बालकों एवं किशोरों को घर-परिवार एवं समाज के प्रति उत्तरदायी बनाने व सुसंस्कारित करने में पूर्ण सक्षम कहानी संग्रह

समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

28, सारंग विहार, मथुरा-6; चलभाष: +91 987 063 1805; ईमेल: drdinesh57@gmail.com

समीक्ष्य पुस्तक: नई दिशा (बाल-किशोर कहानी संग्रह)
ISBN: 978.81.19233.23.6
रचनाकार: सुकीर्ति भटनागर
पृष्ठ: 106, प्रकाशन वर्ष- 2023
मूल्य: ₹ 200 रुपये
प्रकाशक:साहित्यागार, जयपुर (राजस्थान)

 उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ से बाल साहित्य का सर्वोच्च पुरस्कार बाल साहित्य भारती सम्मान एवं पंडित हरप्रसाद पाठक-स्मृति बाल साहित्य भूषण सम्मान सहित सत्तर के लगभग राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत लेखिका श्रीमती सुकीर्ति भटनागर जी का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। इन्होंने कहानी, कविता, बाल कहानी, बाल कविता, लघुकथा एवं बाल उपन्यास आदि विविध विधाओं की चवालीस पुस्तकें लिखकर हिन्दी साहित्य की श्रीवृद्धि की है।

 इनके बाल एवं किशोर कहानी संग्रह ‘नई दिशा’ में कुल बारह कहानियाँ संग्रहीत हैं।

दिनेश पाठक ‘शशि’
माता-पिता से छुपाकर, विद्यालय से गायब होकर अपनी सहेलियों-मित्रों के साथ सिनेमा आदि देखने में समय बरबाद करने वाले बच्चों को शिक्षा प्रदान करने वाली कहानी है-‘नीलिमा को मिली सीख’। कहानी की पात्र नीलिमा को जब अपने अनुचित आचरण का अहसास हुआ तो किस प्रकार अपनी भूल को समझ पाई, सुकीर्ति जी ने बहुत ही मनोवैज्ञानिक ढंग से इसका निराकरण कहानी के माध्यम से किया है-

"मुझे माफ कर दो माँ। कल झूठ बोला था मैंने आपसे और पिताजी से। कल से एक दिन पहले ही अपनी सहेलियों के साथ ‘दृश्यम फिल्म देख आने पर भी आप से सच छुपाया और फिल्म दुबारा न देखनी पड़े, इसके लिए भी पढ़ाई का बहाना बनाकर झूठ का सहारा लिया। इस बात से मुझे आत्मग्लानि हुई और मैं पूरी रात सो नहीं पाई। मुझे रात को यह विचार भी आया कि कल अंधेरी रात में आप सब समय पर ना आते और उस पुलिस वाले के स्थान पर कोई चोर-उचक्के हमारे पीछे पड़ जाते तो हम तीन लड़कियाँ क्या कर पातीं। कितनी विकट परिस्थिति में फंस जातीं हम सहेलियाँ, यही सब सोचकर मुझे बोध हुआ है कि हमने कितनी गलत बात की। मैं लज्जित हूँ स्वयं के व्यवहार पर। माँ, पिताजी, कृप्या मुझे माफ कर दें।" (पृष्ठ-19)

 दूसरी कहानी-‘सुबह का भूला एक मोर के माध्यम से सभी को इस बात की सहज ही शिक्षा प्रदान करने वाली कहानी है कि ईश्वर के दिए अपने रूप-सौन्दर्य को पाकर अहंकार नहीं करना चाहिए तथा अपनी विनम्रता को बनाये रखकर सबके साथ सद्व्यवहार करना चाहिए- 

"यह संसार बहुत बड़ा है और जीवन बहुत छोटा, इसलिए वह इसी प्रकार स्थान-स्थान पर घूमते हुए सब की सेवा करना चाहते हैं। उनके द्वारा कहे यह प्रेरणादायक शब्द मोहना के मन को छू गये और आत्मग्लानि के साथ-साथ उसे स्वयं के बस्ती वालों के प्रति अपने दायित्वों का बोध हुआ। जिन्हें वह अपने वाह्य आकर्षण के अहंकार में फंसकर कब का भुला बैठा था। (पृष्ठ-26)

 ‘मिठुआ की उलझन संग्रह की तीसरी कहानी है जो समय के महत्व को न समझने वाले विद्यार्थियों को अच्छी सीख देती कहानी है। कहानी की पात्र मिठुआ अपने स्कूल का होमवर्क न करके ले जाने पर अध्यापिका के बदले हुए व्यवहार से हतप्रभ रह गई किन्तु जब मिठुआ के घर पर आकर अध्यापिका ने मिठुआ को समझाया तो वह सुधर गई-

"मैं जानती हूँ मेरे बदले हुए व्यवहार को देखकर तुम असमंजस में हो। पर जानती हो, मैंने ऐसा क्यों किया, केवल इसलिए कि तुम समय के महत्व को समझो। यदि तुम अपने भविष्य को उज्ज्वल बनाना चाहती हो तो एक-एक पल की कीमत पहचानो।" (पृष्ठ-32)

 घर के बुजुर्ग अपने बच्चों के हित के लिए उन्हें समझाने का प्रयास करते हैं तो बच्चों को अपने प्रति उनका व्यवहार बहुत कठोर प्रतीत होता है। कहानी की पात्र राबिया को भी अपनी दादी बहुत कठोर लगती थीं किन्तु एक बार यात्रा के दौरान राबिया के पानी में भीग जाने पर दादी जी ने उसके स्वास्थ्य के प्रति जो चिंता की तो राबिया को लगा कि दादी जी तो बहुत अच्छी हैं। हमें अपने बुजुर्गों के कठोर व्यवहार में छुपी असली कोमलता और अपने प्रति सद्भावना को समझना चाहिए, इसी ओर इंगित करती कहानी है प्यारी दादी।

 बच्चों के हृदयों में जीव-जन्तुओं व जानवरों के प्रति सहानुभूति एवं दयापूर्ण आकर्षण होता है। कहानी-‘मैं हूँ ना के गोकुल ने जब कुतिया के चार पिल्लों को ठण्डी रात में अकेला सिकुड़े देखा तो उसने अपनी माँ को बताया। माँ ने जीवों के प्रति गोकुल की कोमल भावना का सम्मान करते हुए चारों पिल्लों को पीने के लिए दूध दिया तथा कम्बल से ढक दिया। छोटे होने के कारण पिल्लों ने दूध नहीं पीया तो गोकुल ने भी रात को कुछ नहीं खाया। सुबह पिल्लों की माँ ल्रगड़ाते हुए कहीं से आई और अपने पिल्लों को अपने अंक में समेटकर बैठ गई। गोकुल ने पेड़ की ओट से छुपकर देखा तो कुतिया चौकन्नी हो गई-

"उन पिल्लों की माँ सहसा शेरनी सी तनकर बैठ गई और सचेत होकर इधर-उधर देखने लगी, मानो कह रही हो, मैं हूँ ना अपने बच्चों के पास, उनकी देखभाल करने के लिए।" (पृष्ठ-47)

 विदुषी लेखिका सुकीर्ति भटनागर जी ने कहानी ’मैं हूँ ना’ के माध्यम से बच्चों की संवेदनशीलता तथा जानवरोंं का अपनी संतान के प्रति दायित्वबोध का बड़ा ही मार्मिक चित्रण किया है।

 कहानी-‘पिचकू बर्गर और बलवान पेठा वर्तमान युग के बच्चों के बिगड़े हुए खान-पान पिज्जा-बर्गर और अन्य फास्ट फूड के प्रति बढ़ती रुचियों के कारण खराब होते स्वास्थ्य में सुधार के लिए बहुत ही उपयोगी उपायों को सुझाया है जो प्रत्येक विद्यालय के प्रधानाचार्यों के लिए भी अनुकरणीय हैं कि केवल पढ़ाई ही नहीं विद्यार्थियों के स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने का दायित्व अभिभावकों के साथ-साथ विद्यालय के प्राचार्य व अध्यापकों का भी बनता है-

"स्कूल में स्थान-स्थान पर लगे विभिन्न फल-सब्जियों तथा खेल-कूद के पोस्टर भी उन्हें प्रभावित करने लगे। कहीं टमाटर हँस रहे होते तो कहीं लौकी की मांसपेशियाँ देख पिज्जा-बर्गर डर के मारे काँप रहे होते। यह सब उनका मनोरंजन भी करता और वैसा ही बनने की प्रेरणा भी देता।" (पृष्ठ-51)

 कहानी संग्रह की दो कहानियाँ ‘संवेदना और ‘समाधान कोरोना काल की विभीषिका में भी मानवीय संवेदना को बचाये रखने का पाठ पढ़ाती कहानियाँ हैं तो ‘स्वाभिमान गरीबों के प्रति सहानुभूतिपूर्वक उनकी सहायता करने हेतु समाज को एक सकारात्मक दृष्टि प्रदान करती कहानी है। कहानी-‘ऐसा क्यों है’ बच्चों की जिज्ञासु प्रवृत्ति को दर्शाने वाली कहानी है तो ‘संकल्प’ ईर्ष्या-द्वेष में दूसरों का अहित करने वालो के लिए क्षमादान के द्वारा उनकी प्रवृत्ति में बदलाव के प्रयास की कहानी है। ‘नई दिशा संग्रह की अंतिम और शीर्षक कहानी है जो अपने नाम के अनुरूप ही एक अतिआत्मविश्वासी बच्चों को नई दिशा प्रदान करने वाली है।

 विदुषी लेखिका के कहानी संग्रह की सभी कहानियाँ इस तरह रची हैं कि सीधे-सीधे बिना कोई उपदेश दिए ही परोक्ष रूप से बालकों एवं किशोरों को घर-परिवार एवं समाज के प्रति उत्तरदायी बनाने एवं सुसंस्कारित करने में पूर्ण सक्षम हैं। भाषा-शैली ऐसी है कि पढ़ते समय लगता ही नहीं कि हम स्वयं पुस्तक पढ़ रहे हैं बल्कि लगता है कि दादी-नानी हमें कहानी सुना रही हैं।

 कुल मिलाकर संग्रह की सभी कहानियाँ रोचक एवं ज्ञानवर्द्धक हैं। पुस्तक का मुद्रण साफ-सुथरा एवं त्रुटिहीन है। गेटअप बहुत ही लुभावना एवं प्रयुक्त कागज उच्च स्तरीय है। हिन्दी साहित्य जगत में पुस्तक का सर्वत्र स्वागत होगा, ऐसी आशा है।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।