खुशियों का आधार है - लोकाचार एवं लोकमंगल की कामना


डाॅ. मृणालिका ओझा
उस दिन मैं हैरान रह गई। हैरान क्यूँ, अवाक ही। एक अभिभावक हमारे कार्यालय में आए। उन्होंने हमारे स्कूल की शिकायत की। कहा-मेरा नन्हा सा आठ वर्ष का बेटा रोज अपना टिफिन किसी और को देता है, खुद नहीं खाता। स्कूल प्रशासन क्यों ध्यान नहीं देता ? इस बात पर मैंने तुरंत आया माँ को बुलवाया। उसने बताया कि आपका बच्चा तो अपना टिफिन गेट के बाहर तीन छोटे पिल्लों को दे देता है। मना करने पर बोलता है-’उसको भूख लगी है।’ जब मैंने उस बच्चें से पूछा तो बच्चा बोला-“मेम, उसकी मम्मी तो स्कूल बस से दब कर मर गई थी। उनको खाना कौन खिलाएगा ? मैं तो घर से नाश्ता करके आता हूँ।” इतना बोलते हुए वो डर गया, और माँ से चिपट कर रोने लगा।



इस घटना को मैं मात्र बच्चे की संवेदनशीलता नहीं कह सकती। उसके आदत-स्वभाव के कारण ही वह ऐसा करता था। अतः मैं उसके अभिभावकों से खुली चर्चा करने के उद्देश्य से उसके घर पहुंँची। जब मैं सबसे बातचीत कर रही थी तब उसकी दादीजी एक केले के पत्ते और दोने में कुछ लेकर आंगन के बाहर जा रही थी। मुझे देखकर रूकी और थोड़ी देर में आकर साथ में बैठ गई। उन्होंने बड़ी अच्छी बात बतायी। हमारे घर का नियम है “खाने के पहले देखते है - घर के बाहर कोई भिखारी या जानवर, पक्षी आदि तो नहीं है।” सबसे पहला पत्तल हम किसी भूखे प्राणी के नाम बाहर रख देते हैं। फिर खाना खाते हैं। हो सकता है, हमारा पौत्र इसी की नकल करता हो। बात स्पष्ट हो चुकी थी।


यह था हमारे दैनिक जीवन का लोकाचार। वैसे लोकाचार प्रमुखतः सामाजिक कार्यो में देखने को मिलते हैं। तो आइये इन्हीं लोकाचारों के बारे में जानें। लम्बे समय से लोग इन्हें अनगढ़ और केवल हास्य विनोद से कल्पित मानते रहे हैं। ये असाक्षरों की दुनिया हो सकती है किन्तु अज्ञानियों की नहीं। लोकमानव के पास अनुभव का ठोस ज्ञान व मानवीय संवेदनायें थी। इन्हें समझने की कोशिश करें। वस्तुतः लोकाचार “लोक मंगल” की कामना से बनाये गये। उसमें लोक का उत्साह, प्यार वह हास्य-विनोद मिश्रित होता रहा।

भारतीय संस्कृति के संदर्भ में यह बात निर्विवाद रूप से स्वीकार की जा सकती है कि लोक मंगल की भावना इसका उत्स है। संस्कृति में कुछ सिद्धांत व लोककल्पनायें आत्मसात कर लिये जाते हैं। ये तथ्य निश्चय ही अमूल्य होते हैं। अमूल्य इसीलिये कि इनमें होती है- लोकमंगल की कामना, सामाजिक एकता के मूल सूत्र एवं जीवन जीने के वैज्ञानिक दृष्टिकोण। पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुसरण में हमने अपनी संस्कृति को भारी क्षति पहुंचायी है। हमने अपनी अनेक मूल्यवान परम्पराओं को व्यर्थ व सारहीन समझकर ठुकरा दिया है। यह बात मिथ्या है कि वे केवल तात्कालिक परिस्थितियों में ग्राह्य थी एवं वर्तमान संदर्भो में उपेक्षणीय है।

आज इस प्रगतिशील युग में एकता व अखण्डता की बातें मंचों व सभाओं में सभी करते हैं, परन्तु हम सब यह भी अनुभव कर रहे हैं कि जीवन के धरातल पर से प्रेम, साहचर्य व भाईचारे के पैर उखड़ते जा रहे हैं। यह हर परिवार व समाज की स्वयं अनुभूत व्यथा-कथा है। इस तथ्य को अस्वीकारा नहीं जा सकता। अगर हम यह कहें कि इसका मूल कारण हमारे अंतःकरण से, हमारे व्यवहार से लोकमंगल की कामना का विलुप्त होना है, तो अत्युक्ति नहीं होगी तो आइयें कुछ परम्पराओं पर पड़ी औपचारिकता की धूल झाड़कर उनके मूलरूप का दर्शन करें। उचित है कि इनकी प्रवृत्ति एवं इनके लोकाचारों के वैज्ञानिक-मनोवैज्ञानिक सार्थकता पर विचार करें।

हमारी संस्कृति में विभिन्न अवसरों में विभिन्न लोकाचारों की परम्परा है। इनके निर्वहन के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गो एवं व्यक्तियों को हर सुख-दुख के अवसर पर महत्व दिया जाता था। उदाहरणार्थ-’’शिशु-जन्म’’ पर घर की वयोवृद्ध महिलाएं इस संबंध में पर्याप्त अनुभव रखती थीं, फिर भी ऐसे अवसरों पर दाई या ’’धाय’’ जिसे छत्तीसगढ़ ’’मेहराइन’’ और ’’धाय माँ’’ भी कहते हैं, उसे आमंत्रित किया जाता था। दाई जो कि आनुवांशिक रूप से इस पेशे से जुड़ी होती है, उसके निर्देशों का पूर्णतः पालन किया जाता था। शिशु जन्म के पश्चात् उसे यथा शक्ति, नेंग राशि, वस्त्र अन्न आदि प्रदान कर सादर विदा किया जाता था। इसके पश्चात नाईन को ससम्मान बुलाया जाता था। वह प्रसूतिका को तेल लगाती, मालिश करती एवं उसके केश संवारती थी। शिशु जन्म की शुभ-सूचना एवं खुशी में भागीदार होने हेतु ’’बुलावा’’ देने वह घर-घर जाती। सबके आंगन में ’’ओलिया’’ एक प्रकार का चौक पूरती, रंगोली देती तथा उसे हल्दी, गुलाल, पुष्प-पंखुरी व अक्षत से रंजित करती थी। यह इस शुभ-वांछा का प्रतीक होता कि आपके घर भी शुभ दिन आयें, आंगन सजा-संवरा व शिशु की किलकारियों से अनुगूंजित हो। इसे ’’गुड़िचार’’ कहा जाता है। गुड़ीचार उदात्त मानवीय भावना का द्योतक है।

माली को सन्देश मिलते ही मालन पुष्प वाटिका से पुष्प पत्र तोड़ लाती तथा आम्र पत्तों से तोरण बनाकर द्वार पर शुभ स्वागतार्थ लगाती थी। घर के द्वार-आंगन को दीप-कलशों से सुसज्जित करती। इसके बदलें में उसे ससम्मान नेंग-राशि, वस्त्र व पारितोषक प्रदान किया जाता। कुम्हार को सूचना मिलते ही वह घड़े में जल भर कर शगुनाचार के लिये उपस्थित होता। आगन्तुक एवं अतिथि उस जल में, नेंग राशि एवं न्यौछावर देते। गायन-नर्तन करने वाली मंडलियां भी बुलाई जाती थीं। उन्हें भी ’’न्यौछावर’’ पारिश्रमिक एवं स्मृति चिन्ह दिया जाता था। सभी संबंधियों को सादर निमंत्रित कर अलग-अलग नेंगचार सौंपकर विशेष महत्व दिया जाता था। यथा-छट्ठी लिखना एवं काजल काढ़ना (जातक की बुआ को) पीपरी पीसना व दूध पिलाना, (जेठानी को) सांेठ के लड्डू एवं पथ्य बनाना, (सासू को) पथ्य परोसना (देवरानी को) तमोर देना एवं दान-पुण्य करना (दादा-दादी) को सौंपा जाता था, शिशु-मुण्डन, केश-कर्तन, कर्ण-बेधन एवं नक-छेदन में भी सभी वर्गो व संबंधियों को पर्याप्त महत्व व आदर दिया जाता था। इन संस्कारों का वैज्ञानिक पहलू यह है कि ये मिरगी के प्रतिरोधक टीके का कार्य करते हैं। इनमें विभिन्न लोकाचारों के साथ ’’स्वर्णकार’’ का भी विशेष सम्मान होता था।

विवाह एवं उपनयन समारोहों के सैंकड़ों लोकाचारों के विविध, गहन सार्थक महत्व हैं। इनमें से एक है बारात-विदाई के समय माता द्वारा पुत्र को ’’अंचरा’’ सौंपना। इस लोकाचार में माँ क्षण भर के लिये पुत्र को आंचल में छुपा लेती है। इसी माध्यम वह पुत्र को जीवन-पीयूष के रूप में प्रदत्त दुग्ध-पान का स्मरण दिलाती है, जो उसके अगाध वात्सल्य का परिचायक हैं। मां पुत्र से यह अपेक्षा करती है कि नूतन संबंधों की उमंग में मातृत्व की उपेक्षा व अपमान न करना, क्योंकि इसी से उत्पन्न होती है, पारिवारिक कटुताएं और सामाजिक जटिलताएं। बारात विदा की ही रात ’’वर’’ के घर ’’नकटी-नाच’’ का आयोजन होता है। इसमें समाज की स्त्रियां सम्मिलित होती है। वे रात भर जाग कर हास्य-परिहास पूर्ण नर्तन, गायन व अभिनय करती है। इससे घर की सुरक्षा होती है। आजकल इस प्रथा के अभाव में प्रायः विवाह वाले घरों में चोरी की घटना सुनने में आती है। यह लोकाचार सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने का सुन्दर आयोजन होता था। अनेक धार्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक समारोहों के माध्यम से, लोकाचारों के लिये विभिन्न व्यवसाय से जुड़े लोगों को आमंत्रित किया जाता था, इससे सामाजिक संबंध सुदृढ़ होते थे। इसके साथ हीं सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि अनेक व्यवसायों एवं कलाओं को भी सम्मान मिलता था। उनके द्वारा निर्मित वस्तुओं का विक्रय भी होता रहता था, क्योंकि लोकाचारों में उनके उपयोग की अनिवार्यता होती थी। मिट्टी के हाथी, बैल, शेर, पुतले, घड़े, चूल्हे, दीए, दीप-स्तंभ तथा अनेक पात्र आयें, आंगन सजा-संवरा व शिशु की किलकारियों से अनुगूंजित हो। हस्त शिल्पकारों को एवं अनेक छोटे उद्यमियों को कला प्रदर्शन का अवसर मिल जाता था एवं उनका जीवन यापन भी हो जाता था।

कन्या विवाह में ’’धोबन-सुहाग’’ का बड़ा गूढ़ अर्थ होता है। इसमें धोबन को सुहाग-श्रृंगार की समस्त वस्तुएं, नूतन परिधान एवं यथाशक्ति आभूषण एवं धन राशि प्रदान कर उसे पूरा सम्मान दिया जाता था।
कन्या-विवाह के समय ’’घर-भरी’’ की प्रथा, प्रेम एवं समर्पण का सुन्दर उदाहरण है। कन्या घर की लक्ष्मी मानी जाती है। विदा होते समय वह अपने आंचल से धन-धान्य पीछे की ओर फेंकती है तथा स्वयं आगे बढ़ती जाती है। कन्या के मर्म से फटती पीड़ा एवं शुभकामना का यह अंतिम चरण है। इसमें ईश्वर से एक मौन प्रार्थना निहित होती है कि हे ईश्वर, मेरे गमनोपरांत भी पिता का घर धन-धान्य संपन्न हो। विपन्नता यहां का द्वार भी स्पर्श न कर सके।

जब नववधू का ससुराल में प्रथम प्रवेश होता है तो द्वारचार के अन्तर्गत परछन किया जाता हैं। नववधू की आरती, उतारी जाती है तथा धान्य एवं पुष्प से स्वागत किया जाता है। हमारी संस्कृति में बेटी की तरह बहू को भी लक्ष्मी माना जाता है। इसके चरणों को धरती पर नहीं रखने दिया जाता। इसकी राह मे नये वस्त्र के पावंड़े बिछाएं जाते हैं। उसके पग, धान, पुष्प, व चंदन युक्त टोकरी में रखते जाते हैं। कहीं कहीं दूध मे कुमकुम धोलकर थाल में रखने की प्रथा भी है। नव-वधू उस पर पग रखकर धीरे-धीरे आगे बढ़ती है। वधू को लक्ष्मी मानकर उसके श्रद्धापूर्ण आत्मीय स्वागत की अभिव्यक्ति है। इसके पश्चात् नववधूू द्वारा भण्डार खोलन, खजाना खोजना, आदि नेंगचार हास्य विनोदपूर्ण होते हैं पर इनमें भी सार्थकता होती है। ये लोकाचार घर की विभिन्न मर्यादाओं के प्रति वधू की निष्ठा को जागृत करने के उपक्रम भी होते हैं।

’’फुड़हर-पाती’’ का नेंग वर के घर में वधू द्वारा तथा वधू के घर में वर द्वारा किया जाता है। एक छिद्रमय कलश में दीप ढँककर रखा जाता है। जब वधू उसे खोलने का प्रयास करती है तो वर उसे ढँकता है तथा जब वर उसे खोलने का प्रयास करता है, तब वधू उसे ढँकती है। इसमें दोनों को यह सन्देश मिलता है कि एक-दूसरे के घर की मर्यादाओं को अपनी मर्यादा समझकर उसकी रक्षा करें।

प्राचीन समय में विवाह के अवसर पर कन्या के माता-पिता स्वेच्छा पूर्वक उसे गृहस्थी की वस्तुएं दान में दिया करते थे, ताकि ससुराल में सदस्य संख्या बढ़ने पर उन्हें विशेष कष्ट न हों। मायके व ससुराल की व्यवस्थाओं की भिन्नता का प्रतिकूल असर वधू के कार्य या जीवन पर न पड़े। इस लोकाचार का विकृत रूप ही ’’दहेज’’ है। सच तो यह है कि दिन प्रतिदिन बढ़ते जघन्य अपराध, हमारे मन से लोकमंगल की भावना के विलुप्त होने के ही परिणाम व प्रमाण हैं। लोकमंगल की भावना तो केवल हमारे शब्दों में सिमट कर रह गई हैं, जो विभिन्न मंचो, सभाओं व नारों में ध्वनित होती है। सोचना तो यह है कि क्या हमारी यह प्रगतिशीलता, जिसमें हमने अतीत की सम्पूर्ण अच्छाइयों को विसर्जित कर अपने विभत्स स्वार्थी स्वरूप को साकार कर लिया है इस मानव-संस्कृति के हित में होगी? कोशिश तो हमारी यह होनी ही चाहिये कि हम अपने हृदय में लोकमंगल की कामना को पनपने दें ताकि हमारी संस्कृति व सभ्यता इस धरती पर अमिट रहें। मानव जाति में परस्पर प्रेम व सद्भावना बनी रहे। मानवता अमर रहे।