संस्मरण: सूखे हुए सेब

मनीष त्रिगुणायत

शोधार्थी (पीएच.डी, समाजशास्त्र-विभाग), महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी, बिहार
चलभाष: 987 769 1970
ईमेल: manishtarakumar@gmail.com

अगर आप एक लम्बी यात्रा कर रहे हों और इस दौरान ऐसे साथी मिल जाएँ जो आपकी यात्रा को छोटा और यादगार बना दें तो क्या कहना। मेघालय में आयोजित भारतीय समाजशास्त्रीय परिषद (2022) के समापन के पश्चात मैं अपने आत्मीय स्थान पूर्वी चम्पारण लौट रहा था। दिनांक 23-12-2022 को कामाख्या रेलवे स्टेशन से पटना तक की यात्रा कर रहा था। मेरा टिकट कैपिटल एक्सप्रेस में था जो लगभग 24 घंटे में पटना पहुँचा रही थी। सुबह 4:30 तक कामाख्या रेलवे स्टेशन पहुँचने की चुनौती को पूरा कर 3एसी के कोच संख्या बी1 में सीट नम्बर 63 पर पहुँचा। तो वहाँ  का दृश्य यह था कि बौद्ध धर्म की महिलाएँ  जो अपने पारम्परिक परिधान में थीं जो मेरे और आसपास के सीटों पर बैठी हुई थीं। मैं कुछ कह पता कि उनमें से एक महिला जिसकी उम्र लगभग पैंतीस साल रही होगी। वह निवेदन के साथ बोली, “भइया आप ऊपर की सीट संख्या 62 पर बैठ जाएँ।” मैंने मुस्कुरा के सिर हिला दिया। और वहीं बगल में खाली सीट पर बैठ गया।

मधुर वाणी और विनम्र निवेदन के आगे विंडो साइड-लोवर सीट देने का अफ़सोस न था । कुछ समय बाद उस महिला ने पूछा कि आप कहाँ तक जायेंगे भइया? मैंने कहा आख़िरी स्टेशन पटना तक! उसने भी कहा, हम भी वहीं जायेंगे। मेरे अंदर इनको लेकर जिज्ञासा थी कि ये लोग कौन हैं? कहाँ  और क्यों जा रहे हैं? अधिकांश महिलाएँ  ही क्यों? लेकिन उनके शारीरिक बनावट की वज़ह से मैंने अनुमान लगा लिया था कि ये  लोग मंगोलियाई प्रजाति के तिब्बत और भूटान सीमा के आस-पास के हैं। जोकि भारतीय हैं। उस महिला की एक चार वर्ष की बेटी थी जो चंचल, प्यारी और मिलनसार थी। मैंने देखा कि  वह अपने रसोई के खिलौनों के बर्तन में अपनी माँ और दादी के लिए चाय बना रही थी। अपने बहिर्मुखी व्यवहार के कारण मैनैं उस प्यारी सी लड़की को बोला, मुझे भी चाय पीना है! शायद वो अभी हिंदी नहीं जानती थी। लेकिन मेरे भावनाओं को वह समझ चुकी थी। भावनाएँ  ही तो हैं जो संबंधो के भवन को मज़बूती के साथ खड़े किए रहते हैं। उसकी माँ ने अपनी बेटी को अपने बोली में मेरे लिए चाय बनाने को बोला और वह चाय बनाने लगी। इधर मुझे इस महिला से पता चला कि वह ‘मोनपा जनजाति’ तवांग, अरुणाचल प्रदेश से हैं। और बौद्ध पंथ को मानने वाले हैं जो गया बौद्ध बिहार जा रहे हैं। जहाँ  धर्म गुरु दलाई लामा आ रहे हैं। तवांग जोकि भारत का प्रमुख बौद्ध मोनेस्ट्री है और पूर्वोत्तर भारत के पर्यटन का केंद्र है। तवांग के आसपास होने के वजह से मोनपा का जीवन-शैली काफ़ी उच्च और आधुनिक है। वैसा नहीं है जो किताबों में इनके बारे में पढ़ाया जाता है।

इधर प्यारी सी बच्ची ने चाय बना ली और मुझे हँसते हुए चेहरे के साथ चाय दी। मैंने चाय पीने और अच्छी बनी होने का अभिनय किया। बच्ची खूब खुश हुई। उधर उसकी माँ ने मुझे कटे-सूखे हुए सेब अपने झोले से निकालकर खाने को दिया जो मैंने अपने जीवन में पहली बार खाया था। बातचीत के दौरान इनकें सांस्कृतिक और धार्मिक क्रियाओं के बारें में पूछा तो ‘तोरग्या उत्सव’ के बारे में पता चला। और बताया कि देश-विदेश से लोग इसे देखने और समझने तवांग आते हैं। यह उत्सव बुरी शक्तियों से रक्षा के लिए मनाया जाता है। लगभग शाम तक हम आपस में बातचीत करते रहे। रात करीब आठ बजे मैं ऊपर की सीट पर सोने के लिए चला गया।

देर रात ट्रेन बिहार के किशनगंज जिले में प्रवेश कर चुकी थी। किशनगंज रेलवे स्टेशन पर ट्रेन रूकती है। राज्य स्तरीय परीक्षा देने आए विद्यार्थी ट्रेन की कमी होने के कारण एसी बोगी में गेट का शीशा तोड़कर अंदर घुस आए। अचानक आँख खुली तो देखा विद्यार्थी अंदर एसी केबिन में आ रहे थे। वें काफ़ी परेशान, थके हुए और बेबस लग रहे थे। पहले सौ आए। फिर, पाँच सौ। फिर, तादाद हजारों की हो गई। पूरी बोगी में अफरा-तफरी मच गई। बच्चों के रोने की आवाज आ रही थी जिसमें इतना भय था, और दहशत थी, जिससे पूरी बोगी के यात्री सहम गए। हाल ये  था कि साँस लेने में घुटन हो रही थी। कहीं ये शोर कि, आ जाओ इधर! थोड़ा सा जगह खाली है खड़े होने के लिए। कहीं से ये आवाज कि, पैर हटा लो! नहीं तो तोड़ देंगे! मोनपा लोग विद्यार्थियों को बाहर जाने को कह रहे थे और उनमें आपस में झड़पें हो रही थी। मेरी सीट पर भी तीन विद्यार्थी आकर  बैठ गए। विद्यार्थी, मोनपा लोगों को चीनी और साँप खाने वाला कह रहे थे। और मोनपा, विद्यार्थियों को बिहारी, मजदूर और गंदे कह कर बहस कर  रहे थे। इस समय तथागत बुद्ध का अतीत और वर्तमान द्वन्द्व के भंवर में जकड़ा हुआ था। वहीं राज्य सत्ता और प्रशासन अपने लग्ज़री भवनों में बेख़बर हो सो रहे थे। ट्रेन के अभाव में जो ख़ौफ़नाक  मंज़र था वो मेरे, मोनपा और विद्यार्थियों के सीने में ख़ंजर घोंप रहा था। उन सूखे हुए सेबों में मिठास होने के साथ-साथ हल्का सा नमकीन का भी स्वाद था। सफ़र और स्मृति भी वैसी ही है। शायद जिंदगी भी!

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।