कुछ कह रहा सम्पादक भी

प्रिय दोस्तों,

दीपक मशाल 

सबसे पहले तो दीपावली पर आप सबको बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। पर्व और त्यौहार वह ईंधन हैं जिनसे सधी हुई मानवों की गाड़ी तमाम तकलीफों के हल ढूँढते हुए जन्म स्टेशन से मृत्यु स्टेशन के बीच का सफर तय करती है। ये परोक्ष-अपरोक्ष रूप से हमारे जीवन की कई मुश्किलें आसान कर देते हैं या और हमें तरो-ताज़ा बनाने में मददगार होते हैं। भारत के जिन दो त्योहारों को आज दुनिया भर का प्यार मिल रहा है वे होली और दीवाली ही हैं। इसके कारण कई हैं लेकिन सबसे बड़ी वजह इनका उत्सव, उल्लास, रंग और रौशनी से क़रीब का नाता होना है। मनुष्यजाति उत्सवप्रेमी है और उत्सव की क़द्रदान भी, यही वजह है कि विश्व के हर देश के लोग भारतीयों संस्कृति के इन दो मूल त्योहारों को मनाते भारतीय समुदाय से जुड़ने में ख़ुशी महसूस करते हैं। 


इस बार न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र संघ के कार्यालय की बहुमंजिला इमारत को प्रकाश लड़ियों से सजाया गया है और साथ ही 'हैप्पी दिवाली' लिखा गया तथा प्रतीक चिन्ह दिया भी बनाया गया है। इस घटना को धीरे-धीरे विश्व संस्कृतियों को एक दूसरे को स्वीकारने के प्रतीक के रूप में भी लिया जा सकता है। 


देखा जाए तो यही जीने का सही तरीका भी है कि हँसते-गाते मुस्कुराते, उत्सव मनाते, प्यार बाँटते हुए जीवन जीते हुए हर मनुष्य धरती को प्राणिमात्र के रहने के लिए एक बेहतर जगह बनाए। लेकिन अफ़सोस कि कुछ लालची तत्वों ने महज़ निजी स्वार्थ के चलते विघटन की नीति निर्मित की और तभी से समय का विस्तार एक दुर्घटना में तब्दील हो गया, उसी पल से हम जो टूटना शुरू हुए तो आज जुड़ना एक असामान्य सी बात हो गई। 
इन त्योहारों का मूल उद्देश्य जन से जन को जोड़ना ही है, चाहे वह एक घर, मोहल्ले के हों या विभिन्न भाषाओँ, संस्कृतियों और देशों के। 

फिलहाल इतना ही, विश्वास है कि 'सेतु' का यह अंक आपको जरूर इसके बारे में भला या बुरा कुछ तो लिख भेजने पर मजबूर करेगा। 

आपका ही-
दीपक मशाल