एक कोना - कहानी

किशोर चौधरी 
- किशोर चौधरी
साफ़ रंग के चेहरे पर कुछ ठहरी हुई लकीरें थीं। इन लकीरों की बारीक परछाई में ताम्बई धागों की बुनावट सी जान पड़ती थी। वह मोढ़े पर बिना सहारा लिए घुटनों पर कोहनियाँ टिकाये बैठी हुई थी। चाय की मेज के पार भूरे रंग का सोफा था। ड्राइंग रूम की दीवारों में आले बने थे। उनमें कुछ एक मिटटी के गुलदस्ते रखे थे। उनमें फूल नहीं थे। उन पर कोई चित्रकारी भी नहीं थी। औरत ने सोफे की ओर देखते हुए बेरंग आवाज़ में कहा- “तुम्हारा जीवन कैसे चल रहा है?”

सोफे पर बैठे आदमी ने कहा, “बीवी है। बच्चे नहीं है। और हम एक साथ हैं। तुम अपना बताओ”

औरत ने उसे मुस्कुराते हुए देखा। उसके साथ पढने वाला लड़का अब अधेड़ हो चुका था। वह क्या जवाब दे ज़रा सी देर इसी असमंजस में रहने के बाद उसने कहा- “मैं चाय लेकर आती हूँ।” वह उठते हुए आदमी को देखने लगी, “तुम चाय पीते हो न?” आदमी मुस्कुराने लगा।

वह जब लौटी तो चाय के साथ खाने को भी कुछ लेकर आई।

औरत ने सोचा कहाँ से शुरू करूँ और कितना बताऊँ। इस तरह ग्यारह साल बाद मिले को आदमी को कहाँ से बताना शुरू करे। और फिर कोई कैसे कुछ और क्या बता सकता है? जीवन के बारे में बात करना आसान नहीं होता है। लोग जज करते हैं। लोग साथ देने का दिखावा करते हैं। लोग अवेलेबल समझने लगते हैं। लोग कुछ भी समझ सकते हैं।
उसने कहा, “क्या तुम ये चाय मेरे साथ छत पर बैठ कर पीना चाहोगे?
आदमी चुप था।
औरत ने कहा, “छत पर एक कोना है, जहाँ मैं सच बोलती हूँ।” औरत की आँखें मुस्कुरा रही थी।
वे दोनों ऊपर चले गए। वहां बहुत सारे गमले थे। हरियाली थी। उतनी हरियाली आदमी ने अपने रिश्तों में कभी नहीं देखी थी।
[इंतज़ार एक नया खिला फूल है जो बूढ़ा होने में वक़्त लगाता है]
“आओ बैठते हैं” ऐसा कहकर औरत खड़ी रही। उसने आदमी के बैठ जाने की प्रतीक्षा की। दोनों एक ही छायादार झूले के दो छोर पर बैठ गये। बीच की जगह पर चाय की ट्रे रख दी। आदमी ने चाय का प्याला हाथ में लेते हुए कहा- “मौसम अजीब है और इससे भी बड़ी बात कि ये ठहर गया है।” वह बस स्थिर भाव से आदमी को देख रही थी। जैसे इस पल उसे देखना ही इकलौता सुख था। “ये कितना अच्छा है न कि तुम्हें मौसम के बारे में पता है। मैंने जाने कब से इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया।”
किसी एक के पाँव के झोल से झूले में हलकी सी मचल आ गयी थी मगर वे दोनों ठहरे हुए थे। आदमी ने इस ठहर को पढ़ा और कहने लगा, “कैसी बात हैं न तुम्हारे पास बैठे हुए ऐसा लगता है जैसे अब कोई काम नहीं। जैसे कहीं जाना नहीं।”
ऐसा सुनते ही औरत चौंकी। उसने अपने ही घुटने पर रखा अपना हाथ उठा लिया। उसे लगा कि उसने अपना हाथ उस आदमी के घुटने पर रख दिया था।
आदमी ने झूले से सटी पीठ को सीधा किया। उसे लगा कि अभी-अभी उसका हाथ था और अब नहीं है।
[ज़िन्दगी में जब आप महसूस करते हैं कि उसने छू लिया है तो सचमुच उसने छू लिया होता है। छूने को छूने की ज़रूरत नहीं होती।]
आदमी ने कहा- “छत का वो कौनसा कोना है जहाँ तुम सच बोलती हो”

औरत ने अपने हाथ बाँध लिए। उसके चेहरे की शान्ति में थोड़ी सी उदासी घुलने लगी। गमलों से उठती गंध, छत की मुंडेर से टकराती हवा, पड़ोस के छत पर टहलते अजनबी जोड़े और गली से गुज़रने वालों की आवाज़ों के वृन्द में भी चुप्पी साफ़ सुनी जा सकती थी।
“हम कभी सच नहीं बोलते” औरत की आवाज़ में भारीपन था। “हमारी आत्मा सच बोलती है। दिल उसे बरगलाता है और दिमाग आखिरकार मूर्ख निकलता है।”
औरत झूले पर ठीक से बैठी। “मेरा सपना था कि अपना घर होगा। एक बहुत छोटा सा घर। उसमें एक कोना जो चाहिए था, वह पूरी तरह खाली चाहिए था। खाली कोना मुझे आशा और प्रतीक्षा से भरा लगता है।”
आदमी ने कहा- “आशा कैसी और प्रतीक्षा किसकी?”
“बचपन से ही लगता था कि ऐसा घर हो जहाँ मुझे कोई कुछ न कहे। मैं अपनी पसंद की सुविधा में जी सकूँ। मैं इस तरह नहीं जीना चाहती कि बाहर की दुनिया की होड़ में, अपने भीतर भी होड़ को बसा लो। वो दुनिया भाग रही है तो हम भी भागें।”
आदमी ने कहा, “हाँ, मैं समझता हूँ ठहरना कितना ज़रूरी होता है” उस आदमी की आँखों में पीला डूबा हुआ सा उजास था। “उसके पास कभी मेरे लिए बहुत सारा वक़्त था लेकिन... अब मैं प्रतीक्षा करता हूँ कि वह एक दिन वह ठहर जाये। वह मेरे लिए रहे”
औरत ने कहा, “ये अच्छी वाली प्रतीक्षा है न?
आदमी ने कहा, “नहीं”
औरत उसकी तरफ देखते हुए अचानक नीचे देखने लगी। झूले में कोई मचल नहीं थी। चाय खत्म हो चुकी थी। ज़िन्दगी बाक़ी थी।
[वह जो जा चुका हो और साथ रहता हो। उसकी प्रतीक्षा सबसे कड़ी प्रतीक्षा है]
आदमी ने औरत की ओर देखा। उसके कंधे पर धूप की एक फांक पड़ी थी। ये फांक शायद कंधे से होती हुई कमर के नीचे तक जा रही होगी। वह उठकर देख लेना चाहता था। वह उठा नहीं। “हम जब मिले थे न, तब हम एक दूजे के लिए इस तरह बेसब्र थे कि एक-एक पल किसी एक के बिना काटना मुमकिन न था। फिर जब हम साथ हुए, हमने खूब प्यार किया। ये आत्मा और शरीर दोनों माध्यमों से था। हम रसोई में चिपके खड़े रहते थे। हम दोपहरों में घंटों नीम अँधेरा किये पड़े रहते थे। इसके बाद हम कभी-कभी साथ हुआ करते थे। फिर हम बातें करते थे मगर किसी और से। हम एक दूजे को कुछ नहीं बोलते थे। अब मैं उसका पति हूँ, वह मेरी पत्नी है।” ये बताते हुए आदमी कहीं और देख रहा था फिर उसने औरत की तरफ मुँह फेरते हुए कहा, “अब बस यही है कि हम एक छत के नीचे रहते हैं”
“तो ऐसा क्यों हुआ? क्या खो गया?”
आदमी ने कहा, “अपनी प्रिय जगहों पर लौटना, उन रिश्तों तक लौटना नहीं है जिनको आप किन्ही कारणों से छोड़ चुके होते हैं। जहाँ कोई आपके साथ का इंतज़ार करता है।”
औरत ने कहा, “मैं वास्तव में किसी भी रिश्ते को छोड़ नहीं पाती हूँ। सब मेरे साथ चलते हैं। मैं जब कभी फिर से किसी पुरानी जगह पर होती हूँ तो उससे जुड़ जाती हूँ। ठीक वहीँ से जहाँ वह छूट गया था”
आदमी की सोच में औरत की आवाज़ ने दखल दिया। “इधर आओ”
वह सीढियों के पास मुंडेर पर कोहनियाँ रखकर खड़ी हुई थी। नीम के पेड की एक ऊंची शाख मुंडेर के इस हिस्से पर छाया उकेर रही थी। वहां खड़े होने से दूर तक गली दिखती थी।
आदमी झूले से उठकर औरत के पास आ गया। औरत ने कहा। “यहाँ आओ, इस जगह खड़े होकर गली को देखो” आदमी पास आया। गली जितनी लम्बी और सूनी थी, आदमी और औरत के बीच उसके उलट नज़दीकी थी। उनके बदन कहीं कहीं से छू गए थे।
औरत ने कहा, “तुम यहाँ खड़े होकर कितनी देर तक इस गली को देख सकते हो?”
आदमी ने गली को देखते हुए कहा, “अगर वह मेरे पास यहाँ खड़ी होती तो मैं इस गली को तब तक देख सकता जब तक वह यहाँ रहती।”
“तुम्हें मालूम है? मैं इस गली को यहाँ अकेले खड़े होकर देखती हूँ। जब तक वो नहीं होता।”
औरत ने कुरते की बाँह को फोल्ड करके एक बटन में टाँक रखा था। उसकी कलाई पर सफ़ेद गुलाबी आभा की दमक थी। उसकी मुट्ठी बंद थी मगर तर्जनी में पहनी अंगूठी का पीला पत्थर चमक रहा था। आदमी ने उसकी बांह पर अपनी तर्जनी से छुआ। जैसे वह एक लम्बी लकीर खींच रहा हो। वह अपनी अंगुली को उसकी अंगूठी तक ले गया।
“सुनो” औरत में कहा। “यही वो जगह है जहाँ खड़ी होकर मैं सच बोलती हूँ।”
आदमी ने सुनो कहते समय ही झटके से अपनी अंगुली को उसकी बाँह से हटा लिया था। वह औरत की तरफ देखने लगा। औरत का चेहरा हल्की लाली से भरा हुआ था। उसके होठ काँप कर ठहर गए थे।
आदमी ने कहा, “मैं जानता हूँ वह किसी और के साथ है। मैं ये बात याद रखता हूँ। अगर मैं तुम्हें बाँहों में भर लूँ और तुमको चूम लूँ तो उसके प्रति मेरी नफरत और तिरस्कार खत्म हो जायेगा। उसमें और मुझमे कोई फर्क न बचेगा। और हम अलग हो जायेंगे। अब वह मेरी नहीं है मगर मैं उसे खोना नहीं चाहता हूँ” ये कहकर आदमी चुप हो गया।
औरत ने मुंडेर पर रखी उसकी हथेली पर अपनी हथेली रखी। “मुझे ख़ुशी है कि इस जगह खड़े होने वाला हर कोई सच ही बोलता है। मैं भी ...” औरत ने अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया।
आदमी ने पूछा, “क्या मैं भी?”
“तुम अपने आपको धोखा दे रहे हो और मैं भी यही कर रही हूँ। लेकिन जानते हो सबसे बड़ा दुःख इस बात का है कि रिश्तों को बचाने के लिए किया गया सबकुछ अंततः ख़ुद को दिया धोखा कहलाता है”
आदमी धोखा शब्द इतनी बार बरत चुका था कि वो बेअसर था। उसने इस उदास बात को नज़रअंदाज करते हुए कहा, “मैंने सोचा तुम कह रही हो कि तुम भी मुझे बाँहों में भर लेना चाहती हो”
औरत मुस्कुराई।
आदमी पानी पर गिरा हुआ कोई टूटा पत्ता था। औरत अनंत प्रतीक्षा के आवेग से भरी उफनती, गरजती नदी थी किन्तु किसी पहाड़ पर खड़े विस्मृत भव्य किले सी चुप खड़ी थी।