत देखकर।

मनु जी के लेखन का एक बड़ा गुण है रमकर लिखना। वे बड़े इत्मिनान से लिखते हैं। कोई जल्दी नहीं अंत पर पहुँचने की। हर घटना को खूब विस्तार से आकार देते हैं, उसके हर पल को उकेरना चाहते हैं। उसके हर रंग-रेशे को उभारना चाहते हैं। यह गुण कम लोगों में है। ज्यादातर लोगों को फटाफट निष्कर्ष पर पहुँचने की जल्दी होती है। मगर मनु जी रचना को उसका स्वाभाविक आकार देते हैं। उसे बहने देते हैं, जहाँ तक बह सकती है। इस तरह उनकी रचनाओं की कद-काठी अपेक्षाकृत बड़ी होती है।

इतने व्यापक अनुभव और पढ़ाई-लिखाई के बावजूद उनमें जिज्ञासु भाव बना रहता है। हर समय वे एक प्रकार के कुतूहल से भरे होते हैं। ज्ञान से उनकी गर्दन झुकी या अकड़ी नहीं है, चेहरे पर दर्प नहीं पसरा है। जिज्ञासु भाव ने उन्हें कोमल और सरल बनाए रखा है। एक नन्हे बच्चे से भी वे घंटों बहुत कुछ जानने-समझने का प्रयास करते देखे जा सकते हैं। बच्चा समझता है कि अंकल तो बिल्कुल बुद्धू हैं, उन्हें कितनी सारी बातें नहीं पता, पर वास्तव में मनु जी का यह गुण है कि वे हर किसी को अपने से ऊपर उठने देते हैं। उसे बौना साबित करने का प्रयास नहीं करते। उसके छोटेपन का अहसास नहीं होने देते। 
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मेरे संग-साथ के अनेक अनुभव हैं। वे रास्ता चलते किसी साधारण से व्यक्ति से भी रुककर इस तरह तन्मयता से बात करने लगेंगे और फिर भूल जाएँगे कि उन्हें कहीं जाना भी है या उनके साथ चल रहे व्यक्ति को कहीं पहुँचने की जल्दी है। वे जब तक उस व्यक्ति से हिल-मिलकर पूरी जानकारी नहीं ले लेंगे, आगे नहीं बढ़ेंगे। यही वजह है कि वे आज भी अपने पड़ोस की मजदूर बस्ती के बच्चों को पढ़ाने निकल पड़ते हैं। पत्रकारिता में रिटायरमेंट के बाद किल्लत में जीवन गुजारना पड़ता है, पैसों की तंगी बनी रहती है, पर उन्होंने इसकी परवाह नहीं की। पुरस्कार में मिले पैसे गरीब बस्ती के बच्चों की पढ़ाई पर खर्च कर देते हैं।

मुझसे उनका स्नेह कुछ इस तरह का है कि कई बार जब वे कुछ लिख रहे होते हैं, तो मुझसे चर्चा करेंगे, कुछ जानने, राय लेने की गरज से भी। जबकि वे जानते होंगे कि मैं उन्हें राय देने की हैसियत नहीं रखता। इसी तरह दूसरे लोगों से भी जिज्ञासु भाव से पूछने-जानने का प्रयास करते होंगे। न जाने कितने लोगों को उन्होंने सराहा होगा, लिखने को प्रेरित किया होगा, शाबाशी दी होगी। मुझे तो बीच-बीच में फोन करके किसी मुनीम की तरह पूछ लेते हैं कि आजकल क्या लिख रहे हैं। मैं कहूँगा कि कुछ नहीं, तो वे तरह-तरह से उकसाएँगे। शायद ऐसा कोई इंजेक्शन होता, जिसे लगाने से मैं लिखने लगता, तो वे मुझे लगाते ही रहते। ऐसा बहुतों के साथ करते हैं। लिखने को उकसाना और फिर उसके लिखे को पढ़कर राय देना, आज कौन करता है?

इसी दिल्ली में बहुत सारे ऐसे रचनाकार मिल जाएँगे, जो चार कविताएँ-कहानियाँ छप जाएँ और कुछ सराहना भी मिल जाए, तो वे अकड़े फिरने लगते हैं। दूसरों को तो पढ़ना ही छोड़ देते हैं। उनका समाज सिर्फ उन्हीं लोगों तक सिमटकर रह जाता है, जो उनकी रचनाएँ पढ़ते और सराहते हैं। मगर मनु जी बिल्कुल नए रचनाकारों को भी कुछ इस तरह सराहते और प्रोत्साहित करते हैं कि वह लिखने को दोगुनी ऊर्जा से भर उठता है। केवल मुँहदेखी या प्रशंसा कर देने भर के लिए नहीं, बल्कि उनकी रचनाओं को पूरा पढ़ने के बाद, उसके एक-एक पहलू पर बात करते हैं।

वे खुद चौबीस में से कम से कम चौदह घंटे पढ़ने-लिखने में ही लगे रहते हैं। उनके पास अपनी कई योजनाएँ हैं, फिर भी कोई रचनाकार फोन करता और उनसे अपनी रचना पढ़कर राय देने को कहता है, तो कभी कोई बहाना, कोई आनाकानी नहीं करते। एक-दो दिन का समय जरूर माँग लेते हैं। फिर पढ़ने के बाद खुद फोन करते हैं और विस्तार से उसकी रचना पर बात करते हैं। जहाँ कुछ कमियाँ हैं, उन्हें भी रेखांकित करते हैं। इस तरह मनु जी नए रचनाकारों के लिए एक संस्थान की तरह हैं। न जाने कितने रचनाकारों ने उनसे कितना कुछ सीखा होगा। मैंने तो बहुत कुछ सीखा है। जब भी कुछ लिखता हूँ, उनको न पढ़ा लूँ, तब तक छपने को नहीं भेजता।

उनमें रचनात्मकता सतत बहती रहती है। साहित्य के अलावा शायद वे कुछ और सोचते ही नहीं। समाज की सेवा उन्हें साहित्य के जरिए ही संभव जान पड़ती है। उसी से वे रस खींचते हैं, ताकत पाते हैं। नहीं तो उनके जीवन में कड़वे अनुभवों की कमी नहीं है। दुत्कार और अवहेलना भी कम नहीं मिली है, मगर उन पर उन्होंने ध्यान नहीं दिया। जो कुछ श्रेष्ठ मिला, उसी को अपना बनाया। अवहेलित करने वालों के श्रेष्ठ को ही याद करते रहे। सतत लिखने-पढ़ने और लंबी-लंबी बैठकों की वजह से उनके स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता रहा, पर उसकी भी परवाह नहीं। कभी किसी नकारात्मक चीज को उन्होंने अपने ऊपर चिपकने नहीं दिया, फटकने नहीं दिया। इसलिए उनकी ऊर्जा बनी रही।

अब वे अपनी आत्मकथा लिख रहे हैं। पहला खंड प्रकाशित होकर आ चुका है, अगले दो खंड छपकर आने वाले हैं। पहले खंड में उनके बचपन और किशोरावस्था की बातें हैं, बाकी दो खंड जीवन के अगले दो पड़ावों पर हैं। उम्मीद है, उनके जीवन से जुड़ी बहुत सारी बातें भी हमें पढ़ने को मिलेंगी, जिनके बारे में उन्होंने कभी किसी से नहीं कहा। उनके बचपन के प्रसंग बड़े मार्मिक हैं। संघर्ष भरे दिन थे वे। परिवार बँटवारे के बाद भरा-पूरा, समृद्ध साम्राज्य छोड़कर भारत आ गया था और फिर शिकोहाबाद में फिर से अपनी जड़ें रोपी थी। उसमें बालक प्रकाश मनु (चंद्रप्रकाश विग) पला-बढ़ा और रचनात्मक आयाम गह सका था।

उसके बाद का जीवन भी कई उतार-चढ़ावों से गुजरा है। वह सब अगले खंडों में आएगा, तो मनु जी के जीवन की कई अनजानी परतें खुलेंगी।

हमें गर्व है कि हम उनके सान्निध्य में हैं।

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