'टापुओं पर पिकनिक' के बहाने प्रबोध कुमार गोविल का वर्तमान चिन्तन

विजय कुमार तिवारी


समीक्षित कृति: टापुओं पर पिकनिक (उपन्यास)
उपन्यासकार: प्रबोध कुमार गोविल
मूल्य: ₹ 500/-
प्रकाशक: किताबगज प्रकाशन, गंगापुर सिटी (राजस्थान)


अपनी रचनाओं के लिए लेखक औपन्यासिक विधा का चयन करते हैं क्योंकि वहाँ स्वयं को विस्तार देना सम्भव दिखता है, पूरा आसमान खुला रहता है, उड़ने और अपनी कलाबाजियों को दिखाने के लिए। इसका परिदृश्य बड़ा व विशाल होता है, यह बड़े काल-खण्ड को समेट लेता है, पात्रों की संख्या अनगिनत और कथ्य-कथानक विस्तार लिए होते हैं। उपन्यासकार यथार्थ को देखता, समझता व अनुभव करता है और अपने अनुभवों को औपन्यासिक विधा में सुगमता के साथ अभिव्यक्त करता है। वह चाहता है, उसका अनुभव, उसकी पीड़ा, संवेदना यथार्थतः पाठकों तक पहुँचे, उसके उद्देश्यपरक लेखन को लोग समझें और जन-जन के संघर्षों को कोई सकारात्मक आधार मिले। इस तरह हर रचनाकार का, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र का सारा अनुभव एवं उसका विचार उसकी रचनाओं में देखा जा सकता है। आज हमारे जीवन में, समाज में, हमारे सम्बन्धों और व्यवहारों में तीव्र गति से बदलाव या रूपान्तरण दिखाई देता है। हमारा जागरुक लेखक इन्हें समझता और अनुभव करता है। वह अनुभव करता है, हमारे आपसी रिश्ते बदल रहे हैं, हमारी प्राथमिकताएँ बदल रही हैं, हमारे सामने नई-नई चुनौतियाँ खड़ी हो रही हैं, पुरानी मान्यताएँ बदल रही हैं, हमारी राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक स्थितियों में तेजी से परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं और आज का जीवन सहज नहीं रह गया है। इन सबका प्रभाव मनुष्य पर ही पड़ना है, वही तो सबके केन्द्र में होता है। उपन्यास विधा इन सारे सरोकारों को कोई सुसंगत, सुदृढ़, बड़ा धरातल देती है और रचनाकार अपने मनोनुकूल अभिव्यक्त हो पाता है।

विजय कुमार तिवारी
ऐसे ही जयपुर, राजस्थान से बहुचर्चित उपन्यासकार, साहित्यकार प्रबोध कुमार गोविल जी हैं जिनका विपुल मात्रा में लिखा साहित्य पाठकों को प्रभावित कर रहा है। मेरे लिए सुखद है, मुझे भी उनके कहानी संग्रहों, आत्म-कथाओं, फिल्म आधारित चरित्रों और उपन्यासों को पढ़ने, समझने का अवसर मिला है तथा मैंने उनकी अनेक पुस्तकों की समीक्षाएँ की है।

अभी मेरे सामने उनका चर्चित उपन्यास "टापुओं पर पिकनिक" है जो किताबगंज प्रकाशन से छपा है।  गोविल जी भूतकाल की अपेक्षा भविष्यकालीन चिन्तन करते हुए समकालीन लेखन को अपने तरीके से प्रभावित करते हैं। भविष्य की दस्तक को वर्तमान में अनुभव करना और सार्थक सृजन करना उन्हें दूसरों से अलग करता है। वे आज की पीढ़ी की नब्ज पहचानते से लगते हैं और उनकी पुस्तकें इसका प्रमाण हैं। वे चुपचाप अपने सृजन में लगे रहते हैं और सहज ही सर्व-सुलभ हैं। वैचारिक मतभेद या वादों की कोई समस्या नहीं है उनके लेखन में। उन्हें जो कहना है, जो लिखना है, खुले मन से चुपचाप लिखते-कहते रहते हैं। उनकी सामाजिक चेतना जागृत दिखाई देती है और वे इसके प्रति प्रतिबद्ध रहते हैं। उनके पात्र सामाजिकता से इतर नहीं हैं बल्कि उनकी प्रतिबद्धता भिन्न तरीके से आकर्षित करती है। मनोवैज्ञानिकता और जीवन की जटिलताओं को उनकी रचनाओं में स्पष्टतया चिह्नित किया जा सकता है। वे समलैंगिकता जैसे विषय को अपने सृजन का आधार बनाते हैं और इससे जुड़ी समस्याओं, भावनाओं को दुनिया को बताना चाहते हैं। यह एक तरह से उनका साहस ही कहा जाना चाहिए।

तेरह वर्ष के आर्यन ने, समान वय के चार अन्य साथियों के साथ मिलकर किशोरावस्था वाले ग्रुप का नाम रख लिया "टापुओं पर पिकनिक"। कोरोना काल का दौर है और हर किसी का एक-दूसरे से मिलना-जुलना, कहीं आना-जाना प्रतिबंधित रहा है। इस ऑनलाइन ग्रुप में सामाजिक मीडिया के माध्यम से सभी एक-दूसरे से जुड़े हैं। ध्यान रखा गया है कि ग्रुप में कोई अन्य न आ सके, न इनकी बातें जान सके और न कोई दखल दे सके।

किसी ने लिफ्ट में कोई शब्द लिख दिया था जिसको लेकर शिक्षक आपस में बातें कर रहे थे कि टीन एजर बच्चे ये सब लिखेंगे ही। आर्यन की जिज्ञासा जाग उठती है उस शब्द के बारे में। स्कूल खुल गया है, एक-दूसरे से मिलकर बच्चे प्रसन्न हैं और यह खुशी सभी के चेहरों पर फैली हुई है।

गोविल जी को अपने विद्यार्थी जीवन के साथ-साथ सम्पूर्ण जीवन में बाल मनोविज्ञान को समझने का खूब सुअवसर मिला है। यह उपन्यास बाल और युवाओं के मनोविज्ञान को बेहतर तरीके से उजागर करता है। उस उम्र की कुंठाएं, जुगुप्साएँ और भीतरी बदलाओं को यहाँ सफलता पूर्वक विस्तार दिया गया है। लेखक अपने भीतरी मनोभावों को व्यक्त करने से कोई परहेज नहीं करता, भले ही कोई कुछ भी कहे। कभी-कभी आपसी खुलापन फूहड़ तरीके से उभरता है जो उस उम्र की सच्चाई होती है। लेखक ने बड़ी सहजता से उपन्यास की पूरी कथा को बुना और चित्रित किया है।     

आर्यन अपनी आगामी योजना के बारे में साथियों को बताता है, सभी खुश और सहमत होते हैं। उसने पिता से अपने बर्थडे गिफ्ट के रूप में मांगा कि वह अपने पाँच दोस्तों के साथ रात भर  के लिए कहीं सैर पर जाना चाहता है। स्वाभाविक ही है, पिता ने अस्वीकार कर दिया। लेखक का विश्वास है कि जीवन में कभी-कभी सुखद संयोग बनते ही हैं, उन्होंने लिखा-"एक कहावत है-बिल्ली के भाग से छींका टूटना।" आगोश के माता-पिता को कहीं जाना पड़ जाता है और उन्होंने उस दिन अपने ही घर में पाँचों मित्रों को रात भर साथ रहने की छूट दे दी। सबको अपने-अपने घरों से भी अनुमति मिल गई।

गोविल जी के लेखन की विशेषता है, वह लगातार परिदृश्य व कथानक में बदलाव करते रहते हैं। इसका सीधा प्रभाव पाठकों और पात्रों पर दिखाई देता है। बच्चे तो बच्चे ही हैं, उनके जूते फैले हुए हैं। कपड़े बदलने को लेकर थोड़ी झिझक है। साजिद दूसरे कमरे से रोती हुई बिना कपड़ों के लड़की को देखकर भागता आया है। नीचे के बाथरूम में खून फैला हुआ है। दोनों दृश्य बच्चों को डराने वाले हैं। आर्यन अनुराधा मिस की गुड टच व बैड टच वाली बातें याद दिलाकर कोई ऐसा ही खेल खेलने का प्रस्ताव करता है। आगोश की मम्मी सुबह-सुबह शादी के कार्यक्रम से लौट आई है और दोनों घटनाओं को लेकर चिंतित है। गोविल जी अपने लेखन के प्रति पाठकों की रुचि जगाने में समर्थ हैं और पात्रों को भी रहस्य-रोमांच के दृश्य बुनने के लिए प्रेरित करते हैं।

उन्होंने अपने इस उपन्यास को 100 खण्डों मे विस्तार दिया है और इसका प्रारूप किसी जासूसी या तिलस्मी उपन्यास की तरह लगता है। साथ ही बालकों की तीव्र बुद्धि, उनकी सोच और अपनी परिस्थितियों को लेकर शंकाएँ पाठकों को बाँधने वाली हैं। आगोश की मम्मी ने सभी बच्चों को उनके घरों तक पहुँचा दिया है। गोविल जी लिखते हैं-"कहते हैं मजबूरी सब सिखा देती है। आज आगोश को एक ही रात में अपनी उम्र से बड़ा कर दिया था।" उसने मम्मी को उस रात की घटना की विस्तार से जानकारी देता है और उसे लगने लगा है कि उसके पापा के क्लिनिक में गलत काम हो रहा है। बच्चों ने अपने तरीके से तहकीकात शुरु कर दी है। गोविल जी ने एक-एक दृश्य बाल मन के अनुरूप रचा है और रहस्यमय तरीके से चित्रित किया है। बड़ों की अपनी सोच व दुनिया होती है और बच्चों की अपनी। किसी भी लेखन में परिवेश और परिस्थितियों का बड़ा योगदान होता है। यहाँ बच्चे शंकालु हो चुके हैं। उनके मनों में अवहेलना और तिरस्कार के भाव जन्म ले चुके हैं। साहित्यकार की मानसिक उड़ान में घटनाएँ सहायक होती हैं और कड़ियाँ बढ़ती चली जा रही हैं। इसमें स्त्री की भूमिकाएँ भी खंगाली जा रही हैं और गोविल जी परत दर परत रहस्य बुनते जा रहे हैं। उनकी संवाद शैली रोचक है और इसका उन्होंने कदम-कदम पर उल्लेख किया है। कहीं-कहीं दार्शनिकता का पुट उनके लेखन को महत्वपूर्ण बना देता है, लिखते हैं-"सच में, विश्वास भी शीशे की बनी मूर्ति सा होता है, एक बार उसमें दरार आ जाए तो आ ही जाती है। फिर लीपापोती से कुछ नहीं हो पता।" मनप्रीत के व्यवहार ने बच्चों को और शंकालु बना दिया है। साजिद और आगोश के पिता का चरित्र उनको संदिग्ध लगने लगा है। गोविल जी उनके मुँह से बहुत कुछ कहवा रहे हैं और दारू पीने की बात भी। बाल चरित्र के विकास का अनूठा चित्रण करते हैं और लिखते हैं-"शब्द भी कैसे किसी चीज का आवरण बदल देते हैं।"

गोविल जी ने खण्ड 21 में विस्तार से उन अनुभूतियों को टटोलने और आकार देने की कोशिश की है जो मनप्रीत और साजिद के बीच पनप रही है। भावनाओं की प्रस्तुति युवाओं को रोमांचित करने वाली है। बीच-बीच में पात्रों का मनोविज्ञान उभरता है, मनप्रीत सोचती है-"शायद लड़कों की दोस्ती ऐसी ही होती है। अच्छे दिनों में दोस्त, बुरे दिनों में अजनबी।" गोविल जी किसी गहरे भाव में लिखते हैं-"स्कूल के बच्चे तो नर्सरी के पौधों की तरह ही होते हैं, एक से, दूर-दूर गमलों में सजे हुए। लेकिन इन्हीं पौधों में बाद में फूल भी लगते हैं और फल भी। इन्हीं पौधों की छांव भी होती है, जब ये पेड़ बन जाते हैं।" स्वाभाविक है-मनप्रीत को गुदगुदी होती है। वह शरमाती है साजिद के उपर लगे इल्जाम को सुनकर कि इसने तो अपनी युवावस्था के औजारों से एक नई जिन्दगी का बीज ही बो दिया--वो भी एक अविवाहित लड़की के बदन में। मनप्रीत की भावनाएँ प्रकृति के साथ जो दृश्य रचती हैं, गोविल जी उन्हें कवित्व शैली वाले वाक्यों में बदल देते हैं-"मनप्रीत का ध्यान उस ठंडी हवा पर था जो साजिद के माथे के बालों को लहरा कर छितरा देती थी, उस धूप पर था जो ऊँचे पेड़ों की फुनगियों से छन कर पेड़ों के पत्तों के बीच से जगह बना कर साजिद के चेहरे पर पड़ती और फिर ओझल हो जाती। साजिद की उस गर्म हथेली पर था जो मनप्रीत की कलाइयों पर हल्का गुलाबी दबाव बनाती हुई उसकी अंगुलियों को मरोड़ देने की हद तक छू देती थी।" 

उपन्यासकार ने युवाओं के जीवन में घटने वाली हर स्थिति, एक-दूसरे की छुअन और भीतर की बदल रही अनुभूतियों को समझाने का प्रयास किया है। पात्रों में संकोच है, उत्सुकता है और रोध-प्रतिरोध भी। जोश तो होता ही उस उम्र में और गोविल जी उम्र की सारी बातों को खुलकर बताना चाहते हैं। घटनाओं की कड़ियों को जोड़ना और दृश्य चित्रित करना उनकी अपनी विशेषता है। कहानी का संदेश है, जब कोई समय से पहले गोपनीय बहुत कुछ जान लेता है या घर में हो रहे अनैतिक, आपराधिक कार्यों को समझता है, उसका व्यवहार बदलने लगता है। आगोश ऐसा ही होता जा रहा है, वह सिगरेट का कश खींचता है, सफाई करने वाली लड़की को चूम लेता है और अपने पिता के प्रति सम्मान का भाव नहीं रखता। गोविल जी लिखते हैं-"इन सब बातों की खुली चर्चाओं से ये लड़के समय से पहले बड़े हो रहे थे। उनके बीच दुनियादारी, कमाई, सेक्स आदि की बातें होने लगी हैं। वे मानसिक रोगियों पर पूर्णिमा के चाँद के प्रभाव की चर्चा करते हैं और आर्यन के अनुभव को लिखते हैं। उसे विक्षिप्त महिला की सेवा करने का अवसर मिला है। उसकी पृष्ठभूमि में सामूहिक बलात्कार, क्रूरता के साथ हत्या का प्रयास, मधुरिमा के घर में एक चप्पल और आगोश के यहाँ दूसरा चप्पल मिलना, गोविल जी एक-एक कड़ी जोड़ रहे हैं। हर किसी के मन में जुगुप्सा होती है। ग़ोविल जी इन बच्चों के बीच नंगी स्त्री का बार-बार दृश्य ले आते है और बाल मनोविज्ञान समझाते हैं। इसी कड़ी में रिसार्ट में पाँच लड़के और दो लड़कियों का रात्रि प्रवास किसी नई कहानी की शुरुआत होने वाली है।

आगोश सचेत करता है-'फ्रेंड्स, हम यहाँ खुशी ढूँढने आए हैं।' सभी सहमत होकर प्रस्तावित योजनानुसार सक्रिय होते हैं। गोविल जी अपने कथानक में पात्रों की उम्र के अनुसार संवाद, उनके मनोभाव और कार्यकलाप चित्रित करते हैं तथा उनकी उड़ान को रेखांकित करते हैं। यहाँ व्यक्ति-विकास की अवधारणा काम कर रही है और यह भी कि किस तरह परिस्थितियाँ, घटनाएँ जीवन-विकास को प्रभावित करती हैं। देखने में पूरा का पूरा उपन्यास बकवास लग सकता है परन्तु ऐसा है नहीं। इसके पीछे गोविल जी का स्पष्ट चिन्तन काम कर रहा है। उन्हें इस उम्र को लेकर बहुत कुछ पता है और अपने सृजन के द्वारा जनमानस तक अपना संदेश पहुँचाना चाहते हैं। यह केवल टीनेजर बच्चों के लिए नहीं है बल्कि उनके माता-पिता को भी सचेत करने वाला है। वे बीच-बीच में छोटी-छोटी कहानियाँ जोड़ते हुए पात्रों के मन को गुदगुदाते चलते हैं। यह उनकी अपनी शैली है, मोड़ देकर चमत्कृत करना। सबसे अधिक बच्चों की भावनाओं के अनुरूप उनकी भाषा व बोली का चयन है। आगोश से उसके पिता डरने लगे हैं। गोविल जी जीवन का मनोविज्ञान समझाते हैं, गलत मार्ग पर चलने वाले को डरना पड़ता है। उन्होंने लिखा है-"शायद डाक्टर साहब ये नहीं जानते कि बच्चे अपने माता-पिता के जिस्म से पैदा होकर भी अपना दिमाग और नक्षत्र उनसे अलग लेकर आ सकते हैं।" आर्यन अरुंधति जौहरी की कम्पनी में माॅडल चुन लिया गया है। आगोश तनिक दुखी होता है। आर्यन को उसकी डायरेक्टर अरुंधति स्क्रिप्ट देती है-"तुम इसे इंटेसिवली पढ़ लो एक बार।" आर्यन घर आकर पढ़ना शुरु करता है। उस कथा में निर्वस्त्र साधु का चरित्र है जिससे अचानक उसका बचपन का मित्र जंगल में मिलता है। गोविल जी उसके सन्यासी बनने के पीछे की विचित्र कथा चित्रित करते हैं और शरीर से निकलने वाले अमृत बूंद की बात जोड़ते हैं। कभी-कभी उनका लेखन तिलस्मी भाव जगाता है और रोमांचित करता है। आगोश के घर में दिखी नंगी लड़की की कहानी धीरे-धीरे खुल रही है और उसका सम्बन्ध उसके पिता के अनैतिक कारनामों से जुड़ता दिखाई देता है। आर्यन और उसके डाक्टर को लगने लगा है कि यह पगली सी दिखने वाली लड़की पूरी तरह पागल नहीं है। गोविल जी यथार्थ और वीभत्स दृश्य चित्रित करते हैं जो आज के समाज में आम बात हो चली है।

वे अपने उपन्यास में धनाढ्य घरों के टीनेजर लड़के-लड़कियों की बढ़ती उम्र, उनकी रुचियाँ, उनकी स्वच्छन्दता, उत्सुकता आदि का सम्मिश्रण करते हैं, उनकी भाषा सड़क छाप होती जाती है, उन्हें संकोच नहीं होता कुछ भी बोलने-कहने में और वे जीवन का सारा गोपन-अगोपन, सब कुछ जानते हैं। बच्चे जानते ही नहीं बल्कि सब कुछ करते भी हैं। यहाँ संवाद के क्रम में द्वय-अर्थी शब्दावली और वाक्य खुलकर लिखे गए हैं और वह सब भी जिससे कोई स्वान्तःसुखाय अनुभूतियों के जाल में जीवन भर उलझा रहता है। उन्होंने लिखा है-"ये जवानी की उम्र ही ऐसी होती है कि तरह-तरह के उल्टे-सीधे कार्यक्रम बनाने का दिल करता है और इन्हीं की बदौलत सब कुछ अस्तव्यस्त हो जाता है।" आगोश की मम्मी का चरित्र-चित्रण लेखक ने बड़े स्वाभाविक तरीके से किया है। उनकी मजबूरी, बेटे के भविष्य की चिन्ता, पत्नी व मां का चरित्र निभाना आदि चल रहा है। वह चिंतातुर हो बेटे की बातें सुनती हैं, दुखी होती हैं, नौकरानी को रेप करने की बात पर उखड़ जाती हैं और बेटे को थप्पड़ जड़ देती हैं। आर्यन को साधु का चरित्र निभाना है, वह भी नंगे साधु का। देर तक जागकर स्क्रिप्ट पढ़ता है-दिलचस्प कथानक है। गोविल जी जीवन में संयोगों के खेल को समझते हैं। भाई अपाहिज है और बहन बेऔलाद। दोनों एक-दूसरे का सहारा बनते हैं। सच और स्वाभाविक होते हुए भी ये दृश्य कोई जुगुप्सा या रहस्य जगाने वाले हैं। बहन मां होती है, समझते हुए भी घटित दृश्य किसी भिन्न मनोविज्ञान से जोड़ते हैं। यह उनकी गहन समझ, अपनी सोच और साहस दिखाता है। वे ऐसे चिन्तन और संयोग चित्रण करने में माहिर हैं। बहन-भाई के बीच घटा दृश्य कुछ ऐसा बना कि भाई को ग्लानि होती है, वह भाग खड़ा होता है, घर से दूर, किसी जंगल में और सन्यस्त जीवन बीताने लगता है। गोविल जी जैसे अनुभवी और कल्पनाशील लेखक ही ऐसा चुनौतीपूर्ण लेखन कर सकते हैं। नंगई, नंगा होना, नंगा करना या नंगा देखना इन पात्रों के लिए आम बात है और लेखक की भी ऐसे चित्रण में कोई सुखद सहमति है। उनके रहस्य और उनका उद्घाटन करते हुए गोविल जी चौंकाते रहते हैं। बीच-बीच में संशय के दृश्य रोमांचित करते हैं। आगोश की मम्मी परेशान है-"कैसी आफत है, कमरे में जवान नौकरानी और बिगड़ैल जवान लड़का एक साथ पड़े हैं।" गोविल जी देश-दुनिया के दृष्टान्त जोड़ते रहते हैं और कहानियाँ बुनते चलते हैं। आज की पीढ़ी को लेकर वे बिल्कुल स्पष्ट हैं और उन्होंने लिखा है लड़के-लड़कियों में कोई दुराव-छिपाव नहीं है, उनके बीच हर तरह के सम्बन्ध बनते -बिगड़ते रहते हैं। सन्यास को लेकर उनको लगता है, अब अधिकांश लोग जीवन के संघर्षों से पलायन करते हैं और सन्यास का मार्ग चुनते हैं। उनकी लिखी पंक्तियाँ देखिए-"आखिर वो कौन से दुख, पश्चाताप या परिस्थितियाँ हैं जो जीते जी एक इंसान की जिन्दगी बुझा देती है। क्यों प्रेम, वात्सल्य या वांछना के सहारे दुनिया में आया हुआ आदमी किसी बात पर दुनिया से ही मुँह छिपाकर घूमता है।" उनका मत है कि तपस्या या साधना दुनिया में रहते हुए भी की जा सकती है, जंगल में जाने की आवश्यकता नहीं है।

गोविल जी की खास बात है, एक ओर उनके पात्र विकृतियों से जूझते दिखाई देते हैं, साथ ही वह कोई दार्शनिक चिन्तन, सुधार या नैतिकता की बातें भी करते हैं। आगोश को प्रशिक्षण के दौरान तेन नामक जापानी मित्र मिल गया है। दोनों के बीच संवाद का दौर चलता रहता है। वह बताता है-आजकल जापान सहित अनेक देशों में "यौन पर्यटन अथवा सेक्स टूरिज्म" लोकप्रिय हो रहा है। इसका कारण और उद्देश्य भी समझाता है। आगोश को लगता है, नैतिक मूल्यों को लेकर जितना अपने देश के लोग बँधे हैं, उतना अन्य देशों में नहीं है। दुनिया अब नैतिक की जगह व्यापारिक मूल्यों पर चलती है। तेन हँसते हुए कहता है-"यही समस्या है, तुम लोग बुरा करने से नहीं डरते, बुरा करते हुए पकड़े जाने से डरते हो।" वह पूछता है-"तुम्हारे यहाँ लोग चलती कार से शीशा खोलकर सड़क पर रैपर्स, छिलके, बोतलें आदि क्यों फेंक देते हैं?" गोविल जी याद दिलाते है-घर से निकलते समय गाड़ी में फर्स्ट-एड बाक्स लेकर निकलना चाहिए। तेन के साथ पिता के बन रहे जिस हास्पिट्ल की खोज में आगोश लगा हुआ है, उसकी जानकारी हो गई है और वे दोनों उस निर्माणाधीन इमारत को गौर से देख रहे हैं। तेन को आगोश से पता चलता है कि आर्यन ने मधुरिमा को प्रिगनेंट कर दिया है और शादी से भाग रहा है तो वह उसे भारी रकम देता है और उसे जापान जाने की व्यवस्था करता है। मधुरिमा आर्यन की निशानी से छुटकारा नहीं चाहती और बच्चे को जन्म देना चाहती है। गोविल जी आधुनिक उपलब्ध संसाधनों के उपर भावनाओं का मुद्दा उठाते हैं और देश की सभ्यता-संस्कृति को लेकर खूब चिन्तन करते हैं। तेन बहुत कुछ हमारे देश की कमजोरियों के बारे में बताता है और जीवन में व्यावहारिक होने की चर्चा करता है।

गोविल जी कहानी को गति देते हुए आगे बढ़ा रहे हैं। मधुरिमा की मनःस्थिति, उसकी तैयारी और मां-पिता की जानकारी के बिना तेन के साथ विवाह आदि जैसे घटनाक्रमों के पीछे लेखक का आधुनिक दृष्टिकोण झलकता है-आज की पीढ़ी निर्णय लेने में हिचकती नहीं, देर नहीं करती और चुनौतियाँ स्वीकार करती है। बच्चे व्यावहारिक हैं, उन्हें भावुकता देर तक प्रभावित नहीं करती। वे साहसी भी हैं। मधुरिमा किसी अपराध बोध से ग्रसित नहीं है और लेखक भी शायद इन्हीं भावनाओं का पक्षधर है। सभी युवा हैं, समर्थ हैं तो उनके बीच का हास-परिहास चित्रित करने में गोविल जी की अपनी कोई उड़ान दिखाई देती है। वे लिखते हैं-"सच में, जीवन में जब आदमी ये तय कर लेता है कि उसे क्या करना है तो एक सुकून सा मिलता है।" सबसे महत्वपूर्ण है, प्रसंगों, घटनाओं को क्रमवार व्यवस्थित करना व सजाना ताकि कुछ भी अशोभन न हो। बीच-बीच में रोमांस के प्रसंग पाठकों को आनंद से भर देते हैं। साथ ही सम्बन्धों की जटिलता के प्रश्न भी उठते हैं जिस पर पात्रों का ध्यान जाता है। लेखक की यह अपनी समझ और दूरदर्शिता है जो ध्यान खींचती है।

आर्यन नई कहानी की  स्क्रिप्ट पढ़ रहा है जिसमें बूढ़े से गंजे आदमी का चरित्र है। वह तीन दिनों के लिए वापस घर आने वाला है। उसके स्वागत में कार्यक्रम बनाए गये हैं क्योंकि अब वह स्टार बन चुका है, उसकी प्रसिद्धि है और सभी उसे देखना-सुनना चाहते हैं। अचानक किसी लड़के ने पूछ लिया-हमने सुना है कि आपका एक बच्चा विदेश में पल रहा है? आर्यन भौंचक्का है, सभी स्तब्ध हैं और अफरातफरी मच जाती है। गोविल जी की विशेषता है, वे शब्दों से खेलना जानते हैं, दृश्यों को बुनना जानते हैं और कहानी में मोड़ देकर अपनी लेखन कला का दर्शन करवा देते हैं। आर्यन स्वयं को दोषी मानता है। गोविल जी लिखते हैं-"उसे लगता था कि उसे दोस्ती, लड़की, सेक्स, गर्भ और बच्चे जैसे संवेदनशील मामले को इतने हल्के में नहीं लेना चाहिए था। आधुनिकता परम्पराओं को रौंदकर फेंक देने का नाम नहीं है।" यह पूरा का पूरा उपन्यास युवाओं की सक्रियता, उनका जोश और कुछ कर गुजरने की भावनाओं से भरा हुआ है। कहीं-कहीं जासूसी जैसे प्रसंग रोचक तरीके से लेखक की खोज-वृत्ति दर्शाते हैं और नाना कड़ियों  को जुड़ते हुए दिखाई देते हैं। साजिद और मनप्रीत की शादी हो गई है और वे भी जापान पहुँचते हैं। आगोश का कारबार खूब फल-फूल रहा है। गोविल जी मधुरिमा के मीठे से अचंभे वाले भाव की व्याख्या और परिभाषा बताते हैं। संवाद करते हुए भाव-संवेदनाओं को पात्रों के द्वारा चित्रित करना उनकी अपनी क्षमता है। व्यवसाय के सिद्धान्तों पर भी उनकी अपनी राय है और वे अपनी दार्शनिकता दिखाते हैं। यह प्रसंग भी बहुत तथ्यात्मक है जिसमें आगोश की मम्मी मनन से तर्कपूर्ण तरीके से आगोश के मन को टटोलने की जिम्मेदारी देती है और अपनी शंका बताती है। गोविल जी का व्यंग्यात्मक हास्य देखिए-"यार मुसीबत है, जवान होने के बाद शादी नहीं करो, लड़की नहीं पटाओ तो घर वाले क्या-क्या सोचने लग जाते हैं--शादी करो, शादी कर ली तो बच्चे पैदा करो--साला यह देश कभी नहीं सुधर सकता।" मधुरिमा-मनप्रीत के बीच के संवाद में अप्रिय स्थिति पैदा हो जाती है जब मनप्रीत मधुरिमा का तेन के साथ तालमेल के बारे में पूछती है।

लेखक ने अपने इस उपन्यास में मनुष्य के सामने आने वाली तकनीक की चुनौतियों के साथ-साथ बहुत से बदलाओं की संभावना दिखाते हुए लिखा है-भविष्य में आदमी के कम हो जाने पर रोबोटों के काम संभालने और तकनीकी दुनिया गढ़ने के विज्ञान के इरादे देख आए। वह गहराई से नवविवाहितों के कोरे बदन का एकांतिक अंग-भंग समझाना चाहते हैं। मधुरिमा के मां-बाप सत्य जानकर दुखी तो होते हैं परन्तु रिश्ते-नाते के लोगों को निमंत्रित करके स्थिति को सार्वजनिक करते हैं और आधी सच्ची-आधी बनावटी कहानी गढ़ देते हैं। आगोश की मम्मी अपनी शंका को लेकर मनोचिकित्सक से मिलती है। वह उसके कमरे में सीसीटीवी लगवा लेती है। गोविल जी समलैंगिकता को लेकर विस्तार से विमर्श करते हैं और उससे जुड़े सन्दर्भों पर प्रकाश डालते हैं। आर्यन जीवन की क्षणभंगुरता महसूस करता है। उसे तेन की सच्चाई मालूम होती है। गोविल जी हर नया प्रसंग जोड़ते हुए "गजब" शब्द का प्रयोग करते हैं और बार-बार गजब करते हैं। नया गजब यह हुआ है कि आगोश घर छोड़कर कहीं चला गया है। पिता, पुलिस और सारे मित्र खोज में लगे है। सूचना देने वाले को 10 लाख रुपये इनाम में मिलने वाले हैं। उनके लेखन की एक विशेषता यह भी है, वे नाना कोणों से चीजों को समझाना चाहते हैं और उनकी तहकीकात खूब रोचक तरीके से आगे बढ़ती है। अचानक आर्यन के कमरे मे आगोश उपस्थित होता है और अपनी भविष्य की योजनाओं की जानकारी देता है। यह किसी तिलस्म से कम नहीं है। गोविल जी जीवन-मृत्यु को लेकर चिन्तन करते हैं, बड़े ही निश्चिन्त और सहज ढंग से मृत्यु पर लिखते हैं-जिंदगी कौन सी किसी से उधार माँगकर लाए थे जो लौटानी है। खतम तो खतम।" सचमुच एक दिन आगोश को श्रद्धांजलि दी जा रही है। किसी हेलिकॉप्टर दुर्घटना का हवाला दिया जा रहा है जिसमें तीन लोगों की मृत्यु हुई है।

कोई भी लेखक वही लिखता है, जिस तरह की प्रवृत्ति समाज में दिखाई देती है। टीनएज से लेकर युवा होती पीढ़ी के संघर्ष, उनकी उड़ान, उनके हास-परिहास, सोच और बेबाक जीने के ढंग को उन्होंने पूरी गम्भीरता से चित्रित किया है। जो जितना चर्चित स्टार है, उसके व्यवहार में बहुत बदलाव, खिलंदड़ापन और मान्यताओं को तोड़ने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। आर्यन अक्सर अपने कमरे में वस्त्रहीन पाया जाता है और उसके साथी भी बातचीत में नंगई वाली भाषा बोलते हैं। लेखक का मंतव्य समझना सहज नहीं है। कभी-कभी लगता है-क्या हमारा सम्भ्रान्त वर्ग चहारदीवारी के भीतर ऐसे ही नंगा रहना चाहता है? घर में पूरा परिवार होता है, तो क्या कोई नई जीवन शैली शुरु हो गई है? वैसे इस उपन्यास में अनेक मुद्दों को छूने की कोशिश हुई है जो देश-समाज के लिए चिन्ता का विषय हैं। आगोश के डाक्टर पिता का सम्पूर्ण कार्यकलाप, कहानियाँ, घटनाओं का पूरे परिवार पर पड़े दुष्प्रभाव का चित्रण  संदेश देने वाला है।

आर्यन वापस आकर विचित्र से दिखने वाले आदमी को अपना पीए बना लिया है। गोविल जी अपने जीवन में फिल्मी दुनिया के लोगों से जुड़े रहे हैं और वहाँ की बहुत सी सच्चाइयों को जानते हैं। आर्यन को आधार बनाकर उन्होंने बहुत कुछ लिखा और दुनिया को बताने की कोशिश की है। आगोश की मृत्यु के बाद भी उसके पिता की कार्यशैली में बदलाव नहीं हुआ है बल्कि उनका कारबार विदेशों तक फैल रहा है। गोविल जी मेडिकल के पेशे से जुड़े सारे गलत कारनामों पर चर्चा करते हैं और पाठको को सावधान करते हैं। आगोश की मम्मी चाहती है, दिल्ली वाले हास्पिटल के विशाल प्रांगण में आगोश की मूर्ति लगाई जाए। अनेक सहमतियों, योजनाओं के साथ इस दिशा में काम चल रहा है। गोविल जी कहानी को भारत, चीन, जापान और सिंगापुर तक फैलाते हैं और एक से एक दृश्य खड़ा करते हैं। मनन और मान्या की शादी जैसा मोड़ भी जुड़ता है और आपसी सम्बन्धों का दायरा बढ़ता जाता है। मधुरिमा का बेटी और तेन के साथ भारत आना, फिर वापस जाना जैसे अनेक रोचक, संवेदनाओं से भरे चित्र अलग प्रभाव छोड़ते हैं। यही तो गोविल जी की खासियत है, उनकी कल्पनाओं की उड़ान चकित-विस्मित करती है। पात्रों की भावनाएँ खूब मुखरित हुई हैं इन चित्रणों में और सुखद रहस्य दिखाती रहती हैं। आर्यन के साथ जुड़े लोग फिल्मी भाषा बोलते हैं। गोविल जी खोल कर लिखते हैं कि आज एक लड़की उसके पास पूरी रात बिताने के लिए आने वाली थी। बात-बात में लड़की पटाने वाली भाषा लिखकर लेखक शायद आज के समाज की सच्चाई दिखाना चाहता है। वे पुनः गजब दृश्य दिखाते हैं-आर्यन आगोश की जो मूर्ति बनवा रहा है, बनकर तैयार होने के बाद अचानक चोरी हो गई है।

रहस्य, रोमांच से भरी यह कहानी और उसके पात्र गोविल जी के जीवन्त दृश्यांकन कला की छाप छोड़ने वाले हैं। वे अक्सर कोई तिलस्म रचते चलते हैं और पाठकों को अपनी भाषा से, लेखन शैली से चमत्कृत करते हैं। आगोश की मम्मी को हर हाल में मृत बेटे की मूर्ति बनवानी है और दिल्ली के हास्पिटल में स्मृति स्वरूप लगवानी है। इसके लिए वह मनन, मान्या के साथ जापान पहुँच जाती है, जहाँ आर्यन भी आने वाला है। तेन और मधुरिमा सारी व्यवस्था करते हैं। आर्यन कभी-कभी पश्चाताप करता है और अपनी जिन्दगी का मकसद तलाशता है। उसकी कम्पनी अगली फिल्म की हिरोइन के लिए सर्बिया की लड़की पर्सी को ले आते हैं। यह सारी करामात आर्यन का पीए बंटी करता है। गोविल जी अंत आते-आते सब कुछ नष्ट कर देने का बीड़ा उठाए हुए हैं। हास्पिटल का बुरी तरह से जलकर नष्ट हो जाना, जहाज दुर्घटना में डाक्टर सहित बहुत लोगों का मर जाना, टापू पर फिल्म शूट करना और चारों तरफ अफरातफरी, जलजला दिखाना सारे दृश्य भयभीत करते हैं और नाना रहस्यमय प्रश्न छोड़ जाते हैं। गोविल जी अनहोनी घटनाओं के पीछे किन्हीं बददुआओं को स्वीकार करते हैं, आधुनिकता की आड़ में हमारी प्राचीन भूमि-पूजन जैसे पवित्र विधि-विधानों का न करना मानते हैं। उन्हें लगता है-इतिहास कभी न कभी अपने-आप को दोहराता है। पर्सी आर्यन को बचा लेती है और वह अपनी पहली ही फिल्म के नायक से प्रेम करने लगती है। गोविल जी अपनी कथायात्रा को समेटते हुए अपने शहर जयपुर का दृश्य चित्रित करते हैं। कहानी के जीवित पात्रों के माध्यम से संवाद, भागदौड़ व संवेदनाएँ जीवन्त करते हैं। सबकी चिन्ता है-आगोश की मम्मी को बचाना और उन्हें दुख की गहन पीड़ा से बाहर निकालना। गोविल जी अपनी कहानी को क्लाइमेक्स देते हुए आगोश को जीवित दिखाते हैं जो बंटी की शक्ल धारण करके सम्पूर्ण घटनाओं का सूत्रधार बना हुआ है। गोविल जी लिखते हैं-अपने जिगरी दोस्त आगोश से लिपटकर आर्यन को दूर-दूर तक ये अहसास बाकी न रहा कि वो किसी ऐसे कातिल की बाँहों में है जो अपना जमीर बचाने के लिए अपने ही बाप और उसके घिनौने मनसूबे को मारकर आया है।

इस तरह यह उपन्यास वर्तमान जीवन की आपाधापी, खोखलापन, वैचारिक ह्रास, दूसरों को दुख पहुँचाकर लूट-खसोट, धन संग्रह आदि को गलत प्रमाणित करते हुए उसके अंत की व्याख्या करता है। हमारे जीवन को प्रभावित करने वाली नाना विसंगतियों पर चिन्तन गहरा प्रभाव छोड़ता है, अनेकों विचारों का समाधान  खोजा जाता है। उपन्यास गलत को गलत प्रमाणित करने में सफल हुआ है। यहाँ रहस्य है, रोमांच है. सहजता है, जटिलता है, प्रेम है और जीवन की गहरी सच्चाई है। यह उनका साहस ही है, उन्होंने बहुत कुछ यथार्थ लिखा है। जीवन के प्रश्नों से जूझना ही चाहिए, गोविल जी जूझते भी हैं और सच्चाई दिखाते हैं। यह शायद इसलिए याद नहीं किया जायेगा कि इसमें आधुनिकता का ताना-बाना है बल्कि यह भी देखा जायेगा कि हमारी भारतीय सोच कहीं न कही मर्यादित तरीके से स्वीकारी गई है।

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