श्रद्धांजलि: गीत-ऋषि माहेश्वर तिवारी की सारस्वत यात्रा

मनोहर अभय

मनोहर अभय

तुम्हारे होने से माहेश्वर क्या से क्या हो जाता है। खाली शब्दों में आता है ऐसे अर्थ पिरोना गीत बन गया-सा लगता है

गीत ऋषि माहेश्वर तिवारी की सारस्वत यात्रा से सम्पन्न 'मैं सदी का गीत हूँ\ सुनाना चाहता हूँ।' मंत्रमुग्ध होकर सब सुन रहे थे, माहेश्वर तिवारी का यह कालजयी गीत,पर 16 अप्रैल 2024 को वेही सो गए गुनगुनाते हुए| छोड़ गए गीत-यात्रा की खट्टी-मीठी यादें "जैसे कोई किरन अकेली पर्वत पार करे।" एक संघर्षशील, सादगी और सदाशयता से सम्पन्न माहेश्वर जीवन भर समर्पण भाव से गूँथते रहे मुलायम धागों में समसामयिक संदर्भोँ और जीवन मूल्यों के नवगीत। पर सब छोड़ गए, जैसे कोई हंस उड़ गया हो (छोड़ आए हम अजानी घाटियों में \प्यार की शीतल हिमानी छाँह\ हँसी के झरने \नदी की गति \वनस्पति का हरापन \ढूँढता है फिर \शहर- दर शहर \यह भटका हुआ मन )।

माहेश्वर तिवारी
(22 जुलाई 1939 - 16 अप्रैल 2024)
तिवारी जी कहा करते थे 'गीत वैदिक ऋचाओं के रूप में उपजा और वह लोक जीवन तथा लोकमानस से होकर नवगीत तक आया। अब ये आधुनिक मनुष्य का गीत है'। तिवारी जी के गीत मानो गेय तत्व से भरपूर सामवेद के मंत्र हों या ऋग्वेद की ऋचाएँ। भारतीय संस्कृति ,भारतीय जीवन शैली और ग्राम्य जीवन के प्रति लगाव रहा सीमातीत।

सद्परम्पराओं की प्राणपण से रक्षा करने वाले तिवारी जी ने पारम्परिक गीतों से किनारा कर लिया जैसे ही नवगीतों का सूर्योदय हुआ। साहित्यकारों ने कहा नवगीतों में वह माधुर्य नहीं हो सकता जो पारम्परिक गीत में है। तिवारी जी ने खोल कर दिखा दी मुंगिया हथेली "भरी-भरी मूँगिया हथेली पर\लिखने दो एक शाम और\ काँपकर ठहरने दो\भरे हुए ताल\इन्द्र धनुष को\बन जाने दो रूमाल \सांसों तक आने दो\आमों के बौर \झरने दो यह फैली\धूप की थकान\बाँहों में कसने दो\याद के सिवान\कस्तूरी आमन्त्रण जड़े\ठौर-ठौर"।

जैसा जीवन, वैसा ही गायन। कोई आडम्बर नहीं। दिखावा नहीं। उनके लिए जनतंत्र राजनीति का कनटोपा नहीं। एक जीवन पद्धति है, वह साहित्य में भी होनी चाहिए। नवगीत के प्रख्यात कवि यश मालवीय से एक साक्षात्कार में (दैनिक जागरण सप्तरंग साहित्यिक पुनर्नवा 24 अगस्त 2015) तिवारी जी ने जनवादी कवि अली सरदार जाफरी का कथन उद्धृत किया "मैं अजीब वामपंथी हूँ। विचारों से दिखावे से लेफ्टिस्ट हूँ, लेकिन नजर कैपीटलिस्ट होने पर लगी है। सुविधा सम्पन्न जीवन चाहिए"।

उनके लिए जनतंत्र राजनीति का कनटोपा नहीं। एक जीवन पद्धति है, वह साहित्य में भी हो। (सबके फूल खिलें )। देखना होगा रचना में कलात्मकता ,स्तरहीनता और प्रचारात्मकता कितनी है। विचारणीय है कि रचना का फॉर्मेट क्या है, उसमें कला है कि नहीं। रचना को वैचारिक प्रतिबध्दता से बचाया जाए ,अन्यथा वह किसी संघठन विशेष का उद्घोष (मैनीफेस्टो )बन कर रह जाएगी। देखनी होगी कविता की दृष्टि। वह विध्वंशक है या सृजनात्मक। मनुष्य के लिए मंगलकारी या विनाशक। तिवारी जी की दृष्टि मांगलिक है (भद्रं नो अपि वातय मन: (आप हमारे मन को श्रेष्ठ -मंगलकारी संकल्पों से युक्त करें ऋक- १० \२० \१ ) कवि की आस्थावादी सोच द्रष्टव्य है --पर्वतों से दिन \बहुत छोटे लगे \सुबह बुनने लग गई \आहट हवा की \पिता के आशीष \दर्पण दीठि माँ की \दुःख कि जैसे तृन \बहुत छोटे लगे \याद सिरहाने टिका कर \सो गया बाँसुरी सा मन। और भी --बहुत दिनों के बाद \आज फिर कोयल बोली है \बहुत दिनों के बाद \हुआ फिर मन \कुछ गाने का \घंटों बैठ किसी से \हँसने का -बतियाने का \बहुत दिनों के बाद \स्वरों ने पंखुरी खोली है \शहर हुआ तब्दीलअचानकगाँवों में। जब मन प्रसन्न होता है उमंगों से भरा तो उसे समय का कोई अंदाज नहीं रहता। पहाड़ से दिन भी हँसते -बतियाते यूँ ही गुजर जाते हैं। बड़े से बड़ा दुःख तीनके सा लगता -। यहाँ कवि एक ओर सामजिकता के महत्व की बात कह रहा है तो दूसरी ओर बरगद की छाँव जैसे संयुक्त परिवार की निजता ,एकता ,समीपता की। सुबह होते ही माता -पिता अलभ्य आशीर्वाद। परिजनों के साथ हँसते -मुस्कराते बतियाते मिठास भरे दिन।

तिवारी जी ग्राम्य जीवन की सीधी- सादी संस्कृति के पक्षधर हैं। यहाँ तक कि वे चाहते हैं कि गाँव की सादगी शहर भी अपना लें \'शहर हुआ तब्दील अचानक कल के गाँवों में \नरम दूब की छुअन जगी'। इशारा आज के नहीं बीते दिनों के गाँवों की ओर है जब अलग -अलग घरों में रहते हए ,पूरी विरादरी एक थी। सब एक दूसरेके सुख -दुःख के साथी। ऋचा कहती है समानी व आकूति: हृदयानि व:। समानमस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति (तुम्हारे हृदय (भावनाएँ )एक समान हों। तुम्हारे मन (विचार )एक जैसे हों ,संकल्प (कार्य ) एक जैसे हों ,इसलिए की तुम संगठित हो कर अपने सभी कार्य पूर्ण का सको --ऋक १० \१९१ \४ )। इसी भावना से ग्राम्य -जन कभी जीवन व्यतीत करते थे। आज हम शहर के कोलाहल में खो गए हैं (चीख़ बनते जा रहे\हम सब खदानों की\हो गए हैं शोकधुन\बजते पियानो की। कल तलक सुनते रहे जो\आज बहरे हैं\आँसुओं के बोल जिनके\पास ठहरे हैं\ज़िन्दगी अपनी हुई है\मैल कानों की \ एक साजिश है खुली\ऊँचे मकानों की। ) गरीबों,ग्राम्यजनों की जिंदगी बड़ी साजिश का शिकार है। कान के मैल सी (क्या अनुपम उपमा हैं) गरीब आदमी कान मैल जिसे कान से निकाल कर फेंक दिया जाता है दूर ,एक व्यर्थ उत्पाद की तरह। वहिष्कृत कर दिया जाता बस्ती के मुहाने से। शानदार बंगलोँ से दूर होते हैं इनके घरोंदे। सामजिक असमानता की कितनी मार्मिक व्यंजना है।

सभ्यता के शिखर पर बैठे आज के आदमी की त्रासद जिंदगी को ध्यान में रखते हुए एक गीत में माहेश्वरजी कहते हैं "आस पास \जंगली हवाएँ हैं \मैं हूँ \पोर- पोर जलती समिधाएँ हैं \मैं हूँ \आड़े- तिरछे अगाव \बनते आते स्वभाव \सिर धुनती हों कितनी ऋचाएँ हैं \मैं हूँ \अगले घुटने मोड़े झाग उगलते घोड़े \जबड़ों में कसती वल्गाएँ हैं \मैं हूँ"। इस गीत की बुनावट, कथ्य और उस का छंद विधान नितांत नवीन है, मौलिक। केंद्र में वाचक है(मैं हूँ )यह 'मैं 'समस्त सामाजिकों का द्योतक है। कवि का अहंकार नहीं। गीता में योगेश्वर ने भी इस शैली का प्रयोग किया है "हे अर्जुन,सृष्टियों का अदि ,मध्य और अंत 'मैं हूँ'(गीता -१० -३२ ) मैं हूँ इस के आस-पास शीतल नहीं, जंगली हवाएँ हैंअर्थात खतरनाक -खूंखार। ये नौंच -खरौंच कर रख देंगी समूची मानवीय निष्ठा को। पूरा परिवेश जंगल और जंगलीपन की जकड़न में जकड़ता जा रहा मानव मूल्यों को,मानवता को। शताब्दियों की संजोई सांस्कृतिक उपलब्धियाँ होम हो रही हैं। भस्म हो रहीं हैं पवित्र ऋचाएँ। संत्रस्त आदमी का जीवन उस घोड़े के समान है, जिसके अगले घुटने मुड़े हैं, मुँह से निकल रहा है झाग ,और वल्गाएँ कस रही हैं जबड़े को। विवशताओं के बीच जी रहेआदमी की त्रासदी का बिम्ब मन को झकझोर कर रख देता। आज की सभ्यता ने आदमी को पंगु ही नहीं , पंगु को घसीट -घसीट कर रेंगने को विवश कर दिया है। इस गीत को सुनकर प्रसिद्ध तूलकी स्वामीनाथन ने कहा था "यह कविता, नहीं पेंटिग है"। तिवारी जी की प्रतिक्रिया थी "ऐसे ही किसी विन्दु पर कविता और कलाएँ एक हो जातीं हैं"। भावनात्मक स्तर पर कवि के अनेक ऐसे गीत हैं जिन्हें पढ़ कर सामजिक भावविह्लव हो जाता है (रेत के स्वप्न आते रहे\और हम मछलियों की तरह छटपटाते रहे )रेत में छटपटाती मछली का विम्ब मन के अंतिम छोर तक छू जाता है "कोई भोक्ता ही जाने"। ( वही पुनर्नवा 24 अगस्त 2015)

विवशता और अकेलेपन के बीच जूझने की सामर्थ्य को नए बिम्ब और प्रतीकों से अभिव्यंजित करने का कौशल कवि में , अद्वितीय है। मोम और आग में मैत्रि नहीं। आग मोम को पिघला कर पानी कर देगी। कुहरे के बीच धूप दिवा स्वप्न है। आज हम ऐसी विपरीत- स्थितियों में ही जीरहे हैं -'बर्फ होकर जी रहे हम- तुम\मोम की इमारत में \इस तरह वातावरण कुहरिल \धूप होना मुश्किल \जूझने को हम अकेले \एक अंधे महाभारत में \सुन रहा हूँ \शेर की खालें दिखा कर \मेमने कुछ फिर किसी मुठभेड़ मारे गए "। बर्फ होकर मोम की इमारत में रहना कठिन नहीं, जबकि चारों - ओर कुहासा पसरा हो। किन्तु धूप का आभाव वह ऊष्मा नहीं दे पायेगा जिस से अंधे युग की दूषित न्याय पद्धति की के विरुद्ध आवाज उठाई जा सके। निर्दोष और मासूम लोगों को भयाक्रांत कर (शेरनहीं, शेर की खालें दिखा कर) इकतरफा मुठभेड़ से बचाया जासके। यह महाभारत के इंद्रप्रस्थ का हाल है। यह ऐतिहासिक तथ्य " बहुत कुछ अनकहा कह जाता है'। कवि को लगता है अच्छे दिनों की आशा मृग -तृषा है --'आने वाले हैं\ ऐसे दिन\जो आँसू पर पहरे बैठाने वाले हैं'। मारे और रोने न देने वाली कहावत है।

अतीत बड़ा लुभवना लगता है। कवि भी इसी बात को दुहराते हैं --"घर की दहलीजों के नीचे \गहरे- गहरे से पदचिन्ह \ कल तक थे जो मेरे साथ \दीखते उनसे \बिलकुल भिन्न \ताजे पर अपरिचित अनाम \अभी छोड़ गई इन्हें शाम \जाने क्यों खिन्न"। बीते दिन सादगी सरलता से भरे आज से बहुत भिन्न थे ,परआज लगता है वे दिन हो गये हैं खिन्न! भला दिन क्यों खिन्न होने लगे? आधुनिकता की चमक -दमक में आदमी स्वयं चौंधिया गया। पर यादें हैं की पल्ला छोड़ती ही नहीं।

'याद तुम्हारी जैसे कोई\कंचन-कलश भरे। जैसे कोई किरन अकेली\पर्वत पार करे। लौट रही गायों केसंग-संग\याद तुम्हारी आती\और धूल के\संग-संग\मेरे माथे को छू जाती\दर्पण में अपनी ही छाया-सी\रह-रह उभरे,\जैसे कोई हंस अकेला\आंगन में उतरे। \जब इकला कपोत का जोड़ाकंगनी पर आ जाए\दूर चिनारों के वन से\कोई वंशी स्वर आए\सो जाता सूखी टहनी पर\अपने अधर धरे\लगता जैसे रीते घट से\'कोई प्यास हरे। कवि को दुनियाँ -जहान में वह सुख नहीं मिल पाया जो घर आँगन में है। यह घर कौन बनाता है? कैसे बन जाता है ? "एक तुम्हारा होना\ क्या से क्या कर देता है,\बेजुबान छत दीवारों को\ घर कर देता है। ख़ाली शब्दों में\ आता है\ऐसे अर्थ पिरोना\गीत बन गया-सा\ लगता है\घर का कोना-कोना\एक तुम्हारा होना\ सपनों को स्वर देता है। आरोहों-अवरोहों से समझाने लगती हैं\तुमसे जुड़ कर\ चीज़ें भी\बतियाने लगती हैं\एक तुम्हारा होना\ अपनापन भर देता है "।

माहेश्वर तुम आए ,क्या से क्या कर गए ? खाली शब्दों में अर्थ पिरो कर ऐसे गीत लिख गए। कुछ और लिख पाते। तुमने हर बार यही कहा मैं वह नहीं लिख पाया जो मेरे मन में रोज कुलबुलाता है ,पर प्रकट नहीं होता।

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