असग़र वजाहत के नाटक समिधा में उभरते हुए सामाजिक आयाम

सैयद दाऊद रिज़वी

सैयद दाऊद रिज़वी

शोधार्थी हिंदी विभाग, अँग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद, भारत 


धर्म का अखाड़ा

     आज के युग का मनुष्य जो बाहर से देखने में तो सभ्य दिखता है, भीतर से अज्ञान, अंधविश्वास और पाखंड की ऐसी जंजीरों में जकड़ा हुआ है, जिनका सत्य से कोसो मील तक कोई वास्ता नहीं  है। 21वीं सदी जो आधुनिक वैज्ञानिक क्रांति की प्रतीक है, जहाँ मनुष्य विज्ञान के नए-नए आविष्कार करके ब्रह्मांड के कई ग्रहों तक पहुँच गया है, वहीं आज भी मानव पाखंड, अंध-विश्वास, अंध-भक्ति, आस्था और परम्पराओं में जकड़ा हुआ है। भगवान तक का आज बाज़ारीकरण हो गया है। सिर्फ़ अशिक्षित लोग ही नहीं बल्कि शिक्षित, उपाधिधारक और उच्च पदों पर आसीन लोग भी पाखंडी और कपटी साधु-संन्यासियों के बहकावे में आ जाते हैं। ऐसे कपटी लोगों को अंध आस्था और पाप-पुण्य के जाल में फँसाकर अपनी तिजोरियाँ भरते हैं।

देश में अनेक कपटी मौलवी, पादरी, धर्माचार्यों और मठाधीशों ने भोली-भाली जनता की आस्था और अंधविश्वास का सहारा लेकर अपने पैर पसारे हुए हैं। ये लोग झूठे जादू-टोटकों के द्वारा भोली-भाली जनता के विश्वासपात्र बनते हैं और स्वयं को ईश्वर का अवतार या पैगंबर बताकर जीवन भर जनता का धन लूटते हैं।

     ऐसे आचार्य और गुरु स्वार्थ और रूढ़िवादिता की बेड़ियों में लोगों को जकड़कर उनकी सचेतन बौद्धिकता को समाप्त कर देते हैं। इस पर नरेंद्र मोहन ने कहा है- "आज के औसत धर्माचार्यों ने विवेक के स्थान पर अपने स्वार्थ और अहंकार को ही अधिक महत्व प्रदान किया है।"[1] ऐसे धर्माचार्य और गुरुओं की कथनी और करनी में ज़मीन-आसमान का फ़र्क होता है। उनकी कथनी ही लोगों में रूढ़ियाँ, अज्ञान एवं अंधभक्ति पैदा करती है और लोग उनको सच्चा और परम ज्ञानी समझकर समाज से भी ऊपर समझ लेते हैं। उसके पश्चात ये कपटी इसका पूरा लाभ उठाते हैं।

इन गुरुओं के चेले-चपाटों का एक समूह होता है जो जनता की अंध-मानसिकता का भरपूर लाभ उठाने के लिए दिन-रात कार्य करता है। ये लोग अपने स्वार्थ के लिए अपने गुरुओं के नाम पर असंख्य आश्रमों को स्थापित करते हैं। समाज के लोग भी ऐसे धर्मगुरुओं की ओर भागते हैं जो पाखंड, अंधविश्वास और अंधभक्ति का प्रचार-प्रसार करते हैं। इन लोगों की स्वार्थपरकता, कुटिलता और पाखंड के कारण धर्म शब्द की छीछालेदर हो रही है। धर्म जिसका संबंध कर्म से होता है। "धर्म हमारे समाज के समूचे कार्यकलाप में रचा बसा होता है। वह उसके आध्यात्मिक जीवन का कटा हुआ अंश नहीं होता।"[2] मज़हब, सम्प्रदाय और धर्म के नाम पर आज बहुत कुछ मानवता की आड़ में निरंकुश और बर्बर होकर समाज में तांडव कर रहा है, और उसका इस्तेमाल राजनीति की रोटियाँ सेंकने के लिए हो रहा है। देश हज़ारों सम्प्रदायों, गुटों में विभक्त हो चुका है और इन गुटों का काम समाज में धर्मांधता और रूढ़िवादिता का प्रचार-प्रसार करना है। इन गुटों का संबंध राजनीतिक दलों से भी होता है। जिसके कारण ये गुट बहुत प्रभावशाली और शक्तिशाली बन जाते हैं। सरकार और नेता भी चुनावों के मौके पर इन धर्मगुरुओं से मदद लेते हैं क्योंकि नेता यह जानते हैं कि "धर्म प्रवण भारतीय ऐसे निजी मसलों में सरकार की भले न सुने, तथाकथित धर्मगुरुओं की बात को जरूर कहीं मन में बांध लेते हैं।"[3] इन ढोंगी धर्मगुरुओं एवं चेले-चपाटों की मंडली समाज में संकुचित मानसिकता और अंधसंस्कृति के द्वारा लोगों की बुद्धि संकीर्ण कर देती है। इसी विषय पर शंभूनाथ कहते हैं कि "आदमी के निजी जीवन की समस्याएँ आज इतनी बढ़ गई हैं कि यदि वह महंगे आध्यात्मिक गुरुओं की शरण में नहीं जा पाता तो ऐसे ही भगवानों और अंधविश्वासों को अपना सिर सौंप देता है।"[4]

ये गुट जनता को खोखली अंधभक्ति और संकीर्ण मानसिकता की आग में झोंक देते हैं और जनता की भावनाओं तथा सत्य रूपी धर्म के साथ खिलवाड़ करके धर्मगुरुओं को प्रसन्न करते हैं। इस समकालीन समस्या को अपनाकर असग़र वजाहत नेसमिधा’  नाटक की रचना की है।

नाटक का पात्र अंबिका प्रसाद मेहनत मज़दूरी करके एक-एक पैसा जोड़ता है ताकि वह अपनी इकलौती बहन रामकली को छुड़वा सके क्योंकि रामकली का ससुर कर्ज़दार का कर्ज़ा चुकाने के लिए रामकली को बेच डालता है। वह आदमी रामकली से वेश्यावृत्ति करवाता है। अंबिका प्रसाद अपनी बहन को उस नर्क से निकालने के लिए डी.पी. दोरिया के पास जाता है। दूसरी ओर दोरिया ऐसे ही एक व्यक्ति की तलाश में था, जिसके द्वारा वह अपना स्वार्थ सिद्ध कर सके। दोरिया उद्योग जगत के एक प्रभावशाली समूह का मुखिया है। वह अंबिका प्रसाद को स्वामी सुखानंद आचार्य बना देता है और उसके प्रचार-प्रसार के लिए प्रेस ब्यूरो को बुलवाकर अखबारों में न्यूज़-आइटम और राइटअप छपवाता है। सेक्स-अपील के लिए हसीन लड़कियों की भी नियुक्ति करता है। जब डी.पी. दोरिया को यह ज्ञात होता है कि जिस व्यक्ति को उसने अंतरराष्ट्रीय स्तर का महाप्रभु स्वामी सुखानंद आचार्य बनाया है, उसकी बहन वेश्यावृत्ति करती है तब वह अंबिका प्रसाद को कैद करके उससे यह हलफनामा ले लेता है कि उसका रामकली के साथ कोई संबंध नहीं है।


धर्म, भ्रष्टाचार और समाज -

    असग़र वजाहत ने इस नाटक के माध्यम से समाज में उस व्याप्त धोखाधड़ी को बेनकाब किया है, जिसे संरक्षण देने वालों में समाज के प्रतिष्ठित लोग शामिल हैं, जिन्होंने अपने फायदे के लिए धर्म का बाजारीकरण तक कर दिया है। नाटक के पात्र डी.पी. दोरिया और उसके समूह के लोग मिलकर अंबिका प्रसाद के साथ धोखा करते हैं। ये लोग उसे समाज में धर्मगुरु के रूप मे स्थापित कर देते हैं और समाज के लोगों द्वारा उसको कहीं भगवान, कहीं दिव्य आत्मा तो कहीं सर्व-समर्थ का प्रतीक बताकर शोषण और भ्रष्टाचार करते हैं। इतना ही नहीं वे दावा करते हैं कि सेक्स के बिना धर्म नहीं चलता। गिलानी का कथन दृष्टव्य है- "सर, सेक्स के बिना धर्म तक नहीं चलता, वी फील हेल्पलेस।"[5]

नाटक में डी.पी. दोरिया, अंबिका प्रसाद का एक फायदे के रूप में उपयोग करता है और उसकी इच्छाओं को कुचल देता है। वह उसकी बहन रामकली को छुड़वाने का वचन नहीं निभाता बल्कि उसे अपमानित करता है। दोरिया और उसका ग्रुप स्वामी सुखानंद आचार्य ट्रस्ट के डोनेशन के नाम पर लोगों का करोड़ों रुपया हड़प लेते हैं। वह कोई भी वस्तु किसी के लिए नहीं छोड़ता है- "बहुत जरूरी है यह... कहें एक तरह का इन्वेस्टमेंट है.... हमारा इन्वेस्टमेंट मल्टीडाइमेंशनल होता है... हम एक चीज़ को भी दूसरे के लिए छोड़ नहीं सकते, आर्ट-कल्चर हो, शिक्षा हो, व्यापार हो, धर्म हो, कला हो या इंडस्ट्री हो अब सौ दो सौ साल पहले वाला जमाना नहीं रहा कि बनिए की दुकान की तरह इंडस्ट्री चलाए जाओ और दुनिया से बेखबर रात में मीठी नींद सोते रहो।"[6]

दोरिया फर्टिलिजर्स के मैनेजिंग डाइरेक्टर डी.सी चुग की पढ़ी-लिखी लड़की मल्लिका अपने पिता के मना करने के बाद भी स्वामी सुखानंद आचार्य महाप्रभु ट्रस्ट की सदस्या बनने को तैयार हो जाती है किंतु उसका प्रेमी अनादि सहमत नहीं होता। वह उसे समझाने का हर संभव प्रयास करता है कि "तुम अच्छी तरह जानती हो धर्म की ये दुकानें करप्शन के अड्डे हैं। ये लोग करप्ट लोग हैं। दुनिया भर के पाप वहां होते हैं और तुम वहां जा रही हो ?"[7] पर मल्लिका अपने फैसले से नहीं हटती और जब उसको ज्ञात होता है कि महाप्रभु सुखानंद आचार्य कोई प्रभु नहीं, एक धोखेबाज़ है। उसके साथ धोखा किया जा रहा है। पुलिस द्वारा उसे गिरफ्तार कर लिया गया है। उसकी बहन एक वेश्या है। तब मल्लिका और उसका प्रेमी मिलकर धोखेबाज़ डी.पी दोरिया का असल रूप समाज के समक्ष लाने का प्रयास करते हैं परंतु कोई भी समाचार-पत्र इस तरह की खबरों को छापने के लिए तैयार नहीं होता, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि समाज में ऐसे धर्मगुरुओं, उनके प्रचारकों और पूँजीपतियों का वर्चस्व बढ़ रहा है।

प्रस्तुत नाटक खुलासा करता है कि समाज अंधी आस्था में इतना लीन हो चुका है कि वह इन धर्मगुरुओं के पाखंड को डंके की चोट पर स्वीकार कर लेता है। इसी बात का फायदा बड़े-बड़े उद्योगपति, पूंजीपति और नेतागण उठाते हैं। ये लोग इन धर्मगुरुओं को एक यंत्र-तंत्र की तरह प्रयोग करते हैं। डी.सी तथा अंकल के बीच का संवाद इसका एक उदाहरण है -

डीसी- मल्लिका, दोरियाज़ को पब्लिक रिलेशन के लिए सब करने की जरूरत नहीं है... तुम जानती ही हो बड़े-बड़े मंत्री हैं उनकी पैरेलपर।

अंकल - राइट भाई साहब आधी सरकार इनकी जेब में रहती है।"[8]

ऐसे भ्रष्टाचारियों के विरूद्ध कोई नहीं बोलता है और अगर किसी ने बोलने का प्रयास किया तो ये लोग उसका जीवन तहस-नहस कर देते हैं।


पत्रकारिता में अनैतिकता -

पत्रकारिता, जिसे देश के लोकतन्त्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, जिसका कर्तव्य झूठ, भ्रष्टाचार और अन्याय का पर्दाफाश करके जनता को न्याय दिलाना होता है, आज उस पर  देश में बड़े-बड़े उद्योगपतियों, नेताओं का वर्चस्व है। देश का दुर्भाग्य है कि प्रतिष्ठित समाचार पत्र और न्यूज़ चैनल्स ख्याति प्राप्त करने की लालसा में पूँजीपतियों, उद्योगपतियों और बाहुबली नेताओं की कठपुतली बन गए हैं। इसको नाटक में गहराई उजागर किया गया है- "छापने को छाप दें....लेकिन जानते हो क्या होगा ? कम से कम मेरी नौकरी चली जाएगी। हमारे अखबार का मालिक जगत कौड़िया ने डी.पी दोरिया की बात न माने यह हो नहीं सकता।[9] नाटक में एक बात का और संकेत मिलता है-मतलब ये कि इसके पहले हमने एक भगवान के खिलाफ छापा था तो दफ्तर पर हमला हो गया था आप क्या चाहते हैं... फिर हम पर हमला कर दिया जाए।"[10]

 ऐसे लोग देश के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं होते हैं जो अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए जनता की भावनाओं, न्याय और सत्य को नीलाम कर देते हैं। ऐसे लोगों को पत्रकारिता में कोई जगह नहीं मिलनी चाहिए। इनकी चाटुकारिता और स्वार्थ देश के लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर कर उन में विष घोल देते हैं।


अभिशप्त नारियों की स्थिति -

नारी जो एक माँ भी होती है, जिसको समाज की प्रथम पाठशाला कहा जाता है। आज उसी नारी की उन्नति विज्ञापनों और चुनावी रैलियों तक सीमित रह गई है। सदियों से समाज में स्त्री का शोषण दहेज के नाम पर, पुत्र प्राप्ति के नाम पर, जाति-धर्म के नाम पर हो रहा है। आज शोषणों का चरित्र और भी भयावह हो चुका है। नारी का नौकरी के नाम पर, पदोन्नति के नाम पर और धर्म की आड़ में मानसिक और शारीरिक शोषण होता है। असग़र वजाहत ने अपने नाटकसमिधाकी पात्र रामकली के द्वारा नारी शोषण का दर्दनाक चित्रण किया है। रामकली के ससुर ने उसको रेड लाइट एरिया में बेचकर उसका जीवन नर्क में झोंक दिया। नाटककार ने रामकली के माध्यम से बड़े-बड़े महानगरों में नारी के शोषण और उनकी स्थिति का सजीव चित्र उभारा है।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि असग़र वजाहत का व्यक्तित्व बहुत ही प्रभावशाली है जो उनके नाटक में प्रस्फुटित होकर दिखाई देता है। उनके नाटक वर्तमान समाज की दशा से सीधे साक्षात्कार करते हैं, जो वास्तव में बड़ा ही साहसिक कृत्य है।


  1. नरेंद्र मोहन- धर्म और सांप्रदायिकता, पृ -99 
  2. निर्मल वर्मा-दूसरे शब्दों में, पृ-232 
  3. मृणाल पांडे- परिधि पर स्त्री, पृ-88 
  4. शम्भूनाथ- धर्म का दुखांत, पृ, 215 
  5. असगर वजाहत- आठ  नाटक-पृ ,157 
  6. वही  
  7. असगर वजाहत- आठ  नाटक, पृ-166 
  8. वही 
  9. असगर वजाहत- आठ   नाटक, पृ-193 
  10. वही-पृ- 192

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