कहानी: कर्कशा

विजय कुमार संदेश

विजय कुमार संदेश

प्राध्यापक, पी.जी. हिन्दी विभाग, मार्खम कॉलेज, हजारीबाग, झारखंड,भारत
दूरभाष: +91-943 019 3804
ईमेल: sandesh.vijay@gmail.com


सुबह के अभी आठ ही बजे थे। सूरज अभी एक बाँस भी चढ़ा नहीं था कि कालिंदी के फ्लैट की घंटी बजी। कूरियर वाले ने आवाज लगायी- कूरियरवाला। घंटी की आवाज सुनकर अवंतिका बाहर आयी और कूरियरवाले से लिफाफा हाथ में ले लिया। संयोगवश लिफाफा उसी के नाम था। वह विगत दो महीने से रिश्ते में अपनी फुफेरी बहन कालिंदी के यहाँ इलाहाबाद में थी। इन दो महीनों में समय बिताने की नीयत से उसने कभी अकेले तो कभी कालिंदी और उसके पति-बच्चों के साथ कानपुर-लखनऊ घूम आयी थी। कानपुर का मोती झील हो या फूलबाग, लखनऊ का भूल-भुलैया और छोटा इमामबाड़ा हो या रूमी दरवाजा, घंटाघर-चिड़ियाघर- सब घूम लिया था और पूरी मस्ती की थी। भूल-भुलैया की उस घटना को वह अबतक नहीं भूल पायी है। सांझ का समय का जब वह भूल-भुलैया में दाखिल हुई थी। लखनऊ का भूल-भुलैया अपनी वास्तु-शैली में बेमिसाल है। यह दो सौ साल पुराना है। इसे देखते ही सैलानी खुश भी होते हैं और हैरान भी। आश्चर्य यह कि इस भूल-भुलैया में सैकड़ों दरवाजे हैं और हर दरवाजे पर चार रास्ते हैं, जिसमें तीन गलत और एक सही है। तीन सही और एक गलत रास्ता होने से सैलानी अक्सर सही रास्ता भूल जाते हैं और अंदर ही भटकते रह जाते हैं। दुर्योग से अवंतिका भी रास्ता भटक गयी थी। उस दिन भूल-भुलैया की वह आखिरी सैलानी थी, जो गाइड की सहायता से बाहर आ सकी थी। अवंतिका बिंदास मिजाज की मुँहफट और पुराने रीति-रिवाजों तथा मान्यताओं को नहीं माननेवाली युवती थी। किंतु, उसका बिंदासपन भूल-भुलैया के खेल में फेल हो गया था। इधर दो-एक वर्षों से उसने स्वतंत्र और बिना रोक-टोक की जिंदगी जीने को ही अपनी आदत में शामिल कर लिया था।
अवंतिका ने लिफाफा खोला। उसमें एक लंबा तीन पृष्ठों का पत्र था। पत्र की पहली पंक्ति पढ़ते ही वह सन्न रह गयी। लिफाफा उसके पति सत्यप्रकाश ने भेजा था। उसने लिखा था- इस पत्र के साथ तलाक के पेपर्स हैं। इसके बाद वह आगे नहीं पढ़ सकी। दिल जोर-जोर से धक-धक करने लगा। धुकधुकी बढ़ गयी। घड़कते दिल के साथ ही उसने कालिंदी को आवाज लगायी। कहा, मैं अब एक क्षण के लिए भी यहाँ नहीं रुक सकती और खुला लिफाफा व पत्र उसके हाथों में थमा दिया। कालिंदी ने पत्र पढ़ा। पढ़कर वह भी अवाक रह गयी। थोड़ा शांत होने पर कहा- दीदी, थोड़ा ठहरो। शांत हो जाओ। रमन को आने दो। रमन उसके पति का नाम था। पर, अवंतिका अब कहाँ रुकनेवाली थी। उसने अपना बैग उठाया चल पड़ी स्टेशन। इलाहाबाद का प्रयागराज जंक्शन जहाँ रेलवे टिकट लेनेवालों की लंबी कतार थी। अवंतिका की ट्रेन आज दो घंटे विलंब से चल रही थी, जिससे तनाव थोड़ा कम हो गया था। जनरल टिकट लेकर वह प्लेटफार्म पर आ गयी। इसी प्लेटफार्म पर पुरुषोत्तम एक्सप्रेस आयेगी, इसकी सूचना यात्रियों को बार-बार दी जा रही थी। थोड़ी देर में कालिंदी और रमन भी प्लेटफार्म पर आ गए। दोनों को देखकर अवंतिका को तनाव से थोड़ी राहत मिली। दोनों ने ढाढ़स बंधाया और कहा कि शांत मन से जाइए। सब कुछ ठीक होगा। भगवान पर भरोसा रखिये। सहानुभूति के इन दो शब्दों से अवंतिका थोड़ी शांत हुई। इसी बीच ट्रेन प्लेटफार्म पर आ गयी। भारी भीड़ को देखकर वह एक स्लीपर कोच में खाली स्थान देखकर बैठ गयी। पाँच घंटे का सफर था। इसलिए स्लीपर कोच में बैठना ही उसने मुनासिब समझा।
ट्रेन अभी प्लेटफार्म पर रुकी हुई थी। ट्रेन के उसी कंपार्टमेंट में सविता का बर्थ आरक्षित था, जिस पर अवंतिका पहले से बैठ गयी थी। सविता का बर्थ जानकर वह बर्थ के एक किनारे दुबक गयी। सविता ने कुछ कहा नहीं। एक अकेली युवती को देखकर बैठ जाने दिया। सविता अभी ठीक से बैठी भी नहीं थी कि किसी ने पीछे से टोका- अरे, सविता तुम ? कहाँ जा रही हो ? वह जया थी, जो कभी कॉलेज के दिनों में क्लास मेट सह रुमेट हुआ करती थी। यह संयोग था कि जया का बर्थ भी सविता के बर्थ के ठीक सामने था। दोनों सहेलियाँ काफी दिनों बाद मिलीं तो बातों का सिलसिला चल पड़ा। थोड़ा इत्मीनान होने पर अवंतिका ने लिफाफा फिर से खोला और पढ़ने लगी। पत्र में लिखा था- अवंतिका, इस पत्र के साथ तलाक के पेपर संलग्न हैं। फिर ब्यौरे में नीचे तीन पृष्ठीय पत्र था, जिसमें लिखा था- तुम चाहती थीं कि तुम मेरे माँ-बाबूजी के साथ रहकर अपना जीवन शेयर नहीं कर सकती। तो, लो मैं तुम्हें आजाद करता हूँ। तुम जो चाहो अपने जीवन में, जैसा चाहो वैसा जीवन जी सकती हो। पत्र पढ़ते-पढ़ते उसकी आँखों में आँसू आ गए। किंचित, उसे अपनी गलतियों का अहसास हो गया था, जिसे उसने अपने जीने की बिंदास आदत  के कारण अपना लिया था। उसकी आँखों में आँसू देखकर सविता पूछ बैठी क्या बात है ? आपकी आंकों में आँसू? अवंतिका ने कुछ कहा नहीं। बस, कातर नजरों से पत्र की पहली पंक्ति दिखाकर कोने में एक बार फिर दुबक गयी।
अवंतिका के पत्र का मजमून समझकर सविता को उसके पड़ोस की एक घटना याद आ गयी। उसने जया से कहा। जया, मेरे पड़ोस में रेलवे से अवकाशप्राप्त एक ताऊ मनमोहन बाबू रहते हैं। शायद, तुम उन्हें जानती हो। बड़े खुशमिजाज और जिंदादिल आदमी हैं। मैंने अपनी इस छोटी-सी जिंदगी में उन्हें कभी दुःखी या उदास नहीं देखा। पड़ोसियों से भी सुना है कि मनमोहन बाबू अपनी तरह के अकेले आदमी हैं। मुहल्ले और पड़ोस में उनको जाननेवाले उनकी सादगी और स्वभाव के कारण उन्हें मस्तमौला-फकीर कहते हैं। उनके जीने का ढंग सबसे अलग और निराला है। कभी किसी से कुछ मांगा नहीं। न उधो से लेना और ना माधो का देना उनका संस्कारगत स्वभाव है। जिंदगी जितनी भी हो, जैसी भी हो - फकीरों की तरह मस्ती में जीना चाहिए - उनके ऐसे संवाद मैंने कई बार सुने हैं। इस उक्ति को अपने जीवन में उन्होंने न केवल उतारा, बल्कि जिया भी है। मैं बड़े विश्वास के साथ कह सकती हूँ कि उनके जैसा जीवंत और मस्तमौला फकीराना अंदाज में जीनेवाला आदमी कोई बीस कोस में नहीं होगा। कौन-सी साधना उन्होंने की थी, किसी को नहीं मालूम। उनकी साधना और इन्सानियत के आगे शायद बड़े-बड़े साधक और ज्ञानी भी फेल होंगे। मनमोहन बाबू के इस जादुई व्यक्तित्व के सभी कायल थे। सविता ने आगे कहा- किंतु, मैंने सुना है कि अवंतिका नाम की एक बहू थी उनकी। स्वभाव से कर्कश। मनमोहन बाबू का एक ही बेटा है - सत्यप्रकाश। बेटे ने अवंतिका की सुंदरता से मोहित होकर उसके साथ विवाह के लिए पिता को बाध्य कर दिया था। उसके मोबाइल का रिंगटोन ही हो गया था- ‘मेरे सपनों की रानी कब आयेगी तू।’ मजबूरी में बेटे की खुशी के लिए उन्होंने यह रिश्ता स्वीकार कर लिया था।
सविता की इस बात-चीत से अवंतिका चौकन्नी हो गयी। उसके कान खड़े हो गए। वह समझ गयी कि बात उसी की हो रही है। सविता ने आगे बताया कि अवंतिका जितनी सुंदर थी, स्वभाव से उतनी ही क्रूर और कर्कश थी। यद्यपि, आज तक उसने अवंतिका को देखा नहीं है, पर उसके बारे में सुना बहुत है। शादी के कुछ दिनों बाद ही वह अपने पति सत्यप्रकाश पर अलग होने के लिए दबाव देने लगी। वह एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाती थी। कोई विशेष नौकरी उसके पास थी नहीं। इसके बावजूद घमंड सातवें आसमान पर था। उसी घमंड के कारण घर की रसोई के भोजन को छोड़कर वह बाहर से ऑनलाइन खाना मंगवाती थी और सारा बिल उसके पति को भुगतान करना पड़ता था। सत्यप्रकाश के माँ-बाबूजी से भी उसने दूरी बना ली थी। दो-एक वर्ष तक ऐसे ही चलता रहा। सत्यप्रकाश को अब यह अनुभव होने लगा था कि अवंतिका के रूप-सौंदर्य से आकर्षित होकर उसके साथ विवाह करना उसकी भूल थी। फिर भी, उसने दांपत्य-रिश्ते को बचाने की पूरी कोशिश की। वह हर सही-गलत सुनता और बर्दाश्त करता रहा। आखिर एक दिन अवंतिका ने अपने पति सत्यप्रकाश को अल्टीमेटम दे दिया और धमकी देते हुए कहा कि अगर कल से तुम अपने माँ-बाप से अलग नहीं हुए तो तुम्हारे और तुम्हारे माँ-बाप के विरुद्ध दहेज-प्रताड़ना का मुकदमा कर दूँगी और दूसरे ही दिन वह अपने मायके चली गयी। जिसने भी यह सुना मनमोहन बाबू के शालीन व्यवहार पर यही कहा - ‘पड़ गए राम कुकुर के पाले।’ भगवान ऐसी बहू किसी को न दे। अवंतिका बर्थ पर बैठे-बैठे सबकुछ सुन रही थी और आत्मग्लानि से भरी जा रही थी। ग्लानि कम करने और मन बहलाने के लिए उसने बाहर झांका। पर, भीतर का अंतर्ज्वाल लगातार चोट कर रहा था। थोड़ा शांत होने पर उसने पत्र आगे पढ़ना शुरु किया। सत्यप्रकाश ने लिखा था कि आज दो वर्ष पूरे हुए जब तुम घर छोड़कर गयीं। मैंने पूरे दो वर्ष तक तुम्हारा इंतजार किया। तुम नहीं आयी। मैंने समझाने की भी पूरी कोशिश की पर तुम अपने जिद पर अड़ी रही। कई बार तुम्हें लाने तुम्हारे मायके गया। वहाँ तुम और तुम्हारे माँ-बाबूजी ने न केवल मेरा अपमान किया बल्कि तुम्हें भेजने से भी मना कर दिया। शायद तुम्हें और उन्हें घर-परिवार, नाते-रिश्ते की जरूरत नहीं। हो सकता है तुम्हारे और तुम्हारे माँ-बाबूजी के लिए घर-परिवार और नाते-रिश्ते का कोई महत्व नहीं हो। पर, मेरे लिए है। तुम्हें स्वतंत्र और बिंदास जीवन पसंद है। घर-परिवार, रिश्ते-नाते की अहमियत तुम क्या जानो ? तुम्हारे जैसी स्त्रियाँ केवल अपना सुख और स्वार्थ देखती हैं। शायद तुम नहीं जानती तो जान लो। व्यक्ति चाहे स्त्री हो या पुरुष उसके जीवन में घर-परिवार का विशेष महत्व होता है। माँ-बाप परिवार रूपी शरीर के लिए रीढ़ होते हैं। जैसे शरीर का कोई अंग बिना रीढ़ के काम नहीं करता वैसे ही माँ-बाप और परिवार के अन्य लोग रीढ़ की हड्डी के अलग-अलग तंतु की तरह होते हैं। मेरे माँ-बाबूजी मेरे लिए उसी रीढ़ की हड्डी की तरह हैं। फिर, आगे लिखा था- अवंतिका, मैं इतना गैर-जिम्मेदार नहीं कि तुम्हारे निजी स्वार्थ के निमित्त गलत राह पर चल पड़ूँ। मेरी दृष्टि में तुम्हारा निजी स्वार्थ और तुम्हारी टेढ़ी चाल एक ढकोसला है और यह ढकोसला मेरे लिए विष पिये तीर के समान है। तुम्हें शायद याद होगा कि मेरे माँ-बाबूजी तुमसे कितना प्यार करते थे। तुम्हारे मामूली सिर-दर्द पर भी वे चिंता से भर जाते थे। हो सकता है तुम्हें वह घटना याद हो। उस दिन तुम अपने कमरे में झाङू लगा रही थी और उसके एक तिनके से तुम्हें खरोंच आ गयी थी, तिनका चुभ गया तो पूरे घर को उन्होंने सिर पर उठा लिया था। मैं जबतक तुम्हें डाक्टर से दिखाकर नहीं लाया, वे शांत नहीं हुए थे। माँ ने तुरंत कहा था- बिटिया, तुम्हें झाडू लगाने की क्या जरूरत थी ? कामवाली बाई तो है ही। किंतु, माँ की इच्छा के विपरीत बाबूजी को तुम्हारा इस तरह छोटे-मोटे काम करना पसंद था। इसलिए तुम्हारा पक्ष उन्होंने लिया था और माँ को नसीहत दी थी कि आदमी को अपने छोटे-मोटे काम स्वयं करने चाहिए। इससे शरीर में फुर्ती बनी रहती है। स्वयं के काम करने को वे जिम्मेदारी मानते थे। सड़ी-गली परंपराओं पर उन्हें भरोसा नहीं था। अवंतिका, मुझे याद है कि मेरे यही माता-पिता हैं, जिन्हें मेरे घर में नहीं होने पर उन्हें नींद नहीं आती थी। मेरे युवा होने के बावजूद उन्हें आज भी लगता है कि मैं अभी छोटा ही हूँ। हमेशा कहते रहते हैं कि कल तक तुम्हें गोद में खेलाया-खिलाया था। आज तुम मेरे बराबर हो गए हो। फिर भी, तुम्हारा बचपना नहीं गया है। मेरे घर से बाहर जाते ही घंटे भर में कई बार फोन करके पूछते कि बेटा! ट्रेन में आरक्षण नहीं है, बैठने की जगह मिली या नहीं। मेरे ‘हाँ’ कहने पर ही वे आश्वस्त होते। और माँ! माँ हमेशा फोन पर पूछती रहती थीं कि मैंने खाना खा लिया है या नहीं। मेरी जरा-सी छींक आने पर फोन पर ही दादी माँ के सौ नुस्खे बताने लगती थीं। वह तो फोन पर ही खाना खिलाने के पीछे पड़ जाती थीं। मैं जबतक उन्हें वीडियो कांफ्रैसिंग करके दिखला नहीं देता था कि मैंने खाना खा लिया है तबतक वह पानी का एक घूँट नहीं पीती थी। अवंतिका, तुम तो जानती हो कि माँ-बाबूजी दोनों ही दहेज-प्रथा के घोर विरोधी थे। इसे वे एक कुप्रथा मानते थे। इसे हर हाल में बंद होना चाहिए, ऐसा वह समाज के लोगों को भी समझाते रहते थे। इसीलिए मेरे विवाह में तुम्हारे पिताजी द्वारा स्वेच्छा से दिये गए रुपयों को भी स्वीकार नहीं किया था, केवल एक रुपया लेकर रस्म-अदायगी की थी। मेरी माँ और मेरे पिताजी की सादगी को तुमने हल्के में लिया। प्रायः हर दिन ही तुम्हारी यह कोशिश रही कि माँ-पिताजी को हद से हद तक परेशान किया जाये। सब जान-समझकर भी वे चुप रहे। मेरा वैवाहिक और दांपत्य-जीवन खतरे में नहीं पड़े, इसका उन्होंने हमेशा ध्यान रखा। तुम्हारे हजार तानों को सहा, बर्दाश्त किया। पर, तुम्हारा हृदय शायद पत्थर का बना है। इसलिए उनके मधुर व्यवहार का भी तुम्हारे ऊपर कोई असर नहीं पड़ा। तुम्हारे इन व्यवहारों से मुझे विश्वास हो गया कि तुम स्त्री नहीं कर्कशा हो। स्त्री तो वह होती है जिसमें स्नेह हो, दया हो, वात्सल्य हो तथा जिसके स्पर्श-मात्र से मृत देह में भी प्राण आ जाये। वह तो देवी की प्रतिमूर्ति, उसका दूसरा रूप होती है। स्त्री यानी रूप, रस, गंध और प्रेम का समुच्चय। लेकिन, तुम्हारे भीतर स्त्री के ऐसे एक भी गुण नहीं हैं । तुम्हें कौन समझाये ? याद रखो, जो स्त्री मायके जाकर ससुराल के लोगों की निंदा करती है, उनकी जिंदगी तबाह करती है, वह असल में आनेवाले कल में अपने सुख का रास्ता खो देती है। इतना तो तय है कि कोई स्त्री विवाहोपरांत हर समय अपने मायके नहीं रह सकती और जबतक उसे वास्तविकता का भान होता है तबतक ससुराल के हर सदस्य से उसका रिश्ता टूट चुका होता है। आखिर में लिखा- अवंतिका, घर एक मंदिर की तरह होता है और माँ-पिता उस मंदिर के मुख्य पुजारी होते हैं। मैं एक ऐसे परिवार में पला-बढ़ा जहाँ तीन पीढ़ियों के लोग संग-साथ रहते आये हैं। मेरे पिताजी से पहले मेरे बुजुर्ग दादा-दादी घर के मुखिया थे। मैं दादा-दादी का लाडला था। मेरे व्यक्तित्व निर्माण में माँ-पिताजी के साथ-साथ दादा-दादी का बड़ा योगदान रहा है। जिस परिवार में माँ-बाबूजी, दादा-दादी का वरद-हस्त न हो, उस परिवार के सदस्य अनाथों की तरह जिंदगी जीते हैं और मैं माँ-बाबूजी के रहते अनाथों वाली जिंदगी नहीं जीना चाहता। पत्र में इतना लिखते-लिखते सत्यप्रकाश की आँखों से आँसू टपक पड़े थे, जिसकी बूँदों ने कुछ शब्दों के धूमिल कर दिया था। अंत में, दर्द भरे स्वर में सत्यप्रकाश ने लिखा था- तुमने धमकी दी थी कि यदि मैं माँ-पिताजी को छोड़कर तुम्हारे साथ नहीं रहा तो तुम मेरे घरवालों पर दहेज मांगने और मेरे ऊपर क्रूएल्टी का मुकदमा कर दोगी। ये तलाक के कागजात उसी झूठे मुकदमे के बचाव में तुम्हारे पास भेजे जा रहे हैं। हमारे देश के कानून में यह प्रावधान है कि कोई एक पक्ष यदि दूसरे पक्ष पर दहेज मांगने या क्रूएल्टी का झूठा केस गढ़ता है तो उसी प्रावधान के तहत तलाक की अर्जी दे सकता है। मैंने यही किया है़- सत्यप्रकाश।
पत्र खत्म होते ही अवंतिका को दो वर्ष पूर्व के एक-एक क्षण, एक-एक शब्द और एक-एक घटनाएँ उसकी आँखों के आगे तैरने लगी थी। वह उन्हीं क्षणों में लौट गयी और उन्हीं लौटते हुए क्षणों में उसने देखा कि आठ वर्ष की अवंतिका के माँ- बाबूजी अपने पड़ोसी से लड़ रहे है। अपने बालपन से लेकर युवावस्था तक उसने अपने माँ-पिताजी को अक्सर किसी न किसी से लड़ते-झगड़ते ही देखा है। वे इतने अहंकारी थे कि किसी से बात करना भी पसंद नहीं करते थे। यहाँ तक कि अपने माँ-बाबूजी से भी उनके संबंध अच्छे नहीं थे। बात-बात पर अपने बाबूजी के साथ अभद्र भाषा का प्रयोग करते थे। अवंतिका को याद है कि एकदिन उसके दादाजी पिताजी के कार्यालय में चले गए थे तो वहाँ उन्हें इतनी अश्लील गालियाँ दी थी कि वहाँ उपस्थित लोगों ने सालों तक छिः-छिः किया था। अवंतिका के दादा जी किसान आदमी थे। सो, नंगे पांव, फटी धोती और मैली कमीज पहनकर आ गए थे। अवंतिका को अब अनुभव होने लगा था कि उसके माँ-पिताजी के अ-शालीन संस्कार का कुप्रभाव उसके ऊपर भी आ गया है। उसने मन ही मन यह भी स्वीकार किया कि वह अहंकारी माँ-बाप की अहंकारी बेटी है। अपनी इन स्मृतियों से वह बेचैन हो उठी और बेचैन मन से ही उसने माँ को फोन लगाया। फोन की घंटी बजी।
अवंतिका ने कहा - हॅलो, माँ।
उधर से आवाज आयी - हाँ, हॅलो, कहो बेटा।
अवंतिका ने भरे गले से जवाब दिया - माँ, सत्यप्रकाश ने कोर्ट से तलाक का पत्र भेजा है। एक पत्र बाबूजी के भी नाम है। शायद मिल गया होगा।
माँ ने कहा - हाँ, बाबूजी ने कल ही कहा था कि सत्यप्रकाश ने अवंतिका से तलाक का नोटिस भेजा है। पर, सत्यप्रकाश ऐसा कैसे कर सकते हैं ?
अवंतिका माँ का जवाब सुनकर रुआँसी हो गयी। बस, इतना ही कह सकी- ऐसा उन्होंने कर दिया है माँ। मैं अगर तुम्हारे बहकावे में नहीं आयी होती तो शायद ये दिन नहीं देखना पड़ता। तुम्हारे उकसावे पर ही मैं अपने ससुराल में सभी से लड़ गयी।
पर, मैंने तो तुम्हारी भलाई और सुख-चैन के लिए ये सब किया था बेटा- दूसरी ओर से माँ की आवाज आयी।
सब उलट-पलट गया माँ। मेरा जीवन बर्बाद हो गया।
माँ के साथ अवंतिका का यह संवाद एक मिनट भी नहीं चला और फोन कट गया। इन पीड़ादायी क्षणों में अवंतिका को अनुभव हो रहा था कि काश! वह अपनी माँ के बहकावे में नहीं आयी होती। माँ ने ही उसे उकसाया था कि घर-परिवार से अलग होकर सत्यप्रकाश के साथ अलग रहो। कबतक घिसी-पिटी जिंदगी व्यतीत करती रहोगी। अवंतिका का मन रोने-रोने का हो आया। उसके भीतर निरंतर एक आवाज गूँज रही थी- अवंतिका, तुम कर्कशा हो। कर्कशा, कर्कशा, कर्कशा। निरंतर आती इस गूँज के प्रतिवाद में उसने चिल्लाकर कहना चाहा- हाँ, मैं कर्कशा हूँ। पर, उसकी आवाज फुसफुसाकर रह गयी। अवंतिका को फुसफसाते देखकर सविता और जया ने एक साथ कहा- क्या हुआ आपको ? लो, आपका गंतव्य आ गया।
अवंतिका ने बाहर झांका। कोडरमा स्टेशन आ गया था और ट्रेन छुक-छुककर रुक गयी थी। बाहर शोर था। एक शोर अवंतिका के भीतर भी था। ट्रेन से उतरते हुए उसके पाँव काँप रहे थे। शरीर अकड़ गया था। प्लेटफार्म पर चलते हुए उसे महसूस हो रहा था मानो, किसी ने उसके पाँवों में पाँच-पाँच किलों के पत्थर बाँध दिये हैं। एक-एक कदम चलना मुश्किल हो रहा था।

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