कविताएँ

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

पीठाचार्य, डॉ. आम्बेडकर पीठ (मानवाधिकार व पर्यावरण मूल्य) 
पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, भटिंडा
चलभाष: (+91) 8989154081, (+91) 9818759757
ईमेल: hindswaraj2009@gmail.com & kanhaiya.tripathi@cup.edu.in
लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं एवं सेतु संपादन मंडल के सम्मानित सदस्य हैं। आप अहिंसा आयोग के समर्थक एवं अहिंसक सभ्यता के पैरोकार भी हैं।



माँ जैसा कोई नहीं

मैं उस माँ की कल्पना का पुत्र हूँ
जिसने असंख्य स्वप्न के साथ हमें जना
जिसने सही हमारे लिए
बहुत सी खट्टी-मीठी कठिनाइयाँ
जिसने सहे अनेक कष्ट
पर हम बच्चों को कभी कष्ट नहीं होने दिया।

माँ-पिताश्री
माँ ने पिता के उन सभी क्रोध को
बदल दिया प्रेम में 
जब हमने की कोई गलती और
पिताजी ने हमें साजने-अनुशासित
करने के लिए क्रोध किया।

माँ का प्रेम पिताजी से 
एक रत्ती ज्यादा नहीं थे
पिताजी से कम भी नहीं थे
पर जब-जब हमने गलती की
पिताजी ने डाँट लगाई, तो
माँ कह देती-बच्चे हमारे अच्छे हैं।

हो सकता है यह हमारे लिए
समझने के लिए काफी थे
बस इतना कहना ही,
माँ के प्रेम को अधिक जता दिया।

माँ की नसीहतें बच्चों के लिए
औषधि से कम नहीं
उसमें होते हैं अनेकों सुरक्षाचक्र
जो बचा लेते हैं हमें हमारा हम खोने से
माँ ने हमेशा हमारे लिए
प्रेम और सुरक्षा चक्र दिया।

हमारा अतीत और भविष्य
माँ की शिक्षा, प्रेरणा-
संदेश से हुआ परिपूर्ण 
माँ के न रहने पर
समझ आता है-माँ क्या थी?

सच, इस धरती पर 
माँ जैसा कोई नहीं, माँ, माँ थी।
***


खोज 

सूरज की लालिमा अब भी
भोर होते ही दिखाई देती है
दिखाई देती हैं चिड़ियाँ 
चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई देती है
दिन बरस महीने सब आए
पर्व-त्यौहार सब आकर चले गए 
माँ गईं, तो कभी नहीं आईं
पिताश्री गए, तो कभी नहीं आये 
माँ-पिताश्री की मधुर आवाज़ सुनाई नहीं देती।

गलतियाँ अब भी करता हूँ 
जाने-अनजाने 
सांझे-बिहाने करता हूँ गलतियाँ
फर्क इतना है कि 
पहले करता था गलतियाँ 
बोल पड़ती थी कभी माँ
सुधर जा! कह देते थे बाबूजी 
कुछ खोज रहा हूँ, नहीं मिल रहा 
अब माँ-पिताश्री की हिदायते नहीं आतीं। 

ओढ़ने-बिछाने से लेकर  
हँसने-गाने और रो देने पर
पड़ती थी डाँट,
कुछ बन जाने, न बिगड़ने की सीख
देर रात बेवजह घूमकर आने 
पर बेरुखी और गुस्सा
कितना अच्छा था न,
अपना सा, कितना सच्चा था न
अब ये न सुनने को मिलता है, तो
उन्हें खोजते अंतस्थल, मन-चित
अब माँ-पिताश्री के न मिलने पर, 
दिल रो पड़ता है, आँखें भर आतीं।
***

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