शीर्ष गीतपुरुष गुलाब सिंह की नवगीत यात्रा

मनोहर अभय

मनोहर अभय

श्री गुलाब सिंह उन गिने -चुने नवगीतकारों  में हैं जिन्होँने इन गीतों को उंगली पकड़ कर चलना सिखाया। उनके   गीतों में गुलाब की महक है और कॉंटों सी चुभन भी। एक सत्यनिष्ठ निर्भीक साहित्यकार जो  सात पर्दो   में छुपे सत्य को खींच कर बाहर लाकर खड़ा करदेंगे फिर चाहे किसी के  तेवर टेढ़े हों या कोई  करतल ध्वनिसे स्वागत करे। प्रस्तुत है  आज की चकाचौंध दूर रहने वाले   कवि की  गीत-यात्रा।
 

भवानी भाई ने बड़े पते की बात कही - "जिस तरह हम बोलते हैं, उस तरह तू लिख /और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख।"

 शीर्ष गीतपुरुष गुलाब सिंह ने एक न सुनी।न किसी के कहने से लिखा, न किसी से बड़े होने की चेष्टा की। इतना जरूर कहा - ; "मैंचन्दन हूँ/बातों की परतें खोलूँगा / भाषा बनकर के बोलूँगा शब्दों में जो छिपी आग है /वह चन्दन का अग्निराग है / गूँजेगी अभिव्यक्ति हमारी/अवरोधों से मैं न झुकूँगा "।

 कवि केलिए गीत जीवन के यथार्थ की भावमयी रसात्मक व्यंजना है, जो मरुथल होते मनुष्यके हृदय को रसासिक्त कर, अधिक से अधिक संवेददनशील बनाती है। (“नर्म दूब भावों की/पनपेगी/ पथरीलेपन पर - मुखरित होंगे गान / सोच के / सब पठार नम होंगे /शब्द नहीं / कुण्ठित होते / संधान नहीं कम होंगे )। ऐसे संधान के लिए चाहिए समय की रफ़्तार के साथ चलने की  चाह। गुलाब सिंह में ऐसी ही चाह है। वे समय के दुशाले का पहला छोर पकड़ कर, उसका रूप-अपरूप भावक को दिखलाने का नैष्ठिक प्रयत्न करते हैं। हर्ष-उत्कर्ष अपकर्ष जो कुछ है, उसे जैसे का तैसा शब्दांकित कर देते हैं। सही अर्थों में वे सत्यव्रती हैं। सत्य के अन्वेषी।  सत्य - साधक की तरह वे समस्या की तह तक जाना चाहते हैं। समाज में बहुत कुछ स्याह-सफेद है। सच्चाईयों पर मोटे गलीचे बिछा कर लोगों ने आसन जमा लिए हैं। जब कोई सत्य पर ही पद्मासन लगा ले, तो नीचे दबा हुआ सत्य कैसे अपनी गर्दन ऊँची कर सकता है? गुलाब सिंह का कवि इस दुरावस्था से व्यथित था। बेचैन। चिंतित। अपनी चिंता को व्यक्त किया नवगीतों के माध्यम से। यों समझिए कि नवगीत की उँगली पकड़ कर, उसे चलना सिखाया। उसकी देह यष्टि को परिपुष्ट किया। कहते है उनके नवगीतों में, नव्यता ने सेंध नहीं लगाई, अपितु नव्यता को परिभाषित किया। जीवन में

  जो कुछ शुभ और सुंदर है, आज समय के क्रूर जबड़े का हिस्सा बन चुका है; वह चाहे जातीय स्मृतियाँ हों,   संचित जीवन-मूल्य, नाते-रिश्तों की ऊष्मा। उनके गीतों में हर्ष-उत्कर्ष अपकर्ष अवसाद है, उल्लास भी।  अवसाद के क्षणों में घुटनों पर सिर रख कर बैठने की जगह स्थितियों से जूझने की उत्तेजना होनी चहिए।  नई जिजीविषा पैदा करने वाली उत्तेजना  (“आओ फूल चुनें / खुशबू की चादर बीनें / अरमान नए टाँकें / आड़े तिरछे तार/गाँठ के फंदे कसें  / जो इसको ओढ़े/उसका उजड़ा संसार बसे/वह भी हँस कर ऐसा ही कोई उपहार बुनें )। ऐसी मांगलिक आस्था की ध्वनि उनके अधिकांश गीतों में रची-बसी है।

 पुरुष यदि पौरुषी है,तो उसके पास मर्म को छूने वाला करुणाद्र मन भी है। पवन के आलम्बन से कवि इसी भाव को व्यंजित करता है - "आँधी बन कर आया

था/अब मंद मरुत हूँ/वही पवन हूँ / सुर्ख दुपट्टा छू जाता / रुक कर शर्माता हूँ/दूध पिलाते आँचल पर/मैं चँवर ढुलाता हूँ/थपकी देते हाथों की/रेशमी छुअन हूँ"।

नवगीत के  प्रतिष्ठित  कवि  निर्मल शुक्ल कहते हैं -  “ग्राम्यबोध के सबसे समर्थ नवगीतकार हैं गुलाब सिंह। इनके काव्य संसार में गाँव अपने समूचे दर्द, गरीबी  पिछड़ेपन  के रिश्ते लिए हुए विद्यमान हैं"।   ग्राम्य जीवन की  दैन्यता  के पीछे, शक्ति -सामंतों के दुराचरण को कवि ने नजदीकी और गहराई से  अनुभव किया। पूरा जीवन गाँव में जो बिताया। जो गांव में नहीं रहा। गाँव की चौपाल में बैठ कर जिसने सुख दुःख साझा नहीं किए वह क्या  लिखेगा  जो गुलाब सिंह ने लिख दिया  ( शब्दों के हाथी पर / ऊँघता महावत है / गाँव मेरा / लाठी और भैंस की कहावत है;) हाथी बाहुबली है, ऊँघता महावत उसके चाकुरे। हाँ में हाँ मिलाने वाले। यथा स्थिति के पक्षधर हैं। समूचा गाँव लाठी- लठैत,  जोर-जबर और दबंगों के कब्जे में है। जो कभी जमींदार कहलाते थे, आज परधान हैं। मुखिया हैं। नीति कहती है कि अपने अधीनस्थ का  सम्यक संरक्षण- परिपोषण करो। गोस्वामी तुलसीदास ने कहा “मुखिया मुख सों चाहिए, खान पान को एक। पालै पोसै सकल अंग, तुलसी सहित विवेक”अर्थात भोजन तो मुँह में जाता है, लेकिन परिपुष्ट होते हैं शरीर के समस्त अंग-प्रत्यंग। गुलाब सिंह

कहते हैं “मुखिया थे” मुख से। सरपंच हुए पेट से/बातों की एवज / सम्बन्ध हुए टेट से / नहर गाँव भर की / पानी परधान का"। नहर का पानी सब के लिए है। आम आदमी के लिए। अधिक आवश्यक है खेतिहर किसान को। मुट्ठी में बाँध रखा है बाहुबली मुखिया ने।गरीब-गुरबाओं के घर तो देखिए “छोटू की छान / कहीं आड़ न किवाड़ / घुस आई हवा / देहरी के पार"। हवा का देहरी पार करना किसी संदेहास्पद की घुसपेंठ को इंगित करता है जो घर की आबरू न लूट ले जाए। किस की आबरू? कहाँ की आबरू?घर में महिलाओं के लिए नहाने -धोने की सुविधा भी नहीं   “ मोरी पर बैठकर/नहाती है बहू/दिखे नहीं देह/यह जुगाती है बहू/मोरी के नीचे बहता काला पानी/क्या समझे ऐसे/तन-मन की सावधानी/जल्दी से भीतर / दौड़ जाती है बहू";। बहू तो जल्दी दौड़ जाती भीतर, इसलिए कि मोरी के नीचे काला पानी  है (कुदृष्टि वालों की भीड़)। पर लछिमी की बिटिया क्या करे?“माँ के संग काम पर गई ; लौट कर नहीं आई / डूब रही चपचिया / बुझ गया अलाव /राख में दीखा फूल जला "। कच्ची कली सी देह को कुचला ही नहीं, उसे जला कर राख कर दिया। अब वे कहाँ जाएँ जो “जन्मे तो खेतों के हो गए/खेतों में जगे/और मेड़ों पर सो गए / पाँव के साथ रहीं जूते की कीलें / रोज-रोज होते बंडी कुर्ते ढीले/ तन-मन जब सूखा आँख से भिगो गए”। कैसे दिन काट रहा है प्रगतिशील स्वतंत्र देश का आम   नागरिक - शीशों के दिल दिमाग वाली / महलों की महरिन झुग्गियाँ / बूटों बन्दूकों के पाँव ढके/अनुशासन पर्वो की लुंगियाँ / सपनों का स्वर्ग सुलग रहा /  आँखों में / नाकों में निन्यानवे नर्क "। एक ओर सत्ता की अनदेखी है, तो सूखा - बाढ़ की मार कौन कम है? “आई बाढ़ चढ़े पेड़ों पर / बाँधे खाट-खटोले / सिर पर उड़े जहाज/पाँव के नीचे अजगर डोले”। कैसी हृदय विदारक जिंदगी है? कैसा विकास? कैसा बदलाव? यदि सचमुच  विकास की त्रिपथगा पिपासित जन-मानस की प्यास बुझाने को गौमुख से उछल कर धरा     पर बिछल रही है, तो प्यास के महासागर की आस्तीनें क्यों बढ़ती जा रहीं हैं? कवि का भी यही प्रश्न है - "जब अँधेरा भी नहीं / तब साफ दीखता क्यों नहीं”। “खेल भीतर हो रहे मैदान खाली / गूँजती जैकार रह रह / बजे ताली"। 

देशज संस्कारों को अक्षय बनाए रखने का आग्रह  है  - “पानी से नेह तुम्हें / अपनी भी उसी से सगाई / ओ रे सहगोती? गाँव के देश की दुहाई / आग मेरे पुरखों की थाती / बौछारों से नहीं बुझाना/ओ रे बादल ! कोने की आग को बचाना।कौन सी आग बचानी है? पूर्वजों से प्राप्त धरोहर, जिसे सुरक्षा की दृष्टि से एक कोने में छुपा रखा है। क्या है पुरखों की थाती में, जो आग की भाँति ऊर्जावान है। ये हैं संस्कार,जीवन के मूल्य, सद्परम्पराएँ, रीति-रिवाज, उत्सव-त्योहार जो सहगोती (अपने ही गौत्र के  ) की तरह साथ-साथ चले आ रहे हैं, पीढ़ियों से। इस अमूल्य धरोहर को बचाए रखना है। यदि सहगोती को पानी प्रीतिकर लगता है ,तो “वाचक” का स्नेह उसकी प्रीति से कहीं अधिक मृदुल और मधुर है, क्योंकि वह उसका वाग्दत्त है। फिर भी वह गुहार करता है कि तुम्हारा प्रीतिकर नीर, पुरखों की बची हुई आग को बुझा न दे। आग प्रकाश की  द्योतक है। उसके बुझ जाने से अंधकार अर्थात अज्ञान का प्रभुत्व बढ़ेगा।

आवश्यकता है कि हमारी पीढ़ियाँ समृद्ध  हों। अग्नि को सम्बोधित वैदिक प्रार्थना है -;अग्निना रयीमश्नवत्पोषमेव दिवेदिवे। यशसं वीरवत्तमम्? १ / ३? (हम अग्नि द्वारा इस प्रकार का धन प्राप्त करें, जो दिनों-दिन पुष्टि देनेवाला हो, यशोवर्धक हो तथा हमें वीरों से युक्त बनाने में सर्वश्रेष्ठ हो।)  ऋचा कुछ भी कहे  यहाँ तो   राजनीति हावी है -राजनीति की ड्योढ़ी पर सिर पैर खेत की माटी में - झउआ, खुरपी शहर बेचते / गाँव बेचते लाठी \वही दूर तक देख रहा है / जिसकी लम्बी काठी/भाई-भाई बाँह चढ़ा कर\ उतरे हल्दीघाटी"। समता और साम्य को लकवा मार गया- "सूरज उलझ रहा मेघों में/चन्दा ऊँची कोठी में / आस- पास की गलियाँ उलझी / रोटी और लँगोटी में "।

अभावों और गरीबी से संत्रस्त युवापीढ़ी पलायन कर जाती है नगरों - महानगरों की ओर। वहाँ कैसे जिंदगी बिताते हैं, किसी  को हवा नहीं लग पाती। पीछे छूटे परिवार की अपेक्षाएँ अपरिपिमित हैं। पढ़िए नन्हे का खत"  भूले बिसरे लिखते / सिलसिले तमाम / नन्हे का खत / बड़के भइया के नाम। इस चिठ्ठी को जैसे तार वाँचना / बहना की पालकी ओहार वाँचना/ बापू की पकी हुई मूँछों  का  काँपना / अम्मा की आँखों हार वाँचना। देखो जी यह खत भी अनदेखा मत करना / घर भर का राम राम / गाँव का सलाम'। ये  खत है या वेदनाओं का बहीखाता। बहिन की शादी, पिता का बुढ़ापा, माँ के सपने,   कितनी अनापूरित जरूरतों के दर्द को आखर- आखर शब्दायित करता यह गीतात्मक खत। परदेश गए भइया आते हैं मनचाहे मेहमान से। दीपक की पीली-पीली रोशनी सी खुशियाँ। भाभी के मन में घुलने लगती है मिठुआ - पान की मिठास। नन्हा सूरज जो है - आशाओं - आकाँक्षाओं की परितृप्ति करने वाली मखमली धूप को विकीर्ण करने वाला उदित-भास्कर। भइया नहीं आश्रयदाता है ;थके पाँवों का रैन बसेरा। “भीने से,महकते पसीने से /तोड़ रहा अनफूले मौसम का घेरा/लिए एक चेहरा हम सबकी पहचान का तोड़ रहा "। परदेस गए बेटे को  घर का संदेश मिला माँ ने रस, बापू ने चन्दन / भाभी ने अमिया / पीछे के दरवाजे दुल्हिन ने पत्र दिया\ बरबस टपकीं दो बूँदें /  हम पूरे भीग गए। क्या लिखा होगा उसने, पता नहीं।  हाँ, बिहारी की  नायिका जैसी  दशा अवश्य हुई   होगी ( जौ वाके तन की दसा, देख्यौ चाहत आपु।तौ बलि, नैंक बिलोकियै, चलि अचकाँ, चुपचापु)।  

भूख नैसर्गिक है। जन्म लेते ही जीव को आहार चाहिए। इसे दारुण त्रासदी समझते हुए कवि ने कहा ;संग्रामों से / सालिग्राम / दिन तमाम /

कब समझे, कौन बडा / रोटी या राम; नाम "। भूखे को सिर्फ रोटी चाहिए। शौक मौज की चीजें बाद में। “भूखे को खुशबू क्या? नंगे को क्या कला"?    

 इसलिए कवि का आमंत्रण है "जहाँ कोई बोलता न हो/ऐसे सुनसान को सुनो / जिसका शब्दांत न हो / ऐसी दास्तान भी सुनो। अभावों में जीते-मरते लोगों के सहारे बनो। कवि कथन है-- ‘हम खारे पानी के/सोते हैं/ आँख से निकलते हैं/अपने दिन धोते हैं /द्वार पर लटकते/बिन चाभी के ताले हैं / हम भूखे घरवाले हैं - गिनती के भीतर हैं/नजरों से बाहर हैं"। गिनती के भीतर अर्थात मर्दुम शुमारी के आंकड़े। अस्तित्व दृष्टि से ओझल।  कवि फिर भी आश्वस्त है अन्यथा “इधर प्यासे/उधर पानी / इस कहानी में नया क्या है "? नया ये है कि आदमी के पेट में चूल्हा / पाँव में चक्की / घर उजड़ा / सड़क पक्की"। प्राथमिकता आदमी की मूलभूत आवश्यकताओं को दी जाय , नहीं तो आदमी अपराध जगत का सरगना हो जायेगा। पुलिस वकील और अदालत की चाँदी  (बिंधे हुए दिन अपराधों से / बड़े कुतर्क गवाही छोटी / सच गायब है संवादों से  / सच की शपथ दिलाने वाले/धर्मो के रिश्ते छत्तीस "।होने थे आमने -सामने हो गए विपरीत (६३-३६)

कवि बदलाव के दावेदारों से पूछता है: “जब अँधेरा भी नहीं / तब साफ दीखता / क्यों नहीं? जब इरादे नेक/ तब उपलब्धि का आकाश/झुकता क्यों नहीं "। ये नेक इरादे,संदेह से अछूते नहीं हैं। सत्ता के झूठे आश्वासनों ने आदमी को भी असत्यवादी और दुराचारी बना दिया है। पैसे के मुकाबले आदमी का आकार घट गया है (“(“घड़ी क्या जाने/ समय का रंग कैसा है/आदमी से सौ गुना / जब बड़ा पैसा है। )। घड़ी तो टाइमपीस है, समय सूचक। समय के हालात (रंग) नहीं बता सकती। रंगदारी तो पैसे की है। इसलिए धनोपार्जन करो,जैसे भी हो। सत्ताधीशों के इर्द-गिर्द चक्कर लगाओ। करनी है मुँह देखी। ठकुर सुहाती बात -  "धूप की चटाई पर छाँव के विचार / करनी मुँह देखी/जुड़ा आला दरबार/ फाइल के पाँव टिके / बाबू की जेबों में - ज्यों के त्यों रहने के आसार"। सारे सुखद परिणाम चाट गया दुराचरण का अँधेरा। दफ्तरों में दे ले के काम आसानी से होजाता है। अन्यथा फाइल दबी पड़ी रहेगी। प्रकाश की  मंदाकिनी के बहाव में ठहराव है। यथास्थिति बनी हुई है। सामाजिक-आर्थिक  विषमताओं से आदमियों के बीच उपजी खाइयाँ चौड़ी और गहरी होती जा रही हैं (इधर सब गरीब बसे/उधर सब अमीर / फेंटोगे कैसे / बढ़े समता का जोर -मुस्काएँ चाँदी की चम्मच / मैली अँगुली पर / नौलक्खा हार/ काँसे की हँसुली पर/टावर से  झाँके/ छोटे-छोटे दिनकर / अपना मुँह ताकें / सौ-सौ जुगनू मिलकर/बज रहे पियानो कौवों का शोरहैं। खाइयाँ पाटने की पुरजोर कोशिशों के  बावजूद : “ वहीं रहे जहाँ हर दिन होती अंधेर। और एक पाँव वहीं रहे जहाँ बाज/गिद्ध के बसेरे’। ‘फटे पाँव को दिए गए कुछ तंग दस्ताने "। जिन्हें चाहिए थे जूते- मौजे, उन्हें दिए गए दस्ताने, वे भी तंग। दी जा रही हैं अनचीन्हीं सुविधाएँ। कवि का तंज देखिए "पाँव की चालें / बेचारे हाथ क्या जानें;।    पाँव की चाल तो जरूरी  है, चालें नहीं )। इस एक शब्द ने गीत को प्रहारक बना दिया, तीखे व्यंग्य के साथ।। कवि फिर भी आश्वस्त है - बात के मोटे भी / पर्दे / जुल्म ढक सकते नहीं / चीखती कातर/पुकारें/और सह सकते नहीं”। कवि की सबसे बड़ी चिंता है आदमी और आदमियत को बचाए रखना (बचा रहेगा अगर ;आदमी / खलेगा नहीं दुःख सहना। संयुक्त परिवार हमारे लिए बरगद की छाँव थी। सारे बंधु-बांधवों को चिलचिलाती धूप से बचाए रखने को (घर तो घर ही होता/जब भी वापस आएँ/शब्द सकपकाएँ/तो क्या हुआ/खटकने को घर की / सांकल तो है। बशीर बद्र की शेर है :“ढलानों की धूप / छतों की शाम कहाँ/घर के बाहर घर जैसा आराम कहाँ? कीर्ति शेष माहेश्वर तिवारी के नवगीत  की पंक्तियाँ है धूप में\जब भी जले हैं पाँव\  घर की याद आई।    . वैदिक मंत्र  है -  हे वर- वधू! तुम यहीं (गृहस्थ आश्रम में) रहो, कभी अलग मत होना और पुत्र- पौत्रों के साथ खेलते, हर्ष मानते उत्तम घर के स्वामी तुम दोनों सम्पूर्ण आयु को प्राप्त हो (अथर्वेद - २२)। घर की छत्र-छाया में व्यवस्थित परिवार, समाज का मेरुदंड कहलाता है। साम्यवादी सोच वर्ग संघर्ष की आड़ में घर - बिरादरी को विशृंखल कर  रही है (स्वप्न साझे के/अचानक खो गए/चूड़ियों से हाथ सूने हो गए / वह हँसी / वह खनक दूनी / हो गयी अब फूल से / ज्यों डाल सूनी / उजड़ता घर देख / बादल रो गए)।संबंधों में जम गया खारापन - मीठा था कुआँ / अब पानी है खारा / बीच-बीच में / फूटे  दाने ने मारा / बातों को छील रही/जीभ की दुर्वचन। अलग-थलग पड़े सब तनावों में  जी रहे हैं :आँगन में बज रही / तनाव की पखावज - कठिन हुआ अब / टूटे धागों का जुड़ना/रिश्तों के शीशे से मक्खी का उड़ना। संबंधों की चिर मिठास ही / रहा खोजता  अपना चींटीपन) - चींटी मिठाई का किनका-किनका खा जाती है। जो रोके उसे काटती है। इस स्वभाव के लिए कवि ने;चींटीपन जैसे नए शब्द की गढन की है, जो स्पृहणीय है। कवि ने पारिवारिक रिश्तों की महत्ता का उल्लेख करते हुए कहा है : “एक चने की / हैं दो दालें / लड़ते बँटे / आँगनों वाले / उतर गए छिलके की भूसी पर/लटके रिश्तों के ताले”। कहीं-कहीं कवि नीतिगत उपदेश देते दिखाई देते हैं- “जो करे बातें खजूरी/ रखें उनसे थोड़ी दूरी। ऐसे ही नजर डालिए देशप्रेम के तमाशे पर दिल के भीतर देश कहाँ है? देश प्रेम में पगे लोग हैं / नहीं किसी के सगे लोग हैं/ मैराथन में आगे बढ़ने की कोशिश में / लगे लोग हैं/ बाकी सब कुछ जहाँ तहां है/दिल के भीतर देश कहां है? विडंबनाओं - विकृतियों के घटाटोप अँधेरे के बीच कवि ने समय के शिलाखण्ड पर खींची हैं प्रकाश की लकीरें। डॉ. विश्वनाथ प्रसाद कहते हैं गुलाब सिंह ने ‘समकालीन जीवन की क्षयी प्रवृत्तियों को सबसे अधिक तीखे पन के साथ कहा है। अपनी अभिव्यक्त में वे अच्छी से अच्छी नई कविता के समानान्तर पहुँच जाते हैं, किन्तु  उनकी रचनाओं की संक्षिप्तता, अन्विति तथा कथ्य की लय ही नहीं, बल्कि सच्चाई का  लने के बाद बची हुई संगीतात्मकता की छौंक उन्हें नवगीत बना देती है। सच में  लय और गेयता का समुच्य मनमोहक है। द्रष्टव्य है - पतियन मंत्र झरे/नात नए अँसुवनसंग फूटे / डरियन सगुन फरे / कुसमित देह सुदिन रँगराती / बगियन में रस बदन  बराती / दूर-दूर नाइन धूप दुवरिया/चुन-चुन चौक भरे - लगता है विद्यापति की स्वर - माधुरी प्रवेश कर गई है कवि के अंतःपुर में। कहना न होगा कि कवि के कथ्य का क्षितिज बहुत व्यापक है। विविधता से भरा।शिल्प इतना सुघड़ है कि काव्यात्मकता, गीतात्मकता और नवीनता का स्वतः स्फूर्त समन्वय है। यहाँ मिलेंगे अवसर जम्हाई लेते, फूल गंध का फर्ज निभाते, बहस बगल झाँकती, संवादों के साबुन, फाटे पृष्ठ सी उजड़ी फसल, झाँझर कमीज तनाव की पखावज। कहन की सम्प्रेषणीयता के लिए शब्दों की बाँहें भी खूब मरोड़ी हैं यथा कटोरे काँसे के नही ;काँस; पथ टोहे की जगह ; थेगरी थिगरी कवि का कथ्य और शिल्प बेजोड़ है। संवेदना की गहनतम अनुभूति सीधी सरल भाषा में ताजे-टटके प्रतीकों, बिम्बों, मुहावरों के माध्यम से सम्प्रेषित की है। उपमाएँ देखिए “धूप सरीखी धिया हमारी”, “भोर सी भौजाइयाँ”, बच्चे जैसे खुले महाजन खातों के पन्ने, बूढ़े लगते हैं  मुनीम के अध्धे और पवन्ने, अधपके खेत सी देह, कत्था-चूना-पान सा तन मन। कहीं  ;धूप मछुवारिन; है, कहीं दुबरिया तो ;हरजाई; भी ; हवा कमसिन है तो कंजड़िन (कंजरिया)। यहाँ देखिए ;धूप का चश्मा लगाए चाँद, नकचढ़ी नहर, अँधियारे की अरगनी है, धुआँ होते हौसले। कैसे-कैसे बिम्ब उकेरे है आंचलिक शब्दों के सहारे यथाः हरे गोट की घंघरी, छींट बुँदकियोंदार, पनघट से लौटती पनिहारिन, महलों की महरिन झुग्गियाँ / अनुशासन पर्वो की लुंगियाँ। यहाँ आम चिठ्ठी लिखता है और सही करता है टेसू। ऐसा कोई गीत नहीं जिसमें देशज शब्दों की गढ़न न हो। द्रष्टव्य हैं  चौंतरा, सकारे, सगुनौटी, चमरौधे, दोहनी, अंटा उजरौटी, बँसवारी, कहरवे। लोक जीवन से उठाए ये शब्द, ताल, छंद लय और रस की नई भाव धारा जोड़ते हैं जबकि नवगीत भाव और रस हीनता के कारण कोरी वैचारकता तथा बौद्धिकता की कतरब्योंत बनते जा रहे हैं। गुलाब सिंह के गीत इस अर्थ में कहीं अधिक रसात्मक और लयात्मक हैं जिनमें नए बाँस की बाँसुरीका मिठास भरा स्वर अन्तर्निहित है।
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सम्पर्क: अमृत कुञ्ज ,बी- 7 रामनाथ सिटी
राजगढ़, ललितपुर रोड,झाँसी - 284135 (उत्तर प्रदेश)

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