चिथड़े चिथड़े शून्य - गीताश्री

गीता श्री
अंधेरा उतर रहा था, हौले हौले। पूरे मोहल्ले पर, पेड़ों की शाखों पर, बिजली के खंभे पर, बेतरतीब फैले बिजली और केबल के तारों पर। अंधेरा इस मोहल्ले को थोड़ा शांत करता है। मोहल्ले को घेर कर जबरन बनाए गए गेट के बाहर खड़ी अंधेरे को आंखों से पीने की कोशिश कर रही थी। भीतर से आते उजाले में वह किसी को खोज रही थी। कनेर के झुरमुटों से सट कर खड़ी पीले पीले फूलों की छुअन को महसूसती रही। अचानक गाड़ी रुकी।

अंदर रोशनी जली। राजपाल। छोटी गाड़ी में! कैसे? आज तक तो ऐसा नहीं हुआ। फिर भला आज स्विफ़्ट जैसी छोटी गाड़ी। इन पोलिटिशियनों का भला क्या भरोसा। कोई भी वेश धर लें। सोचते सोचते गाड़ी में समा गई।
“कहां चलना है ? यमुना एक्सप्रेस वे चलें। बहुत सुंदर सड़क है। अपनी बातें भी हो जाएंगी।”
राजपाल ने ख़ुद ही सवाल पूछा और ख़ुद ही जवाब भी। जैसे पहले से ही तैयार हो कर आया हो।

नंदिनी ने ध्यान से देखा, आज कुछ ज्यादा ही बन ठन कर आया था। सफेद खादी का कुर्ता पाजामा तो वही था मगर आज जैकेट चढा था उसके ऊपर - बंद गले का नारंगी जैकेट। खूब फब रहा था। गोरा चिट्टा हैंडसम राजपाल उसे बहुत आकर्षित करता था, खुल कर बोलती नहीं थी। बोलना क्या है, क्यों है? उनके बीच कोई इश्क तो है नहीं। दोस्ती जरुर है जिसका रंग धीरे-धीरे दोनों पर चढ़ रहा है। आत्मीयता की गहरी परतें चढनी शुरु हुई हैं। नंदिनी को बहुत भीतर तक की यात्रा करनी है अभी। इतनी जल्दी न किसी के दिल में उतरना है न उतरने देना है। वह इन आकर्षणों से बच कर ही लंबी यात्रा कर सकती है। राजनीति के बीहड़ में उतरना कोई आसान काम नहीं। अभी तो शुरुआत है। दिल्ली आते ही राजपाल का साथ जो मिल गया था।

गाड़ी यमुना एक्सप्रेस वे की तरफ बढ़ रही थी।वह अभी तक समझ नहीं पा रही थी कि अपनी बड़ी-सी सैलून और ड्राइवर को छोड़ कर भला छोटी सी कार में क्यों आया है राजपाल? सिर को झटका दे कर शुबहों को बाहर फैंका। अब वह थोड़ा रिलैक्स महसूस कर रही थी। राजपाल के साथ छोटी गाड़ी के कारण निकटता अधिक महसूस हो रही थी। “सुना है बहुत से खेत हैं आपके पास?”
“अजी अब कहाँ? कभी थे। हवेली थी हमारी। अब तो हम भी फ्लैटो में रहने आ गए। हवेली गाँव में वीरान पड़ी है…”
“गाँव कहाँ है?”
“अजी यहीं पास में। मसूरी थाना के पास। ज्यादा दूर थोड़े ना है। ले चलेंगे कभी आपको घूमाने। हम किसान लोग हैं जी। आज भी खेत हमें सोना देते है। सोना। वैसे पार्टी के चिरकुटों को लगता है कि हम स्ट्रगलर नेता हैं। ना जी। हम क्यों मुँह खोले। सुन कर हँस लेते हैं। हम पार्टी के पैसों पर थोड़े ना जिंदा हैं।”
“पार्टी एकदम पैसे-वैसे नहीं देती क्या आपको। फंड तो आता होगा।”
“आप लोगों को मिलता है क्या?”
वह ऐसे चौंका जैसे कोई नई खबर मिली हो।
“हाँ। क्यों नहीं। महिला प्रकोष्ठ का सारा खर्चा तो पार्टी ही उठाती है जी। आप तो मुझसे पुराने हैं वहां। इतने भोले बन रहे हैं जैसे कुछ मालूम ही न हो।”
“मैडम, आप यकीन नहीं करेंगी। हम फील्ड के चैंपियन हैं। भीड़ जुटाते हैं। आप छोटे एरिया में मूव करती हैं। रैलियों के टाइम में जरूर हमें पैसे मिलते हैं पर उस पर साले बास्को की नजर रहती है।”
“कौन? बासु? अकाउंट वाला।”
“हाँ। वहीं। बहुत काईयाँ है। एक एक पैसा दाँत से पकड़ता है। जैसे उसके बाप का पैसा हो। हम तो हाथ भी नहीं लगाते पैसे को। बोरे में भर कर साला गाड़ी में पैसे डालता है, साथ में एक बोरे जैसा अपना आदमी भी पीछे लगा देता है।”
“ओह, ऐसा ... हाउ फनी!”
नंदिनी उसकी बात सुन कर हंस दी। कार में अचानक जैसे मोतियों की चमक-सी फैल गई।
गाड़ी एक्सप्रेस वे पर चढ चुकी थी। दूर तक फैली हुई चमचमाती हुई सड़क, खुरदुरी-सी। ग्रे रंग की, सितंबर के हल्के अंधेरे में चमक रही थी। कहीं कहीं गीली सड़क दिखती तो कहीं सूखी। जैसे मन का कोई ग्रे कोना, गीला होता और सूखता चलता है। कोई छोर नहीं दिखता उसका भी। वीराने वहाँ भी, यहाँ भी। सड़क के दोनों तरफ देखा। कुछ राहत महसूस हुई। हरियाली को चीर कर निकली हुई सड़क उतनी डरावनी नहीं लगी। उसने अपने मन में झाँका। बारिश भी कितनी बेइमान और मनमौजी। जेठ और सावन साथ लेकर चलती है।
“क्या हुआ? कहाँ खो गईं। आप? ये कहां खो जाती हैं बीच बीच में। कई बार नोट किया।”
राजपाल ने नंदिनी को टोका।
“आं। हां। कहीं नहीं। बस ऐंवें ही।”
“आप भी सीख गईं दिल्ली की रंगत। ऐंवे हीं।”
दोनों हँस पड़े।
माहौल थोड़ा हल्का हो गया था। नंदिनी के मन पर पड़े अवसाद धुल रहे थे। राजपाल उसे सहज लगा। राजनीति के माहौल से बाहर निकल कर दोनों शायद बेहतर महसूस कर रहे थे।
“कुछ खाएँगी?”
“यहाँ क्या मिलेगा। वीरान है यहाँ तो।”
“नहीं, मिडवे होगा। वहां रुकेंगे फिर मथुरा से पहले एक कट है, वहाँ से वापस।”
“इतना लंबा जाने की क्या जरुरत?”
“अरे। कौन हम रोज रोज जाते हैं कहीं। आप तो मौका ही नहीं देतीं।”
“मौका। मौका दूंगी तो क्या कर लोगे?”
नंदिनी ने शरारत से पूछा।
“खा जाऊंगा आपको। आप भी न ”
“चलिए छोड़िए मजाक-वजाक की बातें। जरा अपने बारे में बताइए। अच्छी बातें करेंगे तो रास्ता भी कट जाएगा।”
“मेरे बारे में जानते नहीं क्या आप। मैं जब पार्टी में शामिल हुई तब आप यहाँ नेताजी के काफी करीब थे। याद नहीं आपको।”
“यस। और आजकल। आप करीब हैं। “नंदिनी को यह स्वर अनजाना-सा लगा। वह कुछ पल के लिए समझ नहीं पाई कि कैसे रिएक्ट करे। नेता जी के करीब। ओह। तो सब लोग यही सोचते हैं , राजपाल भी।

उसने कोई जवाब नहीं दिया। वह पाँच साल पहले की उस यादगली में चली गई जहां से उसके जीवन ने करवट लिया था। हरिद्वार में पार्टी का अधिवेशन था। देश भर से पार्टी वर्कर जुटे थे। नंदिनी भी अपने शहर से महिला मंडल के साथ आई थी। वहाँ साड़ी पहनने वाली महिलाओ के बीच अकेली, उनकी लीडर, बौब कट बाल वाली नंदिनी सबको आकर्षित कर रही थी। मंच पर भाषण का दौर चल रहा था। सारे राज्यों के नेता अपने भाषण को प्रभावशाली बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे। ऊंची-ऊंची फेंक रहे थे और मंच पर नेता जी पहुँचे नहीं थे।

होटल की लॉबी से शामियाने की दूरी ज्यादा नहीं थी। लाउडस्पीकर से नेताओं की आवाज उनके कानों में पड़ रही थी। नेता जी से उनका पीए बार बार मंच पर चलने का आग्रह कर रहा था और नेता जी फुसफुसा कर कुछ पूछते और हल्के अशांत दिखाई देने लगते। कलफ लगे सफेद कपड़ो में उनकी दिव्यता को सिर्फ चेहरे की भंगिमा कम कर रही थी। नंदिनी नोटिस कर रही थी। पर वह नई नई थी। राष्ट्रीय स्तर के नेता से सीधे बात करने की हिम्मत छुटभैये नेता नहीं जुटा सकते। नंदिनी कहां से जुटाती। वह तो हाल ही में पार्टी से जुड़ी है। नेता जी से एक बार मिली थी बस। वह भी चलते चलाते, गाड़ियों के काफिले में। नमस्कार किया और नेता जी ने हाथ उठाकर बस अभिवादन स्वीकार किया। इतने में ही सब कार्यकर्ता धन्य। नंदिनी को भी अच्छा लगा। दिल्ली जाकर कभी मिल कर कुछ सलाह देने का मन था कि कैसे पार्टी को 'वीमेन फ्रेंडली' बनाया जाए। ताकि अधिक से अधिक महिलाएं पार्टी से जुड़ें। बमुश्किल बीस महिलाओं को ही जुटा पाई थी अधिवेशन के नाम पर। कस्बे में महिलाओं को बहुत मोटिवेट करने की जरुरत है। वह इस पर नेता जी के साथ मिल कर स्ट्रेटजी बनाना चाहती थी। प्रदेश सचिव रामजन्म ठाकुर मिलने दे तब ना। अपना ही नंबर बढाने से उसे फुर्सत कहां। हर दूसरे दिन दिल्ली का दौरा करता रहता है।

ये तो भला हो अधिवेशन का कि सबको हरिद्वार चलने का आदेश हुआ और कुछ प्रमुख लोगों को टारगेट दिया गया कि एक सदस्य कमसेकम दस लोग साथ ले चले। नंदिनी ने बीस को तैयार कर लिया और टाटा 407 में भर कर चल पड़ी सबको। इसके पीछे उसकी कितनी मेहनत और कितनी परेशानी रही, वो किस्सा अलग। फिलहाल वह टारगेट से ज्यादा लोग लेकर जा रही थी और इससे सबसे ज्यादा नाखुश प्रदेश सचिव था।

शामियाने में श्रोता कम दिखाई दे रहे थे। नेता का मूड खराब होगा ना। कई पार्टी सदस्य गंगा नहाने चले गए थे, लौटे नहीं। नेता जी को अपना भाषण देकर दिल्ली लौट जाना था। प्रधानमंत्री ने सर्वदलीय बैठक बुलाई थी जिसमें उनका शामिल होना जरुरी।

अचानक नंदिनी को अपना नाम सुनाई दिया। वह चौंकी। राजपाल की भी नजर नंदिनी की तरफ पड़ी। वह लगभग शामियाने की तरफ भागी। तब तक नेता जी भी उठ खड़े हुए।

“नंदिनी शुक्ला… जहाँ कहीं भीं हो, कृपया समारोह स्थल पर आ जाएँ। उनके पदाधिकारी उन्हें बुला रहे हैं।”
नंदिनी समझ गई कि कुटिल स्वभाव ठाकुर ने उसे लॉबी के आसपास मंडराते हुए देख लिया था और इसीलिए उसको वहां से बुलवा लिया। न वहाँ रहेगी न नेता जी से बात कर पाएगी।

नंदिन जब वहां पहुँची तो देखा, मंच के पास खड़ा ठाकुर कुटिल ढंग से मुस्कुरा रहा है। उसने कुछ नहीं कहा। चुपचाप खाली कुर्सी की तलाश करके बैठ गई। मंच पर सारे पुरुष नेता भरे पड़े थे। नेता जी के साथ बैठने के लिए मार हो रही थी। बड़ी-सी, रंगबिरंगे फूलों की माला लिए कुछ लोग पहले से खड़े थे। एक के हाथ में चांदी का चमचमाता मुकुट था।

नेता जी मंच पर पहुँचे। सारे उपस्थित नेताओं पर नजर डाली। राजपाल को बुलाया, कुछ पूछा। उसने सिर हिलाया-जैसे किसी बात पर अफसोस प्रकट कर रहा हो। नेता जी की निगाहें भीड़ पर गईं। वे किसी को ताड़ रहे थे। खोजी निगाहें अचानक नंदिनी पर पड़ी। राजपाल से कुछ पूछा। उसने किसी और से और फिर ठाकुर को मंच पर बुलाया गया।

ठाकुर ने जो सुना, उसके पाँव से जमीन खिसक गई। मंच संचालक अब जोश में आकर नंदिनी का नाम पुकार रहा था, “कृपया लखनपुर प्रखंड से आईं नंदिनी कुमारी मंच पर आएँ और दो शब्द कहें।”

नंदिनी खुद भी हैरान। प्रदेश सचिव के रहते पार्टी के अदना से सदस्य को राष्ट्रीय अध्यक्ष के सामने मंच पर बोलने के लिए बुलाया जाए, यह अनहोनी बात थी। वह लगभग लड़खड़ाते हुए मंच पर चढी। नेता जी के पैर छुए और माइक पकड़ लिया।

वह बोल रही थी। इतने लोगों के सामने पहली बार। उसे लगा, सामने वाद-विवाद प्रतियोगिता चल रही है और सामने कालेज के छात्र और प्रतिभागी। मंच पर अकेला एक निर्णायक नेता जी और उसे ये अवार्ड जीत कर ले जाना है। उसने पार्टी को “वीमेन फ्रेंडली” का नारा दिया और तालियाँ ही तालियाँ बजती रहीं। उसमें से एक जोरदार, भारी भरकम ताली नेता जी और राजपाल की थी।

संचालक ने भाषण लंबा होते देख कर टोकना चाहा तो नेता जी ने हाथ के इशारे से रोक दिया। नंदिनी ने देखा और संक्षेप में कुछ प्वाइंटस गिना कर धन्यवाद कह कर हाथ जोड़ लिए। संचालक ने इशारा किया कि वह वापस अपनी सीट पर चली जाए, मंच पर कुर्सी खाली नहीं है।

नेता जी ने पास बुलाया, पीठ ठोंकी और राजपाल के साथ ही मंच पर खड़े रहने का आदेश दिया। राजपाल ने बड़े आदर से उसे साथ खड़े होने की जगह दी। मंच की सीढ़ी के पास खड़ा ठाकुर कुढ़ रहा था और नंदिनी तक जलने की बू आ रही थी।मन ही मन गहन मंथन में डूबी नंदिनी गणित लगाती रही। वो समझ रही थी कि सबकुछ इतना आसान नहीं रहेगा अब। या तो पार्टी में महत्व बढ जाएगा या फिर बुरे दिन शुरु। वह खुद को दोनों ही स्थितियों के लिए तैयार कर रही थी।

नेता जी ने पीछे मुड़कर एक बार राजपाल को देखा। राजपाल उनके कानों तक झुका। झटके से सिर उठा कर उसने दाएँ बाएँ देखा, आगे की कुर्सी पर गौर से देखा। सबके चेहरे घूरने लगा। नंदिनी ने नोटिस किया कि वह कुछ बेचैन-सा था। हड़बड़ाहट में अपनी जेब टटोली। ऊपरी जेब में हाथ डाला। पेन हाथ में लेकर इधर उधर देखने लगा। जैसे किसी की सहायता मांग रहा हो। “आप पेपर ढूंढ रहे हैं?”

“जी। आपके पास है क्या। बस एक छोटा सा टुकड़ा चाहिए।” वह लगभग गिड़गिड़ाया
“क्या करेंगे पेपर का? देती हूँ। मेरे पर्स में सब कुछ रहता है। सपनों के साथ साथ।” नंदिनी ने मुस्कुराते हुए डायलाग मार दिया।
“आपके सपने बाद में देख लेंगे। पहले पेपर बढ़ाइए मैडम।”
“नंदिनी। नाम है मेरा।”
“जी। अब तो यहाँ सब जान गए हैं आपको। थैंक्स” नंदिनी ने नोटबुक निकाली और एक पन्ना फाड़ कर राजपाल की ओर बढ़ा दिया। काग़ज़ देते देत चुपके से उसके हाथ को छू भी दिया। राजपाल बुरी तरह से कन्फ़्यूज़। “आज आपने जान बचा दी। रोज़ रखता था जेब में। आज ही भूल गया।”

जल्दी जल्दी में कुछ लिखा और नेता जी के हाथ में पकड़ा दिया। नंदिनी समझ नहीं पाई कि वह पेपर में नेता जी को क्या लिख कर दे रहा है। ऐसी क्या जरुरत पड़ गई। सीढियों के नीचे खड़ा नेता जी का पीए मोबाइल पर किसी के साथ बातें किए जा रहा था। राजपाल को पीछे खड़ा करके वह खुद को आजाद महसूस कर रहा था।
नंदिनी ने सिर घुमा कर एक बारगी भीड़ पर चोर नजर डाली। सैकड़ो जोड़ी आँखें एक सत्ता पर केंद्रित थीं पर कुछ चंचल निगाहे जिनमें ईर्ष्या कूटकूट कर भरी थी, वे नंदिनी की तरफ भी आ जाती थीं। नंदिनी उन पैनोरमा व्यू वाली निगाहो के ताव को समझ सकती थी।

सभा में कोलाहल थम गया था और नेता जी ने बोलना शुरु किया। हथेलियों में दबी हुई पर्ची निकाली। उसे देख कर एक एक कर सबका नाम पढना शुरु किया। “आदरणीय मुखिया जी। सुखिया जी। बलिहारी जी। देश के कोने कोने से आए हमारे कार्यकर्ता गण। और आज की बैठक की खोज तेजस्वी वक्ता नंदिनी जी।”
जनता मंत्र-मुग्ध होकर अपने राष्ट्रीय नेता का भाषण सुनती रही। नंदिनी का ध्यान अंतिम वक्तव्य पर टिक गया-“…। हम यहां तेजस्वी महिला वक्ता के सुझाव का आदर करते हुए राष्ट्रीय कार्यकारिणी में महिलाओं का प्रतिभागिता चाहते हैं, हम आप सबसे कुछ नाम चाहते हैं जिन्हें दिल्ली बुलाया जाए और महिला प्रकोष्ठ में पदाधिकारी बनाया जाए ताकि महिला विंग मजबूत हो। संसद में तैंतीस प्रतिशत आरक्षण जब मिलेगा तब देखेंगे, उसके पहले हमें पार्टी का विकास।”

नंदिनी ने तालियों की गड़गड़ाहट के बीच ठाकुर को देखना चाहा। वह कहीं नहीं दिखा। नीचे सबसे जोरदार तालियां महिलाओं की थीं और सबसे कमजोर खुर्राट नेताओं की जो कई सालों से पार्टी में बड़े पद पर जमें हुए थे और दिल्ली तक पहुँचने का सपना पाले हुए थे। सपनों के बोझ से उनकी पलकें तक बोझिल हो गईं थीं, इन हाँफती हुई पलकों पर सपने लदे हुए थे।
“अरे। नंदिनी मैम। कहाँ खो गईं आप। हम तो आगरा पहुँचने वाले हैं।” राजपाल ने अपना हाथ नंदिनी के हाथ पर रख दिया। “क्या? ऐसा कैसे हो गया।”“आप तो गजब ढंग से खो गईं। मैंने टोका नहीं। मैं तो सड़क का आनंद ले रहा था। क्या बनाई है। ड्राइविंग का मजा तो यहां आया। दिल्ली की भयानक ट्रैफिक ने ड्राइविंग का सारा आनंद ही खत्म कर दिया है। हम इस तरफ आया करेंगे कभी कभी। आपको पता चला कि मैंने 120 की रफ्तार से गाड़ी भगाई यहां। हॉण्डा होती तो 180 के स्पीड पर भगाता। छोटी गाड़ियों में रिस्क।”

राजपाल ने रफ्तार थोड़ी तेज करके स्टेयरिंग आड़ी तिरछी घुमाई। सीट बेल्ट खोल कर आराम महसूस करती हुई नंदिनी झटके से राजपाल की तरफ झुक आई।

“हे हे हे। संभालिये। टक्कर हो जाएगी।”

राजपाल मधुर हंसी हँसा। नंदिनी को यह स्पर्श बुरा नहीं लगा। कोई आदिम गंध थी जो नथुनो में झटके से समाई और बस गई। भीड़ में सैकड़ों लोगो से सट चुकी नंदिनी के लिए यह स्पर्श अलग और मादक था।

उसके भीतर कामनाओं के असंख्य सोते फूट पड़े। उसके भीतर की कोमल स्त्री जो हमेशा कुछ सूत्री एजेंडे में दबी रहती है, वो जागने लगी थी। उसने सीट के पीछे सिर टिका दिया। आंखें बंद कर लीं। पलकें कई बार अपने ऊपर फूलों का पहाड़ रख लेती हैं। उठाए नहीं उठतीं। वह फूलों का भार महसूस कर रही थी। खूशबू कहीं भीतर रुह तक लकीर खींचती हुई उतर रही थी। चट्टानों में नन्हा बिरवा इन्हीं क्षणों में पनपता होगा शायद। जब नदी और हवा एक साथ उसकी हथेलियों पर संगीत पैदा करते होंगे। इस संगीत से वंचित थी वह। अब इस संगीत को सुनेगी। ऐसे क्षणों में वह पंख होना चाहती है जिससे बन बन कर हवाएँ निकलें। वह तरंग होना चाहती है जिससे निकलती हैं सारी आवाजें, वह फूल होना चाहती थी, जिसे छूकर तितलियाँ रंगीन हुआ करती हैं। उसे लगा कोई चीज जांघों पर सुरसुरा रही है, रेंग रही है। पलकें बोझ से दबी हुई थीं। उसने हथेलियों से टटोला। राजपाल उसे छू रहा था। एकदम जैसे करंट लगा हो, वह चिंहुक कर उठी। राजपाल डर गया, झट से हाथ खींच लिए।
अचानक राजपाल का मोबाइल बज उठा। फोन पर बात करते हुए उसके चेहरे का रंग बदल रहा था। जैसे सिनेमा के परदे पर कई रंग आते जाते रहते हैं। वह अचानक उत्साहित नजर आने लगा था।

“जी, जी। आप वहीं रुकिए जी। मैं पहुँचता हूँ। स्वागत और बधाई भाई साब …” बात खत्म होते ही वह नंदिनी की तरफ मुड़ा, “वापस चलना होगा, पार्टी ऑफिस में बुलाया गया है। कुछ खास लोग आए हैं जिनसे अर्जेंट मीटिंग होनी है। चलते हैं।”

“इतनी जल्दी। अभी तो हमने बातें भी नहीं की। मना कर दो। कैसी मीटिंग है, रात को करोगे। इतनी मुश्किल से तो हमें आज मौका मिला है …” नंदिनी का स्वर अलसाया हुआ-सा था।

“जरुरी है। जाना होगा…”

राजपाल गंभीर हो गया था। जैसे वापसी की बहुत जल्दी हो उसे। मोड़ आते ही झट से गाड़ी मोड़ी दिल्ली की ओर। गाड़ी में चुप्पी छा गई थी। वह राजपाल के मूड में आए अचानक आए बदलाव को देखकर हैरान थी। ऐसा लगा जैसे किसी अजनबी के साथ बैठी हो। यह वही राजपाल है न जिसने पहले परिचय से ही नहीं फील होने दिया कि वह अजनबी है।

“हौसले हैं तो रास्ते हैं। रास्तें हैं तो मंजिलें हैं।”

राजपाल इसी रास्ते में मिला था। बहुत महत्वाकांक्षी पर सहयोगी। पैसे और प्रभाव के दम पर राज्य सभा तक पहुँचने का सपना देखता था। वह नंदिनी के श्रम को देखता और कार में एसी चलाकर हंसता रहता है। नंदिनी उसे पसंद आने लगी थी। उसका साथ, उसके विचार अच्छे लगने लगे थे। खुद को व्यक्त नहीं कर पाता था। उसे नंदिनी का जोश, श्रम, हौसला और राजनीति का जुनून डरा देता था। वह कभी कभी उसे निरंकुश आवेग लगती थी। जो लक्ष्य के सिवा कुछ और देख नहीं पाती थी। तभी तो वह देख कर भी नहीं देख पाती कि कोई उसे देखा करता है चुपचाप। मन ही मन। पसंद करने लगा है। अक्खड़ राजपाल और बेबाक नंदिनी पार्टी को नये युवा जोश से भर तो रहे थे पर एक दूसरे से अनजान थे शायद। राजपाल ने मौका तलाश कर यमुना एक्सप्रेस हाईवे की राह चुनी। एकांत में टटोलना चाहता था, खुद को भी और नंदिनी को भी। पर अब, दोनों खामोश!

उसे लगा, यहां आकर समय खराब कर दिया। वे लौट रहे थे। खुरदुरी सड़क पर पहिए की खरखर आवाज एकांत को भंग कर रही थी। कई गाड़ियां उनकी गाड़ी को पीछे छोड़ती हुई सर्र से निकल जातीं। जैसे सब किसी होड़ में शामिल हों और अनजानी-सी प्रतियोगिता चल रही हो। राजपाल पिछड़ रहा था और नंदिनी। वह अब भी राजपाल के बारे में सोच रही थी। उसके संगसाथ, उसके होने न होने के बारे में, जीवन में उसके संभावित साथ के बारे में, उसके अब तक के सारे सहयोग के बारे में, उसके हंसोड़ स्वभाव के बारे में। उसके पैसे और घमंड के बारे में। रसूखदार लोगों की संगति के बारे में। वह रैली के दौरान अपनी गाड़ी में बोरे में भर कर रुपया ऐसे ले गया था जैसे कोई मंडी से सब्जी खरीद कर ले जाता है। पैरों के पास पड़ी रहीं बोरियां।

नंदिनी को सामने सुंदर-सा, रोशनी में डूबा स्टेडियम जैसा दिखा। ट्रैक जैसा बना हुआ। उसे देखने लगीं, शीशे के पार। नंदिनी ट्रैक को घूरती रही। लगता है यहां गाड़ियों की रेस होती होगी। हरियाली के बीच बना हुआ। दिल्ली से बाहर कितनी शांति और सुंदरता है, उसे लगा। राजपाल के साथ आना चाहिए इस तरफ।

शहर में दाखिल होते ही राजपाल ने नंदिनी को कहा, “आप यहीं उतर जाएँ, कोई आटो ले लें। पांडव नगर ज्यादा दूर नहीं है।”

नंदिनी अड़ गई। “मुझे भी पार्टी ऑफिस जाना है। कुछ काम निपटा लूंगी। चलो, तुम अपनी मीटिंग करना, वापसी में साथ चलेंगे …” नंदिनी को जिद पर अड़ा देख कर उसने गाड़ी पार्टी ऑफ़िस की तरफ़ बढ़ा दी। उसके चेहरे से साफ़ ज़ाहिर था कि इस वक्त वह नंदिनी को साथ नहीं ले जाना चाहता था। नंदिनी बेपरवाह बाहर के अंधेरे को भेदने की कोशिश करती रही।

पार्टी आफिस की पार्किंग में गाड़ी पार्क करते ही राजपाल झपटता हुआ पीछे साइड की तरफ बढ़ गया जहां पार्टी पदाधिकारियों के लिए छोटे छोटे कमरे बने हुए थे। कमरों के बाहर ही कुछ लोग खड़े थे। एक डीलडौल वाला आदमी अपने समर्थको से घिरा हुआ खड़ा था।

“अरे भाई साब। आप आ गए बाहर। बहुत बहुत स्वागत। उन्नीस साल बाद की आजादी। कैसी लग रही है आपको। मैं आता हूं आपसे मिलने। पैरोल पर आएं हैं? ओह।”

“भाई साब। मरवा दिया सालों ने आपको। मैं न कहता था। आपका प्रभाव इतनी तेजी से बढ़ रहा था कि ... नहीं तो आज आप दिल्ली के मुख्यमंत्री होते। कहां आप भी ...” राजपाल खुशी के मारे कुछ भी बोले जा रहा था। वह बात करते करते उस अजनबी के गले लग जाता।

“भाई साब। ऐसी भी क्या आपकी मति मारी गई थी कि तंदूर में झोंकने चले गए। हम किसान लोग हैं। जमीनें हैं अपनी। आप एक बार हुक्म देते, हम विदेश में थे तो क्या हुआ। वहीं से सब मैनेज करते। उनके टुकड़े अपने खेतों में गाड़ देते। गन्ना उगा देते भाईसाब। कानोंकान खबर ना लगती किसी को। पुलिस ढूंढती रह जाती जिन्दगी भर। खेतो में अबतक कितने खप गए, किसे पता। और क्या।”

“आपने गलती कर दी। हमसे कहा तो होता। गलती हो जाती है भाई साब। सबसे होती है। इतनी बड़ी बात नहीं थी। आपको सोचना चाहिए था। मैं समझ सकता हूं भाई साब। होता है। कोई भी मार देगा। खून तो खौल ही जाता है। आप क्या, हम भी हों तो। चलिए नेता जी से आपकी एक गोपनीय मीटिंग करवाता हूं।” अपने आसपास सबकी उपस्थिति भूल कर राजपाल खुशी के मारे उत्तेजना में सबकुछ एक ही सांस में बोले जा रहा था।

पलटा तो देखा, नंदिनी पीछे खड़ी है। अवाक्। आंखें भरी हुईं। होंठ कंपकंपा कर कुछ कहना चाहते हैं पर बोल नहीं फूट रहे हैं। ओह। ये चेहरा तो कुछ जाना पहचाना लग रहा है। अजनबी-सा चेहरा अचानक तंदूर में बदल गया। राजपाल के चेहरे से भी आग की लपटें उठतीं दिखाई दीं।

कई कई तंदूर। राजपाल के खेतों में बस तपते हुए तंदूर ही दिखाई देने लगे। हर तंदूर में जलती हुई एक स्त्री का अक्स दिखाई साफ़ दिखने लगा। उसकी जलती हुई देह छिटक रही है। वह छटपटा रही है, चीख रही है। उसकी आवाज को आग की चटक दबा रही है। कोई घेर कर खड़ा है। वह अट्टहास कर रहा है। ओह। और आसमान भी तंदूरी रंग का हो गया। हवा की तरह भरने लगे सवाल उसकी त्वचा में, वह फूल रही है। गलत जवाब की एक सूई फोड़ देगी उसे, वह चिथड़े चिथड़े हवा में। सन्नाटे में डूबी वह बड़बड़ाने लगी। “सवालों दफा हो जाओ, मैं शून्य हो जाना चाहती हूं।”

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