समीक्षा: इत्मीनान में हूँ मैं

इत्मीनान में हूँ मैं
विनीता तिवारी
भावना प्रकाशन

समीक्षक: अशोक सिंह


विनीता तिवारी हिंदी ग़ज़ल और आधुनिक कविता की समृद्ध परम्परा की एक सशक्त उभरती हुई शायरा हैं। उनकी अभिव्यक्ति में जहाँ एक ओर आम आदमी के जीवन की संवेदना है तो दूसरी तरफ समाज, संस्कृति और परिवेश के प्रति सजगता भी। हिंदुस्तानी बोली में कही गई विनीता तिवारी की ग़ज़लें सहज, सरल और सपाट भाषा में लिखी हुई ग़ज़लें हैं, जिन्हें कोई भी हिंदी प्रेमी आसानी से समझ सकता है। विनीता की शायरी में सरलता है, ग़ज़ल की बारीकियाँ हैं, आज के समय के प्रतिमान एवं विसंगतियाँ हैं, आध्यात्म है, तंज है, और यदा-कदा इंसान के दोहरे नैतिक-सिद्धांतों पर प्रहार है। इस सबके साथ भाषा के अलग हट कर प्रयोग भी हैं, और प्रवास और जीवन से मिली हुई सीखें भी हैं।

विनीता तिवारी को ग़ज़ल की समझ है, और जितनी अच्छी ग़ज़लें वो लिखती हैं, उतना ही अच्छा उनका बयान भी तरन्नुम में करती हैं। उनका मानना है कि उन्हें ग़ज़लें और शायरी की विधा तब से पसंद है जब उन्हें ये पता भी नहीं था कि शायरी के मायने क्या होते है। समय आने पर उन्होंने शायरी की बारीकियाँ सीखीं, समझी, और अपने लेखन को निखारा। संगीत की शिक्षा भी प्राप्त की। संगीत की समझ, सुर और शायरी का बेजोड़ मेल होती है, और वही महारत विनीता ने भी हासिल की। इसलिए सुनने वालों को हमेशा उत्कंठा रहती है, विनीता को ग़ज़ल कहते हुए सुनने की।

विनीता तिवारी
‘इत्मीनान में हूँ मैं’ विनीता का पहला ग़ज़ल संग्रह है। यह उनकी बेहतरीन शायरी के साथ, उनकी मानसिक स्थिति का भी द्योतक है। ग़ज़ल कहना अपने आप में एक बेहद मुश्किल काम है, और ग़ज़ल की किताब हासिल कर पाना और भी मुश्किल। ग़ज़ल की प्रकाशित किताब आप को तुरंत ही एक अलग श्रेणी में ला कर खड़ा कर देती है। और फिर ये जज़्बा और लगन अगर परदेस में रहते हुए दिखाया जाये तो और भी प्रशंसनीय हो जाता है। विनीता स्वभाव से ख़ुश-तबीयत की मालकिन हैं, इसीलिए उनकी शायरी में भी उनका निश्छल व्यक्तित्व नज़र आ जाता है। 78 ग़ज़लों से सजे इस गुलदस्ते में मुहब्बत, सामाजिक सरोकार, बदलते मूल्यों की फ़िक्र, निस्वानियत फ़िक्र, हौसले, और  रूमानियत जैसे तमाम नाज़ुक एवं संजीदा मुद्दों के फूलों को क़रीने से सजाया गया है।

कुछ बानगी देखते हैं, सबसे पहले विनीता की सिग्नेचर ग़ज़ल का एक मतला और एक शे’र, - जिसमें इतनी सरलता से इतनी बड़ी बात कही गई है;

ज़िंदगी से शिकायतें कैसी,
बा-ख़ुदा इत्मीनान में हूँ मैं।

राम जाने रहीम ईसा को,
क्यूँ भला दरमियान में हूँ मैं।

आज के समाज की विसंगति, जिसमें अति की अधिकता रहती है, या समय अच्छा हुआ तो किसी इंसान को ईश्वर जैसा, अन्यथा मिट्टी जैसा बर्ताव, दूसरे शे’र में स्वयं से एक दिलचस्प वार्तालाप;

मान सम्मान जो करो, सो करो,
आदमी को मगर ख़ुदा न करो।

जाने किस-किस की ज़िंदगी हो तुम,
यूँ फटाफट से दिल दिया न करो।

आज की मशीनी ज़िंदगी पर एक नज़र, जिसमें इंसान एक रोज़मर्रा की ज़िंदगी से बँध कर रह गया है;

बसर ज़िंदगी यूँ किए जा रहे हैं,
न सपने, न अपने, जिए जा रहे हैं।

यहाँ दर्द बिकता हैं, बिकती हैं ख़ुशियाँ,
लिए जा रहे हैं, दिये जा रहे हैं।

निसवानी फ़िक्र पर कुछ अश’आर, विनीता ने इस विषय में अपने भाव और भी कई जगह बहुत संजीदगी से व्यक्त किए है;

दुर्गा लक्ष्मी पार्वती कुछ भी कह लो,
बातें हैं इन बातों का आधार नहीं।

हालाँ-कि पीहर भी है, ससुराल भी है,
अपना कहने को इक भी घर-द्वार नहीं।

कुछ विश्लेषण आज की मुश्किल तर्ज़-ए-ज़िंदगी पर;

काम आया न कोई पैबंद,
उधड़ी उधड़ी सी रिश्तेदारी है।

जिसको देखा नहीं न जाना ही,
ज़ीस्त ये सारे उस पे वारी है।

सामाजिक चलन पर कुछ कटाक्ष करते हुए अश’आर;

नफ़रती उन्माद से घर जल रहा जब,
इक पड़ोसी न्यूज़ का मुद्दा बना है।

आदमी पीने के पानी को तरसता,
देश की सड़कों पे जबकि पुल बना है।

रूमानी अन्दाज़ इन अश’आर में बड़ी सुंदरता से निखर कर आया है;

देर तक आईने में सँवरने लगे,
आईने से नज़र फिर चुराने लगे।

जिस्म से उनकी ख़ुशबू मिटाने को हम,
देर तक बारिशों में नहाने लगे।

सुंदर भावों और शब्दों का चयन होली और त्योहारों के लिए;

खनकती झाँझरें, चूड़ी, थिरकते पाँव तालों पर,
न माने दिल कोई बंधन, कि होली आई रे आई।

छुड़ा लेते हैं वो दामन किसी मीठे बहाने से,
उलझ जाती है पर धड़कन, कि होली आई रे आई।

विनीता तिवारी की ग़ज़लों में भाषा का सहज सौंदर्य समाहित है और उनमे भावों की सुंदरता पिरोई गई है।

प्रचलित शब्दों और उपमानों से ही ग़ज़ल के खूबसूरत अश’आर परोसे गये हैं जो सुनने वाले के मन में सीधे उतर जाते हैं। जायज़ा लीजिए उनके कुछ और अश’आर का;

साथ नहीं जाना कुछ भी मालूम तो है लेकिन,
बिना लक्ष्य के जीवन भी बिलकुल बेमानी है।

पहुँच गये हम चाँद तलक, सूरज की है बारी,
रोज़ी-रोटी, घर, कपड़ा अब बात पुरानी है।

अंत में एक शेर ऐसा जो आप अपने साथ ले कर जाएँगे, एक ऐसा तंज जो बहुत से प्रवासी भारतीयों को उकसाएगा, उनके मनोभाव, कर्म भूमि और मातृ-भूमि के बीच ईमानदारी और न्याय की माँग करता है;

विदेशों के सजा कर ख़्वाब ढेरों,
दिलों में देश पाला जा रहा है।

आख़िर में, इसी उम्मीद के साथ कि पाठक-गण विनीता तिवारी के इस सराहनीय प्रयास की प्रशंसा अवश्य करेंगे और उन्हें आगे लिखने के लिये प्रेरणा भी देंगे। ग़ज़ल के क्षेत्र में बहुत कुछ सीखने के लिए है, आशा है विनीता अपना ये उन्माद ज़ारी रखेंगी, उनका ज़ोर-ए-क़लम और भी ज़्यादा होगा। एक शे’र विनीता के हवाले करते हुए ‘मैं इत्मीनान में हूँ’ की बात समाप्त करता हूँ;

कुछ जुनूँ, कुछ है कसक, कुछ फ़िक्र तो कुछ है मज़ा,
शाइरों की ज़िंदगी में शाइरी अपनी जगह।
***

अशोक सिंह
न्यू यॉर्क, यू एस ए 
ashokgsingh@gmail.com

परिचय- “तरंग- न्यू यॉर्क” एवं “एक शेर अर्ज़ किया है” डिजिटल गोष्ठी के संस्थापक अशोक सिंह हिन्दी भाषा और साहित्य की सेवा के लिए न्यू यॉर्क की स्थानीय साहित्यिक संस्थाओं में भरपूर योगदान देते रहे हैं। भारत से आमंत्रित शीर्ष कवियों को लेकर कवि सम्मेलनों के सफल आयोजन एवं प्रबंधन भी करते रहे हैं। आपका प्रकाशित काव्य-संग्रह ‘फिर वसंत आए’ एवं ग़ज़ल संग्रह ‘ख़्वाब कोई बिखर गया’।

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