गर्मी, कोविड, और चुनाव

एंग्लो-स्वीडिश दवा निर्माता एस्ट्राजेनेका ने ब्रिटेन की एक अदालत में स्वीकार किया कि 'अति दुर्लभ स्थितियों में' उनके कोविड-19 वैक्सीन से थ्रोम्बोसाइटोपेनिया सिंड्रोम (टीटीएस) की समस्या हो सकती है जिससे शरीर में खून में थक्के बनते हैं और प्लेटलेट्स की संख्या भी गिर जाती है।

मई का आरम्भ हो चुका है। चढ़ती गर्मी के मौसम में बढ़ते तापक्रम और खुश्की के मद्देनज़र आप सब से अनुरोध है कि खुद भी समुचित पानी पीते रहें और यथासम्भव पशु-पक्षियों के लिये भी पानी की व्यवस्था करें।

एक हालिया चर्चा में कुछ हिंदी शिक्षकों के बीच चर्चा चल रही थी कि गर्मी सही वर्तनी है या गरमी। गर्मी और सर्दी दोनों फ़ारसी के शब्द हैं। मूलभाषा के उच्चारण, और वर्तनी گرمی को उर्दू में भी यथावत ले लिया गया है। हर लिपि की सीमाएँ होती हैं, लेकिन देवनागरी की तुलना में उर्दू में मात्राएँ थोड़ी ढीली रह जाती हैं और इस कारण से लिखे शब्दों को अक्सर एकाधिक प्रकार से पढ़ा जा सकता है। ओ और औ लिखने में अंतर नहीं होता और न ही ए और ऐ में। ऐसे में कई बार वर्तनी और उच्चारण में भेद हो जाते हैं। इब्ने इंशा लिखित "उर्दू की आखिरी किताब" के इंतरनेट पर उपलब्ध ऑडियो में महाभारत के संदर्भ में कौरव को कौरू पढ़े जाने में कोई आश्चर्य नहीं होता। यद्यपि उर्दू में गर्मी को 'ग.र.मी' ( और सर्दी को 'स.र.दी') लिखा जाता है, मेरे विचार से देवनागरी में लिखते समय गरमी की अपेक्षा गर्मी बेहतर वर्तनी है। कुछ मित्र जब अंग्रेज़ी शब्द पार्टी (party) बोलते हैं, तो वह 'पार.टी' जैसा सुनाई देने के बजाय 'पा.रटी' जैसा सुनाई देता है। अंग्रेज़ी हमारी मातृभाषा नहीं है। यदि हम पारटी लिखा हुआ पढ़ते हैं तो उसे 'पा.रटी' या 'पार.टी' दोनों ही रूपों में पढ़ने की सम्भावना रहती है। जबकि पार्टी लिखने पर पा.रटी पढ़ने की आशंका निर्मूल हो जाती है। बचपन में एक मित्र राम जेठमलानी का नाम 'जेठ.मलानी' पढ़ने के बजाय 'जेठम.लानी' ही पढ़ते थे। पाकिस्तानी टीवी पर दो-टूक को हमेशा दोटोक कहते हुए सुनता हूँ। कुछ पुराने ऑनलाइन मित्र जिस जगह रहते हैं उसका नाम है अकलतरा। मैं जब भी यह नाम पढ़ता हूँ, सोचता हूँ कि यह जगह अक.लतरा है या अकल.तरा। लिपि की सीमाओं के कारण भ्रष्ट हुए कुछ शब्दों के ये ऐसे  उदाहरण हैं जिनसे मैं परिचित हूँ। गर्मी की वर्तनी की बात मामूली सी है, लेकिन काफ़ी कुछ लिखना पड़ा ताकि उन लोगों तक पहुँच सके जिन्हें सामान्य शब्द और उनकी सामान्य वर्तनियाँ इतनी परिचित लगती हैं कि वे लिखते-पढ़ते समय शब्द या ध्वनि से अपरिचित किसी व्यक्ति की कल्पना ही नहीं कर सकते। गर्मी पर वापस आयें तो - यदि हम गरमी लिखेंगे तो हिंदी-उर्दू से अपरिचित व्यक्तियों के लिये उसे 'ग.रमी' पढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है जबकि गर्मी लिखने में एक ही (सही) उच्चारण बनता है और दूसरे की गुंजाइश समाप्त हो जाती है। इसलिये मैं गर्मी ही लिखता हूँ। वर्तनी पर यह छोटा सा विचार यदि एक सम्भावित विचलन से बचा सकता है तो लिखते-पढ़ते समय उसपर ध्यान देने में कोई बुराई नहीं है। 
 
मौसम की गर्मी के अलावा इस समय भारत में और विदेश में रह रहे भारतीयों में संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र के  चुनावों की गर्मी भी है। एक अजीब तरह का ध्रुवीकरण दिखाई दे रहा है लगभग हर व्यक्ति किसी न किसी दल या नेता का बोर्ड उठाकर अपने नेता की प्रशंसा से पूर्ण सहमति की मांग करता दिख रहा है। ज़रा सी असहमति दिखाने वाले को धक्का मारकर दूसरे पाले में फेंका जा रहा है। एक समय था जब बुरे से बुरा व्यक्ति भी दूसरों का, असहमति का, मत-वैभिन्य का, और निरपेक्षता का सम्मान करता था। तब सही-ग़लत का विवेक था, जो तेज़ी से आज आज तूतू-मैंमैं में बदल रहा है। अच्छे भले शिक्षित, सम्पन्न और विद्वान व्यक्ति भी सोशल मीडिया पर अपने दल/नेता के पक्ष में और अन्यों के विरोध में आने वाले हर तर्क, पाठ, अफ़वाह, क्लिप आदि को आँख मूंदकर प्रसारित करने में लगे हुए हैं।

कोविड के टीकों के साइड एफ़ेक्ट की बात हो या बाबा रामदेव द्वारा कोविड सहित एलोपैथी में लाइलाज कई बीमारियों के जड़ से खात्मे के दावे हों, हर खबर, या अफ़वाह एक चुनावी हथियार बनकर रह गयी है। आज जहाँ सारा संसार श्वेत-श्याम नज़रिये को त्यागकर सर्व-स्वीकृति की ओर बढ़ रहा है, वहाँ वसुधैव-कुटुम्बकम की अवधारणा देने वाले भारत के आधुनिक, शिक्षित और डिजिटली-सक्षम वर्ग में एक लकीर खींचकर सारी दुनिया को मेरा-तेरा के दो खेमों में बाँटने की नयी प्रवृत्ति आश्चर्यचकित करती है। हार्ट अटैक, कार्डियक अरेस्ट, थ्रोम्बोसिस, सरदर्द, बदन दर्द आदि कोविड और उसके टीके से पहले भी होते थे। दवाओं और टीकों के अनचाहे साइडएफ़ेक्ट और रिएअक्शन कोविड के टीकों तक सीमित नहीं हैं। कोविड के टीके और लगभग अन्य सभी टीकों / दवाइयों के निर्माण और प्रयोग का मुख्य अंतर परिस्थितियों का है। जब कोविड अपने चरम पर था, और टीके तैयार नहीं थे तब मैं रोज़ाना किसी न किसी के अवसान का समाचार सुनता था। कभी किसी सहकर्मी के घर के बुज़ुर्ग, कभी बचपन का कोई मित्र, कभी कोई सहकर्मी। इन मृतकों में कितने ही मुझसे कहीं कमउम्र थे। संसार एक अद्वितीय संकट के दौर से गुज़र रहा था। कितनी बार मृतकों के अपने सगे भी शव छूने को तैयार नहीं थे। सरकारों, स्वास्थ्य संस्थानों, और दवा कम्पनियों पर तुरंत टीका बनाने के लिये अत्यधिक दबाव था और टीके के अभाव में हताशा में अनेक प्रकार के आड़े-टेढ़े सुझाव दिये जा रहे थे। महामारी से तो अनेक लोग मरे ही, कितने ही लोग अप्रामाणिक दवाओं से भी मरे हैं। ईरान में एल्कोहल से कोविड के इलाज की अफवाहें फैलीं तो इस्लामिक राज में एल्कोहल प्रतिबंधित होने और जनसामान्य में मिथाइल एल्कोहल और इथाइल एल्कोहल का अंतर स्पष्ट न होने के कारण कितने ही लोग स्पिरिट पीकर मरे। अमेरिका में भी गफ़लत में विषाक्त रसायन पीने से गिनी-चुनी मौतें हुई हैं। टीके के साइडएफ़ेक्ट्स की समुचित जाँच और उससे बचाव पर काम होना चाहिये लेकिन यह भी ध्यान रहे कि आज हमारे आस-पास के अनेक लोग केवल इसीलिये जीवित बच सके हैं कि उन्हें समय पर टीका मिल गया था। कोविड के विषय में पहले ही अनेक कन्सपायरेसी सिद्धांतों की भरमार है। इस महामारी और इसके किसी टीके के सीमित दुष्प्रभाव को किसी देश, दल या नेताविशेष के विरुद्ध चुनावी मुद्दा बनाना सही नहीं है।

आपका दिन शुभ हो, आपको अच्छा पढ़ने और सुनने को मिले, इसी आकांक्षा के साथ सेतु का यह अंक आपकी सेवा में समर्पित है। धन्यवाद!

विनीत,
सेतु, पिट्सबर्ग
30 अप्रैल 2024 ✍️

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