शराब का दरोग़ा - कहानी

कमरे के बाहर नेम प्लेट पर लिखा था -  पी सी झा, माने  प्रेमचंद झा। नाम से ही मिडिल क्लास लगता है। जैसे कभी राही मासूम रज़ा ने कहा था कि ऐसे नाम का आदमी तो पैदा होते ही बुड्ढा हो जाता है। झा जी के ऐसे ही बुड्डे संस्कार भी थे। प्राइमरी स्कूल का टीचर बाप और क्या संस्कार दे सकता था...

- बेटा, हराम की कमाई में बरकत नहीं होती। हराम का पैसा हराम में ही जाता है । ऐसा पैसा, जब निकलता है, बड़ी मुश्किल से निकलता है। यही संस्कार लेकर बड़े हुए थे झा जी। जब स्टेट पब्लिक सर्विस कमिशन में भर्ती हुए तो पहली बार दुनियादारी से वास्ता पड़ा। 

हिंदुस्तान में  कुछ तो बात अभी भी बाक़ी है कि जनरल कैटेगरी का पढ़ाकू, तेल चिपोड़ने वाला बच्चा बिना किसी पौवे के सर्विस कमिशन में नौकरी पा गया। जिसने नौकरी दी होगी, वो भी अपने मिडिल क्लास के वैल्यू सिस्टम से बाहर नहीं निकल पाया होगा। अभी तक ख़ुद के बनाए कुऐं में हीं मेंढक बना रहा होगा।

जब ट्रेनिंग कम्प्लीट हुई तो पता चला कि लगभग सभी ऊँची पहुँच वाले लोग थे। सबके बाप, मामा- चाचा या कोई न कोई रिश्तेदार किसी ना किसी सरकारी ओहदे पर थे या रहे थे। सबने वर्तमान सरकार, पिछली सरकार या आने वाली सरकार के माननीय नेताओं के साथ जुगाड़ बिठा रखा था। सब हिसाब-किताब पक्का था। उनको भेजा खर्चने की जरूरत ही नहीं थी कि किस को कौन सा विभाग और कहाँ पोस्टिंग मिलेगी, मुश्किल तो पीसी झा जैसे लोगों की थी। 

पिछले बीसेक साल में गाँव के नक़्शे में वो बदलाव आए हैं कि पहचानना मुश्किल है। पिताजी बची-खुची ईमानदारी से तनिक पहले के ज़माने के थे, तो प्राइमरी में अध्यापकी मिल गयी थी। तानौकरी पूरी ईमानदारी से पढ़ाते रहे, बावज़ूद इसके प्राचार्य बनने के पहले ही रिटायर हो गए। बाक़ी तो गाँव से पढ़े लिखे लड़के ज़्यादा से ज़्यादा चपरासी बन जाना चाहते थे या फिर नलकूप विभाग में, जो कुछ बहुत पढ़ लिए तो लेखपाल हो गए । प्राईवेट नौकरी की मंजिल होती किसी फार्मा कपनी में MR बन जाना। जब प्रेमचंद पढ़ाई करने शहर निकले तो मौसी ने कहा था, "पढ़ाई छोड़ो, नौकरी कर लो, बम्बई चले जाओ, अच्छी नौकरी है, दरबानी की, पूरे आठ हज़ार रुपिया तन्खा मिल जावेगी। आदमी को पैर उत्तेई पसारन चईये जित्ती लम्बी चादर होवे।" आख़िर एक गाँव वाला इससे दूर और अलग सोच भी क्या सकता था?

प्रेमचंद भाई को रेवेन्यू डिपार्टमेंट मिला था। शुद्ध हिंदी में आबकारी विभाग। जब पता चला की सरकारी नौकरी मिल गई है, बीडीओ वाली, तो गाँव भर में ख़ुशी फैल गयी। कहीं कहीं मातम भी छा गया। ऐसा क्यों हुआ, यह वही समझ सकता है जो गँवई राजनीति से वाक़िफ़ हो। बीडीओ बड़ी बात थी। लोगों को विभाग समझ नहीं आया। आबकारी विभाग क्या होता है? मोटा-मोटा जो समझ आया वह था 'शराब का दरोग़ा'। 
देशी ठेकों पर छापा मारना है, शराबी-कबाबी को दौड़ा दौड़ा के पकड़ना है। गाँव के नौजवान जो बड़े बुज़ुर्गों से छुप-छुपा कर पीते थे, दौड़े-दौड़े मिलने आए। 

- भैया, कोई सहयोग चाहिए तो बताइएगा।  दरअसल भैया से ज़्यादा, उन्हें ख़ुद सहयोग चाहिए था। उस पर हमारे संस्कारी PC भैया ऐसे कि शराब की गंध से भी उबकाई आ जाए, पीना तो बड़ी दूर की बात है। पुराने ज़माने में इसे ही संस्कार कहते थे।

ख़ैर, ट्रेनिंग के बाद पोस्टिंग हुई अमनगंज में। आबकारी विभाग के अपने टारगेट होते है। अमनगंज मुस्लिम बहुल इलाक़ा है। ईमान से शराब हराम है। सो पहली दफ़ा तो लगा की टारगेट बड़ा मुश्किल है। जब कोई पीता ही नहीं होगा तो खपत कैसी और टारगेट कैसे अचीव हो! हुसैन जाफ़री उनके ड्राइवर थे। पहले झा जी की मासूमियत पे बहुत देर तक हँसे। फिर कहा, "सर, फ़िक्र ना करें। धीरे धीरे सब समझ जाएँगे।"

जाफ़री साहब समझ गए की बालक नादान है, उम्र में छोटा भी तो है। जाफ़री ज़हीन और ज़मींदारी ख़ानदान से थे। आधे बुज़ुर्ग बँटवारे के वक़्त पाकिस्तान निकल गए, बाक़ियों ने बची-खुची रियासत इसी हराम में नीलाम कर दी । जाफ़री साहब भी ऑड मैन ऑउट थे। धीरे धीरे दोनों में बनने लगी। कुछ लोगों को ईमानदारी का कीड़ा होता है। कीड़ों के कई ग्रेड होते है। झा जी को भी ऐसे ही बड़े ग्रेड वाले कीड़े ने काटा था। ईमानदारी का यह कीड़ा बहुत भीतर तक घुसा हुआ था। 

जाफ़री साहब ने बहुत  समझाया पर माने नहीं। रात-रातभर गश्त लगाते, टाइम से ठेके बंद हुए या नहीं, कहीं ग़ैर क़ानूनी शराब तो नहीं बन रही। कोई हूच ट्रैजडी नहीं चाहिए थी। लोगों में सुगबुग़ाहट मची, धंधे से जुड़े लोगों को परेशानी भी होने लगी। ऊपर से नीचे तक बात होने लगी। जाफ़री ने कहा भी कि, "सर थोड़ा धीरे चलें, स्लो-स्लो।" 

पर नयी नौकरी का नया जोश और ऊपर से समाज बदल देने का जज़्बा। न सुनना था तो ना सुना। तभी अचानक कुछ बदला। नयी सरकार ने शराबबंदी की घोषणा कर दी। पहली अप्रैल से सारे राज्य में शराब की बिक्री बंद। जैसे गाज गिर गयी। माने शाम होने का मतलब ही ख़त्म हो गया। अब शाम को करेंगे तो क्या करेंगे।

महीने दस दिन गुज़रे। शराब बंदी का असर दिखने लगा। सड़क पर पी के टुन्न पाए जाने वालों की संख्या कम हो गयी। पीकर गाडी चलाने के कारण होने वाले ऐक्सिडेंट्स भी कम होने लगे। झा जी को लगा भाई बात में दम है। गांधी, विनोबा भावे ने ऐसे ही इसके ख़िलाफ़ मोर्चा नहीं खोला था। कहा ना झा जी पुराने विचार धारा के थे। नया नया जागा देश प्रेम नहीं था। सामाजिक बदलाव का हिस्सा होने की ख़ुशी हो रही थी। अच्छा अच्छा सा लग रहा था।

एक रात जब झा जी सो रहे थे तो बिजली चली गई। मारे गर्मी के आँख खुल गयी। बंगले के एक ओर से कई सारी बैलगाड़ियों के साथ-साथ चलने की आवाज़ सुनाई पड़ी। आज के समय में कहाँ सुनाई पड़ती हैं बैलों के गले की घंटिया, पूरी तरह जाग गए, बाहर टहलने आ गए। देखा बग़ल की नदी के पीपापुल पर कई सारी बैलगाड़ियाँ जा रही थी। कुछ सामान्य नहीं लगा। कुछ तो खटका। साहब की खतर-पटर सुनकर जाफ़री भी अपने कमरे से बाहर निकल आए। 

- जाफ़री जी, क्या हो सकता है? एक साथ इतनी गाड़ियाँ?

- सामान जा रहा है सर।  सो जाइए। 

- सामान मतलब? कैसा सामान? ट्रक, टेम्पो में क्यों नहीं जा रहा है?

- सर उसको मेन रोड से ले जाना पड़ेगा। चुंगी देना पड़ेगा और हर नाके पे पुलिस को भी चारा डालना पड़ेगा?

- मतलब कुछ गड़बड़ सामान है?

- सर जाने दीजिए, सिराजुद्दीन का सामान है। 

- पर सामान  है क्या?

- दारू ही है सर, शराब है। भूसा गाड़ी में छुपा के। 

प्रेमचंद झा जी बमक गए। इलाक़े के इंचार्ज होने की हैसियत ने भीतर तूफ़ान उठाना चालू कर दिया, भुजाएँ फड़कने  लगी। सारे देश में चल रहे टॉलरेंस-इन्टॉलरेंस में देश का प्रतिनिधित्व करने का बोझ इन्हीं के कंधे पर आ गया। रेस्पॉन्सिबिलिटी भाव से दुहरे हो कर तुरंत गाड़ी निकालने का आदेश दिया। 

- सर, सिराजुद्दीन के आदमी है, टंटा ठीक नहीं। समझदारी से काम लीजिए। 
सिराजुद्दीन को कौन नहीं जानता! इस इलाक़े में रहकर, बिना जाने रह नहीं सकते। पता ना हो तो, क़दम-कदम पर बता दिया जाता है। मगर उसका क्या करें कि ईमानदारी के सुलेमानी कीड़े ने ज़ोर से काटा। 

- मैंने कहा ना गाड़ी निकलो। 
रास्ते में लोकल पुलिस थाने को फ़ोन कर दिया की एक गाड़ी भर के लोग भेज दें, रेड मारना है। 
हुकुम के ग़ुलाम जाफ़री ने बिलकुल फ़िल्मी अंदाज़ में सबसे आगे जा कर चर्र से गाड़ी रोकी। झा जी गाड़ी रुकने के पहले ही हीरो के माफ़िक़ एक पैर के बल पर उतर गए। बैलगाड़ियों का कारवाँ थम गया, कुलबुलाहट मच गयी। 

- क्या जा रहा है? कहाँ जा रहा है?

- हुज़ूर भूसा है। ग़रीब आदमी है माई-बाप.... मवेशी के लिए भूसा ले जा रहे है। 

- खोल के दिखाओ। 

- नहीं खुलेगा। 

लगा जैसे आकाशवाणी हुई हो। देखा तो सामने ताड़ सा लंबा एक कसाईनुमा आदमी खड़ा था। आँखों में काजल, पान खाए दाँत, गाल में मस्सा। मेक-अप पूरा फिल्मी था। कसाई के बाईशेप्स, झा जी के दोनो जाँघों के बराबर थे। अगर आमने सामने का दाँव होता तो झा जी एक झटके में पिदपिदा जाते। 

जो चीज़ प्रेमचंद बंधु को हौसला देती थी वो थी, सच्चाई की ताक़त। गाड़ी पर लहराता तिरंगा, जोश दुगुना कर देता था। ऊपर से क़ानून का साथ कि अब तो शराब बंदी हो गयी है। अगर मौक़े पे पकड़ लिया तो, बहुत मज़बूत केस बनेगा। वैसे भी आज तक सिराजुद्दीन के ख़िलाफ़ कोई गवाह, सबूत मिला नहीं था। अंधेरे में बटेर हाथ लग गया था। 

- ज़ब्त कर लो, सारा सामान। 

एन्फ़ॉर्स्मेंट देखते ही झाजी और चौड़े हो गए थे। जत्था अब थाने की ओर चला। 

थाने के असली वाले दरोग़ा जी को जब पता चला कि सिराजुद्दीन भाई का सामान है, तो सिट्टीपिट्टी गुम हो गई। घर परिवार वाले थे, पिछले तीन-चार साल से इसी थाने में थे सो सबको जानते थे। आबकारी साहेब, ओहदे में बड़े लगते है, कुछ कह भी नहीं सकते। ऊपर से आधी रात का समय, अपने सीनियर को जगाना भी ठीक नहीं। ख़ुद ही हैंडल करना चाहिए। प्रेमचंद बाबू, कीड़े के काटे, बमके-बमके फिर रहे थे। पहली बार इतनी भारी मात्रा में 'सामान' क़ब्ज़े में किया था। असली दरोग़ा जी ने, बड़े प्यार से बुला के बिठाया, चाय पानी का इंतज़ाम कराया। 
फिर धीरे से कसाई से मामला पूछा। पता चला सिराजुद्दीन भाई तो आउट आफ स्टेशन है। वैसे भी उनको पता चला तो थाना मिट्टी में मिल जाएगा। दरोग़ा जी झा जी को भी जानते थे, इसलिए उनकी सनक का भी अंदाजा था। 
प्रेमचंद बाबू कह रहे थे कि ज़ब्ती दिखाई जाए। दरोग़ा बाबू टालमटोल कर रहे थे। जितना मना करते, झा जी उतना कूदने लगते। कसाई भाई और दरोग़ा जी दोनो, फ़ोन पर फ़ोन घनघना रहे थे। कोई बीच का रास्ता निकल जाए। पर झा जी, तो टस से मस नहीं हो रहे थे। जैसे की भवानी चढ गई हो। 

दो घंटे होते-होते, शास्त्री जी ने थाने में प्रवेश किया। शास्त्री जी, याने सिराजुद्दीन के दाहिने हाथ। बड़ी भारी क़द काठी, गोरा बदन, ललाट पर तिलक चंदन, गले में कंठीमाला। शास्त्री जी सिर्फ़ दो रंग के कपड़े पहनते थे, सफ़ेद या गेरुआ। अपने हावभाव, व्यवहार से बड़े ही शांतचित्त पुरुष थे। किसी ने उन्हें बमकते हुए देखा नहीं था। इस शांतचित्त चेहरे के पीछे, एक बड़ा ही शातिर दिमाग़ था। 

आते ही शास्त्री जी ने झा जी को गले से लगाया। वह तो झा जी उम्र में छोटे पड़ते थे, नहीं तो पैर भी छू लेते। ऐसे नाज़ुक वक़्त में गधे को भी बाप मानना होता है फिर झा सा'ब तो पढ़े-लिखे समझदार अफसर थे। 
शास्त्री जी ने बात सम्हालनी चाही 

- पंडितजी, पंडितजी, लगता है, बच्चा लोग से ग़लती हो गया है। आप का कौशल समझ नहीं पा रहे है। महराज, तनिक बैठिये। ज़रा मस्तिष्क शांत रखिये। कपाल पर चंदन मंदन लगाइए।

- सुनिए सर, अभी हम बोल रहे है ना! बीच में काहे टोक रहे है। जिव्हा को शांति दीजिए। राउया सुना जाए। 

- देखिए, सिराजुद्दीन, आप के उम्र का था जब हम से मिला था। आप्पे के जैसा तेवर। बहुत जान होती है, हौसले में। हम बड़ी इज़्ज़त करते है उसकी। झा जी, सिराजुद्दीन  पाँच बखत  का नमाज़ी है, किसी के फटे में पैर नहीं डालता है। अपने काम से काम रखता है । सरकार, कसाई का काम भी धंधा करना ही होता है ना। अच्छा बुरा क्या होता है उसमें। रविदास को तो भैया उसी कठौती  में गंगा दिख गयी थी, जहाँ वो जूता धोते है। 
शास्त्री जी बोले जा रहे थे।
- देखिए, हम को ज्ञान मत दीजिए, हम भी अपना काम कर रहे है। जो काम ग़ैर क़ानूनी है, तो ग़ैर क़ानूनी है। हमको भी कोई मतलब नहीं है की सिराजुद्दीन क्या धंधा करता है या क्या नहीं करता। हमें क्या?  
अबकी बारी झा जी की थी। 

- कौन गाँव पंडितजी? 
शास्त्री जी ने दाँत कुरेदते हुए पूछा। प्रेमचंद बाबू चुप। 

- दरभंगा के दामाद का बहुत सेवा किया जाता है। जानते है ना। कहे दामाद बने हुए है, सर। देखिए हम दोनों मिल के सलटा लेते है। आप के ऊपर जाएगा तो आपके लिए अच्छा नहीं होगा और मेरे ऊपर जाएगा तो मेरे लिए अच्छा नहीं होगा। लगेगा की हमको अपना काम नहीं आता है।

- क्या बात करेंगे, आप को पता नहीं है क्या कि शराब बंदी है। लाइसेन्स राज में बात अलग है। जुर्माना दे के छोड़ देते। यहाँ तो आप क़ानून का खुल्लम -खुल्ला उल्लंघन हो रहा है। 

- अब समझा आया। सरकार यह तो चरणामृत है। चढ़ावा सबको चढ़ेगा। ऊपर से नीचे तक कोई भी छूटेगा नहीं। सिराजुद्दीन भाई ईमान के पक्के है। कोई भी ग़ैर-इमानी काम नहीं करते। मैं भी कंठाधारी पंडित हूँ, झूठ नहीं बोलता। कसाई रे, ज़रा डब्बा तो उठा ला भाई सुरती वाला। ... दरोग़ा जी, इधर आईये। 

प्रेमचंद जी बिफ़रे, "आप क्या कर रहे है? ऐसे लोग आप के थाने में आकर ऑर्डर छाँट रहे है और आप उधर क्या कर रहे है?"

दरोगा अपना पिण्ड छुड़ाने में लगे थे, बाहर की तरफ़ जाते-जाते बाँच गए
- अरे सर, गाँव में एक कांड हो गया है, उधर ही बिज़ी हूँ। एक मुसलमान लौंडा किन्हीं यादव जी के घर में घुस गया है, मार मार के ससुर हलुवा टाइट कर दिया है लौंडे का। डर है कि लव जिहाद के चक्कर में कहीं साम्प्रदायिक दंगा ना हो जाया। हम ज़रा गस्त मार के आते है। आप शास्त्री जी से सलट लीजिए ना। हमरा भी कपार छूटेगा।

- दारोगाजी, मैं आपके ख़िलाफ़ कम्प्लेन कर दूँगा, आप समझते क्या हैं? ऐसा लग रहा है जैसे हम ही कोई ग़लती कर के बैठे है। जैसे आप ही हुकुम चला रहा है।  
प्रेमचंद जी बोलते रहे, सुनने वाला कोई नहीं था। 

"झा जी, इसको दुनियादारी कहते है। आपका गाँव घर हम को मालूम है। पहला आदमी है ना अपने गाँव के जो इधर आ गया है, तभई जोश आ रहा है लगता है। मत्स्य न्याय सुने है कभी? जंगल का कानून? होगा तो वही जो हमेशा होता आया है। बड़ा मछली, छोटा मछली को खा जाएगा। पर आज कल परजातंत्र है ना। छोटों मछलियों को भी तो मत का अधिकार है ना! उसका भी इज़्ज़त करना पड़ेगा ना। कुछ लोगों को ऊँगली करने में मज़ा आता है, जैसे आप को आ रहा है। पूरे ज़माने का ठेका आप ही लिए हुए है क्या? कबीरपंथी है क्या? - जग सोता है, तो आप भी सोइए ना, काहे जाग कर टसुआ बहा रहे है।" शास्त्री जी झा सा'ब को बिना मौक़ा दिए लगातार बोले जा रहे थे।

"सर देखिए, बमकिए मत शांत रहिए। कोई नहीं सुनेगा, कोई नहीं आएगा। मैं जानता हूँ आपके ख़ानदान को, कोई साइकल से आगे नहीं गया है। ईमान धर्म का झंडा कब तक पकड़े रहिएगा! दुनिया आगे बढ़ गया है। उसी को पकड़े रहेंगे तो फ़ालतू में पीछे रह जाएँगे।" शास्त्री जी ने शांत मन से कहा और एक नोटों की गड्डी आगे कर दी। 

प्रेमचंद ने जब नोटों की गड्डी देखी तो आपे से बाहर हो गया। मार ग़ुस्से के हाथ फड़फड़ाने लगे। एक झटके में टेबल पलट दिया, सारा सामान फैल गया। आवाज़ सुन के दरोग़ा जी अंदर आ गए। अंदर का माहौल देख के दंग रह गए। प्रेमचंद थर थर काँप रहे थे। लगता था जैसे, प्रेशर से जिस्म का सारा ख़ून नाक से निकल जाएगा। 
- आप मुझे रिश्वत देने की कोशिश कर रहे है! आपने अपने आप को समझ क्या रखा है!

शास्त्री जी ग़ज़ब के शांत आदमी थे, चेहरे का भाव भी नहीं बदला। तभी सिराजुद्दीन का काम संभाल लेते है। 
- दरोगाजी, यह आदमी रिश्वत देने की कोशिश कर रहा है। गिरफ़्तार कर लीजिए। 
झाजी बोले।

दरोग़ा जी हैरान खड़े थे। उनकी ज़िंदगी में आज तक ऐसा कोई मौक़ा नहीं आया था। पता नहीं था कैसे रीऐक्ट करना है। शास्त्रीजी धीरे से उठे, प्रेमचंद का हाथ पकड़ा
- देखो झाजी, तुमको झंडा उठाने का बड़ा शौक़ है, तो उठाओ झंडा।  तुमको लगता है कौनऊ इंक़लाब-उंकलाब ले आओगे, आज़ादी-वाजादी आ जाएगी!

शास्त्रीजी ने धोती में खोसी हुई बंदूक झा जी के हाथ में रख दी
- इसको बंदूक कहते है, छू के देख लो। जब यह ठंडा-ठंडा गरम हो जाता है ना, तो सब ज़िंदाबाद-ज़िंदाबाद पिछाड़े में घुस जाता है।

प्रेमचंद सकते में आ गए। दरोग़ा ने बोला, "शास्त्री जी हमको कोई बवाल नहीं चाहिए, जो सलटना है बाहर जा के सलटिए।" 

शास्त्री जी आवाज़ में सख़्ती लाते हुए बोले, "झा जी बहुत मुश्किल नहीं है। वैसे भी बहुत सारे आतंकवादी घुसे आते है, गाड़ी वाड़ी भी अगवा कर लेते है, गोली वोली भी चलिहे जाता है। जान जोखिम हो जाता है, ख़ून ख़राबा आम है हिंया।"

दरोग़ा जी घबराए हुए, बाहर भागे। किसी भी घटना के गवाह बनना नहीं चाहते थे। कमरे के अंदर बड़ी देर तक ख़ामोशी बनी रही। जैसे कोई बोल ही नहीं रहा था। फिर थोड़ी हलचल हुई। कुछ देर बात प्रेमचंद झा जी कमरे से बाहर निकले। धीमी आवाज़ में जाफ़री से गाड़ी निकालने का इशारा किया और घर की तरफ़ रवाना हो गए। 
शास्त्री जी भी निकले। कसाई ने इशारे से पूछा, "क्या हुआ?"
- ज़रा ज़्यादा जोश था, सोच रहा था कोई बड़ा दाँव खेलने को मिला है। तौल रहा था कि कहाँ तक जाएगा, इसलिए बमक रहा था। बंदूक़ देख के पैंट गीली हो गई। पहले मान जाता तो कुछ फ़ायदा भी होता गरीब आदमी का। आदमी को पता होना चाहिए कि पतंग को कब ढील देना है, कब टाइट करना है। छोटा आदमी, छोटा ही सोच सकता है। मध्यमवर्गी जो ठहरा।

झाजी की गाड़ी अंधेरे में चली जा रही थी। हेड्लाईट की रोशनी में एक कहानी याद आ रही थी। बचपन में पढ़ी थी।

'नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना। यह तो पीर का मज़ार है, निगाह चढ़ावे और चादर पर रखनी चाहिए। ऐसा काम ढूँढना जहाँ कुछ ऊपरी कमाई हो। मासिक वेतन तो पूरनमासी का चाँद है जो एक दिन दिखता है और घटते-घटते ग़ायब हो जाता है। ऊपरी आय बहता स्रोत है, जिससे सदैव प्यास बुझती है। वेतन तो मनुष्य देता है, इसी से इसमें कोई बढ़त नहीं होती। ऊपरी आमदनी खुदा देता है, इसलिए उसमें बरकत होती है।'
झाजी सोच रहे थे 'पतंग उड़ाना भी एक कला है, काश कि बचपन में सीखी होती।'