कथादेश अखिल भारतीय हिन्‍दी लघुकथा प्रतियोगिता 2015

एक समीक्षात्‍मक टिप्‍पणी : राजेश उत्‍साही
सर्वप्रथम तो ‘कथादेश’ को इस बात के लिए साधुवाद के वह पिछले कुछ वर्षों से लघुकथा पर एक अखिल भारतीय प्रतियोगिता करवा रहा है।

वर्ष 2015 के लिए आयोजित प्रतियोगिता में चुनी गई 11 लघुकथाएँ कथादेश के अप्रैल, 2016 अंक में प्रकाशित हुई हैं। उन्‍हें पढ़कर थोड़ी खुशी भी हुई और थोड़ा गम भी। निराशा हुई यह देखकर कि इन लघुकथाओं के चयन पर इस अंक में कोई टिप्‍पणी नहीं है। न ही सम्‍पादकीय के तौर पर कुछ कहा गया है। अव्‍वल तो इस अंक में सम्‍पादकीय है ही नहीं। हाँ, अगले अंक में क्‍या होगा इसकी घोषणा में यह सूचना प्रकाशित हुई है कि पुरस्‍कृत लघुकथाओं पर निर्णायक (सुकेश साहनी) की टिप्‍पणी भी होगी। यह बात कुछ समझ नहीं आई। अमूमन इस तरह की प्रतियोगिताओं में चुनी गई रचनाएँ जिस अंक में प्रकाशित होती हैं, उसी अंक में निर्णायकों का मत भी होता है। इससे पाठक को चयन का परिप्रेक्ष्‍य समझने में मदद मिलती है। एक समस्‍या और है। जो पत्रिका के नियमित पाठक हैं, वे तो इस टिप्‍पणी का लाभ ले सकेंगे, लेकिन जिनके पास टिप्‍पणी वाला यह अंक नहीं पहुँचेगा, वे चयन के आधार को कभी समझ ही नहीं पाएँगे। बहरहाल मेरे केस में एक फायदा यह है कि मैं टिप्‍पणी से प्रभावित हुए बिना अपनी राय इन लघुकथाओं पर रख पाऊँगा। अगर टिप्‍पणी साथ होती तो मैं शायद उससे प्रभावित होकर पूर्वाग्रही हो जाता।

मैं पिछले लगभग साल भर से फेसबुक पर तीन लघुकथा समूहों को निकट से देखता रहा हूँ। यह देखकर आश्‍चर्य (सुखद भी और दुखद भी) हुआ कि पुरस्‍कृत लघुकथाकारों में से शायद एकाध को छोड़कर मुझे कोई भी फेसबुक पर नजर नहीं आया। अगर होंगे भी तो कम से कम इन तीन लघुकथा समूहों पर तो नजर नहीं आए।
आइए अब लघुकथाओं पर बात करते हैं। अगर आपने ये लघुकथाएँ पढ़ी होंगी, तो आपको मेरी बात ठीक से समझ में आएगी और आप उससे सहमति या असहमित व्‍यक्‍त कर सकेंगे। फिर भी मैं कोशिश करूँगा कि हर लघुकथा का सार यहाँ प्रस्‍तुत कर सकूँ।

पहला पुरस्‍कार : गाली : अरुण कुमार

लघुकथा एक सवर्ण बड़े बाबू और छोटी जाति के चपरासी चरणदास के बीच की टसल की है। बड़ा बाबू लगातार चरणदास का अपमान करता रहता है। व‍ह उसे जातिसूचक शब्‍दों से भी सम्‍बोधित करता है। अन्‍तत: चरणदास अपने प्रधान के साथ जाकर पुलिस चौकी में बड़े बाबू के खिलाफ रपट दर्ज करवाता है। पुलिस चौकी में बड़े बाबू को बुलाया जाता है और बड़े बाबू को अपनी नौकरी बचाने के लिए चरणदास के पैरों को छूने में भी हिचक नहीं होती।

1200 शब्‍दों से अधिक की यह लघुकथा बहुत प्रभावी तरीके और विस्‍तार से बड़े बाबू और चरणदास के बीच के रिश्‍तों को रचती है। लघुकथा यह कहने में सफल रहती है कि बड़ा बाबू चरणदास की छोटी जाति से बुरी तरह से नफरत करता है और जब भी मौका मिलता है, उसे अपमानित करने से बाज नहीं आता। लघुकथा  चरणदास के अन्‍दर धधक रही अपमान की ज्‍वाला को भी बखूबी दर्शाती है। लेकिन लघुकथा का लगभग अन्‍त सुखान्‍त होते-होते रह जाता है। बड़ा बाबू चरणदास से क्षमा माँग लेता है।

कोई भी संवदेनशील पाठक यह पढ़कर खुश ही होगा कि जाति के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। और जहाँ कहीं हो रहा है उसे रोका जाना चाहिए, भेदभाव करने वालों को सजा मिलनी चाहिए। लेकिन यह लघुकथा यह कहने के बाद अपने कदम जैसे पीछे खींच लेती है। लघुकथा की इन अन्तिम पँक्तियों पर गौर करें, ‘पुलिस चौकी से बाहर आते हुए बड़ा बाबू पसीने पौंछ रहा था। वह अपने आपको बेहद अपमानित महसूस कर रहा था। रही-सही कसर पुलिस वालों ने उसकी जेब खाली करा कर पूरी कर दी थी। बाहर आते हुए उसकी हालत ऐसी हो रही थी मानो बस के पहिए के नीचे उसकी गर्दन आती-आती बची हो। चरणदास की गर्दन आत्‍मविश्‍वास से तनी हुई थी तथा उसका चेहरा स्‍वाभिमान की आभा से दमक रहा था। यह देखकर बड़े बाबू के मन में जातीय द्वेष की भावना फिर से जाग्रत हो गई थी। बड़ा बाबू चरणदास के नजदीक आकर, नफरत से उसकी तरफ देखता हुआ बुदबुदाया, ‘’चरणदास...हो गई तेरे मन की पूरी। अब तो तू खुश है। पर एक बात बता चरणदास...अब तू क्‍या ब्राह्मण हो गया है?’’

चरणदास विस्‍फारित नेत्रों से बड़े बाबू का चेहरा ताकता ही रह गया। उसे लगा, मानो बड़े बाबू ने उसे फिर से गाली देते हुए उसके गाल पर तमाचा जड़ दिया है।’

मेरा पहला सवाल तो लेखक से ही है कि वह लघुकथा का इस तरह अन्‍त करके किसके पक्ष में खड़ा हो रहा है? लघुकथा की अन्तिम पँक्ति चरणदास को स्‍पष्‍ट तौर पर चरणदास को फिर से उसी जगह लाकर खड़ा कर देती है, जहाँ वह था। दूसरे शब्‍दों में लघुकथा बड़े बाबू को फिर से उसका तथाकथित सम्‍मान और चरणदास को नीचा दिखाने का नीच अधिकार वापस सौंप देती है। अब पाठक विचार करें कि अच्‍छे कथ्‍य,भाषा और प्रस्‍तुतिकरण के बावजूद क्‍या यह लघुकथा सचमुच पहला स्‍थान पाने लायक है?

दूसरा पुरस्‍कार : तो क्‍या...? : कुमार शर्मा ‘अनिल’

लघुकथा एक लगभग अ‍धेड़ चालीस बरस के पुरुष और सोलह साल की किशोरी अन्‍यना के बीच आकर्षण की है। जिसमें पुरुष की हमउम्र बेटी सुरभि की सहेली है। अन्‍यना जिस परिवार में पली-बढ़ी है, सम्‍भवत: वहाँ स्‍त्री-पुरुष के बीच लिंगभेद की जो दीवारें हैं, वे उतनी मजबूत नहीं हैं, जितनी हमारे मध्‍यवर्गीय परिवारों में दिखाई देती हैं। उसका स्‍वाभाविक सा परिणाम यह है कि अन्‍यना तमाम वर्जनाओं से मुक्‍त व्‍यवहार करती है। अपनी सहेली सुरभि के पिता के बारे में वह टिप्‍पणी करती है कि ‘तेरे पापा बहुत ही हैण्‍डसम और यंग लगते हैं।’ सहेली के पिता के गाल पर चुंबन देना शायद उसे अपने पिता के गाल पर चुंबन देने जैसा ही प्रतीत होता है। लेकिन पुरुष अपनी पुरातन पुरुषवादी सोच के चलते उसे एक स्‍त्री के आमंत्रण की तरह लेता है। और हिम्‍मत करके कह बैठता है कि ,‘पहली नजर में ही मुझे तुमसे प्‍यार हो गया  था,....पर तुम इतनी छोटी हो कि मेरी हिम्‍मत ही नहीं पड़ती थी कि तुम्‍हें कह सकूँ कि तुम्‍हें प्‍यार करता हूँ।’

‘छोटी हूँ तो क्‍या ? हमारे मैथ्‍स के टीचर राकेश सर तो आपसे भी बड़े हैं, सुरभि और राकेश सर भी तो आपस में बहुत प्‍यार करते हैं। वो तो आपस में ... प्‍यार ही तो करते हैं, तो क्‍या?’

चूँकि सुरभि पुरुष की बेटी है, इसलिए उसे यह सुनकर झटका लगता है। वैसे लघुकथा  अपने मंतव्‍य में सफल है। सम्‍भवत: लघुकथाकार यह कहना चाहता है कि तमाम पुरुष स्‍त्रियों को एक ही नजर से देखते हैं, चाहे वे फिर किसी भी उम्र की हों। ( क्‍या वे अपनी बहन,बेटियों और माँ को देखते समय यह नजर नहीं रखते हैं?) या फिर यह कहना चाहता है कि स्‍त्री-पुरुष की बीच आकर्षण एक स्‍वाभाविक प्रक्रिया है। तकनीकी और तथ्‍यात्‍मक दृष्टि से लघुकथा में कई सारे झोल नजर आते हैं। लघुकथाकार बीच में एक जगह कहता है, ‘अन्‍यना की न तो उम्र इतनी थी न उसमें इतनी समझ ही थी कि वह उसकी आँखों से उसके भावों को जान सके और चेहरे को पढ़ सके।’
मुझे लगता है कि यह शायद सही नहीं है। कानूनी रूप से अठारह साल की उम्र में किसी भी लड़की की शादी हो सकती है। यहाँ अन्‍यना सोलह साल की है। माना कि वह एक कमसिन उम्र है, पर शायद आज के परिवेश में इस उम्र में किशोरियाँ ये सब बातें बहुत अच्‍छी तरह समझती हैं। और अन्‍यना जिस परिवेश की है, वह तो समझती ही होगी। दूसरी बात लघुकथा के नायक की अपनी भी उतनी ही बड़ी बेटी है, क्‍या कभी उसके मन में उसके प्रति ऐसा कोई भाव नहीं आया ? इस बात का संकेत लघुकथा में नहीं मिलता है। अपरोक्ष रूप से ये बातें लघुकथा को कमजोर बनाती हैं। फिर भी लघुकथा हर तरह से पुरस्‍कार योग्‍य है।

तीसरा पुरस्‍कार  : दाँत कुचरनी : राकेश माहेश्‍वरी ‘काल्‍पनिक’

लगभग 100 शब्‍दों में कही गई यह तथाकथित लघुकथा है। विदेश में रह रहा बेटा बरसों बाद अपनी बूढ़ी माँ से मिलने आता है, जिसके दाँत भी गिर चुके हैं। उपहार में वह माँ के लिए सोने की दाँत कुचरनी लाता है। कथ्‍य बस इतना-सा ही है। ईमानदारी से कहूँ तो मैंने इसे तीन बार पढ़ा तब जाकर समझ आया कि इसमें कहा क्‍या जा रहा है। मैं यह लिखने तक भी यह नहीं समझ पा रहा हूँ कि इसे लघुकथा  किस आधार पर मान लिया गया है, पुरस्‍कृत करने की बात तो बहुत दूर की है।

चौथा पुरस्‍कार : एकलव्‍य की विडम्‍बना : राम कुमार आत्रेय

इस लघुकथा के पुरस्‍कृत होने ने मुझे सबसे अधिक चौंकाया। हालांकि लेखक ने एकलव्‍य की मिथकीय कथा को आधार बनाकर देश में जारी जाति आधारित आरक्षण व्‍यवस्‍था और शासकीय तथा निजी शिक्षा व्‍यवस्‍था पर तंज कसा है। तंज कसते हुए वह एक आवश्‍यक तथ्‍य की ओर ध्‍यान खींचता है, वह है आर्थिक आधार पर आरक्षण न मिलना। यहाँ तक लघुकथा ठीक ही लगती है। लेकिन अन्‍त आते-आते आरक्षण के प्रति लेखक का पूर्वाग्रह झलक ही जाता है। इन पंक्तियों पर गौर करें.... गत जीवन में अँगूठा कटवाकर सहानुभूति अर्जित कर लेने वाला एकलव्‍य समझ नहीं पा रहा था कि अपने दाएँ हाथ के अँगूठे को स्‍वयं काटकर फेंक दे अथवा आयुपर्यन्‍त व्‍यर्थ में ही उसका बोझ ढोता रहे।

अगर आप एकलव्‍य की कहानी से परिचित हैं तो यह भी जानते होंगे कि एकलव्‍य ने अपना अँगूठा द्रोणाचार्य के माँगने पर दक्षिणा में दिया था। उसने अँगूठा ‘सहानुभूति’ अर्जित करने के लिए नहीं कटवाया था। अपरोक्ष रूप से यह एक तरह से एक वर्ग विशेष पर आक्षेप ही है।

मेरा यह मानना है कि हर लेखक का एक सामाजिक दायित्‍व होता है। लेखक को उसे ध्‍यान में रखकर ही अपनी रचना करनी चाहिए। इस लघुकथा को लिखना और  पुरस्‍कृत करना एक गंभीर राजनैतिक टिप्‍पणी भी है।

पाँचवाँ पुरस्‍कार : अपना अपना ईमान : हरीश कुमार अमित

लघुकथा का सार यह है कि एक व्‍यक्ति पाँच सौ रुपए का एक नकली नोट चलाने की कोशिश में एक सब्‍जी वाले के पास जाता है। सब्‍जी वाला नया नोट देखकर बची हुई राशि वापस करने के लिए अपने गल्‍ले में नए नोट ढूँढ़ रहा होता है।

एक छोटा-सा वाकया बहुत कुछ कह देता है। कथ्‍य और उसका निर्वाह अच्‍छे से हुआ है। भाषा और गठन भी समुचित है।

छठा पुरस्‍कार : सहारा : रणजीत टाडा

संयुक्‍त परिवार के बिखरने के बाद अकेले रह गई वृद्धा की दशा दर्शाने वाली एक अच्‍छी लघुकथा है। हरियाणा की आंचलिक बोली के प्रयोग से भाषा और अधिक प्रभावशाली हो गई है। कथ्‍य और उसका प्रस्‍तुतिकरण अच्‍छा है।

सातवाँ पुरस्‍कार : खुशियों की होम डिलीवरी : जगवती

लघुकथा का सार यह है कि एक गरीब बच्‍चा किसी पिज्‍जा पार्लर के बाहर बहुत हसरत से अन्‍दर रखा हुआ पिज्‍जा देखकर लालायित होता रहता है। अंतत: वह अपनी रोटी को ही पिज्‍जा मानकर खाकर खुश हो जाता है। यह लघुकथा एक विपन्‍न बच्‍चे की गतिविधि के माध्‍यम से यह बताने में सफल रही है कि आज का बाजारवाद और उसका पिज्‍जा युग किस तरह से कुछ लोगों में खुशी भर देता है, तो कुछ केवल उसके सपने ही देखते हैं और अवसाद में घिर जाते हैं। बावजूद इसके वे अपनी उस स्थिति में भी खुश रहना सीख लेते हैं। लेखिका की यह प्रथम प्रकाशित रचना है। इस मायने में इसे उनकी उपलब्धि ही कहा जाना चाहिए। भाषा,गठन और प्रस्‍तुतिकरण बेहतर है।

आठवाँ पुरस्‍कार : बचपन-बचपन : मीरा जैन

एक बच्‍चे को जन्‍मदिन पर इलेक्‍ट्रोनिक खिलौने मिले हैं, लेकिन उनमें से कुछ को वह क्‍या, घर का कोई भी सदस्‍य चला ही नहीं पा रहा है। ऐसे में घर में काम करने वाली बाई का बेटा वहाँ आता है। उन खिलौनों को कैसे चलाया जाता है यह वह बता देता है। लघुकथा में दो बच्‍चों के बचपन की तुलना है। एक जो मँहगे खिलौनों से खेलता है और एक जो खिलौनों की दुकान पर काम करता है। कथ्‍य अच्‍छा है और प्रस्‍तुतिकरण भी बेहतर है। लेकिन लघुकथा को जहाँ समाप्‍त हो जाना चाहिए था, वह वहाँ से एक कदम और आगे बढ़ जाती है...जैसे यह कहते हुए कि इससे हमें यह शिक्षा मिलती है। जाहिर है कि वह लघुकथा का प्रभाव कम कर देती है। गौर करें...
‘वाह री सन्‍नो। यूँ तो कहेगी पगार कम पड़ती है और इतने मँहगे खिलौने छोरे को दिलाती है जो मैंने आज तक नहीं खरीदे ?’

इतना सुनते ही सन्‍नो की आँखें नम हो गईं, उसने रुँधे गले से कहा, ‘बाई जी । यह खिलौनों से खेलता नहीं बल्कि खिलौनों की दुकान पर काम करता है।’

(कायदे से लघुकथा को यहाँ समाप्‍त हो जाना चाहिए था। लेकिन वह और आगे बढ़ जाती है...)
जवाब सुन मालती स्‍वयं को लज्जित महसूस कर सोचने लगी, दोनों के बचपन में कितना अन्‍तर है।
आजकल लिखी जा रही तमाम लघुकथाएँ इस प्रवृति से ग्रस्‍त हैं।

नौवाँ पुरस्‍कार : चाँद के उस पार : सविता पांडे
लघुकथा आभासी दुनिया के दो पात्रों की है। फैंटेसी और यथार्थ का सुन्‍दर मिश्रण इसमें है। कथ्‍य भी अच्‍छा है, पर इतना उलझा हुआ कि इस लघुकथा का सार मैं दो पंक्तियों में यहाँ नहीं लिख सकता। इसे जानने और समझने के लिए इसे आपको पढ़ना ही होगा। लेकिन इस सबके बावजूद काव्‍यमयी भाषा से ओतप्रोत होने के कारण, सामान्‍य पाठक से दूर जाती प्रतीत होती है। शायद यही कारण है कि यह पुरस्‍कृत लघुकथाओं में नौवें स्‍थान पर है।

दसवाँ पुरस्‍कार : घेवर : किरण अग्रवाल

दो देशों के बीच जारी तनाव की भयावहता के चित्रण से शुरु होती यह लघुकथा  फैंटेसी से होती हुई यथार्थ पर खत्‍म होती है। …क्‍या हम यह जमीन साथ ले जाएँगे या फिर अपने हिस्‍से का आसमान ? और उसके देखते-देखते ही आसमान एक विशालकाय घेवर में बदल गया। उसने देखा एक दुकानदार है जिसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा। लोगों का एक अन्‍तहीन हुजूम है भूखा-नंगा जो ‘जिहाद जिन्‍दाबाद...भारत माता की जय...लौंग लिव द किंग’ के नारे लगा रहा है। दुकानदार घेवर काट-काटकर तौलता जा रहा है और अपना-अपना हिस्‍सा लेने को आतुर भीड़ एक-दूसरे पर टूट रही है। वह कच-कच कर घेवर खा रही है और उससे गरम-गरम ताजा खून टपक रहा है।....यह वह फैंटेसी है जो बहुत ही थोड़े में हमारे समकालीन देशकाल को सामने रख देती है। इसके दूसरे छोर पर सेना का एक लेफ्टिनेंट सीमा पर तैनात है, जहाँ युद्ध हो रहा है। उसकी गर्भवती पत्‍नी यह फैंटेसी सपने में देख रही है। चौंककर जब वह सपने से जागती है, तो उसका सामना यथार्थ से होता है। यथार्थ यह है कि इस युद्ध में उसका पति शहीद हो गया है। लघुकथा का अन्‍त इस मार्मिक पंक्ति से होता है...मृणाल का हाथ सरककर उसके पेट पर आ गया है। भीतर एक जिन्‍दगी काँप रही है।

मेरा मानना है कि बिना किसी नारेबाजी के अपनी बात कहने वाली इस सुगठित लघुकथा को पहली तीन पुरस्‍कृत लघुकथाओं में होना चाहिए था।

ग्‍यारहवाँ पुरस्‍कार : अ-जातिवादी : ओमप्रकाश कृत्‍यांश

लघुकथा संवाद शैली में है, जिसमें रेल में सवार दो यात्री एक-दूसरे से बातचीत कर रहे हैं। दूसरा पहले से यह जानने की कोशिश कर रहा है कि उसका सरनेम या जाति क्‍या है। लेकिन वह सफल नहीं हो पाता और आखिर में हारकर खुद ही यह निष्‍कर्ष निकाल लेता है कि सामने वाला उसकी तरह ही अ-जातिवादी है। यह लघुकथा से ज्‍यादा लगभग एक चुटकुला प्रतीत होती है। सच यह भी है कि लघुकथा के नाम पर ऐसी तमाम रचनाएँ सामने आ रही हैं। हो सकता है इस तरह की तथाकथित लघुकथाओं को प्रतिनिधित्‍व देने के लिए ही इसे ग्‍यारहवें पुरस्‍कार के लिए चुना गया हो।

अन्‍त में इतना तो कहा ही जा सकता है कि जिन लघुकथाओं को चुना गया है उनमें से एक (तीसरी) को छोड़कर बाकी सब अपनी भाषा,कथ्‍य के विस्‍तार तथा गठन में बेहतर हैं। हम उनसे सहमत हों या न हों, उनमें राजनैतिक और सामाजिक टिप्‍पणियाँ भी हैं। लघुकथाओं का फलक ठेठ घर से लेकर आभासी दुनिया तक का है। उनमें हमारा कस्‍बाई बाजार भी है, तो माल कल्‍चर भी।