अभिषेक ओझा

आत्मकथ्य: एक सरल इंसान, किस्मत अब तक जहाँ भी ले गई ... लगता है उसी के लिए बना था। फिलहाल एक इनवेस्टमेंट बैंक में कार्यरत। पढने की बीमारी जो बचपन में लगी उसका अब तक इलाज नहीं हो पाया. काम के बाद घूमने-फिरने, फिल्मों और पुस्तकों से जो समय बच जाता है ... उसी बचे समय के बकवास की कुछ झलकियाँ कभी-कभी इधर भी आ जाती हैं।

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