बाल-कविताएँ

प्रोफ़ेसर (डॉ0) मोहम्‍मद साजिद ख़ान
आऊँगा तब गाँव
 
गाकर  कोई  गीत  सुहाना,
रोज़ रात तुम मुझे सुलाना।
दौड़ - भाग की रोका-टोकी,
कभी न करना टोका-टोकी।
सुबह - सवेरे मुझे जगाना,
फिर खेतों की सैर कराना।
मोबाइल  से ऊब गया हूँ,
इण्टरनेट से बोर हुआ हूँ।
पिज़्ज़ा - बर्गर ख़ूब उड़ाया,
सेहत अपनी, आप गँवाया।
क्या-क्या और नहीं जो देखा,
नहीं आज तक जिसको सीखा—
वह दुनिया, वह खेल सिखाना, 
अनुभव  की  बातें  बतलाना।
नानी  सुन लो बात हमारी,
करनी  है मुझको  तैयारी।
अगर  सभी  बातें मानोगी,
मेरे  मन  को पहचानोगी।
सपने  सच हों अगर हमारे,
तब  आऊँगा  गाँव तुम्हारे।
***


पहली बार गया बाज़ार

माँ  ने भेजा  पहली  बार,
जाना पड़ा  आज  बाज़ार। 
समझ  न आए मेरे  बात,
क्या ले  जाऊँ अपने साथ। 
कद्दू   ख़ूब  फुलाए  गाल,
हुआ टमाटर का मुँह लाल।
टिंडा, बैगन, परवल, प्याज़,
भिंडी को अपने  पर नाज़।
गोभी, परवल  हैं  भरपूर,
धनिया की खुशबू मशहूर। 
इमली  लो,  नींबू,  अंबार,
आलू  है  सबका  सरदार। 
लौकी  और   तरोई  ढेर,
शलजम आँखें  रहीं तरेर। 
मत  पूछो तुम मेरा  हाल,
हुआ आज सचमुच बेहाल। 
हालत  मेरी  आज ख़राब,
कैसे  इनका करूँ हिसाब।
***


तुम बुद्धू के बुद्धू

मैं तितली हूँ, उड़ जाती हूँ-
तुम बुद्धू के बुद्धू॥
मैं कोयल के बोल सुरीले,
मैं गंगा का पानी,
मैं वासंती हवा मनोहर,
मैं दरिया तूफ़ानी।
मैं चट्टान खड़ी चढ़ जाती-
तुम बुद्धू के बुद्धू॥
मैं फूलों-सी खुशबूवाली,
मैं हूँ खिली चमेली,
मैं घर-आँगन की खुशहाली
मैं बुलबुल की बोली।
अपनी राह स्वयं बढ़ जाती-
तुम बुद्धू के बुद्धू॥
मैं ही बनी सानिया मिर्जा
मैं झाँसी की रानी,
मैं बादल की शीतल छाया,
मैं आँखों का पानी।
दिल में हीरे-सी जड़ जाती-
तुम बुद्धू के बुद्धू॥
***

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