चंद्रेश कुमार छतलानी की लघुकथाएँ

चंद्रेश कुमार छतलानी

उम्मीद

भीषण गर्मी के कारण कुछ दिन पहले ही सूखे कुँए के आसपास बहुत भीड़ जमा थी, गाँव के निवासी अपने-अपने घरों से पानी भरने के पात्र, बाल्टी और रस्सियाँ लेकर आये हुए थे और आशा भरी निगाहों से कुँए के अंदर देख रहे थे।
गाँव के मुख्य मंदिर का पुजारी भी वहीं था, कुँए में तीन-चार आदमी खुदाई कर कुँए को गहरा कर रहे थे और पुजारी मुंह में सुपारी चूसते हुए, चंदन का तिलक लगे अपने उन्नत भाल पर हाथ रखे बहुत ध्यान से कुँए में झाँक रहा था, साथ में कुछ मन्त्र भी बुदबुदा रहा था।
जैसी अपेक्षा थी, खोदते-खोदते एकदम पानी का फव्वारा छूटा और खोदने वालों में से एक आदमी गीला भी हो गया।
यह देखते ही पुजारी चिल्लाया, "तुरंत बाहर आओ, एक क्षण की भी देरी मत करो!"
वो सभी व्यक्ति तेज़ी से ऊपर चढ़े और कुँए से बाहर आ गए, जिस स्थान से वो बाहर निकले, वहाँ खड़े लोगों ने अपने-अपने पात्र उठा कर, उनके लिए रास्ता खाली कर दिया।
अब पुजारी कुँए के मुहाने पर खड़ा होकर पवित्र-जल, फूल और अन्य सामग्री कुँए में फैंकते हुए मन्त्र पढने लगा।
और लगभग पांच मिनट के बाद पुजारी ने कहा, "अब पानी भर सकते हैं।"
तब तक थोड़ा पानी भी कुँए में भर चुका था, सभी ने खुश होकर पानी भरना प्रारंभ किया।
और जो आदमी कुँए के अंदर गीला हुआ था, वह वहीँ एक पेड़ के पीछे खड़ा अपनी कमीज़ को आखिरी बार निचोड़ कर पानी को अपने चुल्लू में भर अपनी बेटी को पिलाते हुए कह रहा था, "पी ले, सवर्णों के कुँए का मीठा पानी है, पता नहीं फिर कब नसीब हो?"

भूख

"उफ़..." रोटी के थाली में गिरते ही, थाली रोटी के बोझ से बेचैन हो उठी। रोज़ तो दिन में दो बार ही उसे रोटी का बोझ सहना होता था, लेकिन आज उसके मालिक नया मकान बनने की ख़ुशी में भिखारियों को भोजन करवा रहे थे, इसलिए अपनी अन्य साथियों के साथ उसे भी यह बोझ बार-बार ढोना पड़ रहा था।

थाली में रोटी रख कर जैसे ही मकान-मालिक आगे बढ़ा, तो देखा कि भिखारी के साथ एक कुत्ता बैठा है, और भिखारी रोटी का एक टुकड़ा तोड़ कर उस कुत्ते की तरफ बढ़ा रहा है, मकान-मालिक ने लात मारकर कुत्ते को भगा दिया।

और पता नहीं क्यों भिखारी भी विचलित होकर भरी हुई थाली वहीं छोड़ कर चला गया।

यह देख थाली की बेचैनी कुछ कम हुई, उसने हँसते हुए कहा, "कुत्ता इंसानों की पंक्ति में और इंसान कुत्ते के पीछे!"

रोटी ने उसकी बात सुनी और गंभीर स्वर में उत्तर दिया, "जब पेट खाली होता है तो इंसान और जानवर एक समान होता है। भूख को रोटी बांटने वाला और सहेजने वाला नहीं जानता, रोटी मांगने वाला जानता है।"

सुनते ही थाली को वहीँ खड़े मकान-मालिक के चेहरे का प्रतिबिम्ब अपने बाहरी किनारों में दिखाई देने लगा।



अपवित्र कर्म

पौ फटने में एक घंटा बचा हुआ था। उसने फांसी के तख्ते पर खड़े अंग्रेजों के मुजरिम के मुंह को काले कनटोप से ढक दिया, और कहा, "मुझे माफ कर दिया जाए। हिंदू भाईयों को राम-राम, मुसलमान भाईयों को सलाम, हम क्या कर सकते है हम तो हुकुम के गुलाम हैं।"
कनटोप के अंदर से लगभग चीखती सी आवाज़ आई, "हुकुम के गुलाम, मैं न तो हिन्दू हूँ न मुसलमान! देश की मिट्टी का एक भक्त अपनी माँ के लिये जान दे रहा है, उसे 'भारत माता की जय' बोल कर विदा कर..."
उसने जेल अधीक्षक की तरफ देखा, अधीक्षक ने ना की मुद्रा में गर्दन हिला दी । वह चुपचाप अपने स्थान पर गया और अधीक्षक की तरफ देखने लगा, अधीक्षक ने एक हाथ में बंधी घड़ी देखते हुए दूसरे हाथ से रुमाल हिला इशारा किया, तुरंत ही उसने लीवर खींच लिया। अंग्रेजों के मुजरिम के पैरों के नीचे से तख्ता हट गया, कुछ मिनट शरीर तड़पा और फिर शांत पड़ गया। वह देखता रहा, चिकित्सक द्वारा मृत शरीर की जाँच की गयी और फिर सब कक्ष से बाहर निकलने लगे।
वह भी थके क़दमों से नीचे उतरा, लेकिन अधिक चल नहीं पाया। तख्ते के सामने रखी कुर्सी और मेज का सहारा लेकर खड़ा हो गया।
कुछ क्षणों बाद उसने आँखें घुमा कर कमरे के चारों तरफ देखना शुरू किया, कमरा भी फांसी के फंदे की तरह खाली हो चुका था। उसने फंदे की तरफ देखा और फफकते हुए अपने पेट पर हाथ मारकर चिल्लाया,
"भारत माता की जय... माता की जय... मर जा तू जल्लाद!"
लेकिन उस की आवाज़ फंदे तक पहुँच कर दम तोड़ रही थी।



भय

"कल आपका बेटा परीक्षा में नकल करते हुए पकड़ा गया है, यह आखिरी चेतावनी है, अब भी नहीं सुधरा तो स्कूल से निकाल देंगे।" सवेरे-सवेरे विद्यालय में बुलाकर प्राचार्य द्वारा कहे गए शब्द उसके मस्तिष्क में हथौड़े की तरह बज रहे थे। वो क्रोध से लाल हो रहा था, और उसके हाथ स्वतः ही मोटरसाइकिल की गति बढा रहे थे।
"मेरी मेहनत का यह सिला दिया उसने, कितना कहता हूँ कि पढ़ ले, लेकिन वो है कि... आज तो पराकाष्ठा हो गयी है, रोज़ तो उसे केवल थप्पड़ ही पड़ते हैं, लेकिन आज जूते भी..." यही सोचते हुए वो घर पहुँच गया। तीव्र गति से चलती मोटरसाइकिल ब्रेक लगते ही गिरते-गिरते बची, जिसने उसका क्रोध और बढ़ा दिया।
दरवाज़े के बाहर समाचार-पत्र रखा हुआ था, उसे उठा कर वो बुदबुदाया, "किसी को इसकी भी परवाह नहीं है..."
अंदर जाते ही वो अख़बार को सोफे पर पटक कर चिल्लाया, "अपने प्यारे बेटे को अभी बुलाओ..."
उसकी पत्नी और बेटा लगभग दौड़ कर अंदर के कमरे से आये, तब तक उसने जूता अपने हाथ में उठा लिया था।
"इधर आओ!" उसने बेटे को बुलाया।
बेटा घबरा गया, उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया और कांपते हुए सोफे के पीछे की तरफ चला गया।
वो गुस्से में चिल्लाया, "क्या बातें सीख कर आया है? एक तो पढता नहीं है और उस पर नकल..." वो बेटे पर लपका, बेटे ने सोफे पर रखे समाचारपत्र से अपना मुंह ढक लिया।
अचानक क्रोध में तमतमाता चेहरा फक पड़ गया, आँखें फ़ैल से गयीं और उसके हाथ से जूता फिसल गया।
अख़बार में एक समाचार था - 'फेल होने पर भय से एक छात्र द्वारा आत्महत्या'
उसने एक झटके से अख़बार अपने बेटे के चेहरे से हटा कर उसके चेहरे को अपने हाथों में लिया।