काशी बस के क्या हुआ जो घर औरंगाबाद - संस्मरण


    घटना वर्षों पुरानी है। हम अपने वरिष्ठ व्याख्याताओं के साथ अखिल भारतीय अँग्रेजी शिक्षक सम्मेलन में भाग लेने राँची से पुणे पहुँचे थे। सम्मेलन समाप्ति के बाद हम सभी फरग्यूसन महाविद्यालय से अपने साजो-सामान के साथ ऑटो पर बैठकर पुणे बस स्टैण्ड, शिवाजीनगर, पहुँचे। ऑटो किराया निर्धारित होने के बावजूद मैंने ऑटो वाले से भुगतान हेतु किराया पूछा। ऑटो चालक ने निर्धारित रकम से अधिक की माँग की। मैंने कहा, ''बदमाशी मत करो! तुम निर्धारित राशि से अधिक माँग रहे हो?"
इतना सुनते ही ऑटो चालक की आँखें पूरे चेहरे के साथ लाल हो गयीं। तत्क्षण मैंने पूछा, "आपका चेहरा लाल क्यों हो गया? क्या हो गया?" फिर भी ऑटो चालक कुछ नहीं बोला। लेकिन बगल में खड़े दूसरे ऑटो पर बैठे एक अन्य चालक ने कहा, "साहब! किराया दीजिए या मत दीजिए। परन्तु उसे बदमाश मत कहिए। वह स्नातक है।"
यह सुनकर, मैं अवाक् रह गया और अपने को कोसने लगा। काशी बस के क्या हुआ जो घर औरंगाबाद। पढ़ा तो था-
प्रियवाक्यवादेन सर्वेतुश्टन्ति जन्तवः। तस्मातैव व्यक्तव्यम् वचने किं दरिद्रता।।
(प्रिय वाक्य बोलने से सभी जीव-जन्तु संतुष्ट होते हैं फिर उसे बोलने में दरिद्रता क्यों?)

रहिमन जिह्वा बावरी, कह गयी सरग पाताल।
आपु तो कह भीतर गयी, जूती खात कपाल।।
ऐसी वाणी बोलिए,   मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय।।

चक्षु पुतम् न्येतसपादम, वस्त्रपुतम् जलम् पिबेत।
सत्य पुतम् वदेत वाक्यम्, मनः पुतम् समाचरेत।।
(आँखों से देखकर पैर रखना चाहिए, वस्त्र से छानकर जल पीना चाहिए, सत्य को परख कर पवित्र वाणी बोलना चाहिए और मन से सद् आचरण करना चाहिए।)

लेकिन जिस प्रकार एक साधु द्वारा तोतों को पढ़ाया गया था कि-
शिकारी  आएगा, जाल  बिछाएगा। दाना डालेगा, लोभ से फँसना नहीं।।

उस साधु ने तोतों को परखने के लिए उन्हें मुक्त कर दिया। वन में स्वच्छंद विचरण करते हुए तोते हमेशा यही रटते रहते थे, ‘शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, लोभ से फँसना नहीं। तभी वन में आया हुआ बहेलिया सोचने लगा आज तो उसका आना व्यर्थ हुआ क्योंकि तोते बहुत होशियार हैं। परन्तु बहेलिये ने सोचा कि यदि वह जाल नहीं डालेगा तो भी उसका आना व्यर्थ ही होगा। फिर क्यों न जाल बिछाकर अपना कार्य कर लिया जाए? कम से कम श्रम नहीं करने का अफसोस तो नहीं रहेगा। बहेलिया ने अपना कार्य किया और तोते पाठ पढ़ते-पढ़ते जाल में फँस गए थे। उसी प्रकार की स्थिति मेरी भी बन गयी थी। लेकिन दूसरे अनजाने मित्र (ऑटो चालक जिसने स्थिति से अवगत कराया) के प्रत्युत्तर ने मेरे खोखलेपन का न केवल एहसास कराया बल्कि अद्यतन बिना विचार नहीं बोलने की प्रवृत्ति डाल दी। सत्य है, शिक्षित का साधन है-अनुभव। तत्क्षण सामीप्य वाला जीव-मित्र।

मैंने माँगे गए पैसे से कुछ अधिक पैसा ऑटो चालक को देना चाहा पर ऑटो चालक ने अब निश्चित रकम ही ली क्योंकि वह जान गया था कि मेरे पास खेद व्यक्त कर क्षमा याचना के सिवाय कुछ शेष नहीं था।