दिनकर का काव्य: कल, आज और कल

डॉ. अंगदकुमार सिंह

अंगदकुमार सिंह

असिस्टेण्ट प्रोफ़सर (हिन्दी), जवाहरलाल नेहरू पी.जी. कॉलेज, बाँसगाँव, गोरखपुर (उ.प्र.), भारत - 273403


शोधपत्र सार:
‘दिनकर’ छायावाद की उत्तरपीठ पर अवतरित होने वाले ऐसे कवि हैं जिन्होंने अपनी प्रतिभा से हिन्दी काव्याकाश को ‘सूर्य’ समान प्रकाशित किया। उनकी कविताएँ राष्ट्रीयता की शंखनाद करती हुई वसुधैवकुटुम्बकम् की भावना से ओत-प्रोत होकर कर्मण्येवाधिकारस्ते का पथ प्रशस्त करती हैं। उनका जन्म ऐसे समय में हुआ जब भारत गु़लामी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। वे अपने भावों का निर्माण प्राचीन परम्परा को त्यागकर, नवीन संस्कृति अपनाकर समाज से ख़ुराक लेकर करते हैं। उनकी कविताएँ जनकल्याण की बात करती नज़र आती हैं तो जनपीड़ा व्यक्त करने से भी पीछे नहीं हटती। इतना ही नहीं उनके काव्य में हृदय भग्न कर देने की अपार गर्जना है और निर्जीव में प्राण फूँकने की क्षमता भी। दिनकर राष्ट्रीय जागरण के स्वर को जन-जन तक पहुँचाने के लिए अपनी कविता को हथियार बनाकर प्रयोग करते हैं। इसीलिए उनकी कविता स्वर्णयुग का प्रतिनिधित्त्व करती है। रामधारी सिंह के काव्य को पढ़कर कोई भी सहृदय पाठक प्रेरणा से भर जाता है और समाजहित के लिए उत्साहित हो जाता है तथा समाज में पनप रहे तमाम पाखण्ड, धोखा, अत्याचार, अनाचार का विरोध करने को तत्पर दिखायी देने लगता है। दिनकर की कविता जलते देश में अग्निशमन है। उनकी राष्ट्रीयता की भावना विश्वकल्याण से लबरेज़ हैं।

कीवर्ड: छायावाद, ग़ुलामी, संस्कृति, किसान, मजदूर, जनता, पूँजीपति, विश्वकल्याण।

दिनकर
साहित्य-समीक्षा:
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ छायावाद की उत्तरपीठ पर अवतरित होने वाले ऐसे कवि हैं जिन्होंने अपनी प्रतिभा से हिन्दी काव्याकाश को ‘सूर्य’ समान प्रकाशित किया। उनकी कविताओं में अग्नि की धधकती चिंगारी है तो विराटता की हुंकार भी, विप्लव का शंखनाद है तो क्रान्ति का आह्वान भी, आक्रोश है तो ओज भी। ये सभी विशेषताएँ मानव में स्वाभिमान की भावना का संचार करती हुई अपनी मातृभूमि और धर्मभूमि के लिए हँसते हुए गर्व के साथ प्राणों की बलि देने के लिए प्रेरणा देती हैं। उनकी ज़्यादातर कविताएँ राष्ट्रीयता की शंखनाद करती हुई बसुधैवकुटुम्बकम् की भावना से ओत-प्रोत होकर कर्मण्येवाधिकारस्ते का पथ प्रशस्त करने में अग्रणी भूमिका का निभाती हैं।
‘दिनकर’ का जन्म ऐसे समय में हुआ जब भारत गु़लामी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। यह किसे पता था कि सिमरिया घाट गाँव में जन्म लेने वाला यह बालक आगे चलकर इतना बड़ा महान कवि, लेखक एवं भारतीय संस्कृति का पुरोधा होगा तथा अपनी लेखनी की धार को तेज करते हुए बारदोली, प्रणभंग, रेणुका, हुंकार, रसवन्ती, द्वन्द्वगीत, सामधेनी, बापू, इतिहास और आँसू, धूप और धुँआ, दिल्ली, नीम के पत्ते, नील कुसुम, कविश्री, सीपी और शंख, सुभाषित, मिर्च का मजा, रश्मिरथी, दिल्ली, सूरज का ब्याह, चक्रवाल, उर्वशी, परशुराम की प्रतिज्ञा, आत्मा की आँखें, कोयल और कवित्व, मृत्तितिलक, हारे को हरि नाम जैसे अनेक काव्य-संग्रहों का निर्माण करेगा और मिट्टी की ओर, चित्तौड़ का साका, अर्द्धनारीश्वर, रेती के फूल, हमारी सांस्कृतिक एकता, भारत की सांस्कृतिक कहानी, संस्कृति के चार अध्याय, उजली आग आदि जैसे गद्य का सृजन भी।
‘दिनकर’ का काव्य अपने समय में भी जनता के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा और आज भी है एवं कल भी रहेगा। वे 1952 में पं. जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमन्त्रीत्त्व काल में राज्यसभा के सदस्य निर्वाचित हुए लेकिन उनका कवि-मन जनता के बीच ही लगा रहा इसलिए वे अपने को रोक नहीं सके और उनके दु:ख-दर्द को देखकर जो भाव उनके मन में उभरे उसे बर्दास्त नहीं कर पाये और तत्कालीन सरकार को आईना दिखाते हुए समाज में फैले भूखमरी और दीनता से मर्माहत होकर कह उठे कि, "चिन्ता हो भी क्यों तुम्हें, गाँव के जलने से, दिल्ली में तो रोटियाँ नहीं कम होती हैं।" (भारत का यह रेशमी नगर, दिनकर) वे ऐसे कवि हुए जो सत्ता में रहते हुए उसकी गलत नीतियों का विरोध करते रहे और सरकार को हकीकत का बयां करने से चुके नहीं। उनका जन्म उस प्रदेश की धरती पर हुआ जिसने अनेक विद्वानों, सम्राटों, राजनीतिज्ञों और लेखकों को जन्म दिया। चाणक्य जैसा गुरु भी इसी प्रदेश का था जिसने एक सामान्य से बालक चन्द्रगुप्त को चक्रवर्ती सम्राट बना दिया।
रामधारी सिंह अपने भावों का निर्माण प्राचीन परम्परा को त्यागकर, नवीन संस्कृति अपनाकर समाज से ख़ुराक लेकर करते हैं। वह भी सबसे प्रभुत्वशाली, वैभवसम्पन्न राज्य पाटलिपुत्र का। उनकी आत्मा समाज में चल रहे अनाचार और अत्याचार को देखकर युवावस्था में ही चट्टान सदृश हो गयी तथा विद्रोह करने पर उतर गयी। एतदर्थ उनके युवा समय की कविताओं में इतनी गर्म खून की ठसक है जो वाणी में ओज की चिंगारी प्रज्वलित करने का काम करती है और विद्रोही स्वर में वे कह जाते हैं कि, "चाँदनी की अलकों में गूँथ/ छोड़ दूँ क्या अपने अरमान?" (असमय अह्वान, दिनकर) आज जब युवा साथी लोग अपने अरमान को लेकर दर-दर भटकने को मजबूर हो रहे हैं तो दिनकर की यह काव्य-पंक्ति किसी के लिए प्रेरणा देने का कार्य करती है और आशा का संचार करके उसे अपने कत्र्तव्यपथ पर आगे चल निकलने की सलाह भी।
‘दिनकर’ की लगभग समस्त कृतियों में कहीं मस्ती का वातावरण है तो कहीं तन्मयता का, कहीं व्यंग्य एवं कटाक्ष है तो कहीं ओजपूर्ण वातावरण। मानवता उनके रग-रग में कूट-कूट कर भरी है, इसलिए उनकी कविताएँ जनकल्याण की बात करती नज़र आती हैं तो गायन के कारण जनपीड़ा भी व्यक्त करने से वे पीछे नहीं हटती। इतना ही नहीं उनके हृदय में भारतियों के हृदय को भग्न कर देने की अपार गर्जना है और निर्जीव में प्राण फूँकने की क्षमता भी। दिनकर बहुमुखी प्रतिभा-सम्पन्न होने के साथ-साथ समाज-सुधारक भी रहे। वे जनता की भावना को शासन तक पहुँचाने का काम किया तो उसका समाधान करने का भरपूर प्रयास भी किया एवं बुराई का कट्टर विरोधी बनकर विरोध भी। ‘कुरूक्षेत्र’ में स्पष्ट कहते हैं- “कौन है बुलाता युद्ध? जाल जो बनाता है?/ या जो जाल तोड़ने को क्रुद्ध काल-सा निकालता”। (कुरुक्षेत्र, दिनकर) रामधारी जी अध्यापक थे तो कुशल प्रशासक भी, सुधारक थे तो सामाजिक नेता भी, प्रातिभ कवि थे तो मौलिक लेखक भी, संवेदनशील आलोचक थे तो विचारगर्भीत निबन्धकार भी। आपकी साहित्यिक एवं सामाजिक सेवा का प्रतिफलन 1959 में राष्ट्रपति द्वारा दिये गये पद्मविभूषण के साथ हुआ।
कवि दिनकर के व्यक्तित्त्व पर टिप्पणी करते हुए प्रो. प्रकाशचन्द गुप्त ने कहा है कि, "गेहुँआ रंग, छरहरा बदन, गुलाबी चेहरा, दिल में धधकता अंगार जिस पर इन्द्रधनुष खेल रहे हों। यही ‘दिनकर’ की आत्मा तथा शरीर-रचना का संक्षिप्त परिचय है।" वे स्वभाव से उग्र एवं क्रान्तिकारी है तो विचारों से साम्यवादी, धुन के पक्के हैं तो आर्य संस्कृति के प्रतीक, जनता के रक्षक हैं तो पूँजीपतियों के विरोधी, अध्यापकों के हितैषी हैं तो भारतीय उज्ज्वलगाथा के प्रचारक। उनकी कविता के केन्द्र में शोषण की चक्की में पिसने वाले किसान हैं तो मजदूर भी। पीड़ित की दशा को ये सहानुभूतिपूर्वक कारुणिक चित्रण करते हैं- ‘श्वानों को मिलते दूध वस्त्र, भूखे बालक अकुलाते हैं/ माँ की छाती से चिपक, ठिठुर जाड़े की रात बिताते हैं।" (हुंकार, दिनकर) इतना ही नहीं साम्यवादी विचारधारा से लबरेज़ होकर उनके मुख से स्वयं निकल जाता है कि, "है सबको अधिकार मृत्ति का पोषक-रस पीने का/ विविध अभावों से अशंक होकर जग में जीने का।" (कुरुक्षेत्र, दिनकर) वर्तमान समय में गाँव हो या शहर, राज्य हो या देश अथवा विश्व भी, सभी किसी न किसी रूप में युद्ध की विभीषिका से परेशान हैं और जल भी रहे हैं। लोग आपस में एक-दूसरे के ख़ून के प्यासे दिखायी दे रहे हैं। कोई धर्म के नाम पर युद्ध की स्थिति उत्पन्न कर रहा है तो कोई क्षेत्र या सम्प्रदाय के नाम पर। आज मणिपुर जल रहा है तो यूक्रेन भी, ऐसे ही भयानक वातावरण में दिनकर की कविता क्रान्ति का आह्वान करते हुए उद्घोष करती है कि, "रण रोकना है तो उखाड़ विषदन्त फेको।" (कुरुक्षेत्र, दिनकर)
वर्तमान समय में कमोवेश यह देखने को मिल रहा है कि राजनीतिक सत्ताधारी पार्टी अपनी सत्ता प्रत्येक प्रान्त और पूरे देश पर स्थापित करना चाहती है, इसलिए वह अपने को इस रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हैं कि कोई दूसरा दिखायी न दे। ऐसे समय में ही दिनकर की काव्य-पंक्ति का एक टुकड़ा बहुत ही सटीक बैठता है-"तू ध्यान मग्न ही रहा इधर, वीरान हुआ प्यारा स्वदेश।" (हिमालय, दिनकर) यह सही है कि ये लोग सिर्फ़ सरकार बनाने-बिगाड़ने में अपना समय जाया कर रहे हैं और चीन हमारे देश के कुछ हिस्सों पर अपना पैर फैलाता जा रहा है एवं कुछ दिन पहले एक समाचार-पत्र में न्यूज़ था कि चीन ने नया राजनीतिक नक्शा जारी किया जिसमें भारत के कुछ हिस्सों को अपने देश में दिखाया। जिस पर ये लोग कहते हैं कि हमने विरोध किया, पर यह विरोध बाद में क्यों? पहले क्यों नही? आखिर इनकी तमाम खुफिया एजेंसियाँ क्या कर रही है? अगर यही हाल रहा तो हम पर कोई बाहरी आसानी से काबिज़ हो जायेगा।
दिनकर ऐसे ही भक्तों को सचेत करते हुए, कत्र्तव्य का पाठ पढ़ाते हुए बहुत ही सही और सीधी भाषा में ‘नेता’ नामक कविता में कहते हैं कि, "उठ मन्दिर के दरवाजे से, जोर लगा खेतों में अपने/ नेता नहीं, भुजा करती है सत्य सदा जीवन के सपने।" (नीम के पत्ते, दिनकर) यह सही है कि ‘दिनकर’ की इस कविता को कोई गाँठ बाँधकर अपने कर्त्तव्यपथ पर चल निकले तो उसे कभी भी संसार का कोई पछाड़ नहीं सकता। इसलिए हे मेरे देश के नौजवानों मन्दिर-मठ, मस्जिद, गिरिजाघर के पीछे बहुत अधिक मत भागो, अगर भागना ही है तो जो आपका खेत है उसके लिए भागो अर्थात् उसमें पूरी जोर आज़माइश करो तो जो तुम चाहते हो वह मिल जायेगा और पूरी दुनिया तुम्हारी हो जायेगी। इसी बात को थोड़ा परिवर्तन के साथ आधुनिक युग के कवि और छायावाद के प्रजापति कहे जाने वाले अनेक राष्ट्रीय चेतना से सम्पन्न नाटक लिखने वाले, महाकाव्य, खण्डकाव्य के प्रणेता और उपन्यास लेखक कामायनीकार जयशंकर प्रसाद भी मनुष्यों को समझाते हुए कहते हैं कि, "ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न है, इच्छा क्यों पूरी हो मन की/ एक दूसरे से मिल न सके, यही विडम्बना है जीवन की।" (कामायनी, प्रसाद)
रामधारी सिंह नारी के प्रति अपनी धारणा स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि, "नारी के भीतर एक और नारी है, जो अगोचर और इन्द्रियातीत है। इस नारी का सन्धान पुरुष तब कर पाता है, जब शरीर की धारा, उछालते-उछालते उसके मन के समुद्र में फेंक देती है, जब दैहिक-चेतना से परे, प्रेम की वह दुर्गम समाधि में पहुँचकर निस्पन्द हो जाता है।" नारी के प्रति श्रद्धापूर्वक अपने विचार व्यक्त करते हैं-"तुम्हारे अधरों का रस प्राण! वासना-तट पर पिया अधीर/ अरी ओ माँ! हमने है पिया, तुम्हारे स्तन का उज्ज्वल नीर।" (रसवन्ती, दिनकर) इतना ही नहीं दिनकर में ‘वात्सल्य’ रस भी कूट-कूट कर भावुकता के कारण भरा हुआ है। वे लिखते है कि, "माँ की ढीठ दुलार! पिया की ओ लजवन्ती भोली/ ले जायेगी हिय की मणि को, अभी पिया की डोली।" (बालिका से वधु, दिनकर) सिंह की कविता में चिन्तन का प्रौढ़ रूप उभरकर सामने आया है। आपकी रचनाओं में समाज की पीड़ा का चित्रण बख़ूबी हुआ है तो टूटे हुए भारतीय हृदय की गर्जना का भी-"वह कौन रोता है वहाँ/ इतिहास के अध्याय पर।" (कुरुक्षेत्र, दिनकर) इसलिए वे शान्ति के समर्थक कम लगते हैं तो घोर विद्रोही एवं क्रान्ति के हिमायती अधिक। उनका मानना है कि, "गिरे दुर्ग जड़ता का ऐसा, बुला दो प्रलयंकार।"
दिनकर राष्ट्रीय जागरण के स्वर को जन-जन तक पहुँचाने के लिए अपनी कविता को हथियार बनाकर प्रयोग करते हैं। इसीलिए उनकी कविता स्वर्ण युग का प्रतिनिधित्त्व करती है। वे वर्तमान व्यवस्था के प्रति असन्तोष व्यक्त करते हुए क्रान्ति का आह्वान करते हैं-"पतन, पाप, पाखण्ड जले/ जग में ऐसी ज्वाला सुलगा दे।" (कस्मै देवाय, दिनकर) दिनकर सम्पूर्ण विश्व को एक मानते हुए सबको सुखी, सम्पन्न और समृद्ध देखने के हिमायती हैं इसीलिए मानवता उनमें भरी पड़ी है। वे देश के उत्थान, प्रगति, अखण्डता और स्वतन्त्रता के लिए गाँधी, बुद्ध और युधिष्ठिर को नहीं चाहते बल्कि अर्जुन एवं भीम की आवश्यकता पर बल देते हुए स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि, "रे, रोक युधिष्ठिर को न यहाँ, जाने दो उनको स्वर्ग धीर/ पर, फिरा हमें गाण्डीव-गदा, लौटा दे अर्जुन-भीम वीर।" (हिमालय, दिनकर)

निष्कर्ष:
समग्रतः दिनकर प्रतिभा सम्पन्न कवि हैं। उनके काव्य को पढ़कर कोई भी सहृय पाठक प्रेरणा से भर जाता है और समाजहित के लिए उत्साहित हो जाता है तथा समाज में पनप रहे तमाम पाखण्ड, धोखा, अत्याचार, अनाचार का विरोध करने को तत्पर दिखायी देने लगता है। दिनकर की कविता जलते देश में अग्निशमन है। उनकी राष्ट्रीयता की भावना विश्वकल्याण से लबरेज़ हैं। कुल मिलाकर दिनकर का काव्य कल भी प्रासंगिक था, आज भी है और कल भी रहेगा।

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