ग़ज़ल - सुनीता काम्बोज

सुनीता काम्बोज
ग़ज़ल - 1

सभी इल्जाम मुझ पर हैं, रकीबों पर नहीं आते
सफ़ीने रोज चलते हैं, किनारों पर नहीं आते।

परेशां दिख रहें है क्यों, ये सारे फूल बागों के
ये भँवरें आजकल ही क्यों गुलाबों पर नहीं आते।

नए इस दौर में कुछ तो गया है छूट ही पीछे
पुराने गीत अब उनके भी होठों पर नहीं आते।

सभी तो उड़ गए जब से पहर ये तीसरा आया
परिंदे भी तो अब सूखे से पेड़ों पर नहीं आते।

मुझे गुमराह करके तुम कभी रस्ता न पाओगे
महकते फूल ये हरगिज भी काँटों पर नहीं आते
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ग़ज़ल - 2

होके अब तो विदा चल पड़ी बेटियाँ
मेरे आँगन की थी रौशनी बेटियाँ

गुड़िया गुड्डे खिलौनें पड़े रह गए
हो गई अब तो शायद बड़ी बेटियाँ

करती महसूस माँ की कमी को बड़ा
लौटी पीहर से फिर अनमनी बेटियाँ

ये सहनशक्ति का ही एक भण्डार हैं
जानें किस चीज की बनी बेटियाँ

दिन ढले अब वो घर से निकलती नहीं
रहती हैं आजकल क्यों डरी बेटियाँ

कुल को दीपक मिले सब यही चाहते
कोख में इसलिए ही मरी बेटियाँ

जाने किस बाग के फूल टूटे हैं ये
देख किसने खरीदी बिकी बेटियाँ

अधढका सा है तन वो थिरकती रही
आज महफ़िल में क्यों नाचती बेटियाँ

सूखी मेहंदी गई रंग को छोड़ कर
इस तरह बाटँती है ख़ुशी बेटियाँ

पूछते है वो जन्नत मिलेगी कहाँ
जिसके आँगन में हों खेलती बेटियाँ

प्यार-सत्कार थोडा सा गर मिल सके
और कुछ भी नहीं माँगती बेटियाँ

घर की दीवार को गौर से देखती
बीता बचपन रही खोजती बेटियाँ

दर्द में माँ पिता जी अगर हो कभी
रहती बैचेन सी हर घड़ी बेटियाँ

भाव मन के सुनीता उतारा करे
अब तो जाती नही इस गली बेटियाँ
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ग़जल - 3

समंदर और किनारें बोलते हैं
सुनो नदियाँ व झरने बोलते हैं

वो अच्छा सामने कहते हैं मुझको
बुरा बस पीठ पीछे हैं बोलते हैं

ख़ता तूने भले अपनी न मानी
तेरे कपड़े के छीटें बोलते हैं

जो सूखें हैं वो ज्यादा फड़फड़ाते
हवा चलती तो पत्ते बोलते हैं

तुम्हारी ही हिफाज़त कर रहे
हम यही फूलों से काँटें बोलते हैं

मेरी उनको जरूरत है नहीं
अब मेरे अपनों के चेहरे बोलते हैं

न उसकी बात को हल्की लिया कर
तजुअर्बो से सयाने बोलते हैं

नई तहजीब ये ली सीख किससे
बड़ों के बीच बच्चे बोलते हैं

कभी इस घर में चूड़ी थी खनकती
कि अब टूटे झरोखे बोलते हैं

तरक्की को बयाँ ये कर दिया ही
जो इन सड़कों के गड्ढे बोलते हैं
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