दिवाकर पोखरियाल की कविताएँ

दिवाकर पोखरियाल

सरहद न खींचो

दो दिलो के बीच,
कभी नफ़रत न सींचों,
दो देशों से बीच,
कभी सरहद न खीँचो,

शब्दों के बना तीर,
कभी खून न बहाओ,
मज़ाक का बना सामान,
यूँ दर्द न बढ़ाओ,

चीर के दिलों को,
कभी महल न बनाओ,
वक़्त की लाठी बेआवाज़,
दिमाग़ मे ज़हर न जगाओ,

नन्हे सपनो को,
पैरो तले रौंद न जाओ,
तारे ना पाओ बेशाक़,
पर, आह! भी न पाओ,

दो दिलो के बीच,
कभी नफ़रत न सींचों,
दो देशों के बीच,
कभी सरहद न खींचो।

सपने

समुंद्र की सिसकियों को,
कभी गौर से सुनो,
फूलों और काँटों के बीच,
कभी कांटें तो चुनो,

खुशियाँ दर पर मेरे,
आ जाती है अक्सर,
ललचाकर बच्चो सा,
टाल जाती है हंसकर,

हर पल कुछ बतलाता,
पहचान सको गर,
हर घर है जगमगाता,
निकाल सको जो डर,

इंद्रधनुष सी दुनिया,
कैसी रंगहीन दिखती?
जो जागती इंसानियत,
खुशियाँ कैसे बिकती?

बस ढूँढने निकले हम,
कुछ बिखरे से मोती,
सोता है इन्सा हर रात,
ज़िंदगी नही सोती,

समय के घोड़ो सी,
बस दौड़ती रहती है,
ज़िंदगी का खेल निराला,
कभी सपनें तो बुनो।