संस्मरण: ताड़केश्वर धाम और बुरांश

ऋतु सैनी

ऋतु सैनी

सहायक आचार्य (भूगोल), रानी भाग्यवती देवी महिला महाविद्यालय, बिजनौर


कुछ दिन पहले ताड़केश्वर धाम* जाना हुआ। बिना किसी पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के हम घर से निकले। बीच में सिद्धबली धाम के दर्शन किए, माथा टेका, भंडारे में प्रसाद ग्रहण किया और निकल गए। कुछ किलोमीटर आगे बढ़े तो प्रकृति ने अपने वस्त्र बदल लिए। ज्यों ज्यों पहाड़ ऊँचे होते गए त्यों त्यों वृक्षों की ऊँचाई और रंग रूप में एकरूपता आ गई। दूर दूर तक चीड़ के पेड़ों की विशाल चादर में लिपटे पहाड़ मानों बाँहें फैला कर अपने आगोश में समेटने के लिए खड़े हों परंतु इन विशाल पेड़ों से अलग कहीं कहीं बीच में से झाँकते चटक लाल बुरांस के फूलों ने सारा आकर्षण स्वयं की ओर केंद्रित कर लिया। अपने जीवन में दूसरी बार मैं इन पेड़ों को देख रही थी। इससे पहले एक बार और लैंसडाउन जाते वक्त इन्हें दूर से देखा था। तब पब्लिक ट्रांसपोर्ट में सफर करने के कारण मन मारना पड़ा था लेकिन ईश्वर ने एक बार फिर मौका दिया और ताड़केश्वर जाने के रास्ते में कई जगह बुरांस के फूल मिले मगर अधिक दूर और अधिक ऊँचाई पर होने के कारण हाथ में लेना संभव नहीं हुआ। मन को दूसरी बार मरते देख रही थी।

लाली गुरांस, बुरांस, या बुरांश
फूल एक, नाम अनेक
फूलों के प्रति इतना उतावलापन बचपन से है। असम में स्कूल जाते वक्त गुलाबी और सफेद कमल के फ़ूल देखते देखते मैं बड़ी हुई। मगर कभी हाथ में न ले सकी। बच्चे रोज़ बस में उल्टियाँ करते थे और मैं दुआ करती थी कि हमारी शक्तिमान बस कहीं ऐसी जगह क्यों नहीं रुकती जहाँ उतरकर फूल तोड़े जा सकें खैर पहली कक्षा में कौन बस में से उतरने देता ऊपर से साथ में पहरेदार के रूप में बड़ी बहन हमेशा होती थी। उसकी चिंताएँ ऐसी कि मुझे बस तो दूर सीट से न उतरने दें। स्कूल में खड़े डहेलिया की खुशबू आज भी कहती है एक बार फिर लौट कर आर्मी स्कूल तेजपुर चली जाऊँ और ढेर सारे डहेलिया तोड़ लाऊँ।

हालांकि फ़ूल शाखाओं पर ज़्यादा अच्छे लगते हैं ये आज समझ आ गया है। फिर भी बचपन का मन तोड़ कर सहेजना जानता है और बड़ों का जुड़े रहने में खुशी तलाशता है। बात भटक गई खैर लौट कर फिर बुरांस पर आती हूँ। तो सारे रास्ते बहुत कोशिशों के बाद भी बुरांस को देख भर पाई। छूना संभव नहीं हुआ। कहीं छुट पुट सी कलियाँ ज़रूर रास्ते में पड़ी दिखाई दीं। लेकिन पूरा फ़ूल नहीं मिल पाया। बुरांस का फूल कुछ ऐसा होता है जैसे खूब सारे कनेर के फूल एक साथ जोड़ कर गुच्छा बना दिया हो। हालांकि जो हमको एक फ़ूल लगता है वो सब एक साथ जुड़े हुए स्वतंत्र फूल होते हैं। सब एक साथ जुड़कर एक सुंदर फ़ूल बना देते हैं।

तो मेरी सारी कोशिशों के असफल होने के बाद मुँह से निकला कि हो सकता है जहाँ हम जा रहे हैं दर्शन करने मतलब ताड़केश्वर धाम, वहीं घाटी में हमको ये पेड़ मिल जाए। बात सच निकली। बुरांस के बहुत सारे पेड़ थे वहाँ। मगर सब ऊपर, बहुत ऊँचाई पर लगे थे सभी फ़ूल। उस दिन पहली बार लगा कि काश इस शरीर में पर होते तो अब तक तो फ़ूल मेरे हाथ में होते। मेरे साथ में जो लोग गए थे सबका केवल एक मकसद कि ताड़केश्वर मंदिर के दर्शन हो जाएं। रास्ते में कतारबद्ध घंटियाँ बजा लें। हर घंटी से निकली अलग ध्वनि सबको आकर्षित कर रही थी। श्रद्धा की अटूट डोर में बंधी घंटियाँ किसको अपनी ओर आकर्षित नहीं करेंगी। लेकिन मुझे नहीं किया। मेरा आकर्षण, श्रद्धा, भक्ति, सब केवल एक फ़ूल में बसी थी और वह था बुरांस। मुझे तो फ़ूल का नाम भी नहीं पता था। यह भी वहाँ के स्थानीय लोगों ने बताया। बहरहाल सबके पीछे पीछे मैंने भी दर्शन किए।

ताड़केश्वर धाम में भगवान शिव की पूजा ताड़केश्वर के रूप में की जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार , ताड़कासुर नामक राक्षस ने भगवान शिव से अमरता का वरदान प्राप्त करने के लिए इसी स्थान पर तपस्या की थी। स्वयं को अनश्वर मानकर ताड़कासुर अत्याचारी हो गया। परेशान होकर देवताओं और ऋषियों से भगवान शिव से प्रार्थना की और ताड़कासुर का अंत करने के लिए कहा। भगवान शिव के आदेश पर उनके पुत्र कार्तिकेय ताड़कासुर से युद्ध करने गये। अपने अंतिम क्षणों में ताड़कासुर ने प्रायश्चित करते हुए भगवान शिव से क्षमा मांगी, और भोलेनाथ ने उसे क्षमा करके वर दिया कि कलयुग में इस स्थान पर मेरी पूजा तुम्हारे नाम से होगी।

दर्शन के लिए जैसे ही मंदिर में प्रवेश किया वैसे ही भगवान कार्तिकेय के दर्शन से पहले ही नज़र उनके चरणों में रखे चटक लाल फूलों पर अटक गई। मगर फूलों को एक बार छूने की असमर्थता अब सब्र का बांध तोड़ रही थी। शायद ईश्वर सब जानते थे। सब तय था। मेरा वहाँ जाना। फूलों को पाने की इच्छा करना, सब कुछ। मैंने हाथ जोड़े, घंटी बजाई, पंडित जी ने टीका लगाया। और हाथ में प्रसाद लेने के लिए मैंने हाथ बढ़ाया। प्रसाद मिला। मैं टकटकी लगाए फूल को निहारती रही और एकाएक फूल मेरे हाथ में। आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। शायद कोहिनूर पाने वाले को इतना सुकून और खुशी नहीं मिला होगी। जैसी पूरी कायनात मिल गई हो। कण कण में ईश्वर है सुना था। मगर उस दिन ऐसा लगा जैसे साक्षात भगवान शिव के चरण हाथों में हों और उनका हाथ सर पर। मानों वे कह रहे हों तू सच्चे मन से मांग के तो देख मैं न दूँ तो कहना। आज तक केवल सुना था, आज देख भी लिया।
 
आँखों की कोर नम थी तब भी और आज 14 अप्रैल 2022 को रात के एक बजे लिखते हुए भी। भावनाओं को शाब्दिक रूप कौन दे पाया है। शब्द भावनाओं का अंश मात्र भी बयाँ कर पाएँ तो बड़ी बात होगी।
खैर 
तेरी माया तू ही जाने
कब क्या निर्धारित करता है
और कैसे पूरा करवाता है
सब तूने सोच के रखा है
तो हम कौन और क्यों सोच रहे हैं भला
जैसे तू कर रहा है अच्छा कर रहा है
तू किसी के साथ बुरा भी करेगा तो अच्छे के लिए
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* ताड़केश्वर महादेव मंदिर, उत्तराखंड के पौड़ी जिले के लैंसडाउन से लगभग 34 किलोमीटर दूर और समुद्रतल से लगभग 1,800 मीटर की ऊँचाई पर स्थित एक विख्यात शिवमंदिर है।
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आत्मकथ्य: भूगोल की छात्रा, शोधार्थी तथा भूगोल की ही अध्यापिका हूँ किंतु प्रकृति से प्रेम करते करते मेरा हृदय कब हिंदी के लिए स्पंदन करने लगा मुझे पता ही नहीं चला और यही प्रेम मुझे हिंदी में लिखने के लिए प्रेरित करता है। मेरी कोई विशाल ऐतिहासिक साहित्यिक यात्रा नहीं है। मैं स्वयं के मन की शांति के लिए मन में उमड़ रहे विचारों को शब्दों में बांधने का प्रयास भर करती हूँ।

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