कहानी: करमी मुंडा

विजय कुमार संदेश

विजय कुमार संदेश

प्राध्यापक, पी.जी. हिन्दी विभाग, मार्खम कॉलेज, हजारीबाग, झारखंड,भारत
दूरभाष: +91-943 019 3804
ईमेल: sandesh.vijay@gmail.com


घुमक्कड़ी के शौकीन जयकुमार ने रिटायरमेंट के बाद देश-दुनिया की सैर को अपनी जीवन-चर्या में शामिल कर लिया था। यों, वे अपनी नौकरी की अवधि में भी घुमक्कड़ी के लिए समय निकाल लेते थे। किंतु, इधर उनका यह शौक दिन-प्रतिदिन की चर्या में शामिल हो गया था। बहुत अधिक दूरी नहीं तो दस-बीस किलोमीटर के दरम्यान आनेवाले पर्यटन-स्थलों पर ही वे चले जाते थे। आज वह अपने शहर के प्रख्यात इस्को गुफा देखने के लिए निकले थे। यह गुफा हजारीबाग से लगभग चालीस किलोमीटर दूर दक्षिण इस्को गाँव में है। इस्को गुफा खुले पठारी-दर्रे की तरह है। दर्रा के आधे किलोमीटर तक दोनों ओर फैली कठोर चट्टानें हैं। दर्रा के एक ओर दीवार पर पाषाणकालीन भित्ति-चित्र हैं। इन चित्रों में सूर्य, पशु-पक्षी और ज्यामितीय आकृतियाँ - त्रिभुज-चतुर्भुज बने हुए हैं, जिसे देखकर जयकुमार ने अनुमान लगाया कि सदियों पूर्व उकेरे गए ये शैल-चित्र पाषाणकालीन आदिम जीवन की कला-प्रियता, ज्ञान-चेतना और प्रकृति-चेतना के संवाहक और मेगालिथ की दृष्टि से विशिष्ट हैं। दर्रा के ठीक बीचों-बीच एक सदाबह नाला है, जिसका बहाव पूरब से पश्चिम की ओर दूर तक है। जयकुमार ने अनुमान लगाया कि कभी यह घने जंगल का क्षेत्र रहा होगा। पर, अब यहाँ घनी आबादी और गाँव बस गये हैं। साँझ को लौटते हुए जयकुमार ने देखा कि सैकड़ों छोटे-बड़े पशु-धन गले में बंधी घंटी संग टन-टन-टुन-टुन करते अपने-अपने घरों को लौट रहे हैं। बहुत ही मनोहारी दृश्य था यह। सूरज डूबने से पहले जयकुमार वहाँ से चल पड़े और सोचा हजारीबाग झील और कैनेरी पहाड़ी के सांयकालीन मनोरम दृश्यों का अवलोकन करते हुए घर पहुँच जाऊँ। हजारीबाग आते-आते शाम के पाँच बज गए। वे झील पहुँचने ही वाले थे कि पश्चिम दिशा से अचानक जोरों की अंधड़ के साथ तूफान आ गया। तूफान से बचने के लिए उन्होंने पास ही शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय के परिसर में गाड़ी पार्क की और बरामदे में चले गए। इस आँधी-तूफान से बचने के लिए दर्जन भर लोग कैंपस में आ गए थे। अभी वे बरामदे में पहुँचे ही थे कि तेज बारिश होने लगी और छोटे-बड़े ओले गिरने लगे। आंधी और ओलों के बीच ही लाल-पीली बत्तीवाली एक गाड़ी और पार्क हुई। उस लाल-पीली बत्तीवाली गाड़ी से एक महिला अधिकारी उतरीं और तेजी से कार्यालय की ओर चली गयीं। उस महिला अधिकारी ने जयकुमार के पास से गुजरते हुए एक नजर देखा, ठिठक कर सेकेंड भर के लिए रूकीं और फिर आगे बढ़ गयीं। कार्यालय में अभी भी कुछ कर्मचारी कार्य कर रहे थे। वहाँ के एक कर्मचारी को भेज कर उन्होंने जयकुमार को आदर सहित बुलावा भेजा। जयकुमार गए तो उन्होंने एक खाली कुर्सी पर बैठने का अनुरोध किया। जयकुमार के बैठ जाने के बाद महिला अधिकारी ने पाँव छूकर प्रणाम करते हुए पूछा- सर, आपने मुझे पहचाना। कुछ-कुछ परिचित आवाज सुनकर तत्काल जयकुमार ने तो नहीं पहचाना पर आवाज के सहारे पहचानने की पूरी कोशिश की। पर, नहीं पहचान सके। शायद, समय के साथ स्मृति-लोप हो गया था। फिर भी कहा- जी, कोशिश करता हूँ। जयकुमार कुछ कहने ही वाले थे कि वह बोल पड़ीं- सर, मैं करमी। करमी मुण्डा। जब आप राँची में पढ़ रहे थे तब मैं राँची के मोराबादी-सरई टाँड़ मुहल्ले में आपके लॉज की ठीक पीछेवाले घर में रहती थी। जयकुमार को याद आया। कहा- तो आप करमी हैं और पैंतीस-चालीस साल पहले की स्मृतियों का पिटारा स्वतः खुलता चला गया।
राँची का मोराबादी मैदान। राँचीवासियों के लिए तब सुबह और शाम का सैरगाह था। मोराबादी मैदान के उत्तर-पूर्वी छोर पर आम का बगीचा और जनजातीय शोध संस्थान था। ये अब भी हैं। शोध संस्थान भव्य बन गया है और इसके विपरीत बगीचा उजड़ चुका है। दो-चार आम के पेड़ ही अब बचे हैं। तब इस क्षेत्र में बहुत कम आबादी थी और दिन ढलते ही मोराबादी मैदान और आस-पास सियार हुआँ-हुआँ करने लगते थे। आज तो मैदान के चारों ओर पूरा शहर बस गया है। आम बगीचे के दोनों ओर चमचमाता रिंग रोड बन गया है। इसी रिंग रोड से एक सड़क करमटोली होते हुए मेन रोड चली गयी है तथा दूसरी ओरमांझी-वाया-हजारीबाग होते हुए पटना चली गयी है। आम बगीचे के एक छोर पर कभी एक छोटा हाट लगता था। अब इसने बड़े हाट का रूप ले लिया है और हाट से सटे एक पक्की सड़क श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय होते हुए रातू रोड चली गयी है। चालीस साल पहले जयकुमार जब पढ़ते थे तब मोराबादी मैदान के पश्चिम कोने में बसे सरई टाँड़ के एक छप्परनुमा मकान में निवास था- नाम था शांति-सदन। चिट्ठी-पत्री के दिन थे। डाकिये को पत्र पहुँचाने में दिक्कत न हो, इसलिए उन्होंने लॉज का नाम रख दिया था- शांति सदन। उन दिनों इस क्षेत्र में बिजली नहीं थी। आदिवासी घरों में ढिबरी या लालटेन से रोशनी की जाती थी। एक तरह से अभी भी उनके लिए ढिबरी युग था। आधुनिकता की दृष्टि से यह एकदम अनोखा टोला था। टोले में न बिजली थी ना ही पानी और रोड भी कच्चा और ऊबड़-खाबड़ था। बिजली नहीं रहने के कारण अंधेरा रहता था। जबकि, पास ही करमटोली में भकभक बिजली के बल्ब जलते थे। उन दिनों मोराबादी मैदान करीब साठ एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ था। मैदान के बीचों-बीच उत्तर से दक्षिण करीब एक किलोमीटर की पगडंडी थी। सरई टाँड़ और उसके आस-पास के लोग उसी पगडंडी से राँची कोर्ट और शहर की ओर जाते थे। एक किलोमीटर की इस पगडंडी में दक्षिण-पश्चिम कोने में सौ-डेढ़ सौ युकिलिप्टस के पेड़ थे, शेष मैदान पूरी तरह पेड़ रहित था। बीच में न कोई पेड़ और ना ही झाड़ियाँ थीं। मैदान पूरी तरह खाली था। दक्षिण-पश्चिम कोने में फौजी छावनी थी, जहाँ फौजी-गाड़ियों के मरम्मत का कार्य होता था। मैदान के ठीक बीचों-बीच अब खेल का स्टेडियम बन जाने से यह मैदान सिकुड़ गया है।
सरई टाँड़ में मुंडा-उराँव आदिवासियों के लगभग बीस घर थे, जिसके एक घर में करमी मुंडा अपने पति देवशरण मुंडा के साथ रहती थी। करमी मुंडा की उम्र अभी बमुश्किल अट्ठारह वर्ष ही होगी। वह अपने गाँव के स्कूल से क्लास आठ तक पढ़ी थी। देवशरण भी नवीं पास था। किशोरावस्था पार करते ही दोनों की शादी हो गयी थी और इस कारण पढ़ाई छूट गयी थी। गाँव में कोई ढंग का रोजगार नहीं था सो, दोनों कमाने-खाने राँची आ गए थे। करमी का मायका और ससुराल खूँटी के अड़की ब्लॉक के एक पहाड़ी गाँव में था। यह इलाका मुंडा-बहुल क्षेत्र है और घने जंगलों, छोटी-बड़ी नदियों-झरनों और पहाड़ियों से अँटा पड़ा है। करमी सांवली पर नाक-नक्श से सुंदर थी। गठीला शरीर था। लोक-गीत लय और धुन में गाती थी। शाम से ही सरई टांड़ में अखरा लग जाता था और देर रात तक माँदर की थाप पर गीत-नृत्य चलता रहता था। करमी और देवशरण उस अखरा के लीडर थे। देवशरण मांदर बजाता था और करमी मांदर की थाप पर लोकगीत को लय देती थी। मांदर की थाप और गीतों के लय पर लोग थिरकने लगते थे। सुबह होते ही करमी और देवशरण नहा-धोकर मजदूरी के लिए निकल पड़ते थे।
करमा पर्व हो, बाहा हो या हो सरहुल करमी और देवशरण के नेतृत्व में ही ढोल-नगाड़े और मांदर की थाप पर डोमकच खेला जाता था। यह पारंपरिक नृत्य था और पूरा इलाका डोमकच के गीत-संगीत से गुँजायमान रहता था। करमी-देवशरण और साथ में नृत्य करनेवाले साथियों का नृत्य कौशल ऐसा था कि देखते ही बनता था। एक-एक कदम सधा हुआ। ढोल-नगाड़े और मांदर के साथ बाँसुरी बजाते हुए देवशरण अपनी लय में खो जाता था। अखरा में नृत्य करनेवालों से अधिक साथ देनेवालों की भीड़ होती थी। करमी के जीवन का हर राग-रंग-लय नृत्य और गीत के लिए समर्पित था। अखरा में उपस्थित हर नर्तक की यह कोशिश रहती थी कि वह करमी के पग के साथ थिरके। मांदर की थाप, नगाड़े की धुन और बाँसुरी बजाते हुए करमी और देवशरण की आवाज हृदय से निकलती थी। नाचना-गाना उनके जीवन का अभिन्न अंग था। झरने के मधुर संगीत की तरह करमी के गाने की लय थी।
करमी को पढ़ने का शौक था। जयकुमार से मांगकर कहानियों की किताब पढ़ने के लिए वह ले जाती थी। जयकुमार कभी-कभी उससे कहता भी था करमी, तुम पढ़ो, आगे बढ़ो। आज के समाज में जो पढ़ेगा, सो बढ़ेगा। जयकुमार की प्रेरणा से उत्साहित होकर करमी और देवशरण ने अपनी दिहाड़ी मजदूरी से समय निकालकर शेष समय में पढ़ना शुरु कर दिया था।
करमी और देवशरण दिहाड़ी के लिए सरई टाँड़ से कतारी बागान, चुटिया काम करने के लिए आते थे। कतारी बागान के लगभग पाँच एकड़ में ईख की खेती और शेष में मौसमी सब्जियां होती थी। कतारी बागान स्वतंत्रता सेनानी सुखदेव महतो का था। स्वर्णरेखा नदी के किनारी पर करीब बीस एकड़ क्षेत्र में यह कतारी बागान फैला हुआ था। जयकुमार ने सुन रखा था कि सुखदेव महतो अपने समय के स्नातक थे। उन दिनों संयुक्त बिहार में गिने-चुने उच्च शिक्षा के संस्थान थे। तब के कलकत्ता विश्वविद्यालय से उन्होंने स्नातक की उपाधि ली थी और स्नातक होते ही रेलवे में नौकरी लग गयी थी। स्वतंत्रता सेनानी थे सो उन्होंने खादी धारण कर लिया था। योगदान के दिन ही अंग्रेज अधिकारी ने उनसे कहा था- मि॰ महतो, आपको यह खादी उतारना पड़ेगा। खादी पहनकर आप यह नौकरी नहीं का सकते।
अंग्रेज अधिकारी के इस प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा था- मि॰ अफसर! यह खादी मेरा और मेरे राष्ट्र की पहचान है। 
फिर कहा- मेरा वजूद इस खादी से ही है। मैं नौकरी छोड़ सकता हूँ, पर खादी नहीं।
और, सचमुच उन्होंने नौकरी छोड़ दी थी। वे खादी को राष्ट्रीय बाना का प्रतीक मानते थे। सच्चे स्वतंत्रता-सेनानी और राष्ट्र-धर्म का कर्तव्य उन्होंने निभाया था। कलम और कुदाल दोनों थाम लिया था। स्वतंत्रता आंदोलन के भारत छोड़ो आंदोलन में उनकी सहभागिता और उनके संघर्ष को देखते हुए वे अंग्रेजी हुकूमत की नजरों में चढ़ गए थे। भारत छोड़ो आंदोलन के कई कार्यक्रमों में उनकी सक्रिय भागीदारी और महत्वपूर्ण भूमिका थी। ‘करो व मरो’ के नारे के साथ सुखदेव महतो ने अपने साथियों के साथ राँची के चौक-चौराहों पर तिरंगा फहरा कर आजादी की लड़ाई को इस क्षेत्र में तेज कर दिया था। इस कारण वह अंग्रेज अधिकारियों के आँखों की किरकिरी भी बन गए थे। अंग्रेज अधिकारियों का दमन शुरु हुआ था तो भूमिगत रहकर उन्होंने आंदोलन को गति दी थी। ब्रिटिश सरकार जब हिंसक हुई तो जनता भी हिंसक हो गयी थी। पर, सुखदेव महतो ने लोगों को अहिंसक तरीके से ही प्रतिरोध करने के लिए प्रेरित किया था। सुखदेव महतो के लिए ये संघर्ष भरे दिन थे। उनके नेतृत्व में न केवल पुरुष बल्कि महिलाओं ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। राष्ट्र जागरण और जन आकांक्षाओं के अहिंसक आंदोलन का सुखदेव महतो ने जिस तरह नेतृत्व किया था, उससे अंग्रेज अधिकारी भी चकित थे। हर विपरीत परिस्थिति में उन्होंने अपनी अहिंसा के मार्ग को छोड़ा नहीं था और शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन को धार देते रहे थे। आंदोलन के क्रम में ही एक दिन वे पकड़े गए और बंदी बनाकर उन्हें हजारीबाग सेन्ट्रल जेल भेज दिया गया। हजारीबाग सेंट्रल जेल में वे दो साल आजादी के सेनानी के रूप में बंदी रहे थे। जेल से निकलने के बाद अपने पूर्वजों की भूमि पर खेती करने लगे थे। खेती को ही उन्होंने अपने जीवन-यापन का जरिया बना लिया था। अपने कृषि-फार्म को उन्होंने ‘कतारी बागान’ का नाम दिया था। करमी और देवशरण इन्हीं सुखदेव महतो के कतारी बागान में दिहाड़ी मजदूर का काम करते थे।
सुखदेव महतो की नजर में करमी और देवशरण ईमानदार मजदूर थे। उन्होंने देखा था कि काम से कभी भी इन दोनों ने जी चुराया नहीं था। एक दिन सुखदेव महतो ने करमी और देवशरण को बुलाया और कहा कि तुमलोगों के पास अभी काफी उम्र बची है। काम के बाद पढ़ाई करके प्राईवेट से मैट्रिक क्यों नहीं कर लेते? पढ़ाई कर लोगे तो कोई अच्छी नौकरी मिल जायेगी। कॉपी-किताब के लिए जब भी जरूरत होगी मैं मदद कर दूँगा। जयकुमार और बाद में सुखदेव महतो की ये बात करमी और देवशरण को जँच गयी और इसी क्षण उन्होंने निर्णय लिया कि वे पढ़ेंगे। सुखदेव महतो की प्रेरणा से शाम के सात-आठ बजे करमी और देवशरण दोनों जयकुमार के पास पढ़ने आने लगे। जयकुमार भी इन दोनों की पढ़ाई में लगन देखकर सहायता करने लगे। जयकुमार अपनी पढ़ाई के बाद जब राँची छोड़ने लगे, तब प्रतियोगी परीक्षा की सभी पुस्तकें करमी और देवशरण को सौंपकर कहा- करमी और देवशरण, समय निकाल कर इन पुस्तकों का अध्ययन कीजिएगा। ईश्वर चाहेंगे तो निश्चित आपका मिशन सफल होगा।
एक दिन करमी अपने मायके से अपने दुधमुँहे बच्चे के साथ लौट रही थी। जेठ का महीना था और प्रचण्ड गर्मी थी। अभी वह मोराबादी मैदान के दक्षिणी छोर पर पहुँची ही थी कि दक्षिण-पश्चिम दिशा में उसने बवंडर उठता देखा। अचानक आकाश में धूल-गर्द के साथ घने काले बादल छा गए। वह जल्द से जल्द मैदान के दूसरे छोर पर अपने घर सरई टाँड पहुँच जाना चाहती थी। बच्चे को पीठ से बाँधकर उसने अपने कदम तेज कर दिये थे। आँधी-तूफान का रौद्र-रूप देखकर वह जितनी जल्दी हो सके मैदान की पगडंडीनुमा एक किलोमीटर की दूरी पाट लेना चाहती थी। उसे अंदेशा था कि वह आँधी आने से पहले मैदान पार कर सकेगी या नहीं? उसका अंदेशा सही निकला। अभी वह बीच मैदान में ही थी कि पहले अंधड़ और फिर तूफान आ गया। पलक झपकते बारिश भी आ गयी और बारिश के साथ ही बड़े-बड़े ओले गिरने लगे। बीच मैदान में बचाव के लिए कुछ भी नहीं था। ओलों की मार से पीठ से बंधा बच्चा रोने लगा। बचाव का कोई उपाय नहीं देखकर करमी ने बच्चे को अपनी छाती से चिपकाया और पेट के बल इस तरह धरती पर लेट गई कि बच्चे को ओले की मार से रक्षा हो सके। ओले करमी के शरीर पर गिरते रहे, वह चोट खाती रही, बच्चे को सुरक्षित करती रही। मैदान के उत्तर-पश्चिम छोर के कोने पर जयकुमार का लॉज था। उसने लॉज से ही बारिश और गिरते ओले के बीच करमी को धरती पर औंधे पड़ा देख लिया था। झटपट उसने बाँस से बनी छतरी उठायी और दौड़ पड़ा करमी की ओर जहाँ ओलों की मार से अपने बच्चे को बचाने के लिए वह निरंतर संघर्ष कर रही थी। बाँस की छतरी लेकर जयकुमार उस अंधड़-तूफान-बारिश में इतनी तेजी से दौड़ा कि आधे किलोमीटर की दूरी उसने मात्र डेढ़ से दो मिनट में पूरी कर ली। जयकुमार ने गिरते ओले, घनघोर बारिश और आँधी-तूफान के बीच बाँस की छतरी से करमी और उसके बच्चे को बचाने की पूरी कोशिश की। तूफान का दबाव इतना तेज था कि छतरी बार-बार अंधड़ के प्रभाव से उलट जा रही थी। जयकुमार को छतरी लेकर आँधी-तूफान में दौड़ता देख तथा करमी को जमीन में पड़ा देख उसके साथी भी बाँस की छतरी लेकर पल भर में आ गए। ओले की मार से करमी बेसुध हो गयी थी, पर बच्चा सुरक्षित था। ओलों से करमी को काफी चोट लगी थी। सभी उसे उठाकर लॉज ले आये। जब होश आया तो सबसे पहले उसने अपने बच्चे की तरफ देखा। अबोध शिशु अपनी माँ की ओर टुकुर-टुकुर देख रहा था। बच्चे को कुशल देखकर माता के हृदय का रोम-रोम जयकुमार और उसके साथियों का आभार स्वीकार कर रहा था। करमी के दोनों हाथ जुड़ गए थे।
इतने वर्षों बाद करमी को एक अधिकारी के रूप में देखकर जयकुमार को बहुत खुशी हुई। आज का अचानक आया तूफान भी अब थम गया था। करमी ने जयकुमार का फिर से पाँव छूकर प्रणाम किया और फिर मिलने का वायदा कर चली गयी। दो-एक दिनों में ही जयकुमार ने दोनों की कार्य-शैली के बारे में पता लगाया तो मालूम हुआ कि करमी और देवशरण मुंडा की गिनती राज्य के कर्मठ और ईमानदार अधिकारियों में होती है। अपने सेवाकाल में वे जहाँ भी गए, सबसे उपेक्षित और पिछड़े गाँव को गोद लिया। वहाँ के गरीब लोगों को कदम और कुदाल का महत्व समझाया। सरकारी सहायता से विकास की योजनाएँ धरातल पर उतारी और जहाँ तक संभव हुआ निजी तौर पर भी सहयोग किया। खेती के लिए बीज-खाद जैसे संसाधन जुटाये और पटवन की उचित व्यवस्था की गयी। इसके लिए हर पाँच सौ मीटर की दूरी पर सरकारी लागत से कुएँ खोदे गए और डीजल चालित या बिजली चालित मोटर की व्यवस्था की गयी। बच्चों की पढ़ाई के लिए प्राथमिक विद्यालय से लेकर वयस्क शिक्षा के लिए रात्रि-पाठशाला खोले गए। करमी और देवशरण छुट्टियों में स्वयं आकर पढ़ाते। यानी, विकास का एक मुकम्मल रोडमैप उनके द्वारा तैयार किया गया। इस तरह उन्होंने कई पिछड़े गाँवों का कायाकल्प करते हुए आदर्श गाँव का एक प्रारूप तैयार किया। उन गाँवों के लोग आज भी उनसे मिलने और सलाह लेने आते हैं।
एक सप्ताह बाद जयकुमार के घर के दरवाजे पर पीली बत्ती लगी गाड़ी रुकी। उससे तीन लोग उतरे जिसमें करमी और उसके पति देवशरण मुंडा थे। देवशरण भी करमी की तरह ही सरकारी अफसर थे। साथ में दो बच्चे भी थे। करमी ने बच्चों का परिचय दिया कि ये हमारे पोते हैं और यह हमारा बेटा है। वही बेटा जिसे आपने उस आँधी-तूफान में बचाया था। आज यह भी अपने पिता की तरह अधिकारी हो गया है। यह जयकुमार मुंडा है। आपने इसके जीवन की रक्षा की थी। इसलिए हमदोनों ने इसे आपका ही नाम दिया है। युवा जयकुमार मुंडा अपनी जगह से उठा। उसने जयकुमार का अभिवादन इस तरह किया जैसे कोई अपने आराध्य देवता का करता है। उसने कहा कि मैं सोचता था कि आपके दर्शन कब होंगे। माँ-बाबा ने आपका पता-ठिकाना ढूँढ़ने की पूरी कोशिश की, पर वे सफल नहीं हुए। मेरी माँ ने न जाने कितनी बार आपके बारे में बताया है। उससे मेरे अंतर्मानस में एक देवता की छवि बन गयी थी। एक ऐसे देवता की जो मनुष्य होकर भी देवता का स्थान रखता है। मैं अनीश्वरवादी नहीं हूँ। ईश्वर पर भरोसा करता हूँ। प्रकृति हमारी माँ है और सिंगबोंगा हमारे आराध्य देवता हैं। माँ-बाबा ने जब बताया कि जिन्हें हम वर्षों से खोज रहे थे, वे आज अचानक मिल गए हैं। मैं खुद को रोक नहीं सका और ऑफिस से छुट्टी लेकर सीधे दर्शन के लिए चला आया। इतना कहते-कहते जयकुमार मुंडा भावुक हो गया। भक्त और देवता एकदम आमने-सामने थे। जयकुमार ने आशीर्वाद देते हुए दोनों बच्चों को गोद में उठा लिया।

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