दीपक पाटीदार की तीन कविताएँ

दीपक पाटीदार

वो मुस्कुराती है

वो मुस्कुराती है
मुस्कुराता है पत्तियों का हरापन
मुस्कुराता है रोशनी का समग्र उजास
मुस्कुराती है घास की कोमलता
बसंत की सारी सुंदरता मुस्कुराती है।

उसके बतियाते वक्त
बतियाते हैं नदियों के किनारे
बतियाते हैं भँवरों के विचरते गान
समस्त आकाश का खुलापन और बादल बतियाते हैं।

वह गातीं है
गाता है पक्षियों की धीमा कलरव
गाते हैं हवा के खुशबूदार झोंके
गाते हैं पेड़ अपनी सरसराहट लिए
उनकी छांव की शीतलता गातीं है

लौट जाती है बहारें
वो जाती है
बिखर जाता है सुकून हवा का।

वहीं रहने दो

जहां से निकलता है
सूरज का पहला प्रकाश
उठती है जहां से
बारिश की पहली गंध

वहीं रहने दो मेरे प्यार को
जहां से झरना गिरता है

शहर की ये हवाएँ
उसे अच्छी नहीं लगती।

मजदूर और कुछ कविताऐं

पनी जान जोखिम में डालकर
उन्हें बखूबी आता है
कुएँ से मगरमच्छ निकालना,

और इस मामले में
उनके अधिकारी भी उनसे डरते हैं।

कसर लिखा होता है
सूखी और जली रोटियों पर
उसका नाम

और वो इंतजाम करता है
दूसरों की सुकून भरी रोटियों का।

ज ले ना सके
वो अपने मजदूर से पूरा काम,
और इस घाटे में
खराब हो सकती है उनकी रातों की नींद।
हालांकि इस हालत में
मजदूर का मुरझाया चेहरा
उनका सुकून बन सकता है।

शहर और कुछ कविताऐं

काश में
अपने पूरे आकार में होता है चाँद,
चमक जाता है उसकी चाँदनी में
अंधेरे में लिपटा पूरा शहर

और इसी चाँदनी में चमक जाते हैं
फुटपाथ पर कई खाली पेट
अगली सुबह के इंतजार में।

वे कुछ खाकर आते हैं
उनके मुँह से टपकता है लहू,
मैं गांव का हूँ
बहुत जल्दी पहचान जाता हूँ
उनके मुँह से शहर की बू आती है।

पने खेत के किनारे
बैठा तो जाना
अपनी ऊंची-ऊंची इमारतों में
कितना सहमा और सिमटकर रहता है शहर का आदमी।

पने ही अंधेरे में
इस तरह डूब जाता है शहर
कि सब खो कर इधर-उधर
ढूंढते हैं अपनी ही परछाइयाँ,

और इस हालत को देखकर
ठहाका लगाकर हंसता है
पास ही का एक गाँव।

नींद में बोलता है और सपनों में दौड़ता है शहर का आदमी
एक तेज रफ्तार हरदम उसे खींचें हुए हैं और एक शोर उसे घेरे हुए हैं चारों ओर से।

शहर में शांति खोजने से पहले इतना जान लेना जरूरी है कि
शहर अपने शोर के लिए मशहूर बहुत है।

दिन भर का थका शहर
इस तरह लेटता है कि उसे सुबह उठने की भी चाहत नहीं होती।

हर शाम शहर अपनी दर्द भरी दास्तान कहता है
मगर वो दबी रह जाती है उसी के शोर के पीछे।