कुछ कह रहा सम्पादक भी

प्रिय दोस्तों,

भारत के ग्रामीण अंचलों में एक प्रचलित लोककथा है जिसे विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं और अलग-अलग अंदाज़ में सुनाया जाता है खड़ी बोली में वह कुछ इस प्रकार है कि एक पिता जिसने अपने जीवन काल में एक सफल व्यापारी के रूप में काफी प्रसिद्धि कमाई, देह से मुक्त होने की उल्टी गिनती के समय उसने अपने तीनों बेटों को सफलता पाने की चार युक्तियाँ बताईं। व्यापारी ने कहा कि 'पहली बात गाँठ बाँध लो कि अपने प्रतिष्ठान के लिए छाँव में जाना और छाँव में ही वापस आना, दूसरी बात गाँव-गाँव में घर बनाना, तीसरी यह कि जिसको देना उससे वापस मिलने की उम्मीद कभी न रखना और चौथी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि जब मुश्किलों से निकलने का जब खुद कोई उपाय न सूझे तो तिमुण्डा, तिगोड़ा से सलाह-मशविरा करना।'

तीनों आज्ञाकारी बेटों ने पिता के गुज़र जाने के बाद व्यापार बढ़ाने के लिए उनके सुझाये उपायों का अक्षरशः पालन करना प्रारम्भ कर दिया। सबसे पहले छाँव में ही दुकान तक आने-जाने के लिए अपने घर से दुकान तक के पूरे रास्ते में छप्पर का निर्माण करा लिया, अब बाहर कितनी ही धूप क्यों न हो वो तीनों छाँव में ही जाते और छाँव में ही लौटते। इसके बावजूद जब व्यापार में बढ़ोत्तरी ना हुई, उलटे हानि ही दिख रही थी। तब उन्होंने दूसरा उपाय अपनाया और आस-पास के हर गाँव में अपना एक घर बनवा लिया, इस सब में खर्चा तो बहुत आया लेकिन उन्हें उम्मीद थी कि ये फायदे का सौदा रहेगा। पर इस बार भी उनकी किस्मत के ढाक के पत्तों ने अपनी संख्या में बदलाव लाने में रूचि नहीं दिखाई। तीसरा उपाय किया गया और अब उन्होंने लोगों को कर्ज़ा बाँटना शुरू कर दिया, चूँकि क़र्ज़ के वापस लौटने की उम्मीद न रखने का सुझाव मिला था इसलिए उन्होंने न बही-खाते में लिखने की जरूरत समझी और ना ही तक़ाज़ा करने की। हुआ यह कि व्यापार में नफे-नुकसान की बात छोड़िये, उनके घर-ज़मीन तक बिकने की नौबत आ गयी।   


तीनों बेटे निराश तो बहुत थे लेकिन उन्हें मन में कहीं न कहीं विश्वास था कि हो न हो चौथी और अंतिम युक्ति जरूर हमारी डूबती नैया को बचा लेगी और हमें अपेक्षित सफलता दिलावेगी। इस तरह उन्होंने अपने पिता के कथनानुसार तिमुण्डा, तिगोड़ा की खोज आरम्भ कर दी जिससे कि इस मुसीबत से उबरा जा सके। दिन बीते, फिर सप्ताह और इस तरह समय की लम्बी-चौड़ी इकाईयाँ भी बीत गईं लेकिन उन्हें न कहीं तिमुण्डा यानि तीन सिर वाला व्यक्ति दिखा और ना ही तिगोड़ा यानि तीन पैर वाला। उन्हें लगने लगा कि निश्चित रूप से इस अखिल विश्व में ऐसा कोई प्राणी है ही नहीं, तभी हुआ ये कि एक दिन भरी दुपहरी में एक नदी के किनारे भटकते हुए उन्हें अचानक नदी के उस पार कोई ऐसा व्यक्ति बैठा दिखा जिसके तीन सिर दूर से ही चमक रहे थे। उन्होंने आनन-फानन में नदी पार की और उस व्यक्ति तक जा पहुँचे, पर वहाँ पहुँचने पर देखा कि कोई वृद्ध व्यक्ति कमज़ोरी के कारण अपने घुटनों के बीच सर झुकाये बैठे हैं। तीनों हताश होकर लौटने लगे तो उन वृद्ध पुरुष ने उन्हें रोककर इस तरह आने और तुरंत लौटने का कारण पूछा, जब तीनों बेटों से सारी बात जानी तो ठहाका मारकर हँस पड़े और बताया कि तुम्हारी खोज़ पूरी हुई, असल में मैं न सिर्फ तिमुण्डा हूँ बल्कि तिगोड़ा भी हूँ। सेठ पुत्रों के कौतूहल को दूर करते हुए उन सज्जन ने बताया कि वृद्धावस्था में दुर्बलता की वजह से दोनों घुटनों के बीच सिर रखकर बैठने की जो स्थिति बनती है उसमे व्यक्ति के तीन मुण्ड के होने का आभास होता है और झुक कर चलने में मदद के लिए एक हाथ में डण्डा होता है इसलिए इस स्थिति को तिगोड़ा होना कहते हैं।   


इसके बाद उन बुज़ुर्गवार ने उनके पिता द्वारा बताये गए उपायों का सही अर्थ समझाया कि 'छाँव में आने-जाने' से आशय धूप आने से पहले दूकान जाने और सूर्यास्त के बाद लौटने से है, जिससे की अधिक से अधिक समय व्यापार के लिए दिया जा सके और साथ ही कर्मचारियों पर निगाह रखी जा सके।  इसी प्रकार दूसरी युक्ति में 'गाँव-गाँव में घर' बनाने से तात्पर्य हर ग्राहक के दिल में जगह बनाने से है, जिससे कि ग्राहक आपमें भरोसा रख सकें और प्रलोभन मिलने के बावजूद किसी अन्य के पास न जायें। ऐसे ही 'कर्ज़ देकर वापस मिलने की उम्मीद न रखने' के लिए इसलिए कहा गया जिससे कि कर्ज़ देने के समय ही लेने वाले की कोई ऐसी मूल्यवान वस्तु गिरवी रख ली जाए जिसकी कीमत कर्ज़ से अधिक हो ताकि धन वापस न मिलने की स्थिति में हानि न हो। आखिर में असफल रहने पर तिगोड़ा और तिमुण्डा से सलाह लेने को इसलिए कहा गया क्योंकि एक बुजुर्ग व्यक्ति अपने जीवन भर के अनुभवों और सीखों के आधार पर बेहतर सुझाव दे सकता है। 


यहाँ इस लोककथा को कहने का मकसद व्यापारिक सूझ-बूझ का ज्ञान देना नहीं बल्कि एक उदाहरण देकर समझाना भर है कि कई बातों के अर्थ पूरी तरह शब्दों पर निर्भर नहीं करते, कभी-कभी निगाहें आस-पास होती हैं मगर निशाना दूर होता है।

बीते महीने बहुत कुछ हुआ, भारत में जो चल रहा है सबको मालूम है, ये अच्छा है या बुरा ये तो आने वाला समय बताएगा। समय ही राज खोलेगा कि जो पिलाया गया वह कड़वी दवा थी या कि धीमा ज़हर। 
दो दिन पहले यहाँ कोलम्बस में हमारे विश्वविद्यालय के अहाते में एक ख़ास मानसिकता वाले व्यक्ति ने पुनः इंसानियत को चोट पहुँचाने की कोशिश की, हालांकि यहाँ की पुलिस की सक्रियता के चलते किसी बड़ी हानि से पहले ही उसे मार गिराया गया। 

अंत में एक ख़ुशख़बरी साझा करता चलूँ कि सेतु के प्रमुख सम्पादक अनुराग शर्मा भाई के प्रयासों के चलते आपकी सेतु को आई एस एस एन नम्बर प्राप्त हो गया है, अब आपका साथ रहा तो जल्दी ही सेतु कागज़ की खुशबू के साथ आप तक पहुँच सकेगी। 

एक बार पुनः रचनाकारों से अनुरोध है कि कृपया आगामी अंकों के लिए अपनी रचनाएँ सेतु में प्रकाशन की नियम-शर्तों को ध्यान में रखते हुए भेजें, इससे आप और हम दोनों ही अनावश्यक परेशानी से बचे रहेंगे। 

सप्रेम 
आपका-