मौन राग

- अनिलप्रभा कुमार

तय तो यही हुआ था कि सभी अलग-अलग जगहों से आकर लन्दन के हीथ्रो हवाई अड्डे पर इकट्ठे होंगे और वहीं से टूर कम्पनी का गाइड मिल जाएगा। कस्टमस से बाहर निकलते ही एक युवक उनके टूर के नाम की तख़्ती ऊंची उठाए खड़ा नज़र आया। उसके पास कुछ लोग पहले से ही खड़े थे अब कुछ और आकर जुड़ गए। सबने अपने-अपने नाम बताए। एक-दूसरे को सकुचा कर देखा और मुस्कराए। वह नामों की पड़ताल कर रहा था, कुछ- कुछ हाज़िरी लेने जैसा। अमरीका वाले तो सभी पहुंच गए पर थोड़ा इन्तज़ार करना होगा। अभी भारत वाली फ़्लाइट नहीं पहुंची। वहां से भी छह लोग आने वाले हैं।

सभी लोग इधर-उधर बैठने की जगह ढूंढने लगे। एक जोड़ा न्यूयॉर्क से था। बाक़ी दो परिवार न्यू-जर्सी से आए थे। पति-पत्नी, एक अविवाहित बड़ी बहन, दो जवान बेटे और एक बहू। दूसरा परिवार भी उनके सम्बन्धी ही थे- दूसरी विवाहित बहन, उनका पति जो डॉक्टर था (यह बात ख़ास ज़ोर देकर बताई गई) और उनकी दो किशोरी बेटियां जो मेडिकल में पढ़ रही थीं। एक और दम्पति भी हैं – ओहायो से, शायद कहीं इधर- उधर ही होंगे। 

"इधर आ, कम हियर, यह देख, अपने ग्रुप के लोग यहीं बैठे हैं।" इतने ज़ोर से अपनी ही भाषा में बात सुनकर सभी का ध्यान बंटा। चारों तरफ़ गोरे लोगों को देखकर थोड़ी सकुचाहट भी हुई। "एत्थे आ" एक ऊंची- लम्बी प्रौढ़ आयु की महिला अपने पति को हाथ हिला-हिलाकर बुला रही थी। पति चेहरे पर मुस्कान लिए, हौले-हौले अपनी ही चाल से आ गया। "आप सभी लोग वेकेशन्स एग्ज़ौटिका के ही ग्रुप के हो जी?" उस महिला ने पुष्टि के लिए पूछा। सब के हामी भरने पर उसने अपना परिचय दिया। "मेरा नाम सतनाम है जी और यह मेरा हस्बैंड है, रंजीत जग्गी। हम लोग ओहायो से आए हैं। आप सब कहां से हो जी?" फिर से सब ने अपना अपना परिचय दिया। "इतने नाम तो इस वक्त याद रखने मुश्किल हैं पर अपने आप धीरे-धीरे ज़ुबान पर चढ़ जाएंगे। इतने दिन साथ जो रहना है।" वह आत्मीयता से मुस्करायीं। उनके आने से पहले धीमे-धीमे फुसफुसा कर बातें करने वाले समूह को एक ज़ोरदार आवाज़ मिल गई, एक कड़क और बुलन्द आवाज़।

न्यू-जर्सी वाला परिवार और उनकी बहन का परिवार तीन भागों मे बंट चुका था; मर्द, औरतें और उनके युवा बच्चे। थोड़ी देर में भारत वाले सदस्य भी आ जुटे। बाद मे पता चला कि वह न्यू जर्सी वाले परिवार की बहू के माता- पिता और दो छोटी बहने थीं। बड़े ज़ोर से वे लोग गले मिले। शायद सारे परिवार ने एक साथ यूं यूरोप- भ्रमण की योजना बनाई होगी। चुपचाप एक और जोड़ा पीछे खड़ा लगातार मुस्कराए जा रहा था। पत्नी ने आंखो पर ढेर सारा काजल, माथे पर बड़ी सी बिन्दी और नाक में हीरे की लौंग पहनी हुई थी। पूरे भारतीय चेहरे के नीचे पहनावा पश्चिमी था। एक छोटी सी कमीज़ और फिर ढीली-ढाली सी घुटनों से नीचे तक की पैंट यानि कॅप्री, पांवो में स्नीकर्स। सब ने बड़े कौतूहुल से उन्हें देखा। गाइड ने परिचय दिया, "ये चेन्नई से आए हैं – मधुबाला और रवि महेश्वरी।"

"ओह मधुबाला!" जग्गी साहब की चहक भरी आवाज़ सुनाई दी। फिर उन्होंने आगे बढ़कर महेश्वरी से हाथ मिलाया, "तो आप गुजराती नहीं, मद्रासी हैं?"

"जी नहीं, हम चेन्नई मे रहते हैं, पर हैं मारवाड़ी, घर में हिन्दी ही बोलते हैं।"

"तभी तो मैं कहूँ........।" 

बात पूरी होने से पहले मिसेज जग्गी ने उनकी पीठ पर धप्प लगाया, "बातें ही करते रहोगे क्या? देखो सब लोग आगे निकल गए हैं। ... बड़ा ही बातूनी आदमी है। बस जहां इसे कोई इसकी बातें सुनने वाला मिल जाए तो दुनिया- जहां की होश नहीं रहती।"

"तू अगर घर में बोलने दे तो मुझे बाहर वालों से बातें करने की भला ज़रूरत ही क्यों पड़ेगी?"

"बस चुप्प कर। पोते- पोतियों वाला हो गया पर है वैसा का वैसा ही।" बड़ी ननद ने अपनी भाभी के पास आकर फुसफुसाया, "लगता है, इस टूर में लाइव मनोरंजन रहेगा।" वह सिर्फ़ मुस्करा दीं।

गाइड ने अपना नाम अमर बताया। युवा, फ़ुर्तीला और बहुत ही योग्य युवक लगता था जैसे उसे सब पता था कि कब, कहां और क्या करना है। कोचिंग बस से होटल में पहुंचकर उसने सब को चार घंटे बाद फिर से लॉबी में मिलने को कहा। थकावट से सभी चूर थे। एक सफ़र की थकावट, ऊपर से छह घंटे का समय का भी अन्तर। बस में बैठे-बैठे ही लन्दन देखा। लंडन-ब्रिज, बंकिघम पैलेस, हाईड पार्क, बिग बेन, हाउस ऑफ़ पार्लियामेंट, ट्रफ़लगर स्कवॉयर, टॉवर ब्रिज वगैरह। सभी अधसोये से थे। स्वामी नारायण मंदिर पहुंचने पर सभी बस से उतरे। इटली के श्वेत संगमरमर की नक्काशी देखकर वे अचंभित थे – भारत से इतनी दूर भारत। रात्रि-भोज का प्रबंध वहीं के किसी स्थानीय होटल में किया गया था। मिस्टर और मिसेज़ जग्गी लपककर सबसे पहले मेज़ पर बैठ गए। उन्हें मालूम था कि लन्दन भारतीय-पाकिस्तानी भोजन के लिए प्रसिद्ध है। वे उठे और अपनी प्लेटों को व्यंजनों से ऊपर तक भर लिया। यह जोड़ा शायद आयु में सबसे बड़ा था। अभी तक मिसेज़ जग्गी का लापरवाह सा रवैया था कि मैने लन्दन देखा हुआ है, पर अब वह पूरी तरह सचेत थीं। चेन्नई वाला जोड़ा, जग्गी-दम्पति और न्यूयॉर्क वाला जोड़ा एक मेज़ पर बैठे और बाक़ी लोग अलग-थलग दूसरी मेज़ों पर। 

"अच्छा मधुबाला, तुम वहां क्या करती हो?" जग्गी साहब ने अपने से कम से कम तीस साल छोटी मधुबाला की ओर मुखातिब होकर पूछा।उसने शर्मा कर मुंह दांये-बांये किया, फिर अपने पति की ओर मुस्करा कर देखा।

"यह हाउस-वाइफ़ है। हमारी बेटी की शादी हो चुकी है और मेरा कैमिस्ट का बिज़नेस है। हम घूमने आएं हैं।"

"या कहो, दूसरा हनीमून मनाने आए हो।" जग्गी साहब ठहाका लगाकर हंसे। मिसेज़ जग्गी ने जो अब तक खाने में अति व्यस्त थीं, उन्होंने वेटर के हाथ से मेज़ पर रखने से पहले ही चिकन-करी का डोंगा लपक लिया और पति के मुंह के आगे कर दिया। जग्गी साहब मुर्गे की टांग चिंचोड़ने में व्यस्त हो गए। मधुबाला ने हाथ का चम्मच नीचे रख दिया। धीमे से बुदबुदायी, "मैं नही खा सकती अब।"

अगली सुबह सब तरोताज़ा होकर लॉबी में नाश्ते के लिए पहुंचे। यूरोस्टार से ब्रसल्स जाना था। अमर ने बताया हम सब इंग्लिश चैनल के नीचे से गुज़र रहे हैं। कुछ लोगों ने इस विचार से ही अपने भीतर एक झुरझुरी सी महसूस की। बाहर निकलकर ज्यों ही टूर की कोच पर बैठे तो सबसे आगे वाली दांयी सीट जग्गी दम्पति ने मल ली। उनके पीछे युवा जोड़ा। बांयी ओर महेश्वरी, बीच में न्यूजर्सी वाला परिवार और सबके पीछे की लम्बी सीट के आस-पास युवा लड़के- लड़कियां। बाद में सबने उन्हें बच्चा-पार्टी कहकर बुलाना शुरु कर दिया।

"हम लोगों ने बड़े टूर किए हैं जी। हमें सब पता है।" ज़ाहिर था क्योंकि बस की आगे की बड़ी सी खिड़की से सारा बाहर का रमणीक दृश्य  दिखता था। कुछ थी उनमें योग्यता कि वह सारे भ्रमण के दौरान हमेशा सबसे आगे की सीट मल कर बैठने में सफल रहे। बाक़ी लोग बिसूरते हुए पीछे जा बैठते। फिर तो जैसे सबकी बैठने की जगहें आरक्षित ही हो गईं। 

"अरी बीजल, तेजल, चलो बच्चा पार्टी गाना शुरु करो,कुछ रौनक लगाओ।" लड़कियां संकोच करतीं।

"अरे अन्ताक्षरी नहीं जानते तुम लोग? भारत में सब को पता है। जब मैं छोटी थी तो मै भी अपनी सहेलियों के साथ ख़ूब खेलती थी।" मिसेज़ जग्गी सब को रौनक लगाने का आग्रह करतीं।

"आंटी, आप ही शुरु कीजिए न।" कोई लड़की बड़े भोलेपन से कहती।

"मेरी आवाज़ बहुत ऊँची जाती है। मै नहीं गा सकती।" कुछ औरतें सीटों की आड़ लेकर खी-खी करतीं।

"मिसेज़ जग्गी….", युवा स्त्री ने कुछ कहना चाहा तो उन्होंने टोक दिया, "न, तुम मुझे सतनाम कहकर ही बुलाओ।"

"आप हमसे बड़ी हैं तो अच्छा नहीं लगता न?"

"वैसे इसका एक नाम और भी है।" मिस्टर जग्गी ने चहक कर अपना मुंह सीट के पीछे मोड़ लिया, "जब हमारी शादी हुई थी न तो हमारे यहां रिवाज़ है कि लड़की का नाम बदल देते हैं। जब मेरी मां ने मुझसे पूछा तो मुझे कुछ सूझा ही नही । यह लम्बा-सा घूंघट निकालकर, पांव में झांझरें पहन, मोरनी की तरह मेरे आस-पास भांवरें डाला करती थी। बस, तो मैने नाम रखा – मोरा।" बस के सभी लोग खिलखिला कर हंस पड़े।

"पर एक बात है, सिवाए मेरे और कोई नहीं इसे इस नाम से बुला सकता।" उन्होंने इस नाम पर मात्र अपने अधिकार की मोहर लगा दी। मिसेज़ जग्गी थोड़ी नाख़ुश दिखीं। वह अच्छी-ख़ासी पैंट-टॉप पहनकर, धूप के चश्मे को माथे के ऊपर टिकाए, अंग्रेज़ी बोलने वाली महिला, भले ही पंजाबी उच्चारण के साथ, पर बोलती तो थी न। और पति ने सारी छवि ही ख़राब कर दी। 

"जग्गी साहब, तो क्या और भी मोरनियां आपके आस-पास घूमा करती थीं?" अब महेश्वरी ने चुटकी ली।

"अरे बड़ा बांका जवान था मै। पॉनी-टेल बनाता था। लैदर जैकेट पहनकर जब बाइक चलाता था तो बस, सब लड़कियां दिल को थाम लेती थीं।"

"हां- हां, रहने दो। आंखों मे सुरमा डालते थे तुम।" आख़िर मिसेज़ जग्गी से नही रहा गया तो उनकी उड़ती पतंग काट ही दी।"

"ऐसे ही लगाता था मैं? तुझे तो हर चीज़ सुरमई ही नज़र आती है।" अब उनकी नोंक-झोंक फिर से शुरु हो गई। सारे भ्रमण के दौरान उनकी यह नहले पे दहले वाली फ़िल्म सभी का कभी मनोरंजन तो कभी खीज पैदा कर रही थी। डॉक्टर साहब थोड़े खफ़ा नज़र आते। 

"ये लोग कितना शोर-गुल मचाते हैं। चलती बस मे ज़रा झपकी लगती ही है कि इन लोगों की उंची आवाज़ें झकझोर कर जगा देती हैं।" 

जिस दिन ग्रैंड प्लेस पहुंचे, लगा कि जैसे कुछ साजिश थी कि बस इसी दिन, इसी समय, सभी सैलानियों ने इसी एक जगह पर इकट्ठे होना है। अमर ने अपने दल को इकट्ठा करके सावधान किया कि यहां भीड़ में आप खो सकते हैं। एक-दूसरे के साथ-साथ रहिए और जेबकतरों से सावधान। यहां ऐसी घटनाएं बहुत होती हैं। वह बात कर ही रहा था कि एक दहाड़ सी सुनाई पड़ी-  “रंजीइइइइइइइइत!”सभी पलटे। मिसेज़ जग्गी व्याकुलता से अपने पति को पुकार रही थीं। लोगों में खलबली मच गई। वह दिखे नहीं। सबने इधर-उधर देखना शुरु किया।अमर ने बड़े संयत तरीक़े से कहा, "आप सभी लोग इसी कोने में खड़े रहिए नही तो आपको भी ढूंढना पड़ेगा। मै उन्हें ढूंढ कर यहीं आ जाऊंगा।" मिसेज़ जग्गी चैराहे की चारों दिशाओं मे थोड़ी-थोड़ी दूर तक जाकर ज़ोर से आवाज़ लगातीं, "रंजीइइइइइइइइत", फिर लौट आतीं। उनकी व्याकुलता और चेहरे के भाव देखकर सभी बेचैन थे। यूरोप के एक अति आधुनिक शहर के चौक पर, श्वेत लोगों की भीड़ के बीच, एक भारतीय नाम की गुहार लगाती औरत। कोई उसे शिष्टता-अशिष्टता के मापदण्ड पर तोलने की जुर्रत नहीं कर सका। वह पुकार नहीं रही थीं, बिना रोये क्रन्दन कर रही थीं। अमर के साथ अपराधी की तरह सिर झुका कर लौटते पति को देखकर वह लपकीं, "कित्थे मर गया सी?" उन्होंने प्यार से उलाहना दिया। फिर उनके दाएं हाथ की कोहनी में अपने बांए हाथ की कोहनी फंसा कर उन्होंने अपने सीने पर बांध लिया। लगा अब वह रो पड़ेंगी। जग्गी साहब नज़रें झुकाए चलते रहे। आज वे दोनों ग्रुप के पीछे चल रहे थे, चुपचाप। 

एमस्टरडम की सड़कों पर घूमते हुए जब अमर ने वहां के खुले नैतिक मूल्यों की व्याख्या की तो डॉक्टर साहब ने रंजीत को टहोका लगाया, "जग्गी साहब, हम तो ग़लत मुल्क में पैदा हो गए।"

"ऊपर से ग़लत मुल्क में प्रवास भी कर लिया।" उनके साले ने बात पूरी कर दी। जग्गी साहब ने खुलकर ठहाका लगाया, "भई, मैं तो यहीं की नागरिकता ले लूंगा।" पत्नी पर नज़र पड़ते ही उनकी खिलखिलाहट बीच में ही ठिठक गई।

"देखिए, इस स्ट्रीट के आगे रेड लाइट एरिया है, आप लोग वहां अकेले नहीं जाएं। अगर आपको वाक़ई दिलचस्पी है तो मैं ख़ुद आपको वहां लेकर जाऊंगा।" अमर ने बड़ी संजीदगी से कहा। डॉक्टर साहब, उनके साले साहब और उनके समधी की बांछें खिल गईं। आंखो ही आंखो में मन्त्रणा हो गई। 

"हम तो देखेंगे।" कह कर तक़रीबन सभी आदमी लोग आगे आ गए।

"हम भी चलेंगी, देखने में क्या हर्ज़ है? आख़िर दुनिया देखने ही तो आए हैं।" कहकर मधुबाला ने पति की बांह थाम ली। बाक़ी औरतें भी अगली आदमियों की पंक्ति के पीछे, दूसरी औरतो की पंक्ति बना कर साथ हो लीं। अमर आगे चलता फिर पीछे मुड़ कर बताता –यह डि-वॉलन डिस्ट्रिक्ट है। एमस्टरडम का रेड-लाइट एरिया और पर्यटकों का बहुत बड़ा आकर्षण-केन्द्र। डरती-झेंपती नज़रों को जबरन उठाकर महिलाएं उन लाल बतियों से जगमगाती सड़क पर लगी शीशे के दरवाज़ों की कतार को देख रही थीं। हर शीशे के दरवाज़े के पीछे एक ज़िन्दा गोरी देह अपने अंगों का भरपूर कामुक प्रदर्शन करती खड़ी थी। चेहरे मेकअप से ढके थे और बदन अनढके।सभी देखने वाली औरतें सहमी हुई थीं। "ये बेचारी दुकानों पर सजी चीज़ों की तरह खड़ी-खड़ी क्या थकती नही होंगी? मुझे तो अपने शहर में कसाई की दुकान पर लटकी, खाल उतरी बकरियों की याद आ रही है।"

"इनमें से कई यूरोप की यूनिवर्सिटियों में पढ़ती हैं। छुट्टियों में पैसे कमाने के लिए यहां आकर काम करती हैं।" अमर ने बताया। 

"यौनकर्मी! मुझे तो इस सबमें कोई उतेजना नहीं दिखाई देती, विवशता दिखाई देती है।" एक बोली।

"बस देख लिया, चलो वापिस।" डॉक्टर की पत्नी ने ज़ोर से कहा। सभी आदमी एकदम लौटने को पलट आए। कभी-कभी कनखियों से अश्लील इशारे करती उन देहों को देख लेते। सभी भारी मन से वापिस उसी तय की हुई जगह पर लौट आए, गुमसुम। सौ क़दम पहले, किसी रेस्तराँ के बाहर जग्गी दम्पति बीयर पीते दिखे। "अरे आप नहीं गए वह स्ट्रीट देखने?"

"इस ने बीयर की रिश्वत देकर यहीं बिठा लिया।" उन्होंने अपनी पत्नी की ओर इशारा किया।

"नहीं- नहीं, हमें इन बातों में कोई दिलचस्पी नहीं। आप लोग चलो, हम ड्रिंक ख़त्म करके आते हैं।" ज़ाख नाम का ड्राइवर रोज़ बस को घुमाता जाता। देशों पर देश, शहरों पर शहर, एक से एक अचम्भित करने वाले दर्शनीय स्थल। रात को देर गए होटलों मे दाख़िल होना। सुबह जल्दी उठकर, तरोताज़ा हो फिर वही बस, वही ड्राइवर। अमर का सब कुछ संभालना – यात्रियों की ज़रूरतें, वीज़ा-पासपोर्ट की औपचारिकताएं। भाषा की समस्याएं, खाने-पीने का इन्तज़ाम और दर्शनीय स्थलों के बारे में जानकारी देना। इससे अच्छा इन्तज़ाम हो नहीं सकता था पर दल के लोगों  पर थकावट और ऊब दोनों हावी होने लगे थे। कल क्या देखा था याद नहीं, परसों की तो बात ही छोड़ो।पूरी यात्रा एक ठहरी हुई तस्वीर बननी शुरु हो गई। ज़ाख का बस का बड़ा सा स्टीयरिंग पूरे गोल-गोल घुमाना, लग्ज़री बस की पूरी चौड़ाई वाली खिड़की से, एक से बढ़कर एक रमणीक दृश्यों का फ़िल्म के दृश्यों की तरह गुज़रते जाना। सबसे अगली सीट पर जग्गी दम्पति का विराजमान रहना। बाक़ी लोगों का उनींदी आंखो से बाहर देखना सिवाए सतनाम जग्गी के। वह सबसे पहले बस से उतरतीं और सबसे पहले ही चढ़तीं, "अरे हटो हटो, यह हमारी सीट है।" 

"क्यों, ज़्यादा बोलने वालों के लिए आरक्षित है क्या?" धीरे से कोई बच्चा पार्टी का सदस्य फ़िकरा कसता।

"ओय ज़ाख, वैन विल वुई रीच आवर नैक्सट स्टॉप?" वह ज़ोर से अपने से आगे बैठे ड्राइवर से इतनी ज़ोर से पूछतीं कि बाक़ी लोग भी सीधे होकर बैठ जाते। "वैरी सून", वह मुस्करा कर जवाब देता।

"तू चुप करके बैठी रह। अभी यूरोप की सबसे ऊंची चोटी पर घूम कर आई है। वहां से जो नज़ारा दिखता है न वह स्विटज़रलैंड का सबसे ख़ूबसूरत दृश्य है। थोड़ा उसका आनन्द तो मन में बना रहने दे।" कह रंजीत जग्गी ने मुग्ध होकर आंखे मूंद लीं।

"रहने दे तू, मैने पहले भी सब देखा है।" सतनाम ने खीज कर रंजीत को कोहनी मारी।

"ओह, मैं तो भूल ही गया। तेरा बाप स्विटज़रलैंड में राजदूत बन कर आया था न, तूने तो देखा ही होगा।"

"मेरा बाप जो भी था, तेरे बाप की तरह नहीं था। हर बॉलीवुड फ़िल्म मे यही स्विटज़रर्लैंड के सीन होते हैं, सैकड़ो बार मैने देखे हैं। हीरो-हीरोईन यहीं गाड़ियां चलाते हैं और यहीं फूलों के बीच डांस भी करते हैं।"

"हां-हां, तुझे तो सब मालूम ही होगा। तू कोई किसी हीरोईन से कम थोड़े ही है।"

"मुझे सब दिखता है क्योंकि मैने कभी आंखो मे सुरमा जो नहीं लगाया।"
"तेरे साथ तो बैठना भी सौ का घाटा है।" कह कर रंजीत जग्गी ग़ुस्से से अपनी सीट पर से उठ कर बगल वाली ख़ाली सीट पर खिड़की के बाहर मुंह करके बैठ गए। सतनाम बेपरवाह होकर दोनो सीटों पर फैलकर अधलेटी हो गई। डॉक्टर बुरी तरह झुंझला गया। सारे सफ़र में इन लोगों ने टॉय-टॉय लगाए रखी है। मैने आज तक इतने शोर-शराबे वाली बस मे सफ़र नहीं किया। मैनर्स तो हैं ही नहीं, किसी दूसरे का ख़्याल ही नहीं। खाना खाते वक्त भी शोर मचाते हैं, तभी तो हम लोग इनकी मेज़ पर नहीं बैठते।" 

"वैरी लाउड पीपल।" सबसे छोटी लड़की ने अंतिम मत दिया। बस रुकी। अमर खड़ा हो गया, "जानता हूं आज आप लोग यूरोप की सबसे ऊंची चोटी देखकर आए हैं, बेहद थके हैं पर ये जल-प्रपात देखने लायक हैं। अद्वितीय हैं। ऐसे प्रपात और कहीं नहीं देखने को मिलेंगे।" बच्चा पार्टी कूद कर बस से बाहर निकल गई। फिर मर्द लोग। मधुबाला और न्यूयॉर्क वाली महिला भी धीरे से उठीं और बस की सीढ़ियां उतरने लगीं।

"नाम क्या है इनका?" सतनाम ने पूछा। 
"ट्रम्मलबाख़ वॉटर फ़ॉल्स" 
"चल, फिर मैं भी चलती हूं।" अमर ने उनका हाथ पकड़ कर बस से उतार लिया। एक ही परिवार की वे सभी औरतें बस से नहीं उतरीं। सब बेदम थीं। "अरे तुम सब मुझ से उमर में छोटी हो, क्या बूढ़ियों की तरह बस में बैठी हो। हिम्मत करो, चलो आ जाओ।" धीमी सी मुस्कराहट के साथ सभी ने ना में सिर हिला दिया। सतनाम जल्दी-जल्दी चल कर टोली मे सबसे आगे आ गई। रंजीत जान-बूझ कर पीछे हो लिया। लिफ़्ट कमरे जितनी बड़ी थी, उसी से सब ऊपर आ गए। थोड़ी देर तक सुरंग-नुमा जगह से होकर अन्दर आए तो बस वहीं ठिठक गए।जल-प्रपात नियाग्रा के प्रपात की तरह ऊपर से नीचे नहीं गिरता था बल्कि पहाड़ों के बीच, प्रबल वेग से एक भयानक अजगर की भांति बांए से दांए, अपनी प्रबल ऊर्जा के साथ प्रकट हो रहा था। यह लुका–छुपी का कोई मासूम खेल नहीं था। लगता था जैसे प्रकट-अप्रकट का कोई मायाजाल रचा जा रहा हो। चट्टानों के बीच से अचानक एक रेंगती हुई, लपलपाती फेनिल ऊर्जा प्रकट होती। अपनी प्रबलता और रौरव से दहलाती और फिर चट्तानों में ही विलीन हो जाती। फिर किसी और जगह पर अट्टहास करती निकल पड़ती। जहां जहां से प्रपात दिखाई देता था वहीं निकट से देखने के लिए दर्शकों के लिए एक रेलिंग लगी हुई थी। दर्शक अत्यन्त निकट से प्रकृति का मायावी रूप देख रहे थे। यह सुन्दर, रमणीक नहीं, भव्य और विराट रूप था, आतंकित करने वाला।सतनाम ने रेलिंग के पास से प्रपात को देखा, सिर्फ़ तीन-चार फ़ुट की दूरी से। उसे लगा जैसे कोई महादैत्य, भयंकर गर्जना करते हुए उसे निगलने के लिए पूरे वेग से उसकी ओर बढ़ रहा है। यहां हल्का-सा अन्धेरा था। प्रपात से उठती धुंध ने बाक़ी सब कुछ भी धुंधला कर दिया। उसे लगा कि वह वहां अकेली खड़ी है। अपार पानी का विकराल दानव उसको अपनी ही ओर बढ़ता महसूस हुआ। वह बुरी तरह से भयभीत हो गई। सोचा, अगर कहीं उसका पांव फिसल गया तो? उसे अचानक सांस लेने में कठिनाई होने लगी। घबराकर वह पीछे हो गई। रंजीत बाक़ी आदमियों के साथ थोड़ी दूरी पर खड़ा दिखाई दिया। 

"मैं नीचे जा रही हूं ।" उसने पास आकर उसे धीमे से कहा और जल्दी से लिफ़्ट की ओर बढ़ गई। लिफ़्ट वाला लड़का सुस्ता रहा था। उसे पता था कि यह सैलानियों का आख़िरी समूह ऊपर आया है इसके बाद कोई और नहीं आएगा। वह एकबारगी में ही इन पन्द्रह-बीस लोगों को एकसाथ नीचे ले जाएगा। उसने किसी तरह से सतनाम को बताने की कोशिश की कि वह अभी लिफ़्ट नहीं चलाने वाला, वह चाहे तो सीढ़ियों के रास्ते से नीचे जा सकती है। सतनाम ने भी सोचा, ठीक ही तो कह रहा है। इतनी बड़ी लिफ़्ट वह भला मेरी अकेली के लिए क्यों चलाएगा? वह अकेली ही सीढ़ियां उतरने लगी। सीढ़ियां पानी से गीली थीं। आधा रास्ता उतरने के बाद वह और भी घबरा गई। सीढ़ियों के घुमाव के कारण उसे न तो नीचे का मुख्य जालीवाला दरवाज़ा ही नज़र आ रहा था और न ही उपर वाले लोग। शाम गहरा रही थी। उसके माथे पर पसीना छलछला आया। एक बीहड़ जगह पर अकेले होने और रास्ता खोने के एहसास ने उसे कंपा दिया। वह जल्दी-जल्दी वापिस सीढ़ियां चढ़ने लगी। लिफ़्ट के पास पहुंची तो वहां अब कोई नहीं था। वह दोबारा सीढ़ियों की तरफ़ लौटी।सतनाम ने सीढ़ियों के ऊपर खड़े होकर देखा कि जाली वाला मुख्य फाटक बंद हो चुका था और उसके ग्रुप के सभी लोग इस वक्त अहाते से बाहर जा रहे थे। "रंजीइइइइइइइइइइइइइत" वह अपने फेफड़ों की पूरी ताक़त लगाकर चिल्लाईं।

"अमआआआआअर", सतनाम ने फिर पुकारा। इस पुकार के जवाब में उसका जीवन–मरण बंधा था। प्रपात की गर्जना में उसकी आवाज़ खो गई। दीवार का सहारा ले, वह चुपचाप खड़े होकर उन लोगों को जाते हुए देखती रही। फिर निढाल होकर वहीं बैठ गई। अपने आप ही जपजी साहब का पाठ मन में घूमने लगा -निश्शब्द। अमर ने बस में पहुंचते ही हमेशा की तरह गिनती की। देखा एक जना कम है। "मिसेज जग्गी कहां हैं? क्या बस में नहीं आईं? वह तो वहां से चल पड़ी थीं।" बस में पहले से बैठी महिलाओं ने नकारात्मक सिर हिलाया। हलचल मच गई। सभी वापिस दौड़े। लड़कियों को लेडीज़-रूम की तरफ़ दौड़ाया गया। वह भी निराश लौटीं। आदमी अभी बाहर ही खड़े थे। अमर उनके साथ उलटे पांव प्रपात की ओर लपका। प्रपात के प्रवेश-द्वार पर ताला लग चुका था। पास ही में एक कैफ़ेटेरिया था। अमर ने दरवाज़ा खटखटाया। कैफ़े के मालिक ने दोनों हाथों से इशारा करके बताया कि कैफ़े बंद हो चुका है। अमर ने दरवाज़े को फिर खटखटाया, इशारों से ही बताने कि क़ोशिश की कि आपद-स्थिति है। उसने दरवाज़ा खोल दिया। अमर ने ही बताया कि हमारे ग्रुप की एक महिला भीतर रह गई है। पता चला कि लिफ़्ट वाला ही वहां का एकमात्र कर्मचारी है और वह लिफ़्ट से आख़िरी सवारियां उतारने के बाद, गेट बन्द कर के अपनी साईकल चलाकर वहां से जा चुका है। कैफ़े वाले के पास लिफ़्ट वाले का फ़ोन नम्बर था। उसने उसे फ़ोन मिलाया और अपनी भाषा में सारी स्थिती समझाई। अमर को उसने तसल्ली दी कि लिफ़्टवाला थोड़ी ही देर में आता होगा।

"अरे, तब तक तो वह मर जाएगी। दिल की मरीज़ है वो। अकेले छूट जाने के सदमे से ही कहीं उसे हार्ट-अटैक हो गया तो?" रंजीत तड़पकर लोहे की जाली लगे दरवाज़े की ओर लपके। दस फ़ुट ऊंचे और बारह फ़ुट चौड़े दरवाज़े की रुकावट को नकारते हुए उन्होंने जाली में पैर फंसा कर ऊपर चढ़ना शुरु कर दिया। बार-बार पांव फिसल जाता। नीचे खड़े आदमियों ने उन्हें सहारा देने का प्रयत्न किया। सतर साल का बूढ़ा, किशोरों जैसी तत्परता से दीवार फांदने की क़ोशिश कर रहा था। सहमे  और घबराए लोग डर रहे थे कि अगर ये कहीं गिर गए तो?

"रुको जग्गी साहब, मैं भी आया।" अमर लपक कर दरवाज़े के ऊपर चढ़ गया।दोनों कमांडो जैसी सतर्कता से जाली पर पैर टिकाते हुए दरवाज़े के ऊपर चढ़ गए। फिर उतनी ही सावधानी और तत्परता से दूसरी ओर उतरने लगे। ज़मीन पर पैर पड़ते ही रंजीत सीढ़ियों की ओर लपके। अमर साथ-साथ भाग रहा था। नीचे खड़े लोगों को लगा कि शायद ऊपर से कोई आवाज़ आ रही है। "मोराआआआआअ, मैं आ रहा हूं।" शायद दूसरी ओर से भी कोई आवाज़ आई थी। प्रपात का नाद इतना तीव्र था कि वह आवाज़ सिर्फ़ एक अस्पष्ट-सी गूंज ही बन कर रह गई। "मोराआअ"। रंजीत इतनी सारी सीढ़ियां पलक झपकते चढ़ गए। अमर उनके पीछे ही था कि कहीं काई की फ़िसलन से उनका संतुलन न बिगड़ जाए। सतनाम पत्थर की मूर्ति बनी बैठी थी। रंजीत ने उसे बांहों के घेरे में ले लिया। अचानक जैसे प्रपात मूक हो गया। बांहो का सहारा दिए हुए, वे धीरे-धीरे नीचे उतरे। अब तक लिफ़्ट वाले ने आकर दरवाज़ा खोल दिया था। यूं ही रंजीत की बांहो में सिमटी, सहमी मोरा बिना कहीं भी देखे, चुपचाप आगे की सीट पर सकुचा कर बैठ गई। बस मे बैठे बाक़ी लोगों के चेहरे पर राहत का भाव था। अमर ने बिना कुछ भी कहे ड्राइवर को बस चलाने का संकेत किया। मोरा अभी भी नयी ब्याही दुल्हन की तरह रंजीत की बांहो में सिमटी थी। उसने रंजीत के कंधे पर सिर रख कर आंखे मूंद लीं। रास्ते भर बस में कोई नहीं बोला पर सभी पर्यटकों को लगा जैसे कोई मौन-राग निरंतर बज रहा है।