अहिंसा और विश्व शांति हेतु अहिंसक नेतृत्व

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

पीठाचार्य, डॉ. आम्बेडकर पीठ (मानवाधिकार व पर्यावरण मूल्य) 
पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, भटिंडा
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लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं एवं सेतु संपादन मंडल के सम्मानित सदस्य हैं। आप अहिंसा आयोग के समर्थक एवं अहिंसक सभ्यता के पैरोकार भी हैं।


जैसे-जैसे सभ्यता विकसित हो रही है हमारे लिए अहिंसक वातावरण स्थापित करने की चुनौतियाँ भी बढ़ रही हैं। अब तो कृत्रिम बुद्धिमत्ता का दौर आ चुका है। साइबर क्राइम ने हिंसा का स्वरूप भी बदल दिया है। कुछ ही समय बाद विश्व में परमाणु हथियारों को दिमाग देने की बात शुरू हो जाएगी। एआई के माध्यम से बाज़ार में अभिरुचि रखने वाली शक्तियां अपने मुनाफे के लिए हिंसा के घनत्व को बढ़ाएंगे क्योंकि वे अधिक से अधिक बदलाव करके अधिक कमाने के लिए सुबह सोकर उठा रहे हैं और आधी रात से अधिक समय तक जाग रहे हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता की ओर बढ़ती मनुष्य बिरादरी जब एआई के फायदे देख रही है तो वह यह सोच रही है कि कैसे हम क्षण भर में जिसे हम नैनो-सेकण्ड से भी कम समय कह सकते हैं, उतने समय में पूरी पृथ्वी पर बदलाव करने वाली आधुनिक तकनीकी व्यवस्था तैयार हो। अहिंसक होने का शब्दार्थ अब ऐसे समय में बदल गया है। हिंसक होने का स्वरूप जघन्य हिंसा करने के लिए पर्याप्त अवसर की खोज में है।
पृथ्वी के अहिंसक नेतृत्व की यदि पड़ताल की जाए तो भारत के नेतृत्व को अभिवादन हृदय से करने की इच्छा होती है। भारत की सांस्कृतिक सनातन सभ्यता की लंबी विरासत ऐसे अनेक विभूतियों का परिचय कराती हैं जिन्होंने स्वयं सामाजिक व अकादमिक सहयोग देकर हमें सुन्दर सा आज दिया है। जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभ देव से लेकर स्वामी महावीर तक सभी ने जैन धर्म की व्यवस्थित अहिंसक शैली को रेखांकित किया है। अहिंसा विश्वकोश में नंदकिशोर आचार्य ने अहिंसा के विविध सोपान का ज़िक्र किया है जिसमें ऋषभ देव, बुद्ध, गाँधी जिन्हें भारतीय पृष्ठभूमि में अहिंसा के लिए व्यापक अनुप्रयोगात्मक नेतृत्वकर्ता माना गया है। भारत की वेद, पुराण, उपनिषद, गीता आदि धर्मशास्त्रों में अहिंसक सभ्यता का सूत्र है। ऋषियों, मुनियों और संतों के वचन में अहिंसा के पाठ हैं। नेतृत्व भारतीय ही नहीं अपितु पूरी पृथ्वी का आंकलन किया जाए तो ऐसा लगता है कि भारत के अलावा विश्व में अन्य जितने धर्म हैं क्रिश्चियन, इस्लाम, यहूदी, ताओ या दूसरे जो भी धर्म-पंथ हैं उसमें अहिंसक नेतृत्व इसलिए मिलते हैं क्योंकि सबके मूल में मानवकेंद्रित सोच है। असीम शांति की संकल्पना है जिसकी जड़ें समग्रतामूलक हैं। गाँधी ने अन टू दिस लास्ट का अध्ययन किया तो यह पाया की रस्किन जिस बात को कह रहे हैं, वही ठीक है। उन्होंने भारत में सर्वोदय जैसी संकल्पना को अंगीकार किया और यह कोशिश की भारत सर्वोदय की राह चले।
भगवान बुद्ध ने आष्टांगिक मार्ग की आवश्यकता बताई तो जैन तीर्थंकरों ने हमारे आहार-विहार-विचार-व्यवहार को अनुशासित करने की कोशिश की। इन्हें पढ़ने पर पता चलता है कि सम्यक जीवन से ही अहिंसक जीवन की प्राप्ति हो सकती है। सम्यक जीवन ही इस प्रकार प्रेम पर आधारित जीवन है जिसका तात्पर्य ही अहिंसा होता है। अहिंसक होना यानी सत्य का वरण करना माना जाता है इस प्रकार चाहे महावीर हों या बुद्ध या गाँधी सबने एक तरह से सत्य को जीवन-आचरण माना क्योंकि अहिंसक होने की पहली शर्त प्रेम पर आधारित सत्यनिष्ठ जीवन को जिया जाए। भारतीय नेतृत्व इस प्रकार निःसंदेह अहिंसा के लिए जिन संकल्पनाओं को प्रकट कर चुके हैं वह अमूल्य है और वह वरेण्य भी है। हमारे भारतीय शास्त्रों में वर्णित है-आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्। जिसका अर्थ ही है हो स्वयं को अच्छा नहीं लगता, वैसा आचरण दूसरों के साथ नहीं करना चाहिए। भारतीय जीवन सूत्र का यह सबसे सुन्दर उदहारण है। सत्य, अहिंसा अपरिग्रह, अस्तेय, प्रेम, करुणा, दया, सर्वधर्मसमभाव ये सभी भारतीय ज्ञान परंपरा के तात्विक शब्द हैं जिसमें अहिंसक जीवन के सूत्र हैं। टॉलस्टॉय, रस्किन और थोरो के अहिंसा सभ्यता की व्याख्या भारतीय सनातन सभ्यता से निकली अहिंसक सभ्यता से मेल खाती है क्योंकि इनके भी चिंतन के केंद्र में प्रेम और करुणा पर अधिक विश्वास व्यक्त किया गया। 
विश्व में जब विमर्श अपनी नई-नई संकल्पनाओं को लेकर आने लगे तो स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व, गरिमा और न्याय के विषय में अधिक चर्चाएँ हुईं और इसके कारण विश्व के अन्य भूभाग पर जो अहिंसा के विमर्श हैं, वे इन शब्द-तत्व में सन्निहित देखे गए। जिसकी अब व्याख्या मानवाधिकार तक जा पहुंची है। अब यह व्याख्या जलवायु न्याय तक हो रही है। इसलिए अब जो वश्विक अहिंसक शांति के लिए नेतृत्व देखे जा रहे हैं वे अब्राहम लिंकन, मार्टिन लूथर किंग द्वितीय, नेल्शन मंडेला, दलाई लामा, शिरीन ईबादी और दूसरे जितने भी अहिंसक सभ्यता की वकालत करते हैं वे प्रतिरोध की संस्कृति को ज्यादा महत्व देते हैं। दुनिया के अहिंसक प्रतिरोध को इसलिए सकारात्मक प्रतिरोध नाम दिया गया। हम देखते हैं की इन सकारात्मक प्रतिरोध के कारण न्याय व गरिमा की रक्षा इन नेताओं द्वारा की गयी है।
अहिंसा एक दर्शन है। एक नैतिक आवश्यकता है। एक सुन्दर सभ्यता संभावना है जो मनुष्य प्राप्त कर सकता है। यह कोई विचारधारा नहीं है। इसकी व्यापक प्रकृति है। यह अपने आध्यात्मिक और नैतिक नेतृत्व के लिए अर्थ चाहने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए यह स्वाभाविक है। रुचिकर है। यह है कि हमारा समाज जिस गति गतिशील है, वह कच्चे मिट्टी के वर्तन के समान है। मनुष्य चूँकि सबसे ज्यादा प्रज्ञाशील प्राणी है तो वह अहिंसा की सभ्यता से जैसा आकर देगा, समाज, प्रकृति की सभ्यता का स्वरूप वैसा ही निर्धारित होगा। आज विकल्प हिंसा और अहिंसा के बीच है। अहिंसा चुनने से ज्यादा अच्छा विकल्प कुछ और नहीं हो सकता है। अहिंसा इतने नैतिक आत्मबल से भरी है, यही कारण है कि इसमें हमारा साहस है। इसकी खोज जारी रखने और इसे व्यवहार में लाने की जिम्मेदारी मनुष्य की है।
इस अहिंसक व्यवस्था को भी नेतृत्वकर्ता जब सामाजिक व्यवस्था में संरचनात्मक प्रसार करना चाहते हैं तो एक धड़ा ऐसा भी है जो अहिंसा को एक राजनीतिक टूल्स के रूप में देखता है। राज्य भी इसको टूल्स के रूप में देखते हैं। विश्व शांति एवं अहिंसा इसके लिए जो नेतृत्व खड़े होते हैं उसे टूल्स के रूप में इसलिए माना जाता है क्योंकि यदि सम्पूर्णता में विश्लेषण करें तो यह मिलता है की परमाणु हथियार के लिए व्यापक बज़ट राज्य अनुमोदित व सुरक्षित करते हैं। सेना के लिए बज़ट विश्व के विभिन्न सदनों द्वारा अनुमोदित होते हैं। सुरक्षा और व्यापर को लेकर सजग विश्व के जो राज्य धन की भूख में हिंसा की राह जोहते हैं वे भला अहिंसा को एक राजनैतिक टूल्स के रूप में नहीं देखेंगे तो क्या करेंगे। विश्व में बड़े पैमाने पर आतंकवाद फैलता है इसका भी एक बज़ट आवारा बज़ट के रूप में विद्यमान है जो जनसंहार करता है, दहशत पैदा करता है और हिंसा का शिकार बनाता है इसके लिए लग रही पूंजी तो कहीं न कहीं अस्तित्व में है। इस व्यवस्था को कायम रखने वाली ताकतें या हथियारों की व्यापक पैमाने पर बिक्री करने वाली ताकतें या युद्धक विमान बेचने वाली ताकतें अहिंसक नेतृत्व को अहिंसा की राजनीति बताती हैं। ऐसे में अहिंसा दर्शन की जगह उन सभ्यताओं के लिए जो अस्थिरता के पक्ष में होते हैं, उनके लिए विलेन लगती हैं। अहिंसा की सभ्यता के विस्तारकों को या मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को जीवन से हाथ धोने पड़े हैं तो, इसके पीछे कहीं न कहीं उन मनुष्यता के वैरी-शक्तियों का हाथ था।
अहिंसा के विस्तारकों के पास सबसे बड़ी उनकी ताकत सत्याग्रह होती है। प्रेम व करुणा का पाठ होता है। यह एक मनोवैज्ञानिक लड़ाई होती है जिसे सत्याग्रही बिना किसी हथियार के आत्मबल पर लड़ता है। सकारात्मक प्रतिरोध के लिए किसी हथियार की आवश्यकता नहीं होती। वह न तो युद्धक विमान चाहता है और न ही कोई बंदूक। वह अपने अंतस में विद्यमान ऊर्जा से, अपने संवाद से, अपनी आत्मशक्ति से और अपने विश्वास से समस्त षड्यंत्रों व उसके विरुद्ध चल रही गतिविधियों से लड़ता है। इसलिए अहिंसा का नेतृत्वकर्ता अपने जीवन की परवाह नहीं करता। वह ईश्वर के अधीन खुद को ज्यादा समझता है और उसकी इच्छाशक्ति में अध्यात्म की गतिशीलता बनती है। उसे कोई भला कहे या बुरा, उसके लिए कोई प्रतिक्रिया नहीं करता। चुप होता है। आत्मानुशासन रखता है और अधीर नहीं होता। टॉलस्टॉय ने प्रेम के नियम पर आधारित समाज की रचना देखी, यह अहिंसक नेतृत्व का आभूषण है। हेनरी डेविड थोरो की अहिंसक सैद्धांतिकी एक नई अहिंसक मीमांसा प्रकट करती है। सत्याग्रह व व्रत गाँधी के ही देखे जाएँ तो उसमें से जो नेतृत्व के गुण एक अहिंसक व्यक्ति के निकलकर आते हैं वे यही कहते हैं कि उपवास व व्रत या सत्याग्रह अहिंसक होने के महत्वपूर्ण घटक हैं। इनका समुच्चय अहिंसक नेतृत्व बनाता है। वैसे जिन व्यक्तियों ने किसी मानव समूह की नैतिक व्यवहार करने की क्षमता, संगठन की संरचना उसके आकार उपसमूहों के अंतर्संबंध और एकीकरण को परखा, अनुशासन, विचारों की स्पष्टता रखी, समूह और सदस्यों के बीच समझ व स्पष्टता रखी, सामान्य आदर्श की उदात्तता, सरलता, गुणवत्ता, और नैतिक चरित्र को बनाए रखा धैर्य, सावधानी और कर्त्तव्य पर ध्यान दिया, वे ही अहिंसा को समझ सके और दूसरों में अहिंसक बीज रोप सके। जिसने भी चालाकी की, द्विधा रखी, असहज वृत्तियों में स्वयं को तल्लीन किया वे नेतृत्व एक समय अंतराल के बाद स्वतः मिट भी गए।
अहिंसा एवं विश्व शांति हेतु अहिंसक नेतृत्व की दृष्टि इसलिए बहुत साफ़ होनी चाहिए। सत्ता की अहिंसक अवधारणा ने कई प्रत्यक्ष कार्रवाई समूहों को भ्रम की स्थिति में पहुंचा दिया है। उनका मानना है कि उनके पास वास्तव में जितनी शक्ति है, उससे कहीं अधिक भव्यता की शक्ति है। यह एक अवधारणात्मक अभिव्यक्ति केवल नहीं है अपितु संसार की सत्ता के मनोविज्ञान को समझते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि वे वैश्विक शांति के लिए अहिंसक प्रतिरोध को ही गलत ठहरा देने के लिए अपना सारा दिमाग लगा रहे हैं। अहिंसक नेतृत्व को इसे भी समझना आवश्यक है। अब जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साथ समाज अपने नए पहलुओं के साथ भी जुड़ रहा है तो उसके भीतर स्वभावतः व्यापक बदलाव देखा जा रहा है। सरकारें और बुद्धिजीवी भी हैरान हैं कि इसके साथ भीतरी राह से चली आ रही चुपके से हिंसा के स्वर को दबाने के लिए प्रयोग करें कि समाज को बचाने के लिए प्रयोग करें। इसलिए अब अहिंसक लड़ाई बहुत आसान नहीं रह गयी है। मानवाधिकार के हनन की काफी संभावनाएं जब दिख रही हैं तो अहिंसक नेतृत्व को भी उसी चालाकी किन्तु सच्चाई के साथ अपने रुख को बदल कर विश्व शांति के लिए प्रयास करना होगा। जो राज्य अपने मानवतावादी होने का दावा करते हैं, उन्हें सबसे पहले हिंसा के लिए दिए जा रहे बज़ट पर अंकुश लगाकर मिसाल कायम करना होगा ताकि अहिंसा की सभ्यता को अस्तित्व मिले और अहिंसक समाज की रचना करने वाली व्यवस्था व व्यक्तियों को बल मिले।

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