असग़र वजाहत की कहानियों में व्यंग्य का स्वरूप

नाज़िया परवीन

नाज़िया परवीन

शोधार्थी, हिंदी विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्विद्यालय अलीगढ़-202002

  व्यंग्य साहित्य की वह विधा है जो समाज में फैली विसंगतियों पर तीखी भाषा में प्रहार करता है। यह समाज में उत्पन्न समस्याओं को व्यक्त करता है। समाज एवं व्यक्ति के कुछ नैतिक मूल्य होते हैं,यदि कोई व्यक्ति इन नैतिक मूल्यों के विरुद्ध कार्य करता है तो व्यंग्यकार पर अपनी तीक्ष्ण शैली में प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। जो व्यंग्य का रूप धारण कर लेती है। जिसमें आक्रोश, करुणा आदि भावों का समावेश रहता है। व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में फैली विसंगतियों के कारण व्यंग्य की उत्पत्ति होती है। अतः व्यंग्य समाज में सुधार का कार्य करता है। जिसकी उद्देश्यता, गंभीरता, व्यापकता और सामाजिकता आदि की विशेषताएं हैं। व्यंग्य समाज और व्यक्ति के लिए आवश्यक है। व्यंग्यकार का दृष्टिकोण मूल्यपरक होता है। वह अपने युगीन परिवेश की सामाजिक, राजनीतिक एवं धार्मिक परिस्थितियों से प्रभावित होता है। सभी क्षेत्रों में फैली विसंगतियों पर दृष्टिपात करता है। व्यंग्य बौद्धिक एवं सूक्ष्म प्रक्रिया है जिसका प्रभाव दीर्घकालिक होता है।

असग़र वजाहत
 असग़र वजाहत ने साठ के दशक में कथालेखन आरंभ किया। उनकी पहली कहानी 'वह बिक गई' 1964 में प्रकाशित हुई। उनकी कहानियाँ 1968 तक आते-आते में 'धर्मयुग' पत्रिका में छपने लगीं। असग़र वजाहत ने नाटक, कहानी, उपन्यास, संस्मरण, निबंध और आख्यान आदि विधाओं में लेखन कार्य किया। किसी भी रचनाकार का महत्व ऐसी रचनाओं से होता है जो किसी विधा को नई गति और नया स्वर प्रदान करती हैं। साहित्यकार की सामाजिक चेतना जितनी प्रखर होगी व्यंग्य उतना ही तीक्ष्ण और प्रभावशाली होगा। असग़र वजाहत ने कहानी लेखन में दो प्रकार शैली अपनाई है लंबी कहानियाँ और दूसरी लघु कथाएँ जिसमें उन्होंने संवादात्मक एवं व्यंग्यात्मक शैली में अभिव्यक्ति की प्रदान की है। अतः उनकी यह शैली और अधिक प्रभावकारी सिद्ध हुई। अत: उनकी अधिकांश कहानियों में सामाजिक राजनीतिक और धार्मिक व्यंग्य परिलक्षित होता है।

 असग़र वजाहत ने 'केक', 'सारी तालीमात', 'होज वाज पापा’, 'तेरह सौ साल का बेबी कैमिल’, 'ज़ख्म’,'तख्ती' आदि लम्बी कहानियों में सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक व्यंग्य परिलक्षित होता है। केक' कहानी आम आदमी को आधार बनाकर लिखी गई है कहानी में उन्होंने आम आदमी की आर्थिक एवं सामाजिक हताशा को चित्रित किया है “अब क्या हो सकता है! पच्चीस साल तक प्रूफरीडरी के बाद अब और क्या कर सकता हूँ? सन् 1948 में दिल्ली आया था। अरे साब, डिफेंस कॉलोनी की जमीन तीन रुपये गज मेरे सामने बिकी है, जिसका दाम आज चार सौ है। निजामुद्दीन से ओखला तक जंगल था जंगल। कोई शरीफ आदमी रहने को तैयार ही नहीं होता था। अगर उस वक्त निजामुद्दीन में जमीन खरीद ली होती तो आज लखपति होता। लेकिन उस वक्त उतना पैसा नहीं था और आज…।”¹

 'सारी तालीमात' कहानी में साम्प्रदायिक दंगे के पश्चात् साम्प्रदायिकता विरोधी कमेटियों के नाम पर चंदा वसूलने वाले धार्मिक पाखंडी लोगों पर व्यंग्य किया है। अत: जो लोग धार्मिक सुरक्षा के नाम पर आमजन को आधार बनाकर अपने स्वार्थों की पूर्ति करते हैं- “हाजीजी, आप हाथ रख दें तो देखिए क्या नहीं कर दिखाते।” हाजीजी एक हजार रुपया चंदा देते हैं और जुग्गन की पार्टी चली जाती है। वैसे हाजी जी को एक हजार चंदा देने की कोई जरूरत नहीं थी, क्योंकि उनका कारखाना कासिमपुरे के बीचोबीच है। कारीगर भी सौ फीसदी मुसलमान हैं। हाजी जी हिंदुओं को रखते ही नहीं। कहते हैं, कौम की खिदमत करने का मौका खुदा ने दिया है तो उसे क्यों छोड़ूँ? मुसलमान कारीगर भी हाजी जी के कारखाने में काम करना चाहते हैं। जान प्यारी है, पैसा नहीं।”²

 यूरोपीय सभ्यता में वृद्धों की स्थिति को व्याख्यायित करती उनकी कहानी होज वाज पापा' है। विकसित देश में आर्थिक स्थिति को चिह्नित किया है अस्पताल में भर्ती वृद्ध पिता वहाँ मिलने वाले भोजन को बचाकर अपनी बेटी को देते हैं। जो रोज मिलने आती है। “पापा की लड़की आई तो मैं अपने विजिटर को लेकर बाहर आ गया। दरअसल अब मैं पापा और उनकी लड़की को बातचीत करने के लिए एकांत देने के पक्ष में हो गया था। कारण यह है कि एक दिन मैंने कनखियों से देखा था कि पापा अपनी लड़की को चुपचाप अस्पताल का खाना दे रहे हैं। लड़की इधर-उधर देखकर खाना अपने बैग में रख रही है। अस्पताल में रोटी 'चीज' और दीगर चीजें बहुत मिलती थीं। उन्हीं में से पापा कुछ बचा कर रख लेते थे और शाम को अपनी लड़की को दे देते थे। इसलिए अब जब उनकी लड़की आती थी तो मैं कमरे से बाहर आ जाता था।”³

 साम्प्रदायिक तनाव को व्यक्त करती 'जख्म' कहानी में उन्होंने सांप्रदायिक दंगों के पश्चात शांति व्यवस्था को बनाए रखने के लिए राजनीतिक लोग अपने स्वार्थों को पूरा करने के लिए सांप्रदायिक विरोधी सम्मेलन करते हैं। सम्मेलन में सांप्रदायिकता की समस्या का विश्लेषण किया गया और उसके खतरनाक परिणामों की ओर संकेत किया गया लेकिन उसमें उन लोगों का नाम नहीं लिए जाते जो लोग दंगा करवाते हैं। “मुख्तार ने मेरे कान में कहा, “सरदार जी दंगा कराने वालों के नाम क्यों नहीं ले रहे है? बच्चा-बच्चा जानता है दंगा किसने कराया था।”
 मैंने कहा, “बचपन वाली बातें न करो। दंगा कराने वालों के नाम ले लिए तो वे लोग इन पर मुकदमा ठोक देंगे।”
 “तो मुकदमे के डर से सच बात ना कही जाये?
 “तुम आदर्शवादी हो। आइडियलिस्ट…।”
 “ये क्या होता है?” मुख्तार बोला। 
 “अरे यार, इनका मकसद दंगा कराने वालों के नाम गिनाना तो है नहीं।”⁴

 'तेरह सौ साल का बेबी कैमिल' कहानी में उन्होंने धार्मिक कट्टरता पर व्यंग्य किया है। कुछ लोग धार्मिक नियमों का सहारा लेकर स्त्रियों का शोषण करते हैं। “एक दिन पता चला कि हक्कानी ने अपनी पहली पत्नी को मारपीट कर घर से निकाल दिया है। बच्चों को, जिनमें एक चौदह साल का लड़का और दो लड़कियाँ हैं, 'हक्कानी' ने रख लिया है। कालोनी की औरतों ने चंदा करके 'हक्कानी' की पहली पत्नी को मायके भिजवा दिया। एक दिन यह पता चला कि 'हक्कानी' का लड़का दिल्ली भाग गया है और वहाँ रिक्शा चलाता है। लोगों ने इसके बारे में 'हक्कानी' से बात की तो 'हक्कानी' ने बड़े गर्व से कहा कि उनका लड़का रिक्शा चलाता है तो यह बहुत गौरवपूर्ण है। क्योंकि इस्लाम मेहनत करने को बड़ा ऊँचा दर्जा देता है।”⁵

 असग़र वजाहत ने लघु कथाओं में संवादों के माध्यम से स्वतंत्रता के पश्चात मोहभंग, अपातकाल, आमजन के शोषण, राजनीतिक विचारधारा, मीडिया, राजनेताओं के चरित्र, सामाजिक सम्मेलन, भ्रष्टाचार, धार्मिक पाखंड और सांप्रदायिकता आदि अनेक समस्याओं को व्यंग्यात्मक शैली में अभिव्यक्त किया है। आपातकाल एवं भ्रष्टाचार आदि मुद्दों को आधार बनाकर कई कहानियाँ लिखी 'कुत्ते', 'शेर', 'डंडा', 'ज-1' आदि लघुकथाएं आपातकाल के वातावरण को अभिव्यक्त करती हैं। “अगले दिन मैंने कुत्तों के एक जुलूस को देखा जो कभी हंसते गाते थे और कभी-कभी विरोध में चीखते चिल्लाते थे। उनकी बड़ी-बड़ी जीभे निकली हुई थीं। पर दुम सब दवाये थे। कुत्तों को यह जुलूस शेर के मुंह की तरफ बढ़ रहा था। मैंने चीखकर कुत्तों को रोकना चाहा, पर वह नहीं रुके और उन्होंने मेरी बात अनसुनी कर दी। वे सीधे शेर के मुंह में चले गए।”⁶ असग़र वजाहत ने संवादों के जरिए व्यंग्यात्मक शैली में 'गुरु चेला संवाद', 'मुख्यमंत्री और डेमोक्रेसिया', 'शाह आलम कैंप की रूहें', 'मुश्किल काम' आदि लघु कथाएं लिखी हैं। धार्मिक खोखलेपन पर प्रहार करती हैं। किस तरह कुछ पाखंडी लोग अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए साम्प्रदायिक विचारधारा से उनके दृष्टिकोण को परिवर्तित करते हैं। गुरु चेला संवाद कहानी में साम्प्रदायिक दृष्टिकोण को इस प्रकार चित्रित किया है- 
“गुरु: शिष्य मुसलमान से घृणा किया करो।
चेला: क्यों गुरुदेव?
गुरु: क्योंकि वे गंदे, अनपढ़ और अत्याचारी होते हैं 
चेला: समझ गया गुरुदेव, आपका मतलब है, गंदे, अनपढ़ और अत्याचारी लोगों से घृणा करनी चाहिए।
गुरु: नहीं… नहीं। ये नहीं…दरअसल मुसलमानों से इसलिए घृणा करनी चाहिए क्योंकि वह बड़े कट्टर धार्मिक होते हैं।
चेला: मैं कट्टर धार्मिक लोगों से घृणा करता हूँ गुरुदेव?
गुरु: नहीं… नहीं। तुम समझ नहीं…वास्तव में मुसलमान से घृणा इसलिए करनी चाहिए कि उन्होंने हमारे ऊपर शासन किया था।
चेला: तब तो ईसाइयों से भी घृणा करनी चाहिए। 
गुरु: नहीं…नहीं, शिष्य…मुसलमानों से घृणा करने का मुख्य कारण है कि उन्होंने देश का बँटवारा कराया था।
चेला: तो देश का बँटवारा करने वालों से घृणा करनी चाहिए?
गुरु: हाँ… बिल्कुल। देश को बांटने वालों से घृणा करनी चाहिए। 
चेला: और देशवासियों को बांटने वालों से क्या करना चाहिए?”⁷

 किसी भी धार्मिक समुदाय के व्यक्तियों में किसी भी समुदाय के प्रति नकारात्मक धार्मिक दृष्टिकोण को असग़र वजाहत ने यथार्थ धरातल पर चित्रित किया है। अतः इस प्रकार के मानवीय संवेदना से संयुक्त अनेक प्रसंग उनकी कहानियों में उपलब्ध हैं। असग़र वजाहत के कथा लेखन के केंद्र में आमजन है जिसकी आवश्यकताओं विफलताओं और शोषण को उन्होंने अपनी कहानियों के माध्यम से चित्रित किया है। ' शाह आलम कैंप की रूहें' कहानी में हिंसा के दृश्य को इस प्रकार चित्रित किया है - “शाह आलम कैंप में आधी रात के बाद बच्चे की रुह…आती है बच्चा रात में चमकता हुआ जुगनू जैसा लगता है … इधर-उधर उड़ता फिरता है… पूरे कैंप में दौड़ा-दौड़ा फिरता है… उछलता कूदता है…शरारतें करता है… तुतलाता नहीं… साफ-साफ बोलता है… माँ के कपड़ों से लिपटा रहता है।
 “तुम इतने खुश क्यों रहते हो बच्चे?
 “तुम्हें नहीं मालूम…यह तो सब जानते हैं।”
 “क्या?”
 “यही कि मैं सबूत हूँ।”
 “सबूत? किसका सबूत।”
 “किसकी बहादुरी का सबूत हो।”
 “उनकी जिन्होंने मेरी माँ का पेट फाड़ कर मुझे निकाला था और मेरे दो टुकड़े कर दिए थे।”⁸

 असग़र वजाहत की कहानियों में राजनीतिक व्यंग्य भी अधिकाशत: परिलक्षित होता है। उन्होंने युगीन राजनीतिक परिस्थितियों, सम्मेलन और आंदोलनों में नेताओं की भूमिका आदि पर तीक्ष्ण शैली में व्यंग्य किया है। “मुख्यमंत्री कोसी नदी में से निकले। उनके एक हाथ में पूड़ियों का थाल और दूसरे हाथ में मिठाइयों का थाल है।
 मुख्यमंत्री ने आवाज लगाई, “आइए जो-जो हमारे वोटर हैं, भोजन कर लीजिए।”सब लोग भोजन पर टूट पड़े। थाल सफाचट हो गए।
 कुछ लोगों ने मुख्यमंत्री से कहा, “आपके विरोधियों ने भी भोजन कर लिया है।”
 मुख्यमंत्री ने विरोधियों को पकड़ा। उनके गले में हाथ डाला और गिन-गिन कर पूड़ी और और एक-एक मिठाई का टुकड़ा निकाल लिया।
 फिर मुखमंत्री बोला, “जाइए उनका खाइए जिन्हें वोट देते हैं…अरे ये तो डेमोक्रेसिया है भइया।”⁹
 राजनीति में नेता चुनाव के समय वोट के लिए जनता से वादे कर लेते हैं और बाद में सब भूल जाते हैं। अत: असग़र वजाहत ने राजनीति के अनेक प्रसंगों को आधार बनाया है। चुनावी सभाओं में नेताओं की भाषणबाजी और लोकप्रियता को चित्रित किया। “तालियों की आवाज कम है…आप लोगों से अनुरोध है कि अपने मुर्दों को भी ले आए ताकि अधिक लोग तालियाँ बजा सकें। 
 मुर्दे भी आ गए और तालियाँ बजाने लगे। जानवर और पेड़ पौधे भी तालियाँ बजाएँ।
 और वे भी तालियाँ बजाने लगे। 
 प्रधानमंत्री ने इतना आत्मीय, संवेदनशील और भावभीना भाषण दिया कि उनकी आँखों में आँसू आ गए। 
 कृषि मंत्री ने कहा- आप लोग चिंता ने करें हम कुछ ऐसा करने जा रहे हैं कि खेतों में हैमबर्गर और चिप्स फला करेंगे… कारें उगेंगी, टी.वी. और फ्रिज पैदा होंगे…। 
 स्वास्थ्य मंत्री ने कहा- हम यहाँ दस सुपर स्पेशलटी अस्पताल खोलेंगे जहाँ आप ही लोगों को रोजगार मिलेगा…आप ही मरीज होंगे और आप ही डॉक्टर होंगे…आपका ही ऑपरेशन होगा और आप ही ऑपरेशन करेंगे…।”¹⁰ इस प्रकार नेता आमजन के ही लिए नियम बनाकर उनका ही शोषण करते हैं।

 असग़र वजाहत ने कहानियों में लोकतांत्रिक खतरों, साम्प्रदायिकता की समास्याओं को बहुत ही गंभीरता के साथ रेखांकित किया है। युगीन परिवेश की आधिकांश विसंगतियों को व्यंग्यात्मक शैली में हमारे सामने प्रस्तुत किया है। उनका यह योगदान साहित्य में बहुत ही प्रभावशाली है।

संदर्भ ग्रंथ सूची 
1- संचयन- असगर वजाहत, नाटक /कहानियाँ, सम्पादक पल्लव, अनन्य प्रकाशन दिल्ली संस्करण 2018, पृष्ठ - 171
2- वही, पृष्ठ - 185।
3- वही, पृष्ठ - 260।
4- वही, पृष्ठ - 231।
5- वही, पृष्ठ - 337।
6- वही, पृष्ठ - 192।
7- वही, पृष्ठ - 297।
8- वही, पृष्ठ - 343।
9- वही, पृष्ठ - 374।
10- वही, पृष्ठ - 231।

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