यह भी अहले रवायत है (कविता)

अभिनव सरकार
- अभिनव सरकार 

इब्न ए आदम ने जब पत्थर घिस कर
खोजी थी आग तो उसके उफक से
धुएँ और तपिश के साथ पैदा हुई थी रवायत
रवायत ताप लेने की, रवायत भून खाने की
रवायत ढाँप लेने की, रवायत घर बनाने की

यहाँ से कुछ दूर पर आदमी से फिसल कर 
कोई लट्ठा बना पहिया तो वक़्त चलने लगा
यही से उसके साथ साथ चली कुछ रवायतें

और बसने लगे मुल्क़ दर मुल्क़, कबीले दर कबीले
शहर दर शहर, गाँव दर गाँव, गली दर गली
घर दर घर, बिस्तर दर बिस्तर और आदमी दर औरत

रवायत यह भी तब से यहाँ सब कुछ रवायत है
रवायत तोड़ना भी खुद में एक मिस्ले रवायत है
रवायत मैं भी हूँ और तू भी रवायत है 
यहाँ हर शख़्स जो बैठा है बन के दानिश ए मजमा
यह भी अहले रवायत है तू भी अहले रवायत है!

रवायत बढ़ती जाती है मगर इस नज़्म में फिरता
जो पहिया था वो फिर से लौट आया है
वहीं से लौट आई हैं उफक वाली रवायतें
यक़ीनन तापता है आदमी अब जिस्म नज़रों से
यक़ीनन आदमी अब जिस्म को ढकता है रेशम से
यक़ीनन आदमी ने खाने के अंदाज़ सीखे हैं
यक़ीनन घर बनाए हैं यहाँ पत्थर के जंगल में

मगर वह जो इस दुनिया की पहली रवायत थी
उसी तरह है बस कुछ नये मिसरे लगाए हैं
इंसाफ़ ताप लेने की, जिस्म को भून खाने की
हक़ीक़त ढाँप लेने की, रवायत घर जलाने की।