प्रकाश मनु, अपनी राह पर चलता जा रहा एक मिशनरी

संस्मरण: महाबीर सरवर


डॉ प्रकाश मनु से पहली बार ही मुलाकात में कुछ ‘विप्लवी’ बातें हुई थी, यह याद कर आज भी ताज्जुब होता है।

दरअसल कुछ ‘विप्लवी’ तो उनसे मिलने से पहले ही हो चुकी थीं, जिनमें एक थी उनकी सुनीता से ‘अलौकिक’ शादी और सुनीता मेरी चचेरी बहन है। अब ऐसी रिश्तेदारी वाले पहली ही मुलाकात में यह सवाल पूछें कि क्या तुमने ‘थैंक यू मिस्टर ग्लाड’ पढ़ा है, फिर वह यह बताएँ कि वल्लभ सिद्धार्थ की कहानी ‘महापुरुषों की वापसी’ बड़ी विचलित करने वाली है तो जवाबदार बेहद बैकफुट पर आ जाएगा। और मैं वास्तव में हैरान था कि कुरुक्षेत्र में पी-एच.डी. कर रहे ये पति-पत्नी कितनी ‘ऑफबीट’, पर प्रचलित कलम घसीट रास्ते से बिल्कुल अलग राह पर चल रहे हैं।

जडॉ. सुनीता व प्रकाश मनु
एक और ‘विप्लवी’ बात। पता नही मुझे क्यों यह याद आता है कि मनु जी के उसी कमरे में मैंने किसी फोटो-संग्रह या आले में फ्रेम में उनका एक श्याम-श्वेत छाया-चित्र देखा था, साइड पोज में। उस फोटो का प्रभाव बिल्कुल वैसा था, जैसा अज्ञेय जी की जवानी के एक ऐसे फोटो को देखकर हुआ था। शायद तब अज्ञेय जी शहीद भगत सिंह की टोली के संपर्क में रहे हों या उसके कुछ वर्ष बाद का। बिल्कुल दृढ़संकल्प, समर्पित और संघर्षशील युवक का।

मुझे याद है कि उनसे मिलने के बाद करनाल आकर मैंने एक फोटोग्राफर से वैसा ही श्याम-श्वेत, फोटो, पूरी तरह प्रकाश और कोण संयोजन का निर्देश देकर खिंचवाया था। कमाल था, मेरे उस श्याम-श्वेत फोटो में अँधेरे, प्रकाश और कोण का संयोजन तो बिल्कुल सही था, पर मेरा चेहरा, ढाढ़ी समेत, किसी तड़ीपार का लग रहा था। खैर, मनु जी की अज्ञेय जी जैसी वह गुरु, गंभीर मुद्रा बनावटी नही थी। वे बोलते कम थे, पर मेरे साथ बहुत वाचाल हो जाते थे। मुझे उन्होंने जब भी किसी से मिलवाया, तो साधिकार, बड़े अपनत्व भाव से मुझे अपना भाई कहकर मिलवाया। मैं बड़े पछतावे में रहा हूँ कि मैंने ऐसा कोई भी काम ढंग से नही किया, जिसकी उन्हें मुझसे अपेक्षा रही होगी। उनके दरबार में मैं हमेशा आसामी हाजिर से ज्यादा की हैसियत नही रख पाऊँगा।

कहते हैं, अनिल बर्वे का उपर्युक्त नाटक प्रसिद्ध मार्क्सवादी नेता नागभूषण पटनायक के जीवन पर आधारित है। नागभूषण पटनायक के बारे में वीरभारत तलवार के एक लेख में जिक्र है कि सजा पाने पर वे बार–बार अधिकारियों से अनुरोध करते रहे थे कि क्योंकि उनका अंत तो निश्चित है, अतः उनके जीते जी उनके शरीर के प्रमुख अंग निकालकर जरूरतमंदों के शरीर में रोप दिए जाएँ। ऐसी बातों के जिक्र से स्पष्ट था कि मनु जी और सुनीता खुद को डी-क्लास करने की राह पर चले जा रहे थे। मध्यम या निम्न मध्यम वर्ग की बुर्जवा वर्दी वे उतार चुके थे। उस कमरेनुमा मकान में बहुत देर तक बातचीत, खान-पान चलता रहा।

दूसरी विप्लवी बात जो वहाँ नजर आई, वह थी सुनीता की शख्सियत का बिल्कुल कायांतरण। उस दिन सुनीता को देखकर मुझे लगा कि वह बन गई है (मेरे बड़े प्रिय शब्द के अनुसार) बिंदास। उसमे इतना आत्मविश्वास, चुलबुलापन और खाँटीपन मैंने कभी नही देखा था। मैंने शायद सुनीता को देखा भी लगभग दो-तीन साल बाद था, जब उसने शायद हिंदी से एम.ए. करने के बाद बी.एड. में दाखिला ले लिया था, और फिर पी-एच.डी. में दाखिला मिलने के कारण उसने बी.एड छोड़ दी थी।

मैं उसे देखकर हैरान था कि करनाल में यह लड़की कॉलेज के दिनों में इम्तिहान से ठीक एक दिन पहले बदहवास और ‘अब क्या करूँ’ की स्थिति में आ जाती थी। उसकी यह कमी बताते हुए मैं यह भी बता दूँ कि करनाल के दयाल सिंह कॉलेज में बी.ए. (आनर्स) के आखिरी साल के पहले पेपर से पहले मैं भी कद्दूबक्स हो गया था। भूषण (सुनीता का भाई जो उसी कॉलेज में बी.एस-सी. मेडिकल के पहले साल के पेपर दे रहा था) मुझे कॉलेज में मिला तो मैंने रुआँसा होकर उसे बताया था कि मैं पक्का फेल हो जाऊँगा।

उस पेपर के बाद एम.ए. और नौकरियों के लिए कोई भी पेपर होने से पहली रात मैं हैरान–परेशान, बदहवास हो जाता रहा हूँ और अपनी तमाम मार्क्सवादी आस्था के बावजूद मैं भगवान में इस बात के लिए भी यकीन करता हूँ कि मैं जो कुछ कर पाया, उसी की इनायत है।

अलबत्ता, सुनीता में आया परिवर्तन मुझे बार–बार मनु जी के बारे में सोचने को मजबूर कर रहा था। इसमें भी एक बात ज्यादा कोंच रही थी कि सुनीता ने पूरी तरह अन्य परिवेश और विजातीय माहौल में शादी कैसे की होगी? उसकी शादी में मैं नहीं गया था। उनके विवाह और उससे जुडी दिक्कतों के बारें में मनु जी ने अपनी एक-दो किताबों में जिक्र किया है और सुनीता की इस ‘छलाँग’ मारने की सफलता में उसकी भुगती कठिनाइयों की भी बात की है।

‘यात्रा’ इस बारे में प्रकारांतर से कई बातों पर प्रकाश डालती मनु जी की एक लाजवाब कहानी है। यह कहानी एक कविता है और मुझे लगता है मनु जी और सुनीता का संबंध इसी कविता में लिपटा है। मुझे मनु जी की दो रचनाएँ–-एक तो कहानी ‘यात्रा’ और दूसरी उनकी विष्णु खरे जी पर लिखी किताब हिंदी साहित्य की अति अति अनिवार्य पुस्तकें लगती हैं। ‘यात्रा’ कहानी दुनिया के किसी भी समझदार और जिम्मेवारी समझने वाले युवक की कहानी हो सकती है। इस कहानी के बारे में खाकसार ने लिखा था कि यह कहानी एक युवक (बल्कि हर व्यक्ति) के खुद को पहचानने, फिर अपने परिवार को पहचानने और उसकी किसी भी या हर इकाई से जूझने और फिर मुकम्मल तौर पर समाज या दुनिया से जूझने की यात्रा है।

कहानी में मौजूदा माँ उस घर और परिवेश का प्रतिनिधित्व करती है, जिसने उस युवक को पाला-पोसा और छाँह दी है और जो अपने एक अंश को एक पराए परिवेश में जाने पर आमादा देखने पर सहज ही काफी चिंतित और असुरक्षित महसूस करती है, और बेटा कहता है, माँ वहाँ एक लडकी है जो मेरा ख्याल रखती है। यह वाक्य पूरी कहानी को यूनिवर्सल तौर पर प्रासंगिक बना देता है।

मेरा मन यह पढकर भर आया था, क्योंकि मैंने भी औरों की तरह माँ से बिछोह सहे हैं। उसकी टक्कर की मुझे बस, एक ही कहानी और मिली है, मोहन राकेश की ‘आर्द्रा’। दोनों ही भावप्रवण कहानियाँ हमेशा ताजगी भरी रहेंगी।
हम लोग बातचीत में लीन थे, तभी बीच में सुनीता कहीं चली गई थी। मनु जी मुझे और भूषण (जो मुझे मनु जी के घर ले गया था) को जब बाहर छोड़ने आए तो सुनीता साइकिल पर वापस आ रही थी। मैंने कभी उसे साइकिल चलाते नही देखा था। मुझे एकदम लगा कि बी.एड. की संभावित छुई-मुई छात्रा का सशक्तिकरण मनु जी की संगति में ही हुआ है। मनु जी ने मुझे एक बार बताया था कि अपने जीवन–साथी को दोस्त की तरह ही मानना चाहिए। इन दोनों दोस्तों को जिंदगी और भविष्य बहुत–बहुत इंद्रधनुष रंग में मुबारक।
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इस गाथा का अगला पक्ष शुरू हुआ मेरे दिल्ली आने के बाद। मुझे किताब ‘महापुरुषों की वापसी’ बहुत मुश्किल से मिली थी। इसका जिक्र मैंने स्वर्गीय राजेंद्र यादव जी पर लिखे अपने संस्मरण ‘हर तरफ खाक उड़ाएगी सबा मेरे बाद’ में किया है। यादव जी अपने अक्षर प्रकाशन के ऑफिस में यह किताब मुझे देने के लिए रुके रहे थे। उनके साथ नाटककार सुरेंद्र वर्मा भी थे। मेरी इस अनपढ़ी कहानी में दिलचस्पी देखकर उन्होंने मुझे और वर्मा जी दोनों को संबोधित करते हुए कहा था कि वह रातों की नींद उड़ा देने वाली कहानी है।

यह सन् 1980 के दिनों का किस्सा है।

1980 के बाद मैं मनु जी से सन् 1988 में ही मिला। इस बीच पंजाब के मलोट शहर से, जहाँ वे प्राध्यापक थे, दिल्ली आ चुके थे। उनके शास्त्री नगर के उस इकलौते कमरे के आल-इन-वन मकाननुमा घर पर मैं अप्रैल 1987 में अपनी बहन की शादी का निमंत्रण-पत्र देने गया था, पर मनु जी नहीं मिले थे। इसी घर और मकान में रहते हुए इन दोनों औघड़ तपस्वियों ने मनु जी के माता–पिता की अतुलनीय सेवा-सुश्रूषा की, सत्यार्थी जी को जन्म-जन्म के लिए साधा, बिल्कुल शांत और दीर्घ संघर्ष तथा जीरो प्रोफाइल में जीवन यापन किया, और साहित्य सागर में अपनी–अपनी कश्तियाँ खेईं। इस सबका जिक्र मनु जी की किताबों में मौजूद है।

सन् 1988 में जब मैं मनु जी से दिल्ली में मिला, तो वे हिंदुस्तान टाइम्स की बाल पत्रिका ‘नंदन’ में थे, शायद उससे पहले दिल्ली प्रेस में काम कर आए थे। यहाँ एक हैरानगी भरी बात का जिक्र जरूरी है। 1988 में ही मैंने मनु जी और शायद सुनीता की भी कोई प्रकाशित रचना पहली बार करनाल से निकलने वाली प्रगतिशील और वास्तव में लघु पत्रिका ‘अथ’ में देखी थी, जिसके प्रबंधक-संपादक ब्रह्मकुमार सिंह जी से मेरी बड़ी आत्मीयता रही। मेरे ख्याल से उसका संपादन वास्तव में हरियाणा के धाकड़ और धाँसू लेखक ललित कार्तिकेय करते थे, जो मेरे दुश्मन दोस्त बने।

मनु जी और सुनीता के संघर्षशील जीवन में लगातार सुखद फुहारें बरसाते मधुर साहचर्य की अपीलिंग झलक मैंने देखी सुनीता की इंदौर से निकलने वाली पत्रिका ‘वीणा’ में छपी लघुकथा में, जिसका शीर्षक था ‘दांपत्य की बरसात’। इसके बाद की यादें ही मनु जी के अपने जीवन को वास्तविक रूप से महसूस करने की हैं।
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तंबू, माफिया और निर्लज्जता—ये तीन शब्द हैं। पर ये केवल तीन शब्द ही नहीं हैं। मनु जी से सन् 1988 में मुलाकातों का, कभी सघन कभी बहुत विलंबित, सिलसिला शुरू हुआ और इस दौरान जब भी इन तीन शब्दों में से मैंने कोई भी शब्द सुना या पढ़ा है तो कई बार मनु जी का ध्यान आया।

तंबू शब्द याद आते ही एक छवि हर रोज छपने वाले ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में कुछ साल पहले तक आर.के. लक्ष्मण जी के कार्टून में हमेशा मौजूद उस अधेड़, हर तरह से लगभग आम भारतीय नागरिक की है, जो हर समय हादसा ही देखता है और इतना भौचक्का और आतंकित रहता है कि उसकी आँखें फटकर चश्मे के बाहर आने को हो आती हैं, और उसके रौंगटे ही नहीं, गंजे सिर के आस-पास बचे चंद बाल भी खड़े हो जात हैं। तंबू ध्यान में आते ही मैंने मनु जी को कई बार कल्पना में लक्ष्मण जी के इस आम नागरिक का जामा थोड़े परिवर्तन के साथ कई बार पहनाया है। बाल पूरे सिर पर, उम्र चालीस साल और उसके बाद बढ़ती हुई, पर चार खाने का वही कोट, वही देहाती लांग वाली लुंगी, चश्मा, पर आँखों का भाव या प्रतिक्रिया स्थायी नहीं।

ऐसे मनु जी ज़िंदगी में कैसे अपना तंबू जमाने का संघर्ष करते रहे हैं, इसकी तिलमिलाहट उनकी अपनी चेतना, अवचेतन तथा उपचेतन में स्थायी घर बना गई है, पर वे शांत रहते है। इसके बावजूद एक बेहद आक्रामक अंधड़ में अपना गिरता-पड़ता तंबू सहज स्थापित करने में शिद्दत से संघर्षरत एक आदमी की तस्वीर उनके उपन्यास–-शायद ‘कथा सर्कस’ में मौजूद है और हर आम आदमी के संघर्ष का प्रतिनिधित्व करती है।

कल्पना कीजिए कि कैसे लक्ष्मण जी का आम आदमी तंबू को इस तरफ, उस तरफ से बार-बार अंधड़ के प्रहारों से बचाते हुए जमीन पर कायम रखने की कोशिश करता होगा। शायद अरब देशों की कहावत है, ऊँट अंदर शेख बाहर। अब मनु नाम के शेख की एकमात्र पूँजी है साहित्य रचना का अंतिम लक्ष्य पाना। शिकोहाबाद के अपने घर में काफी सुखी जीवन की सुविधा भोगते हुए ही मनु ने ठान ली थी कि वह बस शब्द-संसार की रचना करेगा और बाकी जीवन की हर हरकत और हर चीज बिल्कुल गौण होगी।

तो इस तंबू में मनु जी अपना घर भी चला रहे हैं और साहित्य भी रच रहे हैं। समस्या के दो युद्ध-मुख हैं। एक तो जमीनी हालात तंबू को बार-बार उखाड़ने की कवायद करते हैं और दूसरे साहित्य जगत के ऊँट उस तंबू में बिन बुलाए अपनी लंबी गर्दन घुसाकर मनु की एकाग्रता को भंग करने की बार-बार कोशिश करते हैं। वे उसके रचे-लिखे को सिरे से ख़ारिज करने की ज़िद पर आमदा हैं।

मनु सबसे जूझ रहे हैं, पर लिखे जा रहे हैं। “मैं अंदर तक हिल गया, दिमाग की तड़कती नसें...!”—ऐसे आशय के वाक्य मनु की रचनाओं में कई बार आए हैं। यह मुझे उनके वास्तविक जीवन की झलक भी दिखा रहे थे। इन सबका ज़िक्र करते हुए उन्होंने मुझे एक बार बताया था कि इस सबके बावजूद मैं अपने पास उपलब्ध समय में किंग कोबरा हूँ और मेरा लिखने के हलके पर पूरा अधिकार है, रात-रात भर लिखूँगा, दफ्तर से छुट्टियाँ लेकर लिखूँगा। और इस लिखने की कथा-वस्तु उनके अंतर में हर वक्त बनती रहती।

यह बेहद बेचैन करने वाली व्यग्रता और बदहवासी ही मनु जी का जैसे संबल थी। उन्हें शीघ्रता रहती। कंधे पर झोला लटकाए मिंटो रोड स्टेशन और हिंदुस्तान टाइम्स के ऑफिस के बीच वे जैसे आते-जाते, उस तेजकदमी और उनके चेहरे के भावों को देखकर हमेशा लगता कि बंदे के अंदर कोई रचना पक रही है और बस सब फर्जों से फारिग होकर वह सब कागज पर उतारने को बेचैन हो।

नुक्ताचीनी करने वाले ऊँटों का तंबू में अगर दखल चलता रहता हो, तो हरिपाल त्यागी, डॉ. माहेश्वर, श्रवण कुमार, संजीव ठाकुर और खाकसार (जो निहायत नाकारा रहा) जैसे आदमियों की सोहबत में उन्होंने अपने अंदर की कशमकश का रोशनदान मिलता। लंच में लाई दो रोटियों में से एक वे आपको खिलाएँगे ही, फिर कैंटीन में ले जाएँगे। शाम को अगर आप पहुँचे तो बारहखंबा रोड के आसपास बनी चाय की गुमटियों पर आपको चाय, समोसा, पकौड़ा खिलाएँगे। और आप हैरान होंगे कि दिल-दिमाग पर साहित्यिक हलके के ‘अहोरूप ऊँटों’ द्वारा बेवजह आक्रामित यह कद्दावर (भगवान उनकी फिजीक बनाए रखे) शेख कैसे खुद को रचना-रत किए है।

इस शेख के साथ खाकसार ने भी घटिया ऊँटगिरी की है। मनु जी ने गिरिजाकुमार माथुर सम्मान से प्राप्त राशि को कुछ मित्र कवियों की रचनाओं को प्रकाशित करने के लिए खर्च करने और एक अच्छा संकलन निकालने का निर्णय लिया था। उसमें उन्होंने कुछ मेरी कविताएँ भी छापी थी। जिस दिन उसका फिरोज शाह पर रोड पर स्थित रशियन सेंटर में उसका विमोचन हुआ, तो स्वर्गीय विष्णु खरे जी ने मुझसे कहा था कि उन्होंने मेरी कविताओं के कुछ नोट्स लिए हैं और वे मुझसे कभी चर्चा करेंगे। लेकिन ऐसा हो न सका। उन्हें मेरे लिखे में कुछ सही लगा था और वे चाहते थे कि मैं लिखता रहूँ। पर मैं ऐसा नहीं कर पाया। इसका सबसे बड़ा कारण तो मेरी सुस्ती रही। पर शायद कुछ और भी कारण रहे हों।

मनु जी के एक उपन्यास में केंद्रीय पात्र एक व्यक्ति के बारे में बेहद आक्रोश से प्रतिक्रिया व्यक्त करता है कि यह नाकारा आदमी बार-बार आकर खामखा मेरा समय बरबाद करता है। यह नाकारा आदमी शायद मैं ही था। मनु जी बार–बार साहित्य की याद दिलाते हैं और मैं खिसिया जाता हूँ।
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हिंदी साहित्य में वाम की छाया परिमल और प्रलेस के दिनों, यानी लगभग आठ दहाई से भी ऊपर से रही है। प्रलेस, जिसका जन्म प्रेमचंद जी के आशीर्वाद से हुआ। जलेस और जसम जैसे गुटों में बहुत साहित्यकार ऐसे हैं, जिनका लिखा जबर्दस्त काट लिए हुए है। पर समय के साथ–साथ इन लेखकों में बेहद पतनशीलता और गुटपरस्ती आती गई है। इन गुटों के कई लेखकों से मनु जी का मेल–जोल रहा है।

लेखक होने के नाते मनु जी की इतनी तो सहज अपेक्षा रही होगी कि उन्हें भी इस क्षेत्र में मान्यता मिले और उनकी सही रचनाएँ प्रकाशित होती रहें। मनु जी ने मुझे एक बार बताया था कि वे मार्क्सवादी हैं, पर उनकी रचनाएँ सिर्फ इसी रंग की नहीं हैं। वे सदाशयी लेखक हैं। उनके सृजन को विष्णु खरे, शैलेश मटियानी, रामविलास शर्मा, रामदरश मिश्र जैसे प्रतिष्ठित लेखकों ने बहुत सराहा और बेकिनार आत्मीयता दी है।

ऐसे लेखक की रचनाओं के छपने में बाधा आनी ही थी, क्योंकि वह निःशब्द अपनी रविश और सृजन-प्रक्रिया में मग्न रहना चाहता था। ऐसे इनसान के बेवजह मुखालिफों की भी भरमार होती है। एक खासे प्रगतिशील लेखक ने, जिसकी इनसानियत बहुत हद तक गिर गई थी, एक बार बड़ी उद्दंड मुसकराहट के साथ मनु जी से कहा था कि अमुक पत्रिका में तो आपकी रचना कभी नही छपेगी। उस पत्रिका का संपादक तो कोई और था, पर यह व्यक्ति उस प्रबंधन का खुदाई फौजदार था।

मनु जी से बहुत से लेखकों ने पाखंड और उस पर भी बेहद ढीठता से व्यवहार किया, पर मैंने उन्हें कभी किसी से मौखिक रूप से बहस करते या प्रतिकार करते नही देखा। बस, जो तड़क रही, वह उनके दिल-दिमाग को तानकर रखती और वह अग्नि-धारा उनके लिखे में ही निकल सकी।

अपने प्रति बहुत सारे शक्तिशालियों का इतना भारी बेतुका और कहीं–कहीं लगभग कोरस प्रतिरोध और उन्हें साहित्य के क्षेत्र से बाहर ही रखने की साजिशों को झेलते हुए भी, उनके सतत लिखने की जिद और सफलता और उसके साथ–साथ अपना घर चलाने की जिम्मेदारी के बेहिसाब संघर्ष को याद करते हुए गालिब का शेर याद आता है—
हम कहाँ के दाना थे, किस हुनर में यकता थे,
बेसबब हुआ गालिब दुश्मन आसमाँ अपना।

पर मनु जी तो मेरे हिसाब से भगवान में आस्था रखते हैं। उनका यह दुश्मन आसमाँ तो जमीन पर ही था, उन पर जब चाहे प्रहार करता। हिंदी साहित्य में मौजूद खलीफा माफिया का इतना प्रभाव रहा है कि मैंने कविता, कहानी, उपन्यास, संस्मरण, बाल साहित्य इत्यादि पर प्रकाशित लेखों में मनु जी के समकक्ष, उनके वरिष्ठ और कनिष्ठ कई रचनाकारों के तो नाम देखे, पर मनु जी का नाम बेहद कम नजर आया। यह हाल तब है जबकि उन्होंने सब कुछ मिलाकर 150 से भी अधिक किताबें लिखीं और चार पुरस्कार (जिसमें साहित्य अकादेमी का बाल साहित्य पर पुरस्कार भी शामिल हैं) उन्हें मिल चुके हैं। सत्यार्थी जी पर तो उन्होंने इतना लिखा है कि शायद वे उनके साहित्य पर सर्वोच्च अथॉरिटी हों। उनके कविता-संग्रहों में मुझे उनकी ‘छूटता हुआ घर’ संग्रह (मगध प्रकाशन) में संकलित कविताएँ बहुत पसंद आई थीं। उनके कहानी-संग्रहों का शीर्षक किसी नाम से शुरू होने से (दिलावर, सुकरात, अरुंधती, मिसेज मजूमदार इत्यादि) ऐसा लगता है कि मनु जी व्यक्तित्वों से बेहद, अच्छे या बुरे–-प्रभावित होते हैं।
यह बात और पुख्ता हो जाती है उनके संस्मरणों की पुस्तकों को ध्यान में रखकर। रामदरश मिश्र, रामविलास शर्मा, शैलेश मटियानी, विष्णु खरे और सबसे ज्यादा सत्यार्थी जी पर लिखी उनकी किताबें और संस्मरण इन शख्सियतों पर बेहद गहरे जाकर लिखे गए संस्मरण और यादगारें हैं। मैं सबसे ज्यादा प्रभावित मटियानी जी और विष्णु खरे जी पर लिखी किताबों और ‘यादों का कारवाँ’ से हुआ। इसके अलावा बाल साहित्य पर तो उन्होंने लगभग बेकिनार लिखा है। और शायद उन्होंने ही पहली बार बाल साहित्य का इतिहास लिखा है।
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मनु जी की संपूर्ण रचना-सृष्टि के बारे में दो बातों पर मैं खास सोचता रहा हूँ। मेरे अपने रुझान के कारण मटियानी जी, खरे जी पर लिखी उनकी पुस्तकें और नामवर जी से हुई उनकी बातचीत मुझे मुठभेड़ और मंथन का यौगिक लगी हैं। उनकी बाकी रचनाओं में मुझे अकसर एक सदाकत और आदर भाव महसूस हुआ है।

मैं हैरान रहता था कि आजकल का यह लेखक पूर्व से भी पूर्वतर पीढ़ी के लेखकों के बारे में लिखने को क्यों लालायित रहता है? पर मैंने देखा कि मनु जी के लगभग समवय रचनाकार भी हमारे अति वरिष्ठ साहित्यकारों में दिलचस्पी रखते है। स्वयं प्रकाश जी ने एक लेख में कहा कि ये हमारे वरिष्ठ लेखक हमारा बृहतर कुनबा, ताऊ, चाचा, दादा वगैरह है। तो मनु जी साहित्य—हिंदी साहित्य समेत, को एक अजर, अमर और सदा प्रवाहमय नदी मानते हैं, जिसमे हर किस्म के साहित्यकार लगातार विचरण करते रहे हैं।

मनु जी के साहित्य में बाल साहित्य का बहुत बड़ी मौजूदगी रखना, भी मुझे चौंकाता रहा। स्वयं प्रकाश जी ने अपने पर बनी फिल्म में आग्रह किया है कि बाल साहित्य पर इतना ध्यान नही दिया गया है और इस पर और फोकस जरूरी है। स्वयं प्रकाश जी की टिप्पणियाँ मुझे हमेशा कमांडमेंट किस्म की लगी हैं। तो मुझे अहसास हुआ कि मनु जी का इस विधा पर इतना काम करना सार्थक और अपेक्षित था। फोन करके मैंने स्वयं प्रकाश जी को मनु जी के विपुल मात्रा में रचे बाल साहित्य के बारे में अवगत भी कराया।

‘ब्रूटस तुम भी...!’ यह किस्सा मेरा है। पर इस किस्से को सही परिपेक्ष्य में समझने के लिए मेरा मानना है कि फ्रायड की यह बात माननी जरूरी होगी कि इनसान का अपनी चेतना के सभी स्तर और अपेक्षित व्यवहार पर उसका कई बार नियंत्रण नही होता। वह अंतर्विरोधी काम सरअंजाम करता है और उसकी कशमकश से गुजरता है। कोई कॉम्प्लेक्स उसे एक घटिया ऊहापोह के पाश में फँसाए रखता है और वह गलत को सही से अलग रख पाने में, अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद, असमर्थ रहता है। यह किसी से एक बिल्कुल अपरिचित किस्म के मोह को किसी अच्छाई की कीमत पर वहन करने की स्पष्ट ही निंदनीय कोशिश है।

इस ब्रूटस का हिंदी साहित्य के एक सदा ऊर्ध्वगामी किस्म के बहुमुखी प्रतिभासंपन्न लेखक से परिचय हुआ। मनु जी से भी उसका परिचय था। इस लेखक पर हिंदी साहित्य की लगभग सभी मूर्धन्य विभूतियों का वरद हस्त था और उन सबने जैसे उसे हिंदी साहित्य की दुनिया में अश्वमेध के घोड़े की तरह मनमानी दौड लगाने की छूट और प्रेरणा दे रखी थी, ‘विश्व विजयी भव।’

असफलता वह जानता ही नही था। कुटिल कैरियरिस्ट रहा। अपना यह यार डोमा उस्ताद बन गया और मनु जी के बेहद खिलाफ हो गया और उन्हें बहुत मानसिक परेशानी झेलनी पड़ी। उन दोनों का परिचय रहते हुए भी जैसे नही रहा। उसकी मनु जी के प्रति बेहद खल किस्म की सोच, व्यवहार और उन्हें किसी भी तरह से परेशान करने की कोशिश जैसी बातें मुझे व्यथित करती थीं। मनु जी मेरे रिश्तेदार भी हैं। नैतिक तार्किकता यह थी कि जैसे मनु जी ने उससे लगभग किनारा कर लिया था, मुझे भी कर लेना चाहिए था। उसके लगभग ठग बन जाने पर आक्रोश भी उभरता। पर न जाने मोह का कैसा धागा था, जिसने मुझे उसमे जोड़े रखा—बेहद कशमकश सहते रहने के बावजूद।

बनारस से कभी निकलती थी एक साहित्यिक पत्रिका ‘काशी प्रतिमान’, जिसमें मनु जी ने काफी लिखा था। उस पत्रिका के किसी अंक के मुखपृष्ठ पर या लेख का शीर्षक था, “हमारे रक्त में निर्लज्जता बह रही है।” यह वाक्य साहित्य समेत हमारी समूची व्यवस्था की टैग लाइन है और हमें इस पर निरंतर मनन करना चाहिए। मनु जी की एक तरह से यह कमांडमेंट भी है। अगर यह पंक्ति लिखते हुए मनु जी के जहन में मैं भी, उस डोमा उस्ताद के मार्फत आया होऊँ, तो मैं बुरा नहीं मानूँगा।

हिंदी साहित्य, हिंदी साहित्य का प्रिंट मीडिया में मुकाम, इस साहित्य से आजीविका कमाने वाले लोगों की जिंदगी, उस आजीविका की अनिश्चितता, स्पेस और क्षुद्र स्वार्थ—ये सब ऐसे बिंदु और मंजर है जिनसे गुजरते हुए मनु जी ने बेतहाशा और अनगिनत कड़वे घूँट पिए होंगे।...उन्हें साहित्यकार बनने और माने जाने के लिए तो सूरमा लोग स्पेस दे ही नहीं रहे थे, उन्हें वास्तविक स्पेस के भी जलवे देखने पड़े।
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मैंने शुरू में उन्हें ‘नंदन’ के ऑफिस में ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की इमारत में तीसरे माले पर एक हॉलनुमा कमरे में काम करते देखा था। अच्छी-खासी जगह थी। धीरे–धीरे ‘नंदन’ को स्पेस की ‘पतनशीलता’ भुगतनी पड़ी और उसका ऑफिस पहले माले पर आ गया, एक छोटे से कमरे में, जो मनु जी के कभी शास्त्री नगर के मकान जितना ही होगा। लेकिन स्टाफ के बीच इतनी जबर्दस्त गलबहियाँ थीं, कि हर काम करने वाले की कुर्सी की पीठ दूसरे सहयोगी की कुर्सी की पीठ से अनिवार्य रूप से मिलती थी। मैं जब भी मनु जी से मिलने जाता तो उनके सहयोगी बेहद नयाजमंदी से मेरे लिए जगह देते। उनकी इस कद्रदानी को मैं कभी नही भूल पाऊँगा।

लगभग सश्रम कारावास की सजा मिली थी मनु जी को जब उन्हें कंप्यूटर पर काम शुरू करना पड़ा। उनके हाथ से लिखे कई ड्राफ्ट मैंने देखे है, लिखे शब्द बड़ी प्यारी सी लहरियाँ, बेलों और हिलते पत्तों की शक्ल ले लेते। नौकरी के अंतिम दौर में कैसे उन्हें अपनी अभिव्यक्ति का मीडिया बदलना पड़ा और उसमें पारंगत भी होना पड़ा–-यह बेहद जानतोड़ और मानसिकता पर असर करने वाला दौर था। उन्हें कंप्यूटर पर कंपोज करने के लिए माउस चलाते हुए मैंने एक बार सोचा कि इस मुकद्दस इनसान को न्यूनतम जरूरतों को पूरा करने के लिए चूहेगीरी भी करनी थी।
मनु जी ने अपनी घर की जिम्मेदारी निभाने के अलावा बस साहित्य की ही आराधना का व्रत लिया है। उन्हें सड़क पर चलते देखकर एक मिशनरी, बेहद उतावले आदमी का अक्स जहन में बनता है : एक काँधे पर झोला, चेहरे पर विभिन्न विचारों के परस्पर हमेशा टकराते रहते मकड़-जालों की छाया, दिमाग कहीं जरूर तड़क रहा होगा। सामने देखती आँखें जैसे देख ही नहीं रही हैं। मंत्र-विद्ध वे तेज चलते कदम भीड़ में रास्ता पता नही कैसे बनाते जा रहे है। बस, इस मिशनरी के अंतर्मन में यह चल रहा है कि जल्दी से अपने गंतव्य पर पहुँचूँ और कागज पर इतना सारा उड़ेल दूँ।

इस भौतिक जीवन में मनु जी बिल्कुल आम आदमी हैं, गाँधी कह लो, मार्क्स कह लो, सबका आम आदमी जैसा। उनमें भी जिजीविषा है, हर उस आदमी की सी जो किसी भी हादसे से निपटकर यह समझता है कि वह अब कोई भी मुकाबला जीत सकता है। पर वह फिर किसी हादसे में घिरकर पस्त हो जाता है और फिर वह समझता है कि मैं सर्वशक्तिसंपन्न हो गया हूँ। यह कौन अनचीन्ही ताकत है, जो हर आम आदमी पर, मनु जी जैसे आम आदमी पर बार-बार प्रहार करती है, पर वह एक नैसर्गिक जिजीविषा से भरपूर होकर, फिर उस शक्ति से रूबरू होने के लिए फिर तैयार होता है।

मनु जी ने बेहद विरोध, कभी-कभी अस्वस्थता और, मेरे हिसाब से, अर्थाभाव भी सहा है। पर इस सब से जूझते हुए उनका मिशन एक रहा, साहित्य रचना। वे अब एक तपस्वी के एकांत में रहते है और रचनाशील है। मनु जी जैसी बेहद आम, साहित्य सृजन को सहज समर्पित, संयत और दंभहीन एक और शख्सियत मेरे दिमाग में आती रही हैं, जिस पर पंकज बिष्ट जी ने लाजवाब संस्मरण लिखा है—स्वर्गीय श्री विष्णु प्रभाकर की।
खाँटी और सहज मानवीयता के प्रतीक और मेरे सबसे महबूब शायर मजरूह साहब ने हर आम आदमी और मनु जी जैसे आदमी के सपनों को पोसते हुए ही लिखा था—
“उन्हें कब के रास भी आ चुके, तेरी बज्मे नाज के हादसे,
अब उठा कि तेरी नजर फिरे, जो गिरे थे गिर के सँभल गए।
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महाबीर सरवर
15, प्रथम तल, जी-ब्लॉक, पॉकेट-2, सेक्टर-16, रोहिणी, दिल्ली-110089
चलभाष: 08527832189

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