बेटियाँ हमारी सजगता

डाॅ. प्रतिभा पाण्डेय
सारांश:
आज वैश्विकता के दौर में हम आधुनिक हुए। परिवर्तन हुए। समय ने करवट ली। हम पश्चिम से प्रभावित हुए। बहुत सी कुरीतियों से अपने आप को मुक्त नहीं कर पाए। अपनी मानसिकता में परिवर्तन नहीं कर। ऊपरी आवरण को बदल लिया आज आवश्यकता थी। वर्तमान, भविष्य के लिए अपने आपको सुधारने की। आज लड़कियों का अनुपात कम है। लड़कियों को कहीं-कहीं कोख में ही मार दिया जाता है। लड़कियाँ असुरक्षित हैं। मार्डन होकर हमने रूग्ण परम्पराओं को नहीं त्यागा। इसी संदर्भ में प्रस्तुत  शोध लिखा गया है।
बेटियाँ आन हैं, बान हैं, शान हैं, सब कुछ तो हैं बेटियाँ फिर ऐसा क्यों होता है कि बेटे के लिए लालसा बनी ही रहती है। एक भ्रान्त पुरातन धारणा भारत में अमिट रूप से बनी हुई है कि लड़के से वंश चलता है। यह सत्य है कि किन्तु महत्व तो लड़कियों का भी है। यदि सभ्ज्ञी यह प्रायोगिक रूप से चाहने लगें कि बेटा ही होना चाहिए बेटी नहीं तो कुल वृद्धि तो रूक ही जायेगी। कहा जाता है ’बेटे से बेटी भली’ यह उक्ति आज चरितार्थ भी है।

आज भी कुछ प्रान्तों में बेटी पैदा होने पर नमक की बोरी के साथ फैक दिया जाता है। बेटे के पैदा होने पर उत्सव और बेटी के पैदा होने पर उदासी। वर्तमान समय में बदलाव हुए उनसे जनमानस की मानसिकता में भी बदलाव आया। अब दोष बड़े बुजुर्गो को दिया जाता है कि लड़की को बेटी को जन्म देने पर परेशान किया जाता है। परिस्थितियाँ बदलीं। बड़े लोगों ने बड़ी उदारता से बेटी को लक्ष्मी मानकर अपनाया है। मध्यप्रदेश  शासन ने तो लाड़ली लक्ष्मी योजना, लड़कियों के लिए बहुत सी सुविधाओं वाली योजनाएँ चलाई हैं। जिनसे वे ’लाड़ली लक्ष्मियाँ’ लाभान्वित हो रहीं है।

अपवाद सभी जगह होते हैं। क्या यह विचारणीय नहीं कि बेटी को जब दुनिया में आने से पहले ही मार दिया जाता है तो उसमें सहयोगी उपकरण, सहयोगी व्यक्ति ने बेटियों के लिए इतनी सावधानी वाले  शासन में जो कृत्य किया। वह अक्षम्य होना चाहिए। व्यक्ति बनाने में यदि असमर्थ है तो बिगाड़ने में समर्थ क्यों? आर्थिक लाभ से प्रेरित जो लोग भी यह करते हैं वह निंदनीय है।

निःसंदेह ’बेटी’ ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट कृति है। इसीलिए कहा है ’बेटी है तो कल है’ यानि वह आगामी समय भविष्य जिसको बेटी होने के कारण बनने से रोका जा रहा है। बेटी ही तो निर्मित करेगी। पी-िसजय़याँ खींचने वाली बेटी ही हैं। बेटे के सहयोग से ही सब संभव है अपेक्षित है। लेकिन मूल में बेटी है। जयशंकर प्रसाद ने कामायनी जैसा महाकाव्य रचा। कामायनी की मूल नारी पात्र श्रद्धा है जो पुरूष पात्र मनु को सृष्टि के सृजन के लिए प्रेरित करती है। आज बेटियों के अनुपात में कमी आई है। एक समाचार पत्र के अनुसार कुछ क्षेत्र विशेष ऐसे हैं जहाँ अविवाहित पुरूष अधिक हैं। यह विडम्बना बेटियों को दुनिया देखने से पहले ही खत्म कर देने के कारण है। और बेटों में अनुपात भारत में 1000 लड़कों का है तो बेटियों का 943, ब्राजील में 1031, रूस में 165, चीन में 980, दक्षिण अफ्रीका में 1109, पाकिस्तान में 942, हमारे भारत की स्थिति ही दयनीय है। पाकिस्तान और भारत दोनों बराबर हैं।

हमें तो अपनी प्रगतिशीलता, अति आधुनिकता, मार्डनिज्म को देखना है। हम इतना आगे बढे कि विदेशों में भारत की कुशाग्र बुद्धि उन्नति के शिखर पर है। लेकिन कुछ मामलों में रूढिवादी ही रह गये हैं। पढे लिखे लोगों ने भले आँंतरिक निराशा से स्वीकार किया हो किन्तुू जब बेटी पैदा हुई तो उत्सवों को आयोजित भी किया और यह साबित कर दिया कि बेटी ही सब कुछ है। हम सचेतन इतने हुए कि प्रत्येक क्षेत्र में दखल देने लगे। रोकथाम के लिए प्रायः चिकित्सकों की सलाह ली जाती है लेकिन भारत में पश्चिमी देशों की तरह बिना चिकित्सकीय सलाह के लिए दवा देने पर प्रतिबंध नहीं है। तो बहुधा प्रतिबंध अपने आप लगा लिए जाते हैं।

 शासन के प्रयासों नित नए-नए कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे हैं। ’बेटी बचाओ’ क्लबों के द्वारा जन चेतना जाग्रत की जा रही है। हमारे देश में सेलीब्रिटीज भी पीछे नहीं हैं। अविवाहितों के द्वारा बेटियों को गोद लिया जा रहा है और उनके पालन-पोषण की जिम्मेदारी एक माँ की तरह ही उठाई जा रही है।

समाज में इतनी अत्याधुनिकता आई, कि सेलिब्रिटीज अविवाहित लड़कियों ने नवागत बच्चियों को गोद लिया और उच्चस्तरीय पालन-पोषण और देखभाल के साथ जिम्मेदारी निभाई तो यही समाज इस कुरीति को क्यों नहीं तोड़ पाया कि बेटी का जन्म कोई बुरी बात नहीं बल्कि अच्छा ही है। पिछड़े और कमजोर तबके के कुछ उदाहरण देखने में आये कि किसी महिला को बेटी को जन्म के बाद फेंक देना पड़ा। कुछ समय पश्चात महिला अपनी ममत्व को रोक नहीं पाई और निश्चित स्थान से बच्ची को वापिस ले आई। ये छोटी-छोटी घटनायें समाज के उन नियमों को तोड़ने के लिए प्रेरित करती हैं जो पूर्णतया कट्टरता के साथ सिर्फ ’बेटी’ के लिए बनाये गये। सृजन विधाता का और विध्वंस मानव का आज जब बेटियाँ कोख में ही मार दी जातीं हैं तो बेटी बचाओ क्लब के माध्यम से बेटी बचाई जा रही है। महिलायें ही जागरूक हो रही हैं तो शायद अब बेटियाँ सुरक्षित हो जाएँ। आज बेटियों के लिए समानता के अधिकार सुरक्षित हैं। सन् 2005 में महिला हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम आया। इस अधिनियम के अनुसार पुत्री को पिता की सम्पत्ति में बराबर का हक़ प्रदान किया गया है। यानि जो पुत्र के अधिकार हैं वही पुत्री के भी हैं। पहले बेटियाँ पिता के घर रह सकती थी परन्तु उन्हें सम्पत्ति पर अधिकार नहीं था। बेटी की उसकी माँ की सम्पत्ति में भी हिस्सेदारी होती है बालिक महिला का स्वअर्जित सम्पत्ति व प्राप्त उपहार पर पूरा अधिकार होता है। आज संविधान के अंतर्गत बनाये गये नियमों में विवाह के पश्चात बेटी को घर में भी संरक्षण प्राप्त है। संरक्षण अधिनियम में महिलाओं के अधिकारों को प्रभावी रूप से रखा गया है। महिलायें स्वयं भी बेटियों के हितों के सुरक्षा के लिए प्रयासरत हैं।

आज धारणाओं में परिवर्तन आया है। बेटी परायी है, पराये घर की है। वह दूसरे का वंश चलायेगी इस तरह की सूक्तियों में पुरानापन आया है। अब यह सुनने में प्रायः आने लगा है कि बेटा-बेटी दोनों बराबर है। बेटी के ससुराल विदा होने के बाद भी माता पिता चिंतित बने ही रहते हैं। व-ुनवजर्याो पुराने जमे वट वृक्ष की तरह जमी पुरानी परम्पराओं की गहरी पैठ होने के कारण पुत्र मोह उन्हें आक्रान्त किये ही रहता है, अपने निर्वासित होने का डर भी मन को भयाक्रांत किये रहता है। सांस्कृतिक विरासत के अमिट चिन्ह मनोमस्तिष्क में गहरे होने के कारण कुछ स्थनों पर बेटी के साथ असमानता देखी जा सकती है। कुरीतियाँ गहराई से छाई होती हैं। उन्हें बदलने में लम्बा समय लगता है किन्तु दिमागों ने यह परिवर्तन स्वयं किया है ’बेटी’ से मुँह मोड़ने की जगह उन्हें अपनाया है।

जापान में बेटी को पढने की सुविधा देने के लिए स्पेशल ट्रेन चलाई गई है। केवल बेटी पैदा होने ही नीं उसके उज्जवल भविष्य के लिए बनाई गई योजनाएँ सार्थक हैं। यह प्रगतिशीलता हमारे देश में भी आई। हालांकि आनुपातिक दृष्टि से अभी यह परिवर्तन नहीं आया है। परन्तु आज उन्नति के शिखर पर बेटियाँ भी हैं। आज लड़कियाँ ट्रक, हवाई जहाज, सवारी आॅटो रिक्शा चला रही है। धरती से आकाश, क्षितिज को भी बेटियाँ छू रही हैं। बेटियों के लिए राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाये जा रहे हैं। बेटियों को बचाने और दुनिया में लाने का प्रयास किया जा रहा है। हमारे देश की बेटियाँ न केवल घरों में वरन् पुलिस और सेना में  शामिल होकर अपनी दक्षता का प्रमाण दे रही हैं। यानि बदल रही हैं मानसिकता, बदल रहे हैं लोग। परिवर्तन भी तो ऐसे ही संभावित हैं। बंधन उस मानसिकता और क्षेत्र पर लगने चाहिए जो बेटियों के व्यक्तित्व को गढने में बाधक है।यह भी जननी बन जाती है। और परिवार में सृजन करती है। इस निर्माण से ही परिवार और समाज चल जाता है। जब कुछ सामाजिक कुरीतियाँ राजा राममोहन राय, दयानंद सरस्वती द्वारा समाप्त की गई। तो हम इस कुप्रथा ’जिसमें बेटी को उतना महत्व नहीं मिल पाता जितना बेटे को,’ बेटी-बेटे से कम है को रोक नहीं सकते है। क्योंकि समानता का अधिकार और कानून परिवारों की आंतरिक रूढियों को मिटा नहीं पाते। जिसमें बेटी को जीवन के आगामी आयामों से सफलतापूर्वक गुजरने के लिए अपना मन मार कर सामंजस्य, तालमेल की स्थिति निर्मित करनी पड़ती है। वरना सम्बन्ध, रिश्ते, भावनायें तो काँच की तरह होते हैं जो जरा सी असावधानी से टूट जाते हैं। यह त्यागमयी प्रयास बेटी के ही द्वारा किया जाता है बेटे के द्वारा नहीं।

यह कहा जा सकता है कि सृष्टि विधाता की है सृजन में नारी का आना रोकना एक अपराध भी है। जब हम जघन्य अपराधों को रोक नहीं पा रहे हैं। एक चार वर्षीय बालिका भी सुरक्षित नहीं है। लड़कियाँ पढने की उम्र से ही असुरक्षा के घेरे में कैद हो जाती हैं तो हमारा दायित्व यह बनता है कि नवजात कन्या को दुनिया में लाने में मिलजुलकर प्रोत्साहित करें। और ऐसी स्थितियाँ निर्मित करें कि आनुपातिक रूप से बेटियाँ कम न हों ताकि बेटियों पर कुदृष्टि न पड़े। दुनिया भले ही असुरक्षित हो जाये पर बेटियाँ असुरक्षित न हों।

संदर्भ -

1-  पत्रिका, दिसम्बर 19, 2015
2-  दैनिक भास्कर, मधुरिमा 26. पृष्ठ 18

डाॅ0 प्रतिभा पाण्डेय
सहायक प्राध्यापक
शासकीय स्नातकोत्तर स्वशासी महाविद्यालय, दतिया, म0प्र0
क्वार्टर नम्बर- 70, हाथीखाना, दतिया, म0प्र0
मोवा. 9993948272, 07522&233057